कर्म का अनंत आकाश और क्रिया की अपरिमित उड़ान :ऐच्छिक और अनैच्छिक क्रियाओं का दर्शन
हमारे अधिकांश पाठकों ने स्कूल के वर्षों में ऐच्छिक और अनैच्छिक क्रियाओं के बारे में और सकर्मक और अकर्मक क्रियाओं के बारे में पढ़ा होगा। अपने दार्शनिक लेखों की श्रृंखला में डॉ मधु कपूर हमें फिर एक बार इन क्रियाओं और क्रिया पदों की ओर ले जा रहीं हैं लेकिन हर बार की तरह आप उनका यह लेख पढ़ने के बाद भी दर्शनशास्त्र के एक और छोटे से क्षेत्र में स्वयं को सशक्त अनुभव करेंगे।
कर्म का अनंत आकाश और क्रिया की अपरिमित उड़ान :ऐच्छिक और अनैच्छिक क्रियाओं का दर्शन
डॉ मधु कपूर
‘वह छत से कूद कर गिर पड़ा’।
‘पीछे से किसी ने धक्का दिया और वह छत से गिर पड़ा’।
ऊपर के दोनों वाक्यों में ‘गिरना’ क्रिया पद है। पहले वाक्य में ‘गिरना’ ऐच्छिक क्रिया है अर्थात स्वेच्छा से की गई क्रिया है, जबकि दूसरे वाक्य में ‘गिरना’ एक घटना है, यह एक अनैच्छिक क्रिया है जो अचानक ‘घट’ गई। 'ऐच्छिक क्रिया' का दर्शन इस बात पर टिका रहता है कि क्या मनुष्य अपने कार्यों का चुनाव करने में स्वतंत्र है? यदि हमारे सारे कार्य मस्तिष्क के रसायनों या भाग्य से तय होते, तो ‘ऐच्छिक क्रिया’ की अवधारणा ही समाप्त हो जाती। गीता में श्रीकृष्ण कहते है हम एक क्षण भी बिना कर्म किये हुए नहीं रह सकते है—न हि कश्चित् क्षणमपि जातु तिष्ठत्यकर्मकृत्। चाहे कर्म करने की इच्छा हो या न हो, हम किसी न किसी रूप में शारीरिक, मानसिक और भावनात्मक क्रियाओं से बंधे रहते हैं। कुछ क्रियायें —जैसे रक्त सञ्चालन, छींक आना, ह्रदय का धडकना— अनैच्छिक कहलाती हैं, क्योंकि इन पर हमारा कोई नियंत्रण नहीं होता।
भाषा-शास्त्र की दृष्टि से क्रिया और कर्म एक नहीं होते। वाक्य अपनी सम्पूर्णता के लिए क्रिया पद की अपेक्षा करता है और क्रिया कर्म की अपेक्षा करता है। जैसे ‘राम किताब पढ़ता है’ —इस वाक्य में ‘पढ़ना ‘ क्रिया का कर्म ‘किताब’ है। क्या पढता है? इस प्रश्न के उत्तर में व्यक्ति कहता है ‘किताब’। इस तरह जिस क्रिया का प्रभाव किसी कर्म पर पड़ता है, उसे सकर्मक क्रिया कहते हैं। यूँ तो क्रिया कर्म के बिना भी हो सकती है, जैसे अकर्मक क्रिया में कर्म की अपेक्षा नहीं होती है। ‘लीला हँसती है’— इस वाक्य में ‘हँसना’ क्रिया है पर उसका प्रभाव कर्ता पर पड़ता है, क्योंकि ‘हँसना’ अकर्मक क्रिया पद है।
भाषा में क्रिया का काम केवल कार्य या अवस्था का बोध कराना है। जैसे ‘खाना पक रहा है’, इस वाक्य में ‘पकना’ कुछ ‘घटने’ या ‘होने’ की ओर संकेत कर रहा है। ‘व्याकरण का कर्म’ और ‘दार्शनिक कर्म’ दोनों शब्द सतही तौर पर समान लगते हैं, लेकिन उनका आशय अलग अलग होता है। जो कुछ घटित हो रहा है—चाहे वह इच्छा से हो या बिना इच्छा के वह क्रिया के अंतर्गत तो आते है पर वे कर्म नहीं भी हो सकते है। कर्म का अर्थ है वे कार्य जो केवल ‘क्रिया’ नहीं, बल्कि कर्तव्य और नैतिक परिणाम से भी जुड़कर एक सम्पूर्णता के परिचायक होते हैं। परिणाम शुभ या अशुभ कुछ भी हो सकता है। 'क्रिया' और 'कर्म' को अक्सर पर्यायवाची मान लिया जाता है, परंतु दार्शनिक परिप्रेक्ष्य में इनका अर्थ भिन्न होता है, क्योंकि दर्शन में अनैच्छिक क्रिया "कर्म" नहीं कहलाती है, क्योंकि उसमें न हमारी इच्छा काम करती है, न नैतिक जिम्मेदारी। जबकि व्याकरण में अनैच्छिक कार्य को क्रिया का स्थान दिया जाता है। वस्तुतः क्रिया वह साधन है जिसे कर्ता अपनाता है, जबकि कर्म वह साध्य या प्रभाव है, जिसे क्रिया के माध्यम से प्राप्त किया जाता है।
पश्चिमी चिंतन में Philosophy of Action एक स्वतंत्र शाखा है। उदाहरण स्वरूप अरस्तू ने कर्म के लिए Praxis शब्द का व्यवहार किया है जिसका सीधा अर्थ होता है: 'सिद्धांत को व्यवहार में लाना' अर्थात जब हम किसी विचार को केवल दिमाग में रखने के बजाय उसे असल जिंदगी में लागू करते हैं, तो उस प्रक्रिया को व्यावहारिक क्रिया (praxis) कहा जाता है, जैसे न्याय करना, मित्रता निभाना, सत्य बोलना इत्यादि, जिसका उद्देश्य उसी क्रिया में निहित होता है, न कि किसी बाहरी परिणाम में। इसके विपरीत, Poiesis रचनात्मक क्रिया है जिसका उद्देश्य कोई बाहरी परिणाम है, जैसे घर बनाना, कविता लिखना, चित्र आंकना इत्यादि।
फिलहाल ऐच्छिक क्रिया ही दार्शनिक आलोचना की विषय वस्तु है, जिसमें हमारी स्वाधीन इच्छा शक्ति कार्य करती है। गीता में श्रीकृष्ण कहते है —कर्म कैसा होना चाहिए इस बारे में विद्वानों को भी भ्रम हो जाता है, क्योंकि कर्म का स्वरूप पल-पल बदलता रहता है। जैसे युद्ध में मारना एक व्यक्ति के लिए कर्तव्य हो सकता है, दूसरे के लिए बुरा कर्म हो सकता है। प्रश्न है हमें क्या करना चाहिए और क्या नहीं —यह निर्णय लेने का कार्य हमारी 'व्यवसायात्मिका' बुद्धि ही कर सकती है, जिसे विवेक ज्ञान की संज्ञा दी जाती है। इस तरह कर्म और ज्ञान के बीच एक कारण-कार्य संबंध स्थापित हो जाता है।
कोई भी बुद्धिमान व्यक्ति तब तक कार्य में प्रवृत्त नहीं होता है, जब तक उसे यह ज्ञात न हो जाये कि यह क्रिया उसे अभीष्ट फल देगी। इस तरह 'प्रवृत्ति' का मुख्य कारण 'इष्टसाधनता का ज्ञान' अर्थात अभीष्ट फल का साधन है, जो एक 'मानसिक स्थिति’ को प्रकट करता है। लेकिन केवल इच्छा मात्र से कोई कार्य संपन्न नहीं होता है, उसके लिए चाहिए कृतिसाध्यता का ज्ञान अर्थात कार्य को करने की क्षमता का होना। जब तक बुद्धि यह निर्णय नहीं लेती हैं कि ‘यह कार्य मैं कर सकता हूँ’. तब तक मनुष्य सक्रिय नहीं होता है।
उदाहरण के लिए जब व्यक्ति को प्यास लगती है तो उसे विश्वास होता है कि सामने रखे हुए गिलास में पानी है और उसे पीकर प्यास बुझाई जा सकती है। यह ‘पीने’ की क्रिया कई स्तरों पर घटती है— प्यास लगना, पानी पीने की इच्छा का होना (काफी, शरबत इत्यादि नहीं), गिलास में पानी को देखना, हाथ बढ़ाना, विश्वास करना कि यह पानी ही है और मुंह में पानी लेने के बाद गले के माध्यम से घूंट गटकना और फिर शरीर में पहुँच कर तृप्ति बोध होना - यह सभी क्रियाएं है जो मेरी इच्छा से संपन्न होती है। बिना इस ज्ञान के सफल प्रवृत्ति संभव नहीं हो सकती है। पक्षाघात ग्रस्त व्यक्ति की इच्छा होने पर भी उसमें सामर्थ्य न होने के कारण उसकी इच्छा क्रिया में रूपान्तरित नहीं हो सकती है। इसके अलावा किसी कार्य को करने से जो परिश्रम होता है, उसकी तुलना में प्राप्त होने वाला सुख उस परिश्रम से कहीं अधिक होता है। उदाहरण के लिए स्पेस में जाने के पहले और लौटने के बाद यात्री को अत्यन्त कष्टसाध्य ट्रेनिंग से गुजरना पड़ता है। पर सफलता के सुख की तुलना में यह परिश्रम उसे स्वीकार होता है, जिसे बलवदनिष्टाननुबन्धित्व ज्ञान कहा जाता है, इस कार्य में अत्यधिक अनिष्ट की आशंका नहीं होती है।
ऐच्छिक क्रिया के लिए इच्छा और चेष्टा दोनों की ही आवश्यकता पड़ती है। मैं कार ड्राइव करता हूँ क्योंकि मैं कर सकता हूँ, पर इसके साथ सुरक्षा का नैतिक दायित्व भी जुड़ा रहता है। दार्शनिक डोनाल्ड डेविडसन के अनुसार यही वह तर्क है जो व्यक्ति के मस्तिष्क में उपजी इच्छा और विश्वास को आधार प्रदान करता है और वह स्टीरियिंग पर हाथ रखता है। जब तक कर्ता को यह विश्वास न हो कि ‘यह कर्म मेरे लक्ष्य का साधन है’, तब तक वह कर्म नहीं करेगा। डेविडसन कहते हैं कि जब हम किसी के कार्य की व्याख्या करते हैं, तो हम यह ढूंढते हैं कि उस व्यक्ति ने वह कार्य क्यों किया? यदि हम उसके 'इरादे' को समझ लें, तो हमें उस कार्य का 'कारण' मिल जाता है।
डेविडसन ने एक चुनौती भी पेश की। कभी-कभी इच्छा और विश्वास होते हुए भी कार्य संपन्न नहीं होता है। उदाहरण के लिए एक परीक्षार्थी प्रश्नपत्र देखकर सोचता है कि उसे सही उत्तर आता है, पर घबराहट में या अति उत्साह से उसका हाथ कांपने लगता है और वह गलत उत्तर पर चिह्न लगा देता है। यहाँ इच्छा और विश्वास तो था, लेकिन गलत चिन्ह 'अनजाने' में लग गया। सबसे परिचित और सहज दृष्टान्त बच्चे देते है जब उनसे पूछा जाता है ‘तुमने यह खिलौना क्यों तोड़ा ?’ उनका जवाव होता है—‘अपने आप टूट गया’।
कर्म एक ऐसे कारण-कार्य नियम से बंधा होता है जो परिणामों को जन्म देता है। अच्छे कर्म को धर्म कहा जाता है, जबकि बुरे कर्म को अधर्म कहा जाता है। डेविडसन के अनुसार, यदि मुझे प्यास लगी है, सामने तरल पदार्थ है लेकिन मुझे विश्वास नहीं है कि यह पानी है तो मैं उसे नहीं पीऊंगा। लेकिन वैसा ही जल विष-मिश्रित होने पर भी अत्यन्त लोभनीय लगने के कारण विश्वास पैदा करता है और पी लेने पर प्राण घातक सिद्ध हो जाता है। इस प्रकार की गति इतनी जटिल और न्यारी है कि इसका ओर-छोर खोजना दुर्लभ हो जाता है।
कुछ ऐसे ही दृष्टान्त हमें आये दिन अपने चारों तरफ दिखाई देते है — जैसे जंगल काटकर सड़क या आवास बनाये जाते हैं, लाखों लोगों को सुविधा और रोजगार मिलता है, लेकिन अनगिनत जीव-जंतु और भविष्य की पीढ़ियों पर इसका बुरा प्रभाव पड़ता है। यदि किसी के पास सीमित संसाधन हैं, तो वह किसे मदद करे? भूखे बच्चों को भोजन, बीमारों को दवा, या शिक्षा के लिए सहयोग? कभी-कभी सत्य बोलने से किसी का जीवन बदल सकता है, लेकिन उसी सत्य से किसी को गहरी चोट भी पहुँच सकती है। नई तकनीक जैसे कृत्रिम बुद्धिमत्ता समाज को एक ओर अनगिनत लाभ दे सकती है, तो दूसरी ओर अनगिनत जोखिम भी। निर्णय करना कठिन है कि हमें कितना आगे बढ़ना चाहिए। इन सभी प्रश्नों का कोई निश्चित उत्तर हमारे पास नहीं होता है।
अंत में रामायण में पक्षीराज गरुड़ से कहे गये भुशुंडि के कथन से समाप्त करना चाहूंगी —
तुम समान खग मसक प्रजंता ।
नभ उड़ाहि नहीं पावहिं अंता । ।
अर्थात कोई पक्षी आकाश की कितनी ही ऊँचाई की सैर क्यों न कर ले, आकाश के छोर को नहीं छू सकता । अर्थात कर्म की थाह पाना असंभव विचार है।
**********

डॉ मधु कपूर कलकत्ता के एक प्रतिष्ठित कॉलेज में दर्शनशास्त्र की प्रोफेसर रही हैं। दर्शनशास्त्र के अलावा साहित्य में उनकी विशेष रुचि रही है। उन्हीं के शब्दों में, "दार्शनिक उलझनों की गुत्थियों को साहित्य के रास्ते में तलाशती हूं।" डॉ कपूर ने हिंदी से बंगला में कुछ पुस्तकों का अनुवाद किया है और कुछ कविता संग्रह भी प्रकाशित हुए हैं। दर्शन पर उनके निबंधों का एक संग्रह Dice Doodle Droll Dance प्रकाशित हुआ है।