कांग्रेस से अघोषित लड़ाई में खुद ही सिमट गये विपक्षी दल
कांग्रेस को लेकर क्षेत्री दलों को होने वाली दुविधा अब बरसों पुरानी हो चली है. अटलबिहारी वाजपेयी और लालकृष्ण अडवाणी की जोड़ी ने जब से हिंदी पट्टी के साथ गुजरात और महाराष्ट्र बल्कि बाद में कर्नाटक में भी अपनी स्थिति मज़बूत कर ली तो क्षेत्रीय दलों को कन्फ्यूज़न होने लगा कि उन्हें लड़ना किससे है. बाद के वर्षों में भाजपा की स्थिति और मज़बूत हुई तो कांग्रेस की तरफ झुके तो लेकिन तब असुरक्षा भी महसूस हुई कि कहीं हमें निगल ही ना ले. इसी पृष्ठभूमि में हाल ही के विधानसभा चुनावों के बाद वरिष्ठ पत्रकार राजकेश्वर सिंह का यह विश्लेषण प्रस्तुत है जिसमें वह बता रहे हैं कि क्षेत्रीय दलों की इस दोषपूर्ण रणनीति का नुकसान इंडिया गठबंधन को ही हुआ है.
कांग्रेस से अघोषित लड़ाई में खुद ही सिमट गये विपक्षी दल
राजकेश्वर सिंह
देश की राजनीति एक बार फिर करवट बदल रही है। ख़ासतौर से क्षेत्रीय दलों की राजनीति पर संकट कुछ ज़्यादा ही गहराता जा रहा है। महज एक दशक के भीतर ही क्षेत्रीय क्षत्रपों के हाथों से कई राज्यों की सत्ता ही नहीं छिनी, बल्कि वे बड़ी टूट के भी शिकार हुए। यह सिलसिला अब भी जारी है। सवाल उठना लाजिमी है कि क्षेत्रीय दलों ने आखिर ऐसा क्या किया कि सिलसिलेवार ढंग से वे हाशिए पर जाते जा रहे हैं और उनसे ख़ाली जगह की भरपाई भाजपा जैसी राष्ट्रीय पार्टी कर रही है।
क्षेत्रीय दलों की राजनीति के बंटाधार का ताज़ा मामला पश्चिम बंगाल से है, जहां तीन बार लगातार मुख्यमंत्री रहने के बाद ममता बनर्जी और उनकी पार्टी न सिर्फ सत्ता से बाहर हुई, बल्कि उनकी पार्टी की ऐसी दुर्गति हुई कि उनके दो तिहाई से अधिक विधायकों ने पार्टी को भी तोड़ दिया। इससे पहले महाराष्ट्र में शरद पवार की पार्टी नेशनल कांग्रेस पार्टी ( एनसीपी) और उद्धव ठाकरे की शिवसेना भी इसी गति को प्राप्त होकर सत्ता से बाहर हो चुकी है। दिल्ली में आप आदमी पार्टी का भी दो बार अपनी बदौलत सरकार में रहने के बाद ऐसा ही हस्र हो चुका है।
हालिया विधानसभा चुनावों में तमिलनाडु में भी छह दशक पुरानी और एक के बात एक लगातार सरकार में बनी रहने वाली दो क्षेत्रीय पार्टियां डीएमके और एआईएडीएमके भी एक झटके में राज्य की सत्ता से बाहर हो गईं। हालांकि वहां की सत्ता पर महज दो साल पुरानी दूसरी क्षेत्रीय पार्टी टीवीके ही क़ाबिज़ हो गई। टीवीके को छोड़ दें तो यह बात गौर करने वाली है कि बाकी के क्षेत्रीय दल प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और भाजपा के खिलाफ एकजुट होकर लड़ने के लिए बने इंडिया गठबंधन का हिस्सा रहे हैं। उसी इंडिया गठबंधन का हिस्सा रहने वाले तेजस्वी यादव का राष्ट्रीय जनता दल भी बिहार की राजनीति में इस क़दर हाशिये पर पहुंच चुका है कि कभी जनता दल-यू जो उसकी प्रतिद्वंद्वी होती थी, उसकी जगह अब भाजपा ले चुकी है और जनता दल यू को भी उसका पिछलग्गू होना पड़ा है। इस कड़ी में तेलंगाना भी ज़िक्र ज़रूरी है, जहां क्षेत्रीय पार्टी टीआरएस सत्ता से बाहर हो चुकी है और वहां अब कांग्रेस क़ाबिज़ है।
आख़िर यह नौबत आई क्यों ?
दरअसल देखा जाये तो राज्यों में बीते दशकों में चमके कई क्षेत्रीय राजनीतिक दल कभी राष्ट्रीय राजनीति की धुरी रही कांग्रेस से अलग होकर ही बने थे। शरद पवार और ममता बनर्जी की पार्टी तो सीधे तौर पर, जबकि कई दूसरे क्षेत्रीय दल कांग्रेस से छिटके मतदाताओं और जातीय राजनीति का सहारा लेकर बने थे। जाहिर है सत्ता में बने रहने के लिए ऐसे क्षेत्रीय दलों ने वैचारिक सिद्धांतों की राजनीति के बजाय जातीय गोलबंदी और तिकड़म से चुनाव जीतने का फ़ार्मूला अपनाया और काफी हद तक वे उसमें कामयाब भी रहे, लेकिन जब उन्हीं दलों का पाला सौ साल पुराने सांस्कृतिक व सामाजिक संगठन आरएसएस की राष्ट्रवाद की वैचारिकी से बनी भारतीय जनता पार्टी से पड़ा तो वे अब न सिर्फ पिछड़ते जा रहे, बल्कि एक तरह से पतन की राह पर हैं।
हाल के वर्षों में वैचारिक तौर पर संगठन की मजबूती के साथ केंद्र के अलावा कई राज्यों में अपनी सरकार बना चुकी भाजपा ने क्षेत्रीय दलों के सामने संकट की एक ऐसी स्थिति पैदा कर दी है, जिसका तात्कालिक तौर पर ठोस निदान इन दलों के पास नहीं दिखता।
विपक्षी खेमें में शामिल क्षेत्रीय दलों के साथ कांग्रेस ही एक ऐसी पार्टी है, जो राष्ट्रीय राजनीति से लेकर राज्यों तक में बहुत हद तक सिमटने के बावजूद विचारधारा की राजनीति पर अब भी क़ायम है। वह भाजपा के धार्मिक राष्ट्रवाद के वरक्स धर्मनिरपेक्ष राष्ट्रवाद की राजनीति से टस से मस नहीं हुई है। भाजपा भी कांग्रेस की वैचारिक राजनीतिक धारा ठीक से समझती है। यही वजह कि देश में चाहे लोकसभा के चुनाव हों या फिर राज्य विधानसभाओं के वह कांग्रेस पर ही सबसे ज्यादा हमलावर रहती है। संसद में भी उसके निशाने पर कांग्रेस और नेहरू ही रहते हैं। यह कहना भी गलत नहीं होगा कि जब-जब भाजपा कांग्रेस को निशाने पर लेती है तो इंडिया गठबंधन में शामिल दूसरे दलों को भी बहुत बुरा नहीं लगता या फिर कुछ संतोष ही मिलता है, क्योंकि गठबंधन के कई दलों को यह डर सताता रहता है कि कांग्रेस मज़बूत हुई तो उनका ही नुकसान होगा। वजह वही है कि वे कांग्रेस से छिटके वोटों की बदौलत मज़बूत हुए हैं।
यहाँ यह सवाल भी कम प्रासंगिक नहीं है कि मोदी और भाजपा से लड़ने के लिए बने इंडिया गठबंधन में शामिल क्षेत्रीय दलों और कांग्रेस के बीच शुरू से ही विश्वास का संकट रहा है। ऐसे कई मौके आये जब गठबंधन की बैठक में मंच साझा करने के बाद भी क्षेत्रीय दलों की बदगुमानी परो़क्ष रूप से सामने आती रही है। गठबंधन बनने बाद कई राज्यों के चुनावों में सीट बंटवारे को लेकर वहां के क्षेत्रीय क्षत्रप कभी खुलकर तो कभी परोक्ष रूप से कांग्रेस की हैसियत बताने की कोशिश करते रहे हैं। गठबंधन में रहकर अविश्वास की इस राजनीति का चुनावी फ़ायदा भाजपा को मिलता रहा है।
कहना गलत नहीं होगा कि इंडिया गठबंधन के कई दल कांग्रेस के साथ रहकर उससे ही लड़ते-लड़ते खुद निपट जाने की स्थिति का प्राप्त हो गये हैं। लोगों को याद ही होगा कि बीते डेढ़ दशक में पश्चिम बंगाल में लोकसभा से लेकर विधानसभा चुनावों में ममता कांग्रेस की हैसियत कैसे बताकर रखती रही हैं। वे तो त्रिपुरा, गोवा और असम तक के चुनावों में अपने प्रत्याशी उतारती रही हैं और अब बंगाल तक में रास्ता नहीं सूझ रहा है। इसी तरह आम आदमी पार्टी के अरविंद केजरीवाल गोवा और हरियाणा तक विधानसभा चुनाव में प्रत्याशी उतारकर कांग्रेस की चुनौती बढ़ा रहे थे और दिल्ली में अपनी सरकार गवां बैठे। बिहार में तेजस्वी यादव को भी कम ही सही, लेकिन कांग्रेस से समस्या थी, अब राज्य की राजनीति में वे भाजपा और जद यू के सामने हाशिए आ चुके हैं। महाराष्ट्र में शरद पवार और उद्धव ठाकरे अपनी-अपनी पार्टियों के टूटने और भाजपा की सरकार बनने के बाद हल्के हो चुके है। ऐसे में कांग्रेस को भले ही तात्कालिक राजनीतिक फ़ायदा न हो, लेकिन उसके लिए अपनी खोई राजनीतिक जमीन को फिर से हासिल करने के संकेत तो मिलने ही लगे हैं।
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लेखक राजनीतिक विश्लेषक व वरिष्ठ पत्रकार हैं। उन्होंने लंबे अर्से तक राष्ट्रीय राजनीति और संसदीय रिपोर्टिंग की है।लगभग चार दशक की पत्रकारिता में उत्तर प्रदेश की राजनीति को उन्होंने प्रमुखता से कवर किया है। वह नियमित रूप से रागदिल्ली.कॉम के लिए लिखते रहते हैं।