दीपाली शर्मा 'deez' की तीन नई कविताएं
डॉ दीपाली शर्मा 'deez' आज करीब तेरह महीने बाद अपनी तीन नई कविताओं के साथ हमारी वेबपत्रिका में वापसी कर रही हैं. दो वर्ष पूर्व जब वह हमारे यहाँ पहली बार प्रकाशित हुईं थीं (यहाँ) तो उस समय हमने अपनी सम्पादकीय टिप्पणी में कहा था कि उनकी कविताओं में काफ़ी ताज़गी है और एक तरह से वह अपनी कविताओं में कुछ नए प्रयोग करती दिख रही हैं। ऐसा लगता है कि दीपाली ने उस ताज़गी को बरकरार रखा है और कविता में नए प्रयोग करना भी छोड़ा नहीं है - जैसा कि आप उनकी तीसरी कविता में देखेंगे जिसे वह रैप की तरह गाया जाना देखना चाहती हैं.
1. बड़े शहर
बड़े शहर
तुम अकेले नहीं आए थे
तुम ढेर सारे सपने लाए थे
तुम अकेले नहीं आए थे
तुम माँ-बाप की उम्मीदें लाए थे
तुम अकेले नहीं आए थे
तुम अपनी बहनों का प्यार लाए थे
तुम अकेले नहीं आए थे
तुम साथ में कुछ अरमान लाए थे
वो सपने वो उम्मीदें वो अरमान
जो छोटे-छोटे शहरों से
बड़े-बड़े शहरों में आते हैं
एक बड़े अनजाने शहर को
पहले अपनी मंजिल और
फिर अपना घर बनाते हैं
बड़े सपने के साथ
तुम बड़े शहर आए
पर तुम्हारे ये सपने
इस शहर को नहीं भाये
कभी-कभी ये बड़े शहर
छोटे से नज़र जाते हैं
बड़े अरमानों को कुचल के
उनको निगल जाते हैं
और बड़े सपनों के आगे
बड़े शहर छोटे पड़ जाते हैं
और अब तुम जो चले गए हो
सपने-उम्मीदें-अरमान सब धूल है
पर कोई जान पाएगा नहीं
कि ये किस-किस की भूल है
तुम्हारे अरमानों की लाश पे
फिर से बड़े घर बनाये जायेंगे
फिर से छोटे शहरों से लोग
बड़े अरमान ले कर आयेंगे
पता नहीं कि फिर
उन अरमानों से साथ
बड़े शहर कैसे पेश आयेंगे
और कोई नहीं जानता कि ये बड़े
अपने नाम जैसे बड़े कब बन पाएंगे ..
2. तलाश
तलाशते है दोनों ही
कभी यह घर मुझे
कभी मैं इस घर को
कौन कहता है कि
नहीं बनता दीवारों से घर
और ख़ाली कमरों से ..
यह जो मेरा कमरा है
और उसकी जो दीवार है
उस पर जो हल्का पीला रंग है
दीवार से लगी जो मेज़ है
मेज़ पर पड़ी जो किताब है
पास में ही जो पुराना रेडियो है
वो जो कुर्सी है कमरे के कोने में
कब से है वो रखी खिड़की के पास
और खिड़की के बाहर जो पेड़ है
सालों से मेरे साथ बड़ा हो रहा है
उस पेड़ पे जो रोज़ मैना आती है
वो भी रोज़ ही आ जाती है
कौन कहता है कि सिर्फ़
दीवारों से घर नहीं बनता
ये जो मेरा घर है
और इसकी जो दीवारें है
ये ही मेरा घर हैं
ये तलाशती हैं मुझे
और मैं इन्हें
ये जो मेरा घर है
और इसकी जो दीवारें है
ये ही मेरा घर हैं
कोई और नहीं घर में मेरे सिवा
सब चले गए अपने-अपने रस्ते
तनहा ही हूँ मैं यहाँ
फिर भी तनहा नहीं मैं
ये कमरे ये दीवारें ये मेज़
ये कुर्सी ये खिड़की ये पेड़
ये ही मेरा ठिकाना है
कौन कहता है कि सिर्फ़
दीवारों से घर नहीं बनता
ये तलाशती हैं मुझे
और मैं इन्हें
ये जो मेरा घर है
और इसकी जो दीवारें है
ये ही मेरा घर हैं
3. अधूरी ज़िन्दगी
(देखें कि क्या आप इसे रैप की तरह गा सकते हैं!)
जब जिंदगी लग रही अधूरी सी,
सोचा क्या करूँ कि लगे पूरी सी ।
कहने को तो मेरे पास सब कुछ है ,
देखूँ तो लगे कि सचमुच है ।
फिर भीड़ में क्यों लगे ख़ाली सा,
जैसे कोई बाग़ बिना माली सा।
चेहरे पे झूठी एक लाली सा,
अंदर से सूखा, कंगाली सा।
ये दिल मेरा मुझसे ही रूठा है,
दिखता जो सच, वो तो झूठा है।
ज़िन्दगी को अब फिर से जीना है,
अधूरापन ये हँसी में पीना है।
पर सोचा क्यों रहूँ मैं उदास सी,
क्या पता कुछ हूँ मैं भी खास सी ।
खालीपन उदासी को छोड़ कर ,
जिंदगी से जिंदगी निचोड़ कर ।
पंख अपने फ़हरा कर उड़ ले अब ,
कोई भी न देखे या फिर देखे सब ।
उड़ इक नई परवाज़ भर ,
इक नई सुबह का आगाज कर ।
ये जिंदगी जो जिंदगी है तेरी खास है ,
नई मंजिलों को तेरी आस है।
तू आग़ाज़ कर तू परवाज़ भर ,
जिंदगी में हसीन रंग भर ।
ख़ालीपन को अपने अब दूर कर
आग़ाज़ कर, परवाज़ भर,
खोल ले तू अपने पर
आग़ाज़ कर, परवाज़ भर,
खोल ले तू अपने पर !!!!
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डॉ. दीपाली शर्मा श्री गुरु तेग बहादुर खालसा कॉलेज, दिल्ली यूनिवर्सिटी के अर्थशास्त्र विभाग में एसोसियेट प्रोफेसर के रूप में कार्यरत हैं। करियर के तौर पर अर्थशास्त्र को अपनाने के बावजूद उनका साहित्यिक रुझान हमेशा ही बना रहा। स्वयं उनके शब्दों में, “मैं सिर्फ़ अपने मन में उमड़ते-घुमड़ते विचारों को कविता में पिरो देती हूं, बिना यह चिंता किये कि वो तयशुदा साहित्यिक मानदंडों पर खरी उतरती हैं या नहीं हैं! मेरी कविताएं अगर कुछ सहृदय पाठकों के मन को भी छू जाती हैं तो यह मेरे लिए बहुत संतोष की बात होगी।"