मुहर्रम: जब ज़ुल्म और तलवार पर सत्य, साहस और निर्भयता की विजय हुई
इस्लाम के गंभीर अध्येता हमारे मित्र राकेश भट्ट को जब हमने कल देर रात जब बातचीत के दौरान यूंही प्रसंगवश यह अनुरोध किया कि वह मुहर्रम के अवसर पर हमारी वेब पत्रिका के लिए एक लेख लिख दें तो हमारी उम्मीद के विपरीत वह तैयार हो गए और उन्होंने यह सुन्दर लेख लिख भेजा. हमने इस लेख को 'अध्यात्म और दर्शन' केटेगरी में रखने की बजाय 'समाज और राजनीति' में रखा है क्योंकि मुहर्रम का बलिदान आध्यात्मिक ऊँचाइयों को छूता ही है, समाज पर भी अमिट प्रभाव छोड़ता है.
मुहर्रम - जब ज़ुल्म और तलवार पर सत्य, साहस और निर्भयता की विजय हुई
राकेश भट्ट
ईरान में इस्लामी दर्शन पढ़ते हुए मेरी सोच का केंद्रबिंदु इस्लामी विचारधारा में धर्म, हिंसा, समाज और राज्यसत्ता के आपसी रिश्तों को समझने का था. इस विषय पर ईरान के एक धार्मिक नेता आयतुल्लाह तालेगानी, जिन्हे ईरान का गाँधी भी कहा जाता था, का यह मानना था कि हिंसा और राज्यसत्ता एक ही विचार के दो नाम हैं क्यूंकि हिंसा का जन्म सिर्फ अपनी सोच को ही सर्वोपरि मानने से होती है, एवं राज्यसत्ता अपने से ऊपर किसी को देखना नहीं चाहती। इसका फर्क नहीं पड़ता कि राज्यसत्ता - इस्लामी चोले में हो या मसीही या यहूदी या हिन्दू और चाहे वह भी जिसे धर्म में विश्वास ना भी हो.
उनके अनुसार समाज मूलतः अहिंसक होते हैं जो कि हमेशा हिंसा की मुखालिफत अपनी कलम, कला और साहित्य के औज़ारों से निरंतर प्रयासरत रहता है.
धर्म के विषय में उनकी राय मुझे बहुत सटीक लगती थी - वे कहते थे कि धर्म उस सराय की मानिंद है जिसमे हर किस्म का थका हुआ मुसाफिर थाह लेता है और सुबह नई तरोताज़गी लिए अपने अपने रास्ते चल पड़ते हैं. यदि कोई धर्म समाज में उल्लास नहीं भरता तो उसे धर्म कहना गलत है.
आयतुल्लाह तालेगानी का देहांत सितम्बर 1979 को हुआ.
इस्लाम के अपने अध्ययन के दौरान मुझे शिया इस्लाम के तीसरे इमाम, हुसैन इब्न अली को पढ़ने का मौका मिला। उनका एक कथन मेरे मन को बहुत भाया जिसमे वो कहते हैं कि "अजेब्तो लेमन यतफक्करो फी मा' कूले, कैफा ला यतफक्करो फी मा' कूले" यानि "अजीब बात है कि मनुष्य अपने पेट की भूख (मा' कूले) की खातिर लगातार प्रयासरत रहता है लेकिन न जाने क्यों वह अपनी आत्मा की भूख (मा' कूले) के बारे में निष्क्रिय होता है".
आज आशूरा यानी इस्लामी मुहर्रम महीने की दसवीं तिथि है। 680 ईस्वी के मुहर्रम महीने के आशूरा के दिन ही इमाम हुसैन को ज़ुल्म के सामने न झुकने की खातिर कर्बला (इराकी शहर) में शहीद कर दिया गया. दुनिया भर के शिया मुसलमान इस दिन अपने गम का सामूहिक इज़हार करते हैं.
इस्लामी इतिहास में कर्बला की घटना सत्य, न्याय और अत्याचार के विरुद्ध संघर्ष का एक महान उदाहरण मानी जाती है जिसमे पैग़म्बर मुहम्मद के नवासे इमाम हुसैन और उनके साथियों ने सत्य और न्याय की रक्षा के लिए अपने प्राण न्योछावर कर दिए।
पहले इमाम हज़रत अली की शहादत और फिर दूसरे इमाम हसन की मृत्यु के बाद तद्कालीन इस्लामी जगत के शासक के तौर पर यज़ीद सत्ता पर बैठा। उसने तीसरे इमाम हुसैन से अपनी सत्ता के लिए निष्ठा की शपथ की मांग की। परन्तु इमाम हुसैन का मानना था कि यज़ीद का शासन इस्लाम की मूल शिक्षाओं और नैतिक मूल्यों के विपरीत था। इसलिए उन्होंने अन्यायपूर्ण सत्ता के सामने झुकने से इनकार कर दिया।
इस बीच ईराक के कूफ़ा नामक शहर के लोगों के निमंत्रण पर इमाम हुसैन अपने परिवार और साथियों के साथ मक्का से निकले, लेकिन रास्ते में कर्बला में यज़ीद की सेना ने उन्हें मुहर्रम की सात तारीख को रोक लिया और फ़रात (Euphrates) नदी का पानी उनके शिविर के लिए बंद कर दिया गया। भीषण गर्मी और प्यास के बावजूद इमाम हुसैन और उनके साथियों ने यज़ीद की सत्ता को स्वीकृति देने से मना कर दिया।
तीन दिनों तक प्यासे इमाम हुसैन और उनके 72 साथियों ने यज़ीद की सेना के साथ संघर्ष किया और 10 मुहर्रम तक , जिसे आशूरा कहा जाता है, अंतिम युद्ध के दौरान इमाम हुसैन के साथी और परिवार के सदस्य शहीद होते गए। इस दौरान उन्होंने अपने प्यास से तड़पते छह माह के बेटे अली असगर को अपनी गोद में लिया और उनका एक आंसू अपने बेटे के प्यास से सूखे होठों पर गिरा जिससे बच्चे की प्यास और असहनीय हो गई, तो इमाम हुसैन उसे गोद में लेकर दुश्मन सेना से कहा कि आज इस्लाम के पैगम्बर का नाती पैगम्बर के नवासे के लिए एक अंजली भर पानी की मांग कर रहा है. इस पर यज़ीद के सेनापति शिम्र ने कहा कि तुम एक अंजली पानी की बात करते हो यज़ीद तुम्हे हर उस ख़ज़ाने मान सम्मान देने को तैयार हैं जो किसी ने अब तक देखी सुनी न होगी।
एक तरफ नन्हा बेटा बाहों में दम तोड़ रहा हो और दूसरी ओर दुनिया की हर सुख सुविधा का निमंत्रण - कहते हैं कि किंकर्तव्यविमूढ़ क्षणों में मनुष्य का सही निर्णय ही उसे महान बनाता है और आने वाली पीढ़ियों के लिए अनुसरणीय। इमाम हुसैन ने एक बार गोद में अली असगर के सूखे होठों को चूमा और आसमान की ओर मुंह करके यज़ीद की पेशकश को ठुकराते हुए आवाज़ लगाई - "हे हात मिन्ना ज़िल्ला" यानी "अन्याय के आगे सिर झुकाना असंभव, भले ही मौत को चुनना पड़े." परम्परागत वर्णनों के अनुसार, यह सुनते ही शिम्र ने एक तीर चलाया जो छै महीने के अली असगर के गले में लगा और वह शहीद हो गया। इमाम हुसैन ने अपने निर्जीव बालक को आसमान की ओर उठा कर कहा - "इन्ना लिल्लाह व् इन्ना इलैहे राजेऊन" यानी हम सब ईश्वर के अंश हैं और हम सबको उसकी पूर्णता में समाहित होना है.
इसके पश्चात् इमाम हुसैन अपने बचे 4 साथियों के साथ यज़ीद की दस हज़ार की सेना से लड़ने की खातिर मैदान में उतरे और वे तथा उनके साथी शहीद हो गए.
इमाम हुसैन का संदेश केवल मुसलमानों तक सीमित नहीं है। उनका संघर्ष अन्याय के विरुद्ध मानवता की साझा विरासत बन चुका है। उनका प्रसिद्ध कथन “ज़िल्लत की ज़िंदगी से इज़्ज़त की मौत बेहतर है” हर समाज को सत्य के लिए संघर्ष करने की सीख देता है.
महात्मा गांधी भी इमाम हुसैन के इस अतुलनीय बलिदान से गहराई से प्रभावित थे। गांधीजी का कहना था कि वह इस्लाम को इमाम हुसैन की नज़रों से देखते हैं . वह कहते थे कि "कर्बला की घटनाओं ने सत्य और न्याय में मेरे विश्वास को और अधिक दृढ़ एवं आलोकित किया है, और मैंने इमाम हुसैन से यह सीखा है कि उत्पीड़न और विपरीत परिस्थितियों के बीच भी नैतिक विजय कैसे प्राप्त की जाती है।"
कर्बला की शहादत हमें सिखाती है कि संख्या, शक्ति और संसाधन ही विजय का मापदंड नहीं होते। इतिहास तो उन लोगों को विजेता मानता है जो सत्य और न्याय के लिए सब कुछ कुर्बान कर देते हैं। इसी कारण, चौदह शताब्दियों बाद भी इमाम हुसैन और कर्बला के शहीदों की याद दुनिया के समाजों को सम्मान और सच्चाई की ओर अग्रसर कराती है. शिया इस्लाम आशूरा को "पीरूजी-ए खून बर शमशीर" - तलवार पर ख़ून की जीत मानते हैं.
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मूलतः उत्तराखंड के ब्राहमण परिवार में जन्मे राकेश भट्ट इस्लाम के गंभीर अध्येता हैं. कई वर्ष ईरान में रहे हैं और वहां उन्होंने इस्लाम की विश्वविद्यालयी पढ़ाई भी की है. सम्प्रति बीबीसी में ईरान विशेषज्ञ के रूप में कार्यरत हैं.