कैसे सुनाते सपने जो भाषा ना होती
डॉ मधु कपूर के लेख "स्वप्न: चेतना का विस्तार और अचेतन की प्रतिध्वनि" (यहाँ क्लिक कीजिए) से उनकी स्वप्न श्रृंखला की शुरुआत हुई थी. इस विषय पर आज अपने पाँचवें लेख से वह इस श्रृंखला का अंत कर रही हैं. आज के लेख में वह प्रसिद्ध अमेरिकी दार्शनिक नॉर्मन मैल्कम की स्वप्न सम्बन्धी प्रस्थापनाओं से पाठकों का परिचय करा रही हैं.
सपने —भाषाई दस्तावेज़
डॉ मधु कपूर
प्रसिद्ध अमेरिकी दार्शनिक नॉर्मन मैल्कम (Norman Malcolm) की एक बेहद दिलचस्प किताब है - Dreaming जो काफी चर्चित और चौंकाने वाली है। दार्शनिक जगत में यह एक झकझोरने वाला प्रश्न है कि क्या चेतना और नींद एक साथ रह सकते हैं? मैल्कम इसे स्पष्ट रूप से नकारते हुए तर्क देते है कि 'चेतना' की परिभाषा है‘ व्यक्ति जागरूक हैं और उसमें अनुभवों को ग्रहण करने की क्षमता है’। वहीं, 'नींद' की परिभाषा है कि व्यक्ति पूरी तरह से अचेतन हैं, बाहरी जगत के बारे में उसे कोई जानकारी नहीं होती है। इसलिए, यह कहना कि ‘सोते समय मैं सपने देख रहा था’ एक तरह का विरोधाभास है। एक तरफ वह नींद में अचेतन होने का दावा करता है, वहीँ दूसरी ओर सपनों के सम्बन्ध में चेतन हो जाता है। मैल्कम कहते हैं, सपने मन की कोई 'आंतरिक क्रिया' नहीं होते हैं, बल्कि जागने के बाद भाषा के माध्यम से व्यक्त की जाने वाली एक मानसिक स्थिति है। इस पुस्तक में लेखक भाषाई और तार्किक विश्लेषण के जरिए यही साबित करने की कोशिश करते हैं।
आमतौर पर हम सोचते हैं कि सपना देखना एक तरह का अनुभव है जो हमें सोते समय होता है। दूसरी तरफ मैल्कम के अनुसार सपने जागने के बाद की कहानी है, जो हम जागृत अवस्था में भाषा में पिरोते है। कल्पना करें यदि व्यक्ति के पास भाषा न होती तो क्या वह किसी भी देखी हुई वस्तु का वर्णन कर सकता? डेकार्ट जैसे दार्शनिक और सिगमंड फ्रायड जैसे मनोवैज्ञानिकों का मानना था कि सपना देखना एक प्रकार की 'मानसिक गतिविधि' है। लेकिन मैल्कम की पुस्तक इस बात का पूरी तरह से खंडन करती है और वे मानते हैं कि इसका कोई प्रमाण नहीं है कि जब व्यक्ति सो रहा है, तभी वह अनुभव भी कर रहा है। नींद के दौरान जब चेतना का अभाव होता है तो नींद में घटित सपनों का वास्तविक अनुभव उसे कैसे हो सकता है?
आधुनिक neuroscience मानता है कि REM (Rapid Eye Movement sleep) नींद का चौथा और अंतिम चरण होता है जिसमें सबसे जीवंत सपने आते हैं और मस्तिष्क की गतिविधि लगभग जाग्रत अवस्था जैसी होती है। इसी आधार पर मैल्कम एक तार्किक भ्रम (logical error) की अवधारणा करते हैं कि नींद के दौरान ‘व्यक्ति को कोई चेतन अनुभव हो रहा था,’ इस वाक्य से हम इस सिद्धांत पर पहुंच सकते हैं कि यदि वह कुछ अनुभव कर रहा था, तो वह सो नहीं रहा था।
Philosophy of Mind के क्षेत्र में नॉर्मन मैल्कम का दृष्टिकोण पारंपरिक सोच के एकदम विरुद्ध है, जिसमें मानसिक अवस्था (जैसे दर्द, गुस्सा, या विचार) को पूरी तरह से 'निजी' और ‘आंतरिक’ माना गया है। उनका तर्क है कि मानसिक गतिविधियों का पता हमें व्यक्ति की शारीरिक गतिविधियों से मालूम पड़ता है। जैसे जब हम कहते हैं कि ‘वह गुस्से में है,’ तो इसका मतलब यह नहीं है कि उसके दिमाग के अंदर कोई 'गुस्सा' नाम की गुप्त वस्तु है। बल्कि इसका मतलब यह है कि उसका व्यवहार (जैसे चीखना, हाथ पैर पटकना, गालियां देना आदि ) गुस्से को व्यक्त कर रहा है। अर्थात किसी व्यक्ति के मस्तिष्क को देखकर यह नहीं कहा जा सकता कि वह क्या सोच रहा है, जब तक कि हम उसके जीवन और व्यवहार को संदर्भ सहित न जानें। पैर में एक काँटा चुभने पर व्यक्ति चिल्ला उठता हैं "आह!", और अपना पैर पकड़ता हैं, और उसका चेहरा दर्द से कराह उठता है, यही तो प्रमाण है कि ’दर्द हो रहा है’। माँ ने कैसे जाना कि बच्चे को दर्द हो रहा है? बच्चे के व्यवहार और ‘आह’ को सुनकर माँ उसके दर्द को समझ जाती है, उसी तरह सपनों का बोध निजी होने पर भी भाषा के माध्यम से ही सार्वजनीन हो सकता है।
उनके अनुसार बिना भाषा के विचार नहीं हो सकता है। उदाहरण के लिए जब हम मन ही मन कुछ सोचते है, तो वह सोचना भी भाषा के माध्यम से होता है। उदाहरण के लिए एक कुत्ता एक बिल्ली के पीछे दौड़ता है। बिल्ली फुर्ती से एक आम के पेड़ पर चढ़ जाती है। कुत्ता पेड़ के नीचे खड़ा होकर ऊपर देखता है, दुम हिलाता है और ज़ोर-ज़ोर से भौंकने लगता है, जिसे देखकर उसकी मानसिक अवस्था का सबूत मिलता है कि वह जानता है कि ‘बिल्ली पेड़ पर चढ़ी है’। लेकिन बिल्ली यदि किसी प्रकार से पेड़ से उतरकर भाग जाए, तो क्या कुत्ता अगले दिन भी उसी पेड़ के नीचे आकर बैठ जाएगा और सोचेगा कि ‘शायद वह बिल्ली फिर आएगी? मैल्कम का उत्तर है कि कुत्ता ऐसा कभी सोच भी नहीं सकता है। ‘अगले दिन आना’ जैसी जटिल अवधारणाओं के लिए भाषा का होना ज़रूरी है, जो उसके पास नहीं है।
मैल्कम के अनुसार मन कोई ऐसी वस्तु नहीं है, जो 'भूत या किसी अदृश्य वस्तु’ की तरह मस्तिष्क के रसायनों या तंत्रिकाओं से खेलता है। मन वास्तव में हमारे जीने के तरीके और सामाजिक गतिविधियों से जुड़ा होता है। कोई व्यक्ति सपना देखता है कि उसने लाटरी में १ करोड़ रुपये जीते हैं। पर उसके पास यह साबित करने का कोई तरीका नहीं है कि रात को उसकी चेतना सक्रिय थी और उसने सपना देखा। और यदि उसका दिमाग सक्रिय था तो वह सो नहीं रहा था।
हम एक कंप्यूटर में डेटा डालते हैं और वह गणना करके स्क्रीन पर लिख देता है—‘मैल्कम एक दार्शनिक था’। दूसरी तरफ, एक छात्र अपनी परीक्षा की कॉपी में लिखता है—‘मैल्कम एक दार्शनिक था’। यद्यपि कंप्यूटर के प्रोसेसर में बिजली दौड़ी और छात्र के दिमाग में न्यूरॉन्स क्रियाशील हुए, दोनों एक ही तरह से ‘गतिविधि ’करते हैं। पर ध्यान देने की बात है कि कंप्यूटर केवल निर्देशों का पालन करता है, वह ‘सोचता’ नहीं है। उसे इस बात से कोई फर्क नहीं पड़ता कि परीक्षा में पास होना क्या होता है। मनुष्य का सोचना सिर्फ दिमाग की नसों का गतिशील होना नहीं है, बल्कि उसके पास एक मानवीय संदर्भ है— एक जीवन है, एक उद्देश्य है, और वह भाषा के खेल को समझता है।
मैल्कम इन उदाहरणों से यह समझाना चाहते हैं कि हमारे विचार, सपने या भावनाएं हमारे बोलने, जीने और व्यवहार करने के तौर-तरीकों में साफ दिखाई देता हैं। कोई व्यक्ति गहरी नींद में सोया हुआ है। क्या वह उस अवस्था में यह कह सकता है कि—‘मैं सो रहा हूँ’? यदि वह यह कह सकता है और अपनी स्थिति के प्रति सचेत है, तो इसका मतलब है कि वह सोया नहीं है, जाग रहा है। इसी तर्क को आगे बढ़ाते हुए मैल्कम कहते हैं कि जब व्यक्ति सो रहा होता है, तब वह यह अनुभव भी नहीं कर सकता है कि वह सपने में गाड़ी चला रहा है। उसके लिए यह परिस्थिति वास्तव है।
पुस्तक का सबसे विचारणीय विषय यह है कि सपने का कोई स्वतंत्र अस्तित्व नहीं होता है। यदि कोई व्यक्ति सोकर उठता है और पूरी ईमानदारी से यह कहता है कि उसने सपने में कुछ घटनाएँ घटते देखी है, इसका मतलब यह नहीं हैं कि व्यक्ति नींद के दौरान दिमाग में चली कोई 'फिल्म' देख रहा था, बल्कि यह विचार उसके दिमाग में जागने के बाद आया, जिसे वह कहानी के रूप में सुनाता है। अगर कोई व्यक्ति जागने के बाद सपना भूल जाता है, तो हम यह कह सकते कि उसने सपना देखा ही नहीं।
वैज्ञानिक शारीरिक तंत्रिकाओं की गतिविधियों का अध्ययन कर सकता है, लेकिन इस शारीरिक गतिविधि को 'चेतन अनुभव' या 'सपना' मान लेना एक तार्किक भूल है। आँखें हिलने का मतलब यह कतई नहीं है कि उस अचेत व्यक्ति को अंदर ही अंदर किसी घटना का 'अनुभव' भी हो रहा था। मस्तिष्क की नसों का हिलना (EEG ग्राफ की तरह) एक शारीरिक क्रिया है, वह 'सपना' नहीं है। सपना तब तक अस्तित्व में नहीं आता जब तक व्यक्ति जागकर होश में उसे 'कहता' नहीं है। जब हम सोकर उठते हैं, तो हमें ऐसा 'महसूस' होता है कि हमने रात में कुछ देखा था। यह ठीक वैसा ही है जैसे कभी-कभी हमें ऐसा एहसास (Deja vu) होता है कि यह घटना पहले भी घट चुकी है या मुझे ऐसा लगता है कि कुछ खाने की महक ऐसी आ रही है जैसे किसी एक ज़माने में माँ की रसोई से आती थी।
असल में देखा जाए तो मैल्कम के कथन में भाषा के नियमों पर इतना ज़्यादा ज़ोर दिया गया कि उन्होंने इंसान के वास्तविक और प्रत्यक्ष अनुभवों को ही नकार दिया। यदि कोई सपना केवल 'जागने के बाद की रिपोर्ट' है, तो इसका मतलब यह हुआ कि रात में कुछ हुआ ही नहीं था। जबकि हमारे रोजमर्रा के अहसास जैसे सपने के डर से अचानक पसीने-पसीने होकर जाग जाना, दौड़कर पेड़ पर चढ़ जाना, या नदी में डूब जाना इत्यादि के खिलाफ जाता है। इन समालोचनाओं के बावजूद उनके विचार आज भी एक क्रांतिकारी मील का पत्थर है, जो हमें यह सोचने पर मजबूर करता है कि हमारी चेतना और भाषा का संबंध कितना गहरा है।
नीलाभ अश्क की इन पंक्तियों से इस लेख का समापन करती हूँ, जो सपनों के सभी सिद्धांतों को समेटती हुए मानो प्रतीत होती हैं—
सपने बेहद अराजक और निरंकुश होते हैं
तरह-तरह के छुपे हुए दरवाज़ों, ढँके गलियारों,
गुप्त द्वारों, भेद-भरी गलियों, रहस्यमय खाइयों,
तिलिस्मी फंदों, गोरखधंधों और पेचीदा प्रकोष्ठों से भरे
वे नहीं पूरा करने देते आपको अपनी दबाई गयी इच्छाएँ
ला खड़े करते हैं अबूझ अवरोध,
बदल देते हैं पटकथा की दिशा
अधबीच पहुँच कर कई बार भरते हुए आकुलता प्राणों में
नींद की निरापदता में आतंक की सृष्टि करते हुए।
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डॉ मधु कपूर कलकत्ता के एक प्रतिष्ठित कॉलेज में दर्शनशास्त्र की प्रोफेसर रही हैं। दर्शनशास्त्र के अलावा साहित्य में उनकी विशेष रुचि रही है। उन्हीं के शब्दों में, "दार्शनिक उलझनों की गुत्थियों को साहित्य के रास्ते में तलाशती हूं।" डॉ कपूर ने हिंदी से बंगला में कुछ पुस्तकों का अनुवाद किया है और कुछ कविता संग्रह भी प्रकाशित हुए हैं। दर्शन पर उनके निबंधों का एक संग्रह Dice Doodle Droll Dance प्रकाशित हुआ है।