गाँधी की ज़रूरत सर्वकालिक है
पराग मांदले गाँधी विचार के विशेषज्ञ हैं. इस वेब-पत्रिका में उनके कुछ लेख पहले भी प्रकाशित हुए हैं जिन्हें आप उनके नाम पर क्लिक करके देख सकते हैं। आज गाँधी जी की पुण्यतिथि के अवसर पर पराग मांदले का एक और लेख प्रकाशित कर रहे हैं जिसमें वह बताते हैं कि यह विचार भ्रामक है कि गाँधी विचार व्यावहारिक नहीं है।
गाँधी की ज़रूरत सर्वकालिक है
पराग मांदले
गांधी की जरूरत पर कोई बात शुरू करने से पहले हमें यह बात स्पष्ट कर लेनी चाहिए कि गांधी की जरूरत पर बात करते समय हम गांधी व्यक्ति की बात नहीं कर रहे, बल्कि गांधी विचार की बात कर रहे हैं। इतिहास के किसी भी दौर में व्यक्ति महत्वपूर्ण रहे हैं, क्योंकि उनके माध्यम से ही इतिहास की निर्मिति होती है, मगर सिर्फ व्यक्ति का होना पर्याप्त नहीं होता, क्योंकि यदि ऐसा होता तो हर साल जन्म लेने वाले करोड़ों लोग उस इतिहास का निर्माण करते दिखाई देते। मगर सच तो यह है कि इतिहास का अनाम हिस्सा होने वाले लोग तो असंख्य होते हैं मगर अपने वर्तमान को और बहुधा भविष्य को भी एक दशा और दिशा देकर इतिहास में अपना अस्तित्व दर्ज कराने वाले बहुत कम लोग होते हैं। उनके विचार और उन विचारों के अनुरूप किए गए कार्य ही उन्हें इतिहास में दर्ज कराने का आधार बनते हैं।
इतिहास में दर्ज इन चुनिंदा लोगों में से अधिकांश अपने-अपने समय को और कुछ मात्रा में आने वाले भविष्य को प्रभावित करने वाले होते हैं, मगर इनमें से अपवादस्वरूप कुछ लोग ऐसे भी होते हैं जिनके विचारों और कार्यों का असर और महत्व देश, काल और परिस्थितियों से परे सर्वकालिक होता है। गांधी ऐसे ही व्यक्तियों में शामिल हैं।
आज आप देश और दुनिया की कुछ सबसे बड़ी समस्याओँ पर निगाह डालिये और फिर उन समस्याओं के दीर्घकालिक समाधान का विचार कीजिए, बिना किसी शको-शुबहे के आप गांधी तक और प्रकारांतर से गांधी विचारों तक पहुँच जाएंगे। आइये, हम आज की कुछ प्रमुख समस्याओं और गांधी विचारों में दर्ज उनके समाधान की संभावनाओं पर निगाह डालते हैं। यह कवायद बिना किसी औपचारिक उल्लेख के भी, हमारे समक्ष गांधी की जरूरत को स्पष्ट कर देगी।
राष्ट्रीयता का प्रश्न और युद्ध
आज सारी दुनिया के समक्ष राष्ट्रीयता का दुराग्रह एक अंतहीन संकट का रूप ले चुका है। चाहे वह पिछले लगभग चार सालों से जारी रूस-यूक्रेन युद्ध हो या फिर इजराइल-फिलिस्तीन-ईरान का तनाव हो, वह चीन-ताइवान के बीच चल रहा संघर्ष हो या फिर ग्रीनलैंड सहित कुछ देशों को हड़पने की ट्रम्प की लालसा हो। हर जगह दूसरों के सुख-चैन-सम्पत्ति की कीमत पर अपने लिए अधिकाधिक जुटाने की हवस अपने विकराल रूप में फैली हुई दिखाई देती है, जिसे राष्ट्रीयता के चमकीले रैपर में लपेट कर प्रस्तुत किया जाता है। इसका एकमात्र समाधान प्राचीन भारतीय ग्रंथों में व्यक्त वसुधैव कुटुंबकम् की भावना में है, जिसकी व्यावहारिक व्याख्या आधुनिक समय में गांधी ने की है। 12 मार्च 1925 के यंग इंडिया में एक पत्र का उत्तर देते हुए गांधी लिखते हैं कि भारत के उत्थान की कामना के पीछे मेरी यह कामना निहित है कि सारे संसार को लाभ हो। मैं यह नहीं चाहता कि भारत दूसरे राष्ट्रों का विनाश करता हुआ प्रगति करे।
सारे संसार के लाभ की कामना और प्रयत्न करने के लिए जरूरी है एक व्यक्ति और राष्ट्र दोनों ही भूमिकाओं में हम लोभ से मुक्त रहें। सबकी भलाई में अपनी भलाई भी निहित है, और किसी की भी हानि अंततः व्यापकता में हमारी हानि का आधार सिद्ध होती है – इस साधारण सत्य का स्वीकार और इसकी भावना के अनुरूप आचरण से हम न सिर्फ अलग-अलग देशों बल्कि अलग-अलग समुदायों और अलग-अलग व्यक्तिओं के बीच होने वाले संघर्षों से भी मुक्ति पा सकते हैं।
विकास की अंधी दौड़ और पर्यावरण का प्रश्न
आज दुनिया बाजार केंद्रित अर्थव्यवस्था के माध्यम से जिस तेजी से तथाकथित विकास की अविवेकपूर्ण अंधी दौड़ में लगी हुई है, यह संपूर्ण पृथ्वी और मानव जाति को अंततः विनाश की कगार पर ही ले जाकर छोड़ेगी। इसकी वजह यह है कि कामनाओं की कोई सीमा नहीं होती। और जैसा कि गांधी कहते थे, यह पृथ्वी इसमें रहने वाले प्रत्येक प्राणी की मूलभूत जरूरतों को पूर्ण करने में सक्षम है मगर किसी एक व्यक्ति के भी लालच या हवस को पूरा करना संपूर्ण पृथ्वी के लिए भी संभव नहीं है।
अधिकाधिक मुनाफे के लिए अधिकाधिक उत्पादन, अधिकाधिक निर्माण और उसके लिए प्राकृतिक संसाधनों के असीमित दोहन और उसके परिणामस्वरूप हमारे अस्तित्व के आधारभूत पंच तत्वों में से भूमि, जल, वायु और आकाश में निरंतर बढ़ते प्रदूषण के कारण पर्यावरण का संकट इस समय दुनिया के समक्ष उपस्थित सबसे बड़े संकटों में से एक है, जो हमारे संपूर्ण अस्तित्व के लिए ही एक बड़ा खतरा बन चुका है। इसका उपाय एक ही है कि बाजार को मुनाफे की जगह जरूरत केंद्रित बनाना। हम उतना ही उत्पादन करे जितने की हमारी जरूरत है। हम अविवेकपूर्ण ढंग से अपनी जरूरतों को बढ़ाने की जगह उन्हें सीमित रखें और सख्ती से प्रकृति से सिर्फ अपनी वास्तविक आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए लेते समय बदले में उसे वापस करने की भी नीयत रखें। हमारी मूलभूत आवश्यकताओं और प्राकृतिक संसाधनों के दोहन के बीच का यह संतुलन ही एक स्वस्थ, सुंदर और टिकाऊ पृथ्वी के अस्तित्व का एकमात्र उपाय है। दिखने में यह चाहे जितना असंभव लगता हो मगर हमारे बचने की संभावना भी एकमात्र इसी उपाय में छिपी हुई है।
अमीर और गरीबों के बीच की भयावह खाई और गाँधी जी का ट्रस्टीशिप का सिद्धांत
यदि हम सिर्फ भारत की ही बात करें तो ऑक्सफैम की रिपोर्ट (2023) के अनुसार, भारत में शीर्ष 10 प्रतिशत आबादी के पास देश की 77 प्रतिशत संपत्ति है, जबकि निचली 50 प्रतिशत आबादी के पास केवल 3 प्रतिशत संपत्ति है। एक अनुमान के अनुसार ऊपरी दस प्रतिशत में से भी शीर्ष एक प्रतिशत के पास कुल राष्ट्रीय् संपत्ति की 40 प्रतिशत से अधिक संपत्ति है। अमीर और गरीब के बीच की यह खाई साल-दर-साल बढ़ती ही जा रही है। इस खाई को कम करने का उपाय क्या है? कुछ लोगों में अधिकाधिक पैसा कमाने की जन्मजात और सहज वृत्ति होती है। यह एक व्यक्ति केंद्रित क्षमता या प्रतिभा है। क्या इस खाई को दूर करने के लिए उनकी इस क्षमता को बाधित करना जरूरी है? क्या ऐसी कोई दुनिया बनाना संभव है जिसमें सिर्फ सर्वहारा वर्ग ही रहे। क्या धनिक वर्ग को नष्ट करके दुनिया में समानता लाई जा सकती है? इस तरह की दुनिया के संभव होने की जो उम्मीद रूस में 1919 में हुई क्रांति से जागी थी, वह बीसवीं शताब्दी के अंत तक आते-आते पूरी तरह से चकनाचूर हो गई है। ऐसे में फिर कौन-सा तरीका है, जिससे अमीर और गरीब के बीच सम्पत्ति के वितरण की इस भयावह असमानता को अधिक से अधिक कम किया जा सके?
इसका उत्तर गांधी के ट्रस्टीशिप के सिद्धांत में है। इस सिद्धांत के दो मुख्य आधार हैं – पहला, हर व्यक्ति को उसके परिश्रम का उचित मेहनताना मिले, उसका शोषण न हो। दूसरा, हम समाज की सहायता से जो सम्पत्ति कमाते हैं, खुद को उसका मालिक न समझकर ट्रस्टी समझे और उसमें से अपनी जरूरत का हिस्सा लेकर शेष सारा फिर समाज के हित में खर्च कर दें। जाहिर है, किसी में पैसा कमाने की चाहे जितनी प्रतिभा और क्षमता हो, वह अकेला अपने दम पर एक पैसे को दो पैसे में नहीं बदल सकता। समाज के भीतर के आर्थिक व्यवहार ही उसके लिए इसकी संभावना जगाते हैं। इसलिए समाज के योगदान से कमाये धन का उपयोग उस समाज के हित में किया जाना चाहिए। इससे व्यक्ति की धन कमाने की नैसर्गिक प्रतिभा भी बाधित नहीं होगी और उसकी यह प्रतिभा अंततः समाज के लिए हितकर भी साबित होगी।
इसमें सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या यह संभव है और व्यावहारिक है? गांधी मानते थे कि समाज, समुदाय या राष्ट्र अंततः व्यक्तियों की समष्टि से ही निर्मित होते हैं। जो बात किसी एक व्यक्ति के लिए संभव है, वह समूह, समाज या राष्ट्र के लिए भी संभव है। यदि हम गांधी के जीवन काल में ही देखें तो अनेक धनिक उनके समाजहित के कार्यों में खुले दिल और हाथों से आर्थिक सहायता करते थे। जमनालाल बजाज तो उनके ट्रस्टीशिप के सिद्धांत के जीते-जागते उदाहरण थे। उनके अलावा बड़े धनिकों में घनश्यामदास बिड़ला भी उनके बहुत बड़े मददगार रहे हैं। वर्तमान में ही देखें तो एचसीएल के संस्थापक शिव नाडर ने वर्ष 2024-25 में दो हजार करोड़ रुपये से ज्यादा राशि शिक्षा और समाजसेवा के कार्यों के लिए दान में दी है। विप्रो के संस्थापक अजीम प्रेम जी अपने ट्रस्ट के माध्यम से अपनी सम्पत्ति का अधिकांश हिस्सा दान कर चुके हैं। टाटा परिवार भी लगातार देश के बड़े दानदाताओं में एक रहा है। सो, ट्रस्टीशिप का सिद्धांत न अव्यावहारिक है और न असंभव। बस इसे ईमानदारी से पारदर्शी तरीके से लागू किए जाने की जरूरत है।
निरंतर बढ़ती बेरोजगारी
यह एक ऐसा सवाल है, जिसका कोई एकरेखीय उत्तर नहीं है। ना इस समस्या के हल का कोई एकमेव समाधान। बेरोजगारी पर बात करते समय कई सारे पहलुओं पर ध्यान देने की जरूरत है। उसमें निरंतर बढ़ती जनसंख्या, शिक्षा का रोजगारपरक न होना और नित नई टैक्नोलॉजी के कारण विभिन्न उद्योगों, सेवाओं और क्षेत्रों में श्रमिकों की या यूँ कहें कि मानव-संसाधन की घटती जरूरत जैसे मुद्दे शामिल हैं। गांधी का जोर हमेशा इस बात पर रहा कि शिक्षा ऐसी हो, जिससे प्रत्येक बच्चे का शारीरिक, मानसिक और आत्मिक विकास साध्य हो सके। उनका जोर इस बात पर भी रहता था कि बचपन से ही प्रत्येक बच्चे को शिक्षा के साथ-साथ कोई न कोई ऐसा कौशल सिखाना जरूरी है, जिससे आगे चलकर वह अपना जीवन-निर्वाह कर सके। जहाँ तक नई टैक्नोलॉजी के इस्तेमाल का सवाल है, यहाँ गांधी की दृष्टि बिलकुल साफ है। तकनीक या प्रौद्योगिकी इंसान के लिए होनी चाहिए, इंसान की कीमत पर नहीं। मशीनें मनुष्य की मेहनत और समय को बचाने के लिए होनी चाहिए, जिससे उस समय का उपयोग वह अपने परिवार और समाज के हित में कर सके, न कि उसे बेरोजगार करने के लिए।
हमें इस बात को स्पष्ट रूप से समझ लेना चाहिए कि विकास की सारी अवधारणाएं मनुष्य के लिए गढ़ी गई हैं। इसलिए विकास का ऐसा कोई भी स्वरूप स्वीकार्य नहीं होना चाहिए जो कुछ लोगों के लिए तो फायदेमंद हो मगर एक बड़ी संख्या के लिए नुकसानदायक हो या बेरोजगारी बढ़ाने वाला हो। इसलिए उत्पादन का केंद्रीकरण और उसमें मनुष्यों की जगह मशीनों के बढ़ते इस्तेमाल पर रोक लगाने की जरूरत है। विकास वह नहीं है जिसमें देश के दो-चार लोग दुनिया के सबसे ज्यादा दस अमीरों में शामिल हो जाएं, सच्चा विकास वह है जिसमें देश के हर व्यक्ति के लिए भोजन, स्वच्छ पानी, स्वास्थ्य, शिक्षा और घर जैसे मूलभूत सुविधाएं उपलब्ध हों और हर वयस्क व्यक्ति के पास रोजगार हो।
इसलिए गांधी ग्राम स्वराज्य की बात करते हैं। एक ऐसे गाँव का निर्माण जो अपनी जरूरत की अधिकांश वस्तुओं का निर्माण स्वयं करता हो और जिसमें हर जरूरतमंद के लिए काम उपलब्ध हो। हर गाँव अपनी जरूरत की वस्तुओं के उत्पादन के बाद अतिरिक्त उत्पादित वस्तुओं को आसपास के बाजारों में बेच कर लाभ कमा सकता है। जिन वस्तुओं के उत्पादन के लिए बड़ी मशीनों और उद्योगों की आवश्यकता हो, केवल उन्हें ही अनुमति दी जाए, शेष सभी वस्तुओं का उत्पादन घरेलू या कुटीर उद्योगों में विकेंद्रीकृत रूप से हो। इससे न केवल देश के मानव-संसाधन का समुचित उपयोग होता है बल्कि प्राकृतिक संसाधनों पर पड़ने वाले अतिरिक्त भार को भी कम किया जा सकता है।
धार्मिक असहिष्णुता और जातीय वैमनस्य
गांधी ने बार-बार खुद को कट्टर हिंदू कहा मगर उनके भीतर दूसरे किसी भी धर्म को लेकर लेशमात्र भी द्वेष या कमतरी का भाव नहीं था। धर्म के मामले में यही आदर्श स्थिति है। आपके भीतर अपने धर्म या उपासना पद्धति के प्रति पूरी आस्था हो मगर वह आस्था किसी और धर्म या उपासना पद्धति के प्रति घृणा या द्वेष का कारण न बने। साथ ही प्रत्येक व्यक्ति इस बात का भी ध्यान रखे कि उसका विश्वास अंधविश्वास में न बदले। यदि कोई ईश्वर है और उसने इस सृष्टि की रचना की है तो इससे हम यही सबसे बड़ा सबक ले सकते हैं कि इस संसार में कुछ भी स्थायी नहीं है। सब कुछ परिवर्तनशील है। परिवर्तन ही सत्य है। और गांधी कहते हैं कि सत्य ही ईश्वर है। इसलिए हमें अपने धर्मग्रंथों की स्थापनाओं और अपनी धार्मिक मान्यताओं को भी समय-समय पर विवेक की कसौटी पर कसते रहना और समयानुसार उनमें सुधार करते रहना आवश्यक है।
दिनांक 26 फरवरी 1925 के यंग इंडिया के अंक में प्रकाशित एक टिप्पणी में गांधी कहते हैं : प्रत्येक धर्म के प्रत्येक नियम को विवेक के इस युग में पहले विवेक और व्यापक न्याय की अचूक कसौटी पर कसना होगा। किसी भूल का समर्थन संसार के समस्त धर्मग्रंथों में भी किया गया हो तो भी वह भूल इस नियम से मुक्त नहीं हो सकती।
गांधी द्वारा सुझाई गई विवेक की यह कसौटी बहुत महत्वपूर्ण है। इस विवेक का इस्तेमाल करे तो कोई भी मनुष्य इस नतीजे पर पहुँच सकता है कि अलग-अलग धर्मों और पंथों की मान्यताओं के अनुसार इस सृष्टि की रचना करने वाला अलग-अलग व्यक्ति या शक्ति नहीं हो सकती। वह तो एक ही है। अलग-अलग धर्म और पंथ वाले अलग-अलग नामों से एक उसी की पूजा या उपासना करते हैं। इस सत्य को झुठलाया नहीं जा सकता। जब हम सब एक ही ईश्वर की संतान हैं तो फिर आपस में द्वेष और घृणा की क्या वजह है?
इसी तरह गांधी मानते हैं कि जातियां समाज में विभिन्न लोगों के बीच काम सुनियोजित बँटवारे और समाज के सुचारु संचालन के लिए निर्माण की गई व्यवस्था है, जिसमें हर व्यक्ति के काम का महत्व समान है, चाहे वह शिक्षक हो या फिर सफाईकर्मी, किसान हो या फिर कुम्हार। समाज की दृष्टि में हर व्यक्ति का सामाजिक दर्जा समान होना चाहिए। उसे समान सम्मान और मेहनत का प्रतिदान मिलना चाहिए। जाति के आधार पर किसी के साथ भेदभाव उस ईश्वर का अपमान है, जिसने सबको एक समान रचा है।
वह आदर्श किसी काम का नहीं, जिसे व्यवहार में उतारना संभव न हो
गांधी कहते हैं, सत्य ही ईश्वर है और उस तक पहुंचने का मार्ग है अहिंसा, जिसका उच्चतम स्वरूप प्रेम है। वह चाहे किसी भी जाति, धर्म, पंथ या समुदाय का हो, जब तक उसके भीतर मानवमात्र और प्राणीमात्र के प्रति प्रेम का भाव नहीं होगा, उसे उस सत्यरूपी ईश्वर का बोध भी नहीं होगा।
इस तरह हम देखते हैं कि संसार के समक्ष आज जो ज्वलंत समस्याएं हैं, उन सबका समाधान गांधी द्वारा पिछली शताब्दी के पहले हिस्से में सुझाये गये उपायों में है। कई बार गांधी के विचारों के संदर्भ में यह आपत्ति की जाती है कि उनके समाधान आदर्श जरूर हैं मगर व्यावहारिक नहीं। गांधी खुद यह मानते थे कि वह आदर्श किसी काम का नहीं, जिसे व्यवहार में उतारना संभव न हो। इसलिए आदर्श और व्यावहारिक का यह भेद ही भ्रम है। दूसरे गांधी यह भी मानते थे कि जिस तरह चावल के पतीले से किसी एक दाने के जरिए भी चावल के पकने की पुष्टि हो जाती है, वैसे ही किसी सिद्धांत या उपाय की पुष्टि के लिए किसी एक भी व्यक्ति का उस पर पालन पर्याप्त है। जो व्यक्ति पर लागू किया जा सकता है, वह समष्टि पर लागू किया जा सकता है क्योंकि व्यक्तियों से ही समुदाय का गठन होता है। पिछले सौ सालों से अधिक समय से लाखों व्यक्तियों ने गांधी के विचारों के जरिए अपने जीवन को दिशा देकर इन विचारों की सत्यता और संभाव्यता को सिद्ध किया है। यदि हम समस्याओं का सकारात्मक और रचनात्मक समाधान चाहते हैं तो हमें गांधी विचारों की ओर जाना ही होगा, क्योंकि उन विचारों में सत्य है, और प्रेम है। इस संसार को ये दो तत्त्व ही सार्थक और सुंदर बनाते हैं।
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पराग मांदले के लेख, कहानियां, कविताएं और स्थायी स्तंभ देश भर की पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित होते रहे हैं। हाल ही में सेतु प्रकाशन से आई उनकी पुस्तक ‘गाँधी के बहाने’ खासी चर्चित हुई है. उनके तीन कहानी संग्रह भी प्रकाशित हैं। विगत अनेक वर्षों से वे पर्यावरण संरक्षण के साथ-साथ शाश्वत व वैज्ञानिक जीवनशैली के प्रचार-प्रसार से जुड़े हुए हैं। इसके अलावा गांधी उनके अध्ययन का प्रमुख केंद्र रहे हैं।