मेरा दर्द न जाने कोय ㄧदर्शनशास्त्र की नज़र में
भारतीय दर्शन में दुःख केवल एक अनुभूति नहीं, बल्कि आत्मबोध की यात्रा का प्रारंभ है। डॉ मधु कपूर इस लेख में दुःख के विविध आयामों को दार्शनिक दृष्टि से टटोलती हैं—विचार, अनुभव और प्रश्नों की गहराइयों में उतरते हुए। यह लेख पाठक को आत्मचिंतन की ओर आमंत्रित करता है, जहाँ दुःख एक बोध है, बोझ नहीं। दर्शनशास्त्र के सिद्धांतों को यदि आप सरल ढंग से समझना चाहें तो आप हमारी अध्यात्म एवं दर्शन केटेगरी में जाकर डॉ मधु कपूर के पुराने लेख पढ़ सकते हैं.
मेरा दर्द न जाने कोय ㄧमीराबाई
डॉ मधु कपूर
मीराबाई का पद ‘मेरा दर्द न जाने कोय’ कोई असामान्य शिकायत नहीं, आध्यात्मिक प्रेम की पीड़ा है, जिसके लिए मीराबाई को कितने ही अपमान, तिरस्कार और विष का पान तक करना पड़ा । इस व्याकुलता को कोई सांसारिक चिकित्सक नहीं समझ सकता है। यूँ तो चिकित्सक रोगी के ‘शारीरिक दर्द’ को समझकर दवा जरूर दे देता है, पर वह उसे महसूस नहीं कर सकता है, क्योंकि रोगी का अनुभव व्यक्तिगत होता है, जिसे किसी भी हालत में साझा नहीं किया सकता है।
महाभारत के युद्ध की समाप्ति के बाद गांधारी और अन्य स्त्रियों का विलाप किसी भी संवेदनशील व्यक्ति को सोचने के लिए बाध्य कर देता है कि आखिर ‘दुःख’, अर्थात उत्तम पुरुष अनुभूति कि ‘मैं दुखी हूँ’ क्या है? कहा जा सकता है, यह एक प्रतिकूलवेदनीय अनुभूति है, जिससे व्यक्ति शीघ्रातिशीघ्र छुटकारा पाना चाहता है।
भारतीय दर्शन की यदि बात करूँ, (जो कि बहुत पहले ही कर लेनी चाहिए थी) तो दुःख केवल एक भावनात्मक अनुभूति नहीं, बल्कि एक गहरी दार्शनिक समस्या है, जिसकी निवृत्ति ही दर्शन की उत्पत्ति का कारण माना जाता है। बुद्ध के चार आर्य सत्यों में प्रथम सत्य है—‘सर्वं दुःखम्’ अर्थात दुःख जीवन का अपरिहार्य सत्य है, यथा ㄧ जन्म, जरा, मरण, प्रियवियोग, अप्रिय संयोग इत्यादि। दुःख एक व्याधि है, इसके कारण को जाने बिना इससे मुक्ति का उपाय नहीं पाया जा सकता है। सांख्य दर्शन में भी दुःख तीन प्रकार के माने गये हैं—आधिभौतिक (शारीरिक), आधिदैविक (प्राकृतिक आपदाएँ), और आध्यात्मिक (मानसिक क्लेश)। न्याय दर्शन में जिन इक्कीस प्रकार के दुःखों का उल्लेख मिलता है, उसमें सुख इक्कीसवां प्रकार है, अर्थात साँसारिक सुखों का अन्त दुःख में ही होता है, क्योंकि ये सभी नाशवान, क्षणभंगुर हैं। इसलिए सम्यक ज्ञान ही दुखों से आत्यंतिक निवृत्ति का एकमात्र पथ हैं।
पाश्चात्य अस्तित्ववादी विचारक दुःख को केवल एक अनुभव और समस्या ही नहीं, बल्कि मानव अस्तित्व की प्राथमिक शर्त के रूप में स्वीकार करते है, जिसका मूलस्वर शिशु के प्रथम क्रंदन से घोषित होता है। यदि जन्म ही न होता तो दुःख उत्पन्न ही नहीं होता। यह ‘होना’ ही मानव अस्तित्व को दुखों में डुबो देता है, जिससे न तो सम्पूर्ण रूप से उबरा जा सकता है और न ही पूरी तरह से इसमें तैरा जा सकता है । इसका एहसास व्यक्ति को कभी अवसाद की ओर, कभी आत्महत्या की ओर, कभी उत्तरदायित्व की घबराहट से पलायन की ओर धकेल देता है । इन विचारकों ने दुःख को मृत्यु की अनिवार्यता से जोड़ कर जीवन की पूर्णता के रूप में स्वीकार किया है । ‘होने’ का अर्थ ही है—जीवन का अर्थ खोजना और अर्थहीनता से जूझना। शारीरिक अक्षमता, अकेलापन, उपेक्षा मनुष्य के जीवन में गहरा दुख उत्पन्नकर देती हैं। पर अस्तित्ववादी दार्शनिक दुःख को स्वीकार कर, उसका सामना करने में ही जीवन की सार्थकता और प्रामाणिकता मानते है, क्योंकि दुःख के क्षणों में ही व्यक्ति अपने अस्तित्व को बिना किसी मुखौटे के पहचान सकता है।
प्रेमचंद की कहानी “कफ़न" इसका सफल दृष्टान्त है । घीसू और माधव, जो पैसे अपनी पत्नी बुधिया के कफ़न के लिए जमा करते हैं, उन पैसों से शराब और पेट भर भोजन कर, नशे में धुत होकर नाचते-गाते हुए वहीं गिर पड़ते हैं। इस तरह गरीबी और मानवीय मूल्यों के पतन के साथ साथ मानवीय अस्तित्व की अवचेतन परतों से पहचान कराने में कथानक समर्थ होता है । दोस्तोएव्स्की, एक रूसी अस्तित्ववादी लेखक,अपने विख्यात उपन्यास ‘क्राइम और पनिशमेंट’ में दिखाते है कि रस्कोलनिकोव (एक किरदार) जब अपने अपराध को स्वीकार कर लेता है, तो सोन्या उसे एक लकड़ी का क्रॉस देती है, जो प्रायश्चित और आत्मा के आध्यात्मिक समर्पण का प्रतीक है। वे साथ चलने, दुःख सहने और अपना क्रॉस उठाने का संकल्प लेते है।
दुख एक बहुआयामी अनुभव है जिसकी व्याख्या केवल आध्यात्मिक या दार्शनिक नहीं, बल्कि मनोवैज्ञानिक, सामाजिक और न्यूरोसाइंस की दृष्टि से भी की जाती है। शरीर,मन और सामाजिक संबंधों की जटिलताएँ व्यक्ति को दुखी कर देती है। फ्रायड ने दुख को दमन किए गए अनुभवों से जोड़ा है, न्यूरोसाइंस इसे मस्तिष्क की रासायनिक प्रक्रिया से जोड़ता हैㄧयानी जब कोई चोट लगती है, तो nociceptors नामक तंत्रिकाएं मस्तिष्क को संकेत भेजती हैं, मस्तिष्क इसे 'दर्द' के रूप में ग्रहण करता है।
मनुष्य तो क्या ईश्वर भी इस व्यथा से अछूता नहीं है । सती के आत्मदाह के बाद उनके मृत शरीर को कंधे पर उठा कर पूरे ब्रह्मांड को तहस-नहस करते हुए शिव अपने क्रोध और वेदना की अभिव्यक्ति तांडव-नृत्य के माध्यम से करते है। रामचरितमानस में श्रीराम सीता के वियोग में अत्यंत दुखी हैं। उनका सन्देश हनुमान अशोक वाटिका में सीता को सुनाते हैं:
कहेउ राम बियोग तव सीता । मो कहुँ सकल भए बिपरीता ॥
नव तरु किसलय मनहुँ कृसानू । कालनिसा सम निसि ससि भानू ॥
(हे सीते! तुम्हारे वियोग में मेरे लिए सब कुछ प्रतिकूल हो गया है। नव-वसंत के कोमल पत्ते मुझे अग्नि समान, रात्रि कालरात्रि और चंद्रमा-सूर्य भी दुखदायी लगते हैं।)
कला, साहित्य आदि विधाओं में दुख को सृजनात्मक प्रेरणा के रूप में देखा जाता है । क्रौंचवध तथा मादा पक्षी के करुण विलाप ने वाल्मीकि के शोक को अनायास ही श्लोक में बदल दिया ‘मा निषाद प्रतिष्ठां...’ जो भारतीय साहित्य में वेदना की एक अनुपम मिसाल रामायण महाकाव्य के रूप में उभरी । महादेवी वर्मा "मैं नीर भरी दुःख की बदली!” गीत में अंतर्मन की वेदना को बादल की उपमा से व्यक्त करती हैं । आधुनिक कवयित्री, गगन गिल की कविता "दिन के दुख अलग थे" में स्त्री-जीवन के दुख को दोहरे मानदण्डों के माध्यम से उकेरती है— दिन में जिन्हें ‘छिपाना पड़ता है’ सामाजिक बंदिशों, जिम्मेदारियों, और आत्म-संयम से, पर रात में ‘उनसे छिपना ‘ भी मुश्किल हो जाता है।
विश्व साहित्य में Sophocles द्वारा रचित Oedipus Rex ग्रीक त्रासदी की एक कालजयी कृति है। थिब्स के राजा को भविष्यवाणी होती है कि उसका पुत्र उसे मार देगा और अपनी माँ से विवाह करेगा । वे इस डर से बच्चे (ओडीपस) को मरवा देने का आदेश देते है। पर बच्चा बच जाता है और कोरिन्थ के राजा द्वारा पाला जाता है। ओडीपस अपनी नियति जानकर अपने माता-पिता को बचाने के लिए घर छोड़ देता है। रास्ते में, अनजाने में वह अपने असली पिता (लाइअस) की हत्या कर देता है और थिब्स पहुँचकर रानी जोकास्टा (अपनी असली माँ) से विवाह कर लेता है। जैसे-जैसे कथानक की परतें खुलती हैं, ओडीपस नियति और आत्मग्लानि के टकराव से दुःखी होकर अपनी आँखें फोड़ लेता है और जोकास्टा आत्महत्या कर लेती है। उनकी रचना आज भी विचारकों को नियति और स्वतंत्र इच्छाशक्ति के समीकरण पर सोचने को मजबूर कर देती है।
गैब्रिएल गार्सिया मार्कुएज़, स्पेनिश कथाकार, अपनी रचना One Hundred Years of Solitude में बुएनदिया परिवार की सात पीढ़ियों की कहानी सुनाते है। माकोन्दो नामक काल्पनिक गाँव प्लेग से ग्रस्त होता है, जिसमें लोग अपनी स्मृति खो देते हैं । हर पीढ़ी में एकाकीपन, प्रेम में असफलता, युद्ध, अंतहीन सत्ता का मोह और मृत्यु की प्रतीक्षा, आत्म-निर्वासन की जकड़न प्रमुख विषय बनकर उभरते हैं। उड़ती हुई स्त्रियाँ, वर्षों तक चलने वाली बारिश, और मृतकों की वापसीㄧसब मिलकर यथार्थ और कल्पना के बीच की सीमाओं को मिटा देती है । इतिहास एक चक्र है जिसे वे बार-बार दोहराने को अभिशप्त होते है, यहाँ दुखों से मुक्ति नहीं, केवल पुनरावृत्ति है । कथानक में दुख को इतिहास, स्मृति और नियति से जोड़कर एक गहन दार्शनिक विमर्श के रूप में प्रस्तुत किया गया है।
लेकिन दर्शन तो दुःख का निदान चाहता है । शान्तिदेव ‘बोधिचर्यावतार’ ग्रन्थ में स्वार्थ और परार्थ के भेद को ही दुःख का मूल कारण मानते है। और इस दुःख से मुक्ति का एकमात्र उपाय दूसरों के दुःख को साझा करना ही है । सभी प्राणियों के दुःख को अनुभव करना ही बोधिसत्व का परम लक्ष्य हैं। बोधिचित्त की प्रतिज्ञा है कि जब तक एक भी प्राणी दुःखी है, तब तक बोधिसत्व की करुणा अधूरी है । वे केवल अपने मोक्ष की नहीं, सर्वजनमुक्ति की कामना करते है । पर-दुःख को अखंडता या समग्रता में ग्रहण करने की क्षमता हमें न केवल संवेदनशील बनाती है, अपितु स्वयं का दुःख कुछ हद तक समझने और कम करने में भी मदद करती है । जिस तरह हाथ और पैर एक ही शरीर के अंग है, इनकी पीड़ा की अनुभूति पृथक पृथक नहीं होती है, उसी तरह समाज के लोगों का दर्द ‘मेरा ही दर्द है’ यह अनुभूति हमें दूसरों के प्रति दयाद्र॔ बना देती है।
शान्तिदेव अपने ग्रन्थ में ‘ध्यानपारमिता’ अध्याय में परात्मपरिवर्तन क्रिया का उल्लेख करते है। इस ध्यान की विधि में दुखी व्यक्ति के स्थान पर यदि हम स्वयं को रखने का अभ्यास करें तो पर-दुःख की अनुभूति भी संभव हो सकती है, जिससे बुद्ध की करुणा का मार्ग भी प्रशस्त हो जाता है। मजनूं पर कोड़े बरसते हैं, तो लैला उसकी पीड़ा सिर्फ देखती नहीं है, उन कोड़ों के मार के दाग उसकी भी पीठ पर दिखाई देते है और दोनों आत्माएँ एक ही लय में कराह उठती है। जैसे घास पर चलते हुए घास की पीड़ा को रामकृष्ण परमहंस महसूस करते थे। यहाँ दुःख से पलायन नहीं, बल्कि उसके अस्तित्व में पैठना ही मुक्ति की ओर पहला कदम कहा गया है । मीराबाई इसी उद्देश्य से प्रेरित होकर कहती है ㄧ
घायल की गति घायल जाणै, जो कोई घायल होय।
जौहरि की गति जौहरी जाणै, की जिन जौहर होय॥
**************

डॉ मधु कपूर कलकत्ता के एक प्रतिष्ठित कॉलेज में दर्शनशास्त्र की प्रोफेसर रही हैं। दर्शनशास्त्र के अलावा साहित्य में उनकी विशेष रुचि रही है। उन्हीं के शब्दों में, "दार्शनिक उलझनों की गुत्थियों को साहित्य के रास्ते में तलाशती हूं।" डॉ कपूर ने हिंदी से बंगला में कुछ पुस्तकों का अनुवाद किया है और कुछ कविता संग्रह भी प्रकाशित हुए हैं। दर्शन पर उनके निबंधों का एक संग्रह Dice Doodle Droll Dance प्रकाशित हुआ है।