सुप्रसिद्ध कवि, कथाकार, लेखक, दर्शन एवं मनोविज्ञान के अध्येता शरद कोकास का जन्म बैतूल (मध्यप्रदेश) में हुआ और इनकी प्रारंभिक शिक्षा भंडारा (महाराष्ट्र) में और उच्च शिक्षा भोपाल एवं उज्जैन में सम्पन्न हुई। वैज्ञानिक दृष्टिकोण और इतिहास बोध को लेकर लिखी साठ पृष्ठों की लम्बी कविता ‘पुरातत्त्ववेत्ता‘ (2005) तथा दीर्घ कविता 'देह' (2016) प्रतिष्ठित साहित्यिक पत्रिका ‘पहल’ में प्रकाशित हो चुकी हैं. नवें दशक के कवि शरद कोकास के छह कविता संकलन आ चुके हैं जिनमें पहला संकलन 'गुनगुनी धूप में बैठकर' 1993 में आ गया था और बीसवीं सदी की कविताएँ, ‘सुख एकम दुःख’ एवं बिजूका 2025 में प्रकाशित हुए। दो लम्बी कविताएँ "पुरुरवा उर्वशी की समय यात्रा" (2024) तथा "ओपेनहाइमर" (2026) "समालोचन" वेब पत्रिका में प्रकाशित। कविता के अलावा नवसाक्षर साहित्य के अंतर्गत शरद कोकास की तीन कहानी पुस्तिकाएँ, चिठ्ठियों की एक किताब 'कोकास परिवार की चिठ्ठियाँ' (2004), एक पुरातत्त्ववेत्ता की डायरी (2025 ),‘बैतूल से भंडारा : एक जन इतिहास’(2025 ) भी प्रकाशित हैं। मनोविज्ञान एवं मस्तिष्क पर लिखी उनकी पुस्तक ‘मन मशीन’ (2023) इन दिनों बेस्ट सेलर है। इसके अलावा प्रसिद्ध साहित्यिक पत्रिकाओं व अखबारों में उनकी पाँच सौ से अधिक कविताएँ, समीक्षाएं व लेख प्रकाशित हो चुके हैं। कविताओं के लिए उन्हें वर्ष 2024 का ठा. पूरन सिंह स्मृति ‘सूत्र सम्मान’ प्राप्त हुआ है। प्राचीन भारतीय इतिहास, संस्कृति एवं पुरातत्त्व में विक्रम विश्वविद्यालय उज्जयिनी से परास्नातक, शरद कोकास स्टेट बैंक से स्वैच्छिक सेवानिवृत्ति लेकर साहित्य लेखन के अलावा अंधश्रद्धा निर्मूलन, वैज्ञानिक चेतना के विकास एवं मनोविज्ञान के विविध विषयों पर व्याख्यान देते हैं, ब्लॉग लेखन करते हैं, पॉडकास्ट करते हैं तथा मनोवैज्ञानिक समस्याओं पर काउंसिलिंग व हिप्नोथेरेपी भी करते हैं। विविध विषयों पर उनके व्याख्यान व कविता पाठ के वीडियो उनके यूट्यूब चैनल ‘शरद कोकास’ पर उपलब्ध हैं ৷ सम्प्रति वे दुर्ग छत्तीसगढ़ में निवास करते हैं।





