भारतीय चिंतन की धाराएँ : एक अकादमिक दृष्टि
सुभाष सेतिया की दो कविताएँ आप इस वेब-पत्रिका में पढ़ चुके हैं. इसी बीच हमने उनसे अनुरोध किया कि वह हमें अपने लेख भी भेजें तो उन्होंने भारतीय चिंतन की अलग-अलग धाराओं से परिचित कराते हुए यह लेख भेजा है जिसमें भारतीय दर्शन की परम्पराओं का एक सरलीकृत विवरण मिल जाता है. वैसे हमारे बहुत से पाठक डॉ मधु कपूर के दार्शनिक लेखों की श्रृंखला पिछले काफी समय से पढ़ रहे हैं लेकिन नए जुड़ रहे पाठकों के लिए सुभाष सेतिया का यह लेख विशेष रूप से उपयोगी रहेगा.
भारतीय चिंतन की धाराएँ
सुभाष सेतिया
यूनान मिस्र रोमां सब मिट गए जहाँ से
कुछ बात है कि हस्ती मिटती नहीं हमारी
इक़बाल का यह शेर हालाँकि बीसवीं सदी में रचा गया पर यह बताता है कि भारत का दर्शन, चिंतन और आचरण ऐसा रहा है कि हज़ारों साल पुरानी संस्कृति और सभ्यता की कश्ती अनेक झंझावातों से टकराने के बाद भी आज तक अपने तेज से दुनिया को रास्ता दिखाने की क्षमता रखती है। इस मुद्दे पर विचार करना इसलिए ज़रूरी लग रहा है कि जो चिंतन धारा सदियों तक विरोधों व आक्रमणों के बावजूद ‘हस्ती मिटती नहीं हमारी’ की स्थिति में रही उसे आज बाहर से नहीं अंदर से ही हमले झेलने पड़ रहे हैं।
हस्ती न मिटने या हमारी उम्रदराजी की वजह है हमारे चिंतन का खुलापन, सहनशीलता और समन्वय का भाव। ‘एकम् सत्य पंडिता: बहुधा वदंति ‘अर्थात् एक ही सत्य का बखान विद्वान लोग अलग-अलग ढंग से करते हैं। इसी सोच के कारण हमारा वांग्मय इतना विविध और संपन्न हो पाया है। आज हम राजनीति और विचारधारा में 'लेफ्ट' और 'राइट' यानि वाम और दक्षिण की जो चर्चा सुनते हैं उसके बीज हमारे चिंतन में सदा मौजूद रहे हैं । विश्लेषण से यह सिद्ध होता है कि दोनों ध्रुवों को जोड़ने की उपधाराएँ भी समय-समय पर अवतरित होती रही हैं जो स्वयं तो प्रमुखता प्राप्त नहीं कर सकीं किंतु मुख्य धाराओं की दूरी कम करने में अपना योगदान दे सकीं। आज के राजनीतिक परिदृश्य में यही उपधाराएँ 'लेफ्ट ऑफ द सेंटर' या 'राइट ऑफ द सेंटर' कहलाती हैं। ज्ञान और विचारों की भिन्नता के बीच सामंजस्य और समरसता ने हमारी चिंतन प्रकिया को सजीव व प्रासंगिक बनाए रखा है।
भारत की दर्शन परंपरा से ही संकेत मिलते हैं किस तरह एक दूसरे से अलग होते हुए भी मानव के विकास में वे एक दूसरे के पूरक बन कर काम करते रहे हैं। हमारे यहाँ दो तरह के दर्शन परिवार हैं। पहला वर्ग आस्तिक कहलाता है। यहाँ आस्तिक का अर्थ है वैदिक परंपरा में आस्था। ये षड्दर्शन कहलाते हैं क्योंकि ये संख्या में छह हैं। ये हैं: सांख्य, योग, न्याय, वैशेषिक,पूर्व मीमांसा और उत्तर मीमांसा। ये दर्शन अलग अलग समय पर अलग अलग ऋषियों या विद्वानों द्वारा प्रवर्तित किए गए। सभी दर्शनों के अपने पृथक् तर्कशास्त्र हैं जिनके माध्यम से ये एक दूसरे के तर्कों को काटते हुए जीव, जगत् और ईश्वर के संबंधों का न केवल ज्ञान देते हैं बल्कि अनुभूति के स्तर पर परमानंद की अवस्था की प्राप्ति की विधियां भी बताते हैं। पूर्व मीमांसा और उत्तर मीमांसा तो एक ही डग के दो चरण हैं। उदाहरण के लिए पूर्व मीमांसा में ईश्वर को सत्य माना गया है जिसे जीव को जगत् रूपी माया से निपट कर प्राप्त किया जा सकता है। इसे द्वैतवाद भी कहते हैं। उत्तर मीमांसा दर्शन इससे आगे बढ़ कर ईश्वर को माध्यम मात्र मान कर ब्रह्म की प्राप्ति को चरम अवस्था मानता है। यह अद्वैतवाद कहलाता है। आज की परिभाषा के अनुसार षड्दर्शन की चिंतन परंपरा को दक्षिण पंथ मान सकते हैं।
भारतीय दर्शन परंपरा का दूसरा परिवार नास्तिक श्रेणी में आता है जो वैदिक परंपरा का अनुपालन नहीं करता। साथ ही ये दर्शन ईश्वर की सत्ता को नकारते हैं। इनमें बौद्ध दर्शन, जैन दर्शन और चार्वाक दर्शन हैं। बौद्ध और जैन दर्शन कालांतर में धर्म बन गए जिनकी चिंतन व आचरण प्रक्रिया सनातन या वैदिक धर्म से अलग रही। चार्वाक दर्शन का नाम इसकी स्थापना करने वाले ऋषि चार्वाक के नाम पर पड़ा। यह पूर्णतया भौतिक जीवन को सत्य मानता है और आत्मा परमात्मा की परिकल्पना को मिथ्या बताता है। इसके एक प्रसिद्ध मंत्र से इसकी वास्तविक दृष्टि को समझा जा सकता है । यह मंत्र है : यावेद जीवेत् सुखं जीवेत् ऋणम् गृहीत्वा घृतम् पिबेत्’ अर्थात् जब तक जियो, सुख से जियो, ऋण लेकर घी पियो। तो ऐसे घोर भौतिकवादी दर्शन को भी हमारे यहाँ मान्यता मिली है और इसके प्रवर्तक को ऋषि का पद प्राप्त है । आधुनिक शब्दावली में इस दर्शन परंपरा को वाम पंथ माना जा सकता है। जैसा कि पहले बताया गया है कि प्रत्येक दर्शन के विद्वानों ने दूसरे दर्शनों का खूब खंडन मंडन किया है। इस तरह हमारी चिंतन परम्परा की अलग-अलग धाराएँ कभी समांतर रूप से तो कभी एक दूसरे को काटते हुए आगे बढ़ती रही हैं।
मध्य काल में यदि हम भक्ति धारा पर नज़र डालें तो लगभग समूचे देश में हर भाषा के साहित्य और सामाजिक -सांस्कृतिक जीवन में दो धाराएँ स्पष्ट दिखाई देती हैं। एक है सगुण धारा और दूसरी है निर्गुण धारा। सगुण धारा में मूर्ति पूजा यानि ईश्वर के साकार रूप में आस्था, अर्चना आदि का चलन रहता है। निर्गुण परंपरा में निराकार रूप में आस्था और प्रार्थना की जाती है। दोनों धाराओं के प्रवर्तक महान भक्त, कवि और विद्वान व्यक्ति रहे हैं । हिंदी प्रदेशों में तुलसी, सूरदास, मीरां,जैसे प्रमुख भक्त कवि सगुण धारा के और कबीर, नानक, रैदास जैसे भक्त कवि निर्गुण धारा का प्रतिनिधित्व करते हैं। इन दोनों धाराओं के भक्त कवियों व विद्वानों द्वारा एक दूसरे से विपरीत मान्यताओं के अनुसरण के बावजूद वे समूचे समाज में स्वीकार्य व मान्य रहे। दोनों धाराओं के महात्माओं का उद्देश्य लोगों को सही दिशा देना रहा। यों आप सगुण धारा को दक्षिणपंथी और निर्गुण धारा को वामपंथी कह सकते हैं क्योंकि सगुण भक्तों ने सनातन परंपरा का अनुसरण किया और किसी वैचारिक परिवर्तन की बात नहीं कही जबकि निर्गुण धारा के कवियों ने प्राचीन प्रथाओं और विश्वासों का खंडन किया और ईश्वर के मनुष्य रूप की बजाय निराकार रूप को प्राथमिकता दी। कबीर जैसे कवियों ने तो सामाजिक विद्रूपताओं पर भी जम कर कलम चलाई। आलोचकों ने कबीर को खंडनवादी कवि घोषित किया।
भक्ति काल की यह प्रवृत्ति देश के लगभग सभी अंचलों में दिखाई देती है । बांग्ला, मराठी, गुज़राती, तमिल आदि अनेक भारतीय भाषाओं में सगुण व निर्गुण रूपों का अनुसरण करते हुए साहित्य रचना हुई। यहाँ एक उल्लेखनीय बात यह है कि हिंदी सहित अनेक भाषाओं के निर्गुण भक्त कवि ब्राह्मण न हो कर तथाकथित छोटी जातियों से आते थे। नानक खत्री थे, कबीर जुलाहा थे, रैदास चर्मकार थे। यह भी ध्यान देने की बात है कि निर्गुण धारा के कवि ज़्यादा शिक्षित और प्रशिक्षित नहीं थे। किंतु उनकी रचनाएँ अपनी -अपनी भाषा के साहित्य में श्रेष्ठ पद पर आसीन हैं और उन पर व्यापक शोध किया गया है। तुलसीदास हिंदी के सर्वश्रेष्ठ कवि के रूप में स्थापित हैं और उनका रामचरित मानस घर घर में पढ़ा जाता है। इसी तरह सूरदास , मीरां ,कबीर आदि के दोहे और अन्य पद लोगों के गले का हार हैं। दो अलग धाराएँ होते हुए भी भक्ति काल को साहित्य का स्वर्ण युग माना जाता है।
आधुनिक काल में हमारे यहाँ वाम और दक्षिण चिंतन धाराएँ 19वीं शताब्दी में अधिक स्पष्ट हो कर उभरीं जब अंग्रेज़ी शिक्षा पद्धति लागू होने और विश्व की ज्ञान प्रवृत्तियों के संपर्क में आने से हमारे चिंतन में पश्चिमी ज्ञान विज्ञान व विचारधारा ने हस्तक्षेप किया। भारत के परंपरागत चिंतन में लंबे समय तक एक तरह का ठहराव रहा ,जबकि पश्चिम में दर्शन की अनेक शाखाएं अस्तित्व में आ चुकी थीं। आधुनिक शिक्षा के फलस्वरूप न केवल नए विचारों व ज्ञान ने हमें झकझोरा बल्कि हम अपने प्राचीन चिंतन पर पड़ी धूल को भी झाड़ने को प्रेरित हुए। इससे दोनों चिंतन प्रणालियों में टकराव भी देखने को मिला और परस्पर आदान -प्रदान भी हुआ। बीसवीं सदी भारतीय संदर्भ में क्रांतिकारी सदी सिद्ध हुई । इस दौरान हमारी मेधा को विश्व ने पहचाना। पश्चिम के ज्ञान और भारत के वेदों ,शास्त्रों, उपनिषदों , गीता रामायण, महाभारत जैसे संस्कृत के ग्रंथों के अध्ययन व अनुवाद से भारतीयों ने देश में मौजूद अपार ज्ञान को न केवल पहचाना बल्कि उस पर गर्व महसूस किया।
महात्मा गांधी और स्वामी विवेकानंद ने भारतीय जन मानस को प्रभावित करने तथा विदेशों में एक ज्ञान संपन्न राष्ट्र के रूप मे भारत की छवि को निखारने में बहुत बड़ी भूमिका निभाई। इन में से एक के नाम से पहले महात्मा और दूसरे के नाम के साथ स्वामी लिखा जाता है जो प्रत्यक्ष तौर पर उनके दक्षिणपंथी होने का संकेत है किंतु यह पूरा सच नहीं है। ये दोनों महात्मा बुद्ध के बताए मध्य मार्ग के अनुगामी रहे। वे विचार और व्यवहार दोनों स्तरों पर परिवर्तन के समर्थक थे। विवेकानंद घर में बैठ कर गीता का पाठ करने से मैदान में जाकर फ़ुटबॉल खेलना बेहतर मानते थे। उन्होंने पहली बार सनातन धर्म के साथ समाज सेवा को जोड़ा। गांधी जी भले ही कुछ मामलों में परंपरावादी थे किंतु उन्होंने समाज सुधार तथा अन्य प्रगतिशील कदम जोड़ कर स्वतंत्रता आंदोलन को राष्ट्र निर्माण अभियान बना दिया।अहिंसा और सत्याग्रह जैसे परंपरागत भारतीय मूल्यों को लोकप्रिय बना कर इन्होंने परंपरा के रास्ते लोगों को आधुनिक बनाने का अद्भुत प्रयास किया। कांग्रेस प्रारंभ में भले ही दक्षिणपंथी थी, लेकिन धीरे-धीरे वो वाम और दक्षिण दोनों मार्गों पर चलने वालों का एक 'अम्ब्रेला' समूह बनती गई। लाल, बाल, पाल का मुहावरा इसी तथ्य की ओर इशारा करता है। देश की विविधता के चलते समूचे देश को साथ लेकर चलने के लिए मध्य मार्ग ही उचित मार्ग समझा गया। इस दौरान राजनीतिक क्षितिज पर कम्युनिस्ट पार्टी का उदय हो चुका था जो घोषित रूप से वामपंथ की प्रतिनिधि थी।
स्वतंत्रता के पश्चात् , विशेष तौर पर राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ और उसकी मानस संतति जनसंघ का प्रभाव बढ़ने के बाद वाम और दक्षिण की रेखा गाढ़ी हो गई। एक ओर जनसंघ और स्वतंत्र पार्टी जैसे दल यथास्थिति व पूंजीवादी अर्थ व्यवस्था की पैरवी कर रहे थे और कम्युनिस्ट पार्टी उत्पादन और वितरण के साधनों पर राज्य के अधिकार की पक्षधर थी। प्रथम प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरु का झुकाव समाजवाद या वामपंथ की ओर था किंतु सत्तारूढ़ कांग्रेस के अधिकांश बड़े नेता मध्य मार्ग के हिमायती थे, इसलिए सरकार ने मिश्रित अर्थव्यवस्था की नीति अपनाई। लेकिन उसका झुकाव वामपंथ की ओर रहा जिसे 'लेफ्ट ऑफ द सेंटर' कह सकते हैं। 1980 के दशक तक केंद्र में जितनी भी सरकारें बनीं , सबने 'लेफ्ट ऑफ द सेंटर' रुख़ अपनाए रखा। इस बीच रूस तथा कई अन्य देशों में साम्यवादी व्यवस्था बिखर जाने और चीन जैसे बड़े साम्यवादी देशों में पूंजीवादी नीतियों की स्वीकृति के बाद समाजवादी अर्थनीति को क़ायम रखना कठिन हो गया और 1991 में भारत ने समाजवादी नियंत्रणों को शिथिल करके आर्थिक सुधारों का रास्ता अपनाया हालाँकि सामाजिक दृष्टि से 'लेफ्ट ऑफ द सेंटर' की धारा बरक़रार रही।
इतिहास कभी भी स्थिर नहीं रहता । इक्कीसवीं सदी तक पहुँचते-पहुँचते देश पर कांग्रेस की पकड़ ढीली होने लगी और घोषित रूप से दक्षिणपंथी दल भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) का प्रभाव बढ़ने लगा। इस पार्टी की मज़बूती धर्म को राजनीति से अधिकाधिक जोड़ने के कारण बढ़ने लगी। साथ ही अर्थव्यवस्था पूँजीपतियों व धनाढ्य लोगों के हितों पर ज़्यादा बल देने लगी। जब तक बीजेपी दूसरे दलों के सहयोग से सत्ता में रही, तब तक उसके सांप्रदायिक व वित्तीय एजेंडे पर कुछ नियंत्रण रहा । परंतु 2014 में लोकसभा में पूर्ण बहुमत मिल जाने के बाद हर मोर्चे पर दक्षिण पंथ का खुला खेल प्रारंभ हो गया ,जिसमें राष्ट्रवाद, अतीत का महिमामंडन, धर्म की भूमिका, पूँजीवाद और अपने क़रीबी पूँजीपतियों का हित साधन , मीडिया पर नियंत्रण जैसे वे सभी तत्व खुल कर खेलने लगे , जो दक्षिण पंथ के अनिवार्य अंग हैं। आर एस एस और उसके अनुषंगी संगठनों का प्रशासन में हस्तक्षेप आम बात हो गई। यहाँ तक कि विदेश नीति भी बदल गई है।
यह स्वीकार करने में कोई संकोच नहीं होना चाहिए कि विश्व के अधिकांश भाग की तरह भारत में इस समय दक्षिणपंथ हावी है और वामपंथ क्षीण है। मिश्रित अर्थव्यवस्था के दौर में लोगों को कम क़ीमत पर बेहतर सुविधाएं और रोज़गार उपलब्ध कराने के लिए सार्वजनिक क्षेत्र में जो उद्योग व संस्थान बने थे, उन्हें धड़ाधड़ औने-पौने दामों पर बेचा जा रहा है। शिक्षा, स्वास्थ्य , बीमा, निर्माण रेल, विमान सेवा आदि हर क्षेत्र में निजीकरण का बोलबाला है। चिंतनीय यह भी है कि सत्तासीन वर्ग में लोकतंत्र की बजाय अधिनायकवादी तत्व मुखर हो रहे हैं। साथ ही सांप्रदायिक ताक़तें सत्ता का साथ दे रही हैं और सत्ता की मदद से अपना वर्चस्व फैला रही हैं। हालत यह है कि सरकारी कार्यक्रमों में धर्म का खुला प्रवेश हो गया है। कर्मचारियों व अधिकारियों की प्रशिक्षण कार्यशालाओं में आरएसएस के लोगों को प्रशिक्षक के रूप में भेजा जाता है ताकि संघ की अलगाववाद की भावना प्रशासन का अंग बन जाए।
सांप्रदायिकता और पूँजीवाद के साथ साथ नौकरशाही व मीडिया अंधाधुंध हो कर सत्ता को सहारा दे रहे हैं किंतु काले बादलों में चमकती बिजली के समान यह तथ्य भी हमारे सामने है कि विचारधारा और प्रतिबद्धता के स्तर पर बड़ी संख्या में प्रगतिशील लोग पूरे आत्म विश्वास के साथ प्रतिगामी और अतीतोन्मुखी दक्षिणपंथ से टक्कर लेने को कटिबद्ध है। इस समय प्रत्यक्ष रूप में वाम चिंतन धारा भले ही दुर्बल है पर 'लेफ्ट ऑफ द सेंटर' की दृष्टि जीवित है। नई पीढ़ी दक्षिण पंथ के इस सैलाब को रोकने के लिए सड़कों पर आने लगी है। विचारधारा के तौर पर न सही, सक्रियता के स्तर पर वामपंथ नए रूप में सामने आ रहा है।
निष्कर्ष के तौर पर कहा जा सकता है कि देश में दक्षिण और वाम दोनों जीवित रहेंगे और अंतत: मध्य मार्ग ही हमारे आगे बढ्ने का रास्ता बनेगा।
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सुभाष सेतिया आकाशवाणी से अपर महानिदेशक(समाचार) पद से रिटायर । भारतीय सूचना सेवा (IIS) के अधिकारी के रूप में आकाशवाणी और दूरदर्शन में समाचार संपादन, प्रकाशन विभाग में आजकल. योजना और Employment News का संपादन, पत्रकारिता का अध्यापन । 10 पुस्तकों का प्रकाशन । आकाशवाणी के विशेष संवाददाता के रूप में कई देशों की यात्रा ।