एक टुकड़ा धूप का और अन्य कवितायें
पारुल हर्ष बंसल की कवितायें किसी परिचय की मोहताज़ नहीं। आप इनकी कविताएं इस वेब-पत्रिका में पहले भी पढ़ते रहे हैं हालांकि इस बार अंतराल कुछ लंबा हो गया था। इस बार केवल यह दो कविताएं पढ़िये - जल्द ही और भी प्रकाशित की जाएंगी।
एक टुकड़ा धूप का और पारुल हर्ष बंसल* की अन्य कवितायें
एक टुकड़ा धूप का
एक डिब्बे में भरकर धूप संजो ली है मैंने
उस वक्त के लिए
जब तुम्हें अपने कांपते हाथों से
एक कौर तुम्हारी मनपसंद सब्जी का
खिला रही हूंगी...
और यदि छलककर हल्दी का दाग़
कमीज पर तुम्हारी लग जाए
तो उसे धूप में उड़ने के लिए नहीं डालूॅंगी
वह प्रमाण होगा उस अबोले प्रेम का
जो मैं करती आई हूॅं सदा तुमसे.....
प्रेम की इस धरोहर को
यूॅं ही संजोकर रखने के लिए
धूप का वह हिस्सा भी मैंने
चाकचौबंदी के साथ सुरक्षित कर लिया है।
मैं बोधिसत्व नहीं....
मैं बोधिसत्व नहीं
जो समय-समय पर तुम्हें पथभ्रष्ट होने से बचाती रहूॅं
या तुम्हारे अन्यायों को न्याय में बदलती रहूॅं
मैं तुम्हारा दूरदृष्टि यंत्र नहीं
जो भविष्यवेत्ताओं के पूर्वानुमानों की गणनाओं से
तुम्हें वाक़िफ करा सकूॅं
मैं कोई तुम्हारी स्वअर्जित संपत्ति नहीं
जिसे आप जब चाहें दांव पर लगा सकें
मेरे भीतर राजा इंद्रजीत की भार्या सा
सरल व सहज हृदय नहीं
जो तत्क्षण ही तुम्हारी नादानियों को
नज़रंदाज़ कर सकूॅं
न मुझमें वैदेही जैसा संतोष है
जो सब उपालंभों और दुर्वाक्यों को सहन करती फिरूं
मुझमें थेरी इसीदासी जैसा धैर्य भी नहीं
कि तीन-तीन बार पुनर्विवाह की प्रक्रिया से
स्वयं को आहत करूॅं
इससे बेहतर तो यह होगा कि
थेरी सुमेधा के पदचिन्हों का अनुसरण करते हुए
मैं संसार ही त्याग दूॅं....

*पारुल हर्ष बंसल मूलत: वृन्दावन से हैं और आजकल कासगंज में हैं। इनकी कवितायें स्थानीय पत्र-पत्रिकाओं और वेब पोर्टल्स पर प्रकाशित होती रही हैं। स्त्री-अस्मिता पर कविताएं लिखना इनको विशेष प्रिय है। इनकी कवितायें पहले भी इस वेबपत्रिका में पढ़ चुके हैं। सबसे ऊपर नीले रंग में लिखे इनके नाम पर क्लिक करके आप इनकी पहले की कवितायें पढ़ सकते हैं।