सम्बन्धों पर दार्शनिक दृष्टि : स्व-स्वामित्व की परिधि में सम्बन्ध
डॉ. मधु कपूर की सम्बन्धों पर चल रही दार्शनिक श्रृंखला का यह तीसरा लेख है। पहले लेख में उन्होंने सम्बन्ध की सत्ता को यथार्थ या मानसिक कल्पना के रूप में परखा था, और दूसरे लेख में एफ. एच. ब्रैडली तथा नागार्जुन के दृष्टिकोण से सम्बन्ध की असंगति को उजागर किया था। आज के लेख में वे हमें एक नए आयाम पर ले जाती हैं—स्व और स्वामित्व के बीच सम्बन्ध। यह लेख पाठक को सोचने पर मजबूर करता है कि स्वामित्व की सीमाएँ कहाँ तक जाती हैं—क्या शरीर, विचार और ज्ञान भी हमारे स्वामित्व में आते हैं? और क्या अंततः स्वामित्व का सर्वोच्च रूप वही है जहाँ व्यक्ति केवल स्वयं का स्वामी रह जाता है।
सम्बन्धों पर दार्शनिक दृष्टि : स्व-स्वामित्व की परिधि में सम्बन्ध
डॉ मधु कपूर
मैं ऑटो में थी और मेरे पास किताबों से भरा हुआ बैग, जो मैंने पुस्तक मेले से खरीदी थी। उतरने के समय मैं सीट के पीछे रखा बैग लेना भूल गई। उतरने के बाद जब याद आया तो हैरान होकर ऑटो ढूँढने की कोशिश करने लगी। यद्यपि उन किताबों से मेरा सम्बन्ध दीर्घस्थायी नहीं था, लेकिन खोने के बाद मुझे महसूस हुआ सचमुच मेरा उन किताबों से कोई रिश्ता था जिसे खोने का मुझे इतना दुःख हो रहा है।
मुझे याद आने लगा व्याकरण का सूत्र ‘सम्बन्धे षष्ठी’ जिसके अनुसार ‘सम्बन्ध’ वह साधन है जो क्रिया, कर्ता और कर्म के बीच सम्बन्ध को स्थापित करता है। जैसे राम का घर, सीता की पुस्तक और बच्चों के खिलौने —यहाँ राम और घर के बीच, सीता और पुस्तक के बीच और बच्चे खिलौने के बीच के सम्बन्ध को "के" शब्द के द्वारा व्यक्त किया गया है। इससे साबित होता है कि ‘स्व’ की पहचान बाहरी वस्तुओं, जैसे, घर, पुस्तक, खिलौनों आदि से होती है।
स्व के साथ स्वामित्व का सम्बन्ध अधिकार को व्यक्त करता है। स्व = स्वयं व्यक्ति और स्वामित्व जिस पर उसका मालिकाना हक़ है। स्व और स्वामित्व का सम्बन्ध वास्तव में एक व्याकरणिक या कानूनी बंधन मात्र नहीं है, बल्कि अस्तित्व और पहचान की खोज से जुड़ा एक गहरा दार्शनिक प्रश्न भी है। स्व-स्वामित्व की धारणा का पहला धुंधला आभास माँ का शिशु के प्रति अधिकार से शुरू होता है—‘यह बच्चा मेरा है’।
दार्शनिकों के अनुसार यह एक सापेक्ष सम्बन्ध है, जैसे पिता और पुत्र का सम्बन्ध इत्यादि। यदि संबंध पुत्र से शुरू होता है तो पिता को पुत्र के संदर्भ में देखा जाएगा। उदाहरण के लिए, जब पुत्र ओलंपिक में स्वर्ण पदक जीतता है तो पिता को ‘स्वर्ण पदक विजेता पुत्र का पिता कहा जाता है’, और जब सम्बन्ध पिता से शुरू होता है तो पुत्र को पिता के सन्दर्भ में देखा जाता है। पिता एक महान गायक है, अतः पुत्र को ‘महान गायक का पुत्र कहा जाता है। वाद्ययंत्र, कारखाना, कार और प्रेम जैसी गहरी अनुभूतियाँ भी स्वामित्व के अंतर्गत आती हैं। मेरी अनुपस्थिति में भी मेरा घर और संपत्ति के स्वामित्व को पड़ोसी पहचानते हैं और उसका सम्मान करते हैं।
यद्यपि समाजवाद निजी स्वामित्व के उन्मूलन का समर्थन करता है, फिर भी व्यक्ति के नैतिक विकास के लिए निजी संपत्ति का स्वामित्व बनाए रखना उचित है। ‘स्व’ शब्द का रोचक व्युत्पत्तिगत अर्थ है—“ते स्वाद आस्याद असृजत” (अर्थात् उसने अपने मुख से स्वयं को उत्पन्न किया)। इसका तात्पर्य है कि व्यक्ति अपनी शक्ति से स्वयं को रचता है, जिसे किसी अन्य पर नहीं छोड़ा जा सकता है। इस तरह ‘स्व’ शब्द का अर्थ है—“जो अपने स्वभाव में स्थित है,” जैसे ‘स्वस्थ’ होना। जब शरीर किसी बाहरी कारण से यथा वायरस, दुर्घटना आदि से पीड़ित हो जाता है तो उसे ‘अस्वस्थ’ कहा जाता है। अपनी स्वाभाविक अवस्था में वापस आने पर उसे ‘स्वस्थ’ कहा जाता हैं। गीता में कहते है: “स्वधर्मे निधनं श्रेयः परधर्मो भयावहः”—अर्थात् अपने धर्म (स्वभाव) में मरना श्रेष्ठ है, दूसरों के धर्म का अनुकरण करना भयावह है। यदि कोई ऐसा करता है, तो वह अपनी पहचान से वंचित हो जाता है। जैसा कि बौद्ध दार्शनिक भी ‘स्वलक्षण’ के बारे में कहते है। प्रति क्षण वस्तु में विद्यमान विशिष्ट गुण को ‘स्वलक्षण’ कहा जाता है। मातृत्व प्राकृतिक स्व है, जिसे छोड़ा नहीं जा सकता है, भले ही बच्चा कानूनी रूप से किसी अन्य दंपति ने गोद ले लिया हो।
हमारे दैनन्दिन जीवन में देखा जाता है कि दान देने के पश्चात् दाता उस पर अपना दावा नहीं कर सकता। यदि दान स्वीकार कर लिया जाता है, तो दान की गरिमा एक नई ऊँचाई प्राप्त करती है। पर दाता उस पर अपना स्वामित्व खो देता है और लेने वाले में नया स्वामित्व सम्बन्ध उत्पन्न हो जाता है।
मेरे एक मित्र का बेटा अपने माता-पिता से झगड़ रहा था, क्योंकि उसने पूरे शरीर पर टैटू बनवा रखे थे और दावा कर रहा था कि यह उसका शरीर है और वह इसके साथ जो चाहे करेगा। यद्यपि हम अपने शरीर के लिए अपने माता-पिता के ऋणी हैं, फिर भी एकबार उत्पन्न होने के बाद उस पर हमारा स्वत्व-स्वामित्व स्थापित हो जाता है। कोई व्यक्ति असाध्य रोग से पीड़ित हो सकता है, अपराधी हो सकता है, फिर भी उसे जीने का अथवा उसे समाप्त करने का नैतिक अधिकार अभी तक विवाद का विषय बना हुआ है। अपवाद भी मिलते हैं—जैसे सम्राट बाबर ने अपने पुत्र की बीमारी पर तथा रामकृष्ण देव ने अपने भक्तों के दुखों पर अपना स्वत्व स्थापित कर उन्हें कष्टों से मुक्त कर दिया था।
कोई व्यक्ति घर खरीदता है और किसी बीमा कंपनी के साथ एक अनुबंध करता है ताकि नुकसान की स्थिति में उसे क्षतिपूर्ति मिल सके। पर वह अपनी इच्छा से घर में नगरपालिका जैसी आवश्यक प्राधिकरण के बिना कोई परिवर्तन नहीं कर सकता। यहाँ तक कि अनुबंध से कुछ घंटे पहले यदि भवन में आग लग जाए, तो नुकसान विक्रेता का माना जाता है, क्योंकि संपत्ति पर नियंत्रण अभी नये मालिक का नहीं हुआ है।
एक व्यक्ति दुर्लभ गैस से भरा सिलेंडर रखता है। दुर्भाग्यवश वाल्व खुल जाने पर गैस बाहर निकल जाती है। अब वह उस गैस का मालिक नहीं रहा, और न ही उसके पास दूसरों से अपनी गैस वापस पाने का अधिकार रहा। एक व्यक्ति ने घड़ी खो दी, यदि वह उसे नहीं ढूँढ पाता है तो अपने स्वामित्व को खो देता है।
इसी प्रकार, किसी व्यक्ति के पास कुछ विचार हैं और अपने वह विचार दूसरों को बिना किसी अनुबंधीय बाध्यता के बता देता है। श्रोता उस विचार पर काम करके अपने नाम से लेख छपवा लेता है। बाद में पछताने के बावजूद भी वक्ता के पास उन विचारों पर कोई अधिकार नहीं रह जाता। इसी वजह से बौद्धिक संपदा अधिकार कॉपीराइट को प्रदर्शित करता है, जिसमें किताबें, फ़िल्में, संगीत, चित्रकला, फ़ोटोग्राफ़ी और सॉफ़्टवेयर इत्यादि शामिल होते है। यह विचार गहराई से सोचने पर मजबूर करता है कि स्वामित्व का असली अर्थ क्या है—क्या यह केवल कानूनी अधिकार है, या अस्तित्व, परंपरा और सामूहिक पहचान का भी हिस्सा है। हमारी श्रुति परंपरा में ज्ञान—संगीत, कृषि, शिक्षा, नैतिकता आदि—हमें विरासत में मिलता है और जो बिना किसी लिखित कानूनी अधिकार के हस्तांतरित हो जाता हैं। यही कारण है कि भारतीय शास्त्रों में व्यक्ति को अपने पूर्वजों का ऋणी माना जाता है—जो पितृ-ऋण, देव-ऋण, भू-ऋण, ऋषि-ऋण और नृ-ऋण के रूप में जाना जाता है।
भूमि, जल, वायु, आकाश आदि जो मनुष्य श्रम करके उत्पन्न नहीं करता है, लेकिन आजकल ये निजी स्वामित्व में शामिल हो चुके हैं, जो क्रेता और स्वामी के बीच अधिकार की रेखा को धूसर कर देते हैं। अभिभावक विद्यालय की फीस देते हैं, लेकिन वे यह तय नहीं कर सकते हैं कि पाठों का प्रबंधन कैसा और कैसे होना चाहिए। इसी तरह किसी वास्तुकला की सुंदरता की सराहना करना, या किसी के गायन को सुनकर आनंदित होना, व्यक्ति के अमूर्त स्वामित्व को प्रमाणित करता है। एक इत्र निर्माता एक विशिष्ट घ्राण—पहली बारिश की मिट्टी की गंध—का निर्माण कर उसे अपने अनुबंध की श्रेणी में ले आता है। एक व्यक्ति खेत का मालिक है और वह मजदूरों को अपने अनाज की कटाई के लिए उसके श्रम को खरीद लेता है। प्रश्न हमें उलझन में डाल देता है कि जमीन किसकी है— श्रम करने वाले मजदूर की या उसके श्रम को खरीदने वाले स्वामी की ?
मैं एक किताब पढ़ती हूँ और अचानक एक विचार झटके से मन में कौंध जाता है। उस विचार पर स्वामित्व किसका है? यह वैसा ही सवाल है जैसे किसी व्यक्ति को कुर्सी बेच दी जाए और फिर हर बार जब वह कुर्सी का उपयोग करे तो उस व्यक्ति को अतिरिक्त शुल्क देना पड़े जिसने कुर्सी बनाई थी? या संभवतः उस व्यक्ति को भी अतिरिक्त शुल्क देना पड़े जिसने पहली बार कुर्सी का विचार किया था—यदि वह मिल जाए तो? साहित्यिक चोरी की कोई निश्चित सीमा नहीं होती है। राजनेता अक्सर भौतिक संपत्ति को बाँटने की जोड़-तोड़ में लगे रहते हैं जो उनकी अपनी नहीं होती। यह “रॉबिन-हुड” प्रकार का रोमांस है जो चोरी किए गए माल को दूसरों के साथ बाँटা जाता है।
ऊपर लिखित सभी विरोधी धारणाओं को छोड़कर व्यक्ति के जीवन में ऐसा समय भी आ सकता है जब वह अपने स्वामित्व की सभी लालसाओं को समाप्त कर पारलौकिक शून्यता की अवस्था में पहुंच जाता है — क्योंकि वह स्वयं का स्वामित्व उपलब्ध कर लेता है। ईशोपनिषद के अनुसार ‘ईशावास्यं इदं सर्वं यत्किञ्चित् जगत्यां जगत’—वह संसार के सभी प्राणियों से स्वामित्व या एकात्म का अनुभव करने लगता है।
जब स्वामित्व ‘स्व’ की परिधि में आ जाता है, तो स्व और स्वामित्व का द्वैत मिट जाता है। अतः स्वामित्व केवल कानूनी या सामाजिक व्यवस्था नहीं है, बल्कि अस्तित्व और आत्मा की गहराई तक पहुँचाने वाली सुरंग है, जो हमें उस द्वार पर लाकर खड़ा कर देती है —जहाँ व्यक्ति सिर्फ स्वयं का स्वामी रह जाता है।
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डॉ मधु कपूर कलकत्ता के एक प्रतिष्ठित कॉलेज में दर्शनशास्त्र की प्रोफेसर रही हैं। दर्शनशास्त्र के अलावा साहित्य में उनकी विशेष रुचि रही है। उन्हीं के शब्दों में, "दार्शनिक उलझनों की गुत्थियों को साहित्य के रास्ते में तलाशती हूं।" डॉ कपूर ने हिंदी से बंगला में कुछ पुस्तकों का अनुवाद किया है और कुछ कविता संग्रह भी प्रकाशित हुए हैं। अभी हाल ही में उनकी पुस्तक "द्रष्टा दृश्य और दर्शन दर्शन - एक चौथे आयाम की खोज" प्रकाशित हुई है. इससे पहले भी उनके निबंधों का एक संग्रह Dice Doodle Droll Dance आ चुका है।