राजनीति और गांधी की अपेक्षा
गांधी ने राजनीति को कभी सत्ता का खेल नहीं माना। उनके लिए उसका धर्म सेवा, उसका आधार नैतिकता और उसका लक्ष्य समाज के अंतिम व्यक्ति का कल्याण था। पराग मांदले का यह विचारोत्तेजक निबंध गांधी की राजनीतिक दृष्टि को उनके अपने शब्दों में समझते हुए आज की राजनीति के सामने एक असहज लेकिन जरूरी प्रश्न खड़ा करता है: क्या हम गांधी की अपेक्षाओं के अनुरूप राजनीति रच पाए हैं?
राजनीति और गांधी की अपेक्षा
पराग मांदले
आमतौर पर भारत में महात्मा गांधी की पहचान मुख्य रूप से एक राजनीतिक व्यक्ति की है, जिसने सत्य और अहिंसा का सहारा लेकर देश की स्वतंत्रता के आंदोलन का नेतृत्व किया। हालाँकि गांधीजी का राजनीतिक रूप आध्यात्मिक या समाज-सुधारक के रूप की तुलना में बहुत छोटा था। उन्हें केवल राजनीतिक खाँचे में फिट करना जैसे किसी लोटे में पूरी नदी को बंद करने की कोशिश करने जैसा है। लेकिन इसमें भी विडंबना यह है कि इस देश में उनके राजनैतिक रूप को या कहें उनकी राजनीति को भी ठीक से नहीं समझा गया। गांधीजी के सारे चिंतन और कार्यों के केंद्र में मनुष्य और उसका कल्याण था। उनकी दृष्टि में राजनीति का कार्य भी मनुष्य का कल्याण ही था। उन्होंने बार-बार कहा कि राजनीति का मूल उद्देश्य सत्ता नहीं बल्कि सेवा है। इस सेवा के मूल में समाज के सबसे अंतिम छोर के व्यक्ति का कल्याण अपेक्षित है।
गांधीजी ने 18 सितंबर 1925 को हजारीबाग में विद्यार्थियों की एक सभा को संबोधित करते हुए स्पष्ट रूप से कहा था, ‘यद्यपि प्रकटतः मेरा जीवन राजनैतिक संघर्षों में उलझा रहा है, लेकिन जो लोग मुझे जरा भी जानते हैं, वे आपको बता सकते हैं कि मैंने अपना समय मुख्यतः समाज की सेवा में लगाया है। मैं समाजसेवा का प्रेमी हूँ। मेरी नम्र राय में समाज सेवा के बिना सच्ची राजनीतिक सेवा संभव नहीं है।’ उनका मानना था कि वह न चाहते हुए भी राजनीति से इसलिए जुड़े हुए हैं क्योंकि राजनीति ने हमारे संपूर्ण जीवन को साँप के समान जकड़ रखा है और कोई कितना ही प्रयास करे वह इस सर्प-समान राजनीति की जकड़न से मुक्त नहीं हो सकता।
जिस तरह व्यवसाय के संदर्भ में गांधीजी ने ट्रस्टीशिप के सिद्धांत के माध्यम से यह प्रतिपादित करने का प्रयास किया था कि समाज की सहायता और उसके आधार पर ही अपना व्यवसाय करने में समर्थ हो सकने वाले प्रत्येक व्यवसायी को अपने मुनाफे में से अपनी जरूरतों के हिसाब से धन अपने पास रखकर बाकी के धन का नियोग समाज के हित में करना चाहिए, उसी तरह गांधीजी का यह भी मानना था कि कोई भी शासक या राजनेता जनता के कल्याण के अपने मूलभूत उद्देश्य से दूर नहीं जाना चाहिए। उसे सत्ता लोगों की भलाई और इसके माध्यम से उनकी सेवा करने के लिए मिली है, जनता का शोषण करके मनमानी अय्याशी करने के लिए नहीं मिली है।
गांधीजी मानते थे कि राजनीति में उसी को आना चाहिए जिसके जीवन का लक्ष्य स्वार्थ-साधन नहीं बल्कि सेवा हो। वे मानते थे कि जैसे आग का धर्म जलाना है, पानी का धर्म भिगोना है उसी तरह से राजनीति का धर्म सेवा है। इस धर्म से इतर धर्म के किसी अन्य स्वरूप में उनकी श्रद्धा नहीं थी। 29 अगस्त 1924 को बम्बई निगम द्वारा किए गए अभिनंदन का उत्तर देते हुए गांधीजी ने कहा था, ‘मेरे लिए मानव या प्राणीमात्र की सेवा धर्म बन गई है और मैं इस धर्म और राजनीति में अंतर नहीं करता।’ वे मानते थे कि सेवा के इस धर्म के बिना राजनीति एक ऐसा भयानक मनोविनोद है जिसका परिणाम न केवल उससे सम्बद्ध व्यक्तियों, बल्कि राष्ट्र के लिए भी अहितकर ही होता है। हम पिछले लम्बे समय से दिन-रात इसके अनेक उदाहरण अपने आसपास के जीवन में देखते ही हैं।
धर्म के अर्थ को और अपने मंतव्य को और अधिक स्पष्ट कहते हुए 27 नवंबर 1924 को यंग इंडिया में प्रकाशित एक लेख में गांधीजी लिखते हैं, ‘मेरे लिए तो धर्म-विहीन राजनीति कोई चीज ही नहीं है। लेकिन जब मैं धर्म की बात कहता हूँ तो मेरा मतलब रूढ़ियों और अन्धविश्वासों से नहीं है, उस धर्म से नहीं है जो हमें घृणा करना और एक-दूसरे से झगड़ना सिखाता है। मेरा मतलब तो सहिष्णुता के सार्वजनीन धर्म से है। नैतिकताविहीन राजनीति ऐसी चीज है जिससे बचना चाहिए।’
गांधीजी की दृष्टि हमेशा सर्वसमावेशी और व्यापक रही है। यही वजह थी कि उनके सामने विभिन्न वृत्तियों के अंतर्सम्बन्ध बिलकुल स्पष्ट रहते थे। राजनीति को वह एक अलग प्रवृत्ति के रूप में नहीं देखते थे। उनका मानना था कि धर्म, समाज और राजनीति तीनों ही एक-दूसरे से न केवल जुड़े हुए हैं बल्कि अभिन्न हैं।
नवजीवन में 7 दिसंबर 1924 को प्रकाशित एक लेख में गांधीजी ने काठियावाड़ में आयोजित होने वाली राजनीतिक परिषद के अध्यक्ष पद को स्वीकारने की चर्चा करते हुए आयोजकों से अपेक्षा व्यक्त की कि इस परिषद के मंडप में अछूतों का प्रवेश किसी भी स्थान पर निषिद्ध नहीं होगा। और यदि किसी स्थान पर ऐसा होगा तो अध्यक्ष के रूप में वह भी वहीं बैठेंगे जहाँ अछूतों के बैठने की जगह निर्धारित होगी।
राजनीतिक परिषद से इस सामाजिक विषय के सम्बन्ध को स्पष्ट करते हुए उन्होंने लिखा, ‘राजनीतिक परिषद के सदस्य शायद सोचेंगे कि इन बातों का राजनीतिक परिषद से क्या संबंध है? मैं अनेक बार बता चुका हूँ कि राजनीतिक, सामाजिक और धार्मिक – ये तीनों कोई अलग-अलग प्रवृत्तियां नहीं हैं; अपितु इन तीनों का परस्पर सम्बन्ध है। राजनीतिक शब्द राजा और प्रजा के सम्बन्धों का सूचक है, सामाजिक शब्द समाज की आंतरिक व्यवस्था का सूचक है और धार्मिक शब्द व्यक्ति के कर्तव्य का सूचक है। जो व्यक्ति के लिए ठीक है वही समाज के लिए ठीक है और जो समाज के लिए ठीक है वही राजा-प्रजा के सम्बन्धों के लिए भी है।’ उनकी दृष्टि में इनमें से किसी भी वृत्ति या विषय को बाकी दो से काटकर नहीं देखा जा सकता। धर्म व्यक्ति के कल्याण का मार्ग है, और व्यक्तियों के समूह के रूप में समाज के कल्याण का मार्ग भी। राजनीति के मूल उद्देश्य में भी अपने कार्यक्षेत्र के व्यक्तियों या समाज का संपूर्ण कल्याण निहित है। इसलिए राजनीति का नैतिकता से विहीन होना न समाज के लिए कल्याणकारी हो सकता है और न ही देश के लिए। वह मानते थे कि वर्तमान परिस्थितियों में जनता के कल्याण के लिए राजनीति एक महत्वपूर्ण साधन है, इसलिए इससे अलिप्त रहकर व्यापक तौर पर लोगों की भलाई नहीं की जा सकती।
ब्रिटीश पत्रकार बेसिल किंग्सले मार्टिन ने दूसरे गोलमेज सम्मेलन के समय गांधीजी से पूछा था कि वह कितने संत हैं और कितने चतुर राजनीतिज्ञ। मगर बाद में उन्होंने खुद लिखा कि इस प्रश्न का उत्तर देना असंभव है क्योंकि ये दोनों पहलू गांधीजी के एक विलक्षण जटिल व्यक्तित्व में गहराई से समाहित थे। दरअसल धर्म को राजनीति से जोड़ने का उनका उद्देश्य राजनीति को एक मानवीय चेहरा प्रदान करना था। लेकिन राजनीति से धर्म को जोड़ते हुए गांधीजी यह भी स्पष्ट करते हैं कि धर्म शब्द के प्रयोग में सावधानी बरतनी चाहिए। धर्म से उनका तात्पर्य चरमपंथी विचारधाराओं से न होकर एक विशेष नैतिक व्यवस्था में आस्था से है। इसीलिए गांधीजी राजनीति में धर्म को प्रकारांतर से नैतिकता को सर्वोच्च स्थान देते हैं।
नैतिकता के लिए इस आग्रह की सबसे बड़ी वजह यह थी कि राजनीति अपने मूल उद्देश्य से भटककर भ्रष्ट ना हो जाए। वह मानते थे कि लोकतंत्र जैसी बहुमत पर आधारित व्यवस्था में इसकी गुंजाइश बहुत ज्यादा है। 07 मई 1931 को यंग इंडिया में प्रकाशित एक लेख में उन्होंने इस संबंध में अपनी चिंता जाहिर करते हुए लिखा था, ‘मनुष्य की बनाई हुई कोई भी संस्था ऐसी नहीं है जिसमें खतरा न हो। संस्था जितनी बड़ी होगी, उसके दुरुपयोग की संभावनाएं भी उतनी ही बड़ी होंगी। लोकतंत्र एक बड़ी संस्था है, इसलिए उसका दुरुपयोग भी बहुत हो सकता है। लेकिन उसका इलाज लोकतंत्र से बचना नहीं, बल्कि दुरुपयोग की संभावना को कम से कम करना है।’
इतना ही नहीं, वह राजनीति में सद्भाव, सहानुभूति और सहिष्णुता के भी पक्षधर थे। उनका मानना था कि विचारों में भेद हो सकता है मगर यदि सभी राजनेताओं का लक्ष्य जनता की सेवा करना हो तो उन्हें एक-दूसरे के प्रति परस्पर सम्मान और सहिष्णुता की भावना रखनी चाहिए। 1937 में मध्यप्रांत की विधानसभा के अधिवेशन के उद्घाटन के अवसर पर पूर्व मुख्यमंत्री डॉ. ई. राघवेंद्रराव के अवसर सदन के भीतर दर्शक दीर्घा में प्रदर्शन किया गया। इस पर 14 अगस्त 1937 के हरिजन सेवक में टिप्पणी लिखते हुए गांधीजी ने कहा, ‘मेरा खयाल है कि जब हमें अपने ढंग की पूर्ण स्वाधीनता प्राप्त हो जाएगी, उसके बाद भी विभिन्न राजनीतिक दल तो रहेंगे ही। यदि उन दलों ने एक-दूसरे के साथ सहिष्णुता नहीं दिखाई या एक-दूसरे के प्रति साधारण शिष्टता और सौजन्य जाहिर नहीं किया तो वह हमारे लिए तकलीफ़ का कारण हो जाएगा। .....असहिष्णुता, अविनय और कटुता न केवल कांग्रेस के अनुशासन और प्रतिष्ठा के विपरीत है, बल्कि ये दुर्गुण तो किसी भी भद्र या सभ्य समाज के लिए अवांछनीय हैं और प्रजातंत्र की भावना के निश्चय ही विरुद्ध हैं।’
आज जब हम अपने चारों ओर राजनीति में अशिष्ट, द्वेषपूर्ण और कटुतापूर्व वक्तव्य देते हुए सर्वोच्च स्तर से लेकर निचले स्तर के कार्यकर्ताओं तक को देखते हैं तो यह समझ में आता है कि गांधीजी की अपेक्षा की तुलना में हमारी राजनीति कितने छिछले स्तर पर पहुँच गई है।
गांधीजी ने स्वतंत्रता के पूर्व भी उन सदस्यों को जो प्रांत या केंद्र की विधानसभाओं में जाना चाहते थे, बार-बार नैतिकता का ध्यान रखने और अपने आचरण के प्रति सतर्क रहने की सलाह दी। 23 अप्रैल 1938 के हरिजन सेवक में वह लिखते हैं, ‘अपनी प्रतिष्ठा को यदि हमें बिलकुल नहीं गँवा बैठना है तो मंत्रियों और धारासभाओं के सदस्यों को अपने व्यक्तिगत और सार्वजनिक आचरण के प्रति जागरूक रहना ही होगा। उनकी हर बात संदेह से परे होनी चाहिए। वे कोई ऐसा काम न करें, जिससे खुद उन्हें या उनके संबंधियों या मित्रों को व्यक्तिगत रूप से कोई फायदा पहुँचता हो।’
लेकिन सच तो यह है कि गांधीजी की राजनीति में नैतिकता की पुरजोर वकालत के बावजूद भारत में राजनीति ने अनैतिक रास्ता स्वतंत्रता के साथ ही पकड़ लिया था। आंध्र के एक नौजवान ने इसके बारे में गांधीजी को एक शिकायती पत्र लिखा। गांधीजी ने जवाब दिया कि यदि सभी लोग अपने स्वार्थ के लिए सत्ता हासिल करने और उसका दोहन करने का प्रयास करेंगे तो भारत की दुर्दशा को कोई नहीं रोक सकता। उन्होंने लिखा, ‘हिंद हमारा न बने, हम हिंद के बनें। हम सब हिंद की सेवा करें और वह भी निःस्वार्थ भाव से। यह हमारा पहले नंबर का काम है। हम अपना पेट भरने का न सोचें। अगर हम अपने रिश्तेदारों को नौकरी दिलाने की कोशिश करेंगे तो काम बिगड़ जाएगा।’
गांधी की नैतिक राजनीति में न सिर्फ सेवा शामिल थी, सादगी भी उतना ही अनिवार्य तत्त्व थी। दुर्भाग्य से देश में स्वतंत्रता प्राप्ति के पूर्व ही अस्थायी सरकारों के सत्ता संभालते ही राजनेता अंग्रेजों के विलासितापूर्ण जीवन की नकल करने लगे थे। इस पर 16 जून 1946 में गांधीजी की एक टिप्पणी प्रकाशित हुई थी, जिसमें उन्होंने कहा था - अंग्रेज दुनिया के सबसे खर्चीले देश के लोग हैं। वे यह भी जानते हैं कि हम पर वे अपनी जितनी धाक बैठा सकें उतना ही उन्हें लाभ है। इसलिए उन्होंने दफ्तरों के लिए बहुत कीमती और बड़े-बड़े मकान बनवाये हैं, जिनकी देखभाल के लिए नौकरों और उनके सहारे जीने वाले चापलूसों की एक फौज की जरूरत होती है। अगर हमने उनके तरीकों और आदतों की नकल की, तो हम-आप तबाह हो जाएंगे और देश को भी अपने साथ ले डूबेंगे।....जनता की सरकारों को चाहिए कि वे आते ही लोकप्रिय कार्य करें और सस्ती आदतें अपनायें।
आज हम देखते हैं कि हमारी राजनीति और सत्ता-व्यवस्था गांधीजी की अपेक्षा से बिलकुल उलट ध्रुव पर आ गई है। आज राजनीति न सिर्फ किसी भी अन्य व्यवसाय से बड़ा व्यवसाय बन चुकी है, बल्कि उनसे कहीं ज्यादा अनैतिक भी हो गई है। एक ओर पैसे और अपराध के गठजोड़ ने चुनाव की पूरी व्यवस्था को अपने चंगुल में ले लिया है, दूसरी ओर अपने को विशिष्ट समझने और इस विशिष्टता को बनाये रखने के लिए सार्वजनिक धन के अंधाधुंध दुरुपयोग की नीयत और आदत अपनी पराकाष्ठा पर पहुँच चुकी है।
इस दुर्दशा से मुक्त होने के लिए शायद आज एक गांधी का होना पर्याप्त साबित ना हो।
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वाणिज्य और पत्रकारिता की डिग्री हासिल करने के उपरांत पराग मांदले किसी ना किसी रूप में मीडिया से जुड़े रहे। देश भर के विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में उनके लेख, कहानियां, कविताएं और स्थायी स्तंभ प्रकाशित होते रहे हैं। उनके दो कहानी संग्रह भी प्रकाशित हैं। विगत अनेक वर्षों से वे पर्यावरण संरक्षण के साथ-साथ शाश्वत व वैज्ञानिक जीवनशैली के प्रचार-प्रसार से जुड़े हुए हैं। इसके अलावा गांधी उनके अध्ययन का प्रमुख केंद्र रहे हैं। गांधी विचारों पर उनके कई लेख प्रकाशित हुए हैं और देश के विभिन्न शहरों में व्याख्यान भी आयोजित हुए हैं। सेतु प्रकाशन से आई उनकी पुस्तक 'गाँधी के बहाने' खूब चर्चित हुई है. संपर्क - 8484999664