कारणकूट: मैं से हम तक की यात्रा का विश्लेषण
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कारणकूट: 'मैं' से 'हम' तक की यात्रा का विश्लेषण
डॉ मधु कपूर
हम देख चुके है कि हमारी व्यक्तिगत ऐच्छिक क्रियाएं हमारे इरादों के द्वारा निर्धारित होती हैं। आधुनिक दर्शन में आज यह प्रश्न भी महत्वपूर्ण हो गया है कि क्या सामूहिक क्रिया भी नैतिक जिम्मेदारी का विषय हो सकती है? हम आए दिन देखते है ईंट-पत्थरों की बौछारों से अथवा आगजनी से जन संपत्ति की व्यापक विध्वंसक लीला चलती है, यहाँ तक कि पार्लियामेंट भवन भी इससे अछूता नहीं रहता है। इस तरह की सामूहिक ऐच्छिक क्रियाओं का जिम्मेदार कौन होता है? किसे दंड का अधिकारी समझा जाए? किसी रेल दुर्घटना के घटने पर रेल मंत्री अपनी नैतिक जिम्मेदारी समझ कर इस्तीफा तो दे देते है और अपने इस कृतित्व पर जनता की वाहवाही भी लूट लेते है। यदि इस्तीफा नहीं देते हैं, तो कोसे जाते है । एक रेल दुर्घटना के पीछे असंख्य कारण छिपे रहते है —ड्राईवर की लापरवाही, कोई साजिश अथवा सिग्नल की खराबी, समय पर पुर्जों की जांच का न होना, ड्राईवर के पारिवारिक संकट के कारण मानसिक तनावग्रस्त होना इत्यादि। इस तरह एक पूरा समूह जो इस इस दुर्घटना से जुड़ा रहता है, तो सामूहिक जिम्मेदारी का प्रश्न क्यों न खड़ा हो?
सामूहिक जिम्मेदारी के कारण दंड मिलने का एक प्रसिद्ध उदाहरण द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद नूरेम्बर्ग ट्रायल्स का है। वहाँ केवल व्यक्तिगत अपराधियों को ही नहीं, बल्कि पूरे संगठनों —जैसे नाज़ी पार्टी, एसएस, गेस्टापो को भी अपराधी घोषित किया गया था। इसके पीछे यह विचार था कि जब कोई संगठन सामूहिक रूप से अमानवीय कार्य करता है, तो उसके सदस्य सामूहिक जिम्मेदारी के भागीदार होते हैं। प्राचीन भारतीय न्यायशास्त्र में भी ऐसे दृष्टान्त मिलते है, जब गाँव के लोग किसी अपराध को छिपाने में सहयोग करते थे, तो पूरे गाँव को दण्डित किया जाता था। भारतीय दंड संहिता और भारतीय न्याय संहिता में भी अपराध छिपाने पर कठोर प्रावधान हैं। यदि किसी परीक्षा केंद्र में सामूहिक नकल होती है, तो सभी विद्यार्थियों को औसत अंक दे दिए जाते है, अथवा परीक्षा ख़ारिज कर दी जाती है। इससे स्पष्ट होता है कि सामूहिक क्रिया और नैतिकता का दर्शन सर्वत्र लागू होता है।
नौवीं शताब्दी के विख्यात न्याय दार्शनिक जयंत भट्ट, जो कश्मीर के राजा शंकरवर्मन के दरबार में सलाहकार थे, के अनुसार ‘खाने की क्रिया’ तब तक समाप्त नहीं होती, जब तक व्यक्ति का पेट न भर जाए यानि कार्य की उत्पत्ति न हो । एक एक ग्रास खाने के पश्चात् अंतिम ग्रास के साथ पूर्व के सभी ग्रासों की समष्टि तृप्ति बोध को जन्म देती है। इसी तरह वाक्यार्थ बोध भी तभी होता जब व्यक्ति को वाक्य निहित सभी पदों का अर्थबोध होता है। किसी एक पद को सुनकर वाक्य बोध उत्पन्न नहीं हो सकता। इस कारणसमूह को ‘कारणकूट’ कहा जाता है, जिसकी संकल्पना का अर्थ है कि जब अनेक व्यक्ति मिलकर किसी कार्य को करते हैं, तो उनकी क्रिया केवल व्यक्तिगत प्रयत्नों का जोड़ नहीं होती, बल्कि उसका परिणाम एक साझा उद्देश्य से जुड़ा होता है।
जयन्त भट्ट भाषा और व्यवहार में ‘कारणकूट’ को स्पष्ट करते हुए कहते हैं कि सामूहिक अनुष्ठान जैसे यज्ञ, पूजा आदि कर्म का फल सामूहिकता और सहभागिता से ही संभव होता है। यज्ञ अनुष्ठान में अनेक ऋत्विज अलग-अलग मंत्र और क्रियाएँ करते हैं। लेकिन फल सामूहिक रूप से यज्ञ पूरा होने पर ही उत्पन्न होता है। इसी तरह जब गायक और वादक मिलकर जिस सामूहिक संगीत को उत्पन्न करते है, वह ‘कारणकूट’ का ही उदाहरण है। इसी प्रकार व्यक्तिगत उद्देश्य से कोई खिलाडी कह सकता है— ‘मैं फुटबॉल खेलना चाहता हूँ।‘ लेकिन उसका उद्देश्य तभी सार्थक होता है जब वह टीम में शामिल होता है। कहावत भी है —अकेला चना भाड़ नहीं फोड़ सकता है।
व्यक्तिवाद को चुनौती देते हुए, एक अमेरिकन दार्शनिक John Searle दिखलाते हैं कि सामाजिक क्रियाओं का अपना अलग अलग अस्तित्व होता है, जिसे कई व्यक्तियों के सहयोग से पूरा किया जाता है —खाना बनाने से लेकर सामाजिक, राजनीतिक या आर्थिक सुधार, आंदोलन, हड़ताल, विवाह, कानून इत्यादि तक। सामूहिक निर्णय लेने की प्रक्रिया में अक्सर विभिन्न विकल्पों पर विचार-विमर्श, चर्चा, बहस और विश्लेषण करना आवश्यक होता है, जिससे सामूहिक क्रिया में एक अलग सामाजिक और नैतिक आयाम जुड़ जाता है।
Michael Bratman, एक अन्य अमेरिकन दार्शनिक भी इस मत का समर्थन करते है कि सामूहिक क्रिया तब होती है जब व्यक्तियों के इरादे एक-दूसरे से जुड़े हों। लेकिन यह ‘जुड़ा होना’ कोई गाणितिक संख्या नहीं होती है, जैसे १,१,१,१ चार नहीं हो सकता जबतक इसमें + और = इन चिह्नों का प्रयोग कर उसे अनुभवजनित प्रकार से गिना न जाय। जिस तरह + चिन्ह गणित में एक साझा प्रतिबद्धता को उजागर करता है, उसी तरह सामूहिक क्रिया व्यक्तियों में नैतिक प्रतिबद्धता को जन्म देती है। इस तरह सामूहिक क्रिया यह दिखलाती है कि ‘हम’ का कार्य केवल ‘मैं’ का जोड़ नहीं है, बल्कि उसके अतिरिक्त कुछ है। जयंत भट्ट कहते है —चार लोग मिलकर जब पालकी उठाते हैं, तो उनका इरादा केवल ‘मैं उठाता हूँ’ ऐसा नहीं होता है, बल्कि ‘हम उठाते है’ होता है।
सामाजिक मनोविज्ञान यह मानता है कि सामूहिक क्रिया में शामिल होना केवल तर्कसंगत निर्णय नहीं है, बल्कि एक भावनात्मक प्रक्रिया भी है। इसमें व्यक्ति को अन्याय का प्रतिकार, सामूहिक क्षमता और सामूहिक पहचान का बोध होता है। यदि अकेला व्यक्ति अपनी आवश्यकता की पूर्ति करने में समर्थ हो तो उसे समूह की जरूरत ही नहीं रहेगी। सामूहिक क्रिया एक गहरा सवाल उठाता है—क्या समूहों की जिम्मेदारी व्यक्तियों से अलग होती है, और क्या ‘हम’ का इरादा वास्तव में एक स्वतंत्र अस्तित्व रखता है? उदाहरणस्वरूप यदि किसी कंपनी के किसी विशेष निर्णय से प्रदूषण फैलता है, तो उस निर्णय में सक्रिय भाग लेने वाले सभी अधिकारी व्यक्तिगत रूप से जिम्मेदार होते हैं।
इस प्रसंग में Barry Maguire ने "fractal responsibility" पर भी विचार किया है, इसमें नैतिक अवदान बहुस्तरीय होता है —जिम्मेदारी को हर स्तर पर बाँटा जाता है। इसका उद्देश्य यह है कि कोई भी स्तर जिम्मेदारी से बच न सके, क्योंकि सामाजिक आंदोलन तभी सफल होता है जब समूह भी एक स्वतंत्र नैतिकता को वहन करने की जिम्मेदारी उठाता है । इस तरह किसी सरकार द्वारा युद्ध छेड़ना केवल नेताओं का नहीं, बल्कि पूरे राज्य का नैतिक दायित्व माना जाना चाहिए, क्योंकि सरकार चुनने का अधिकार सभी नागरिकों का था। अतएव सामूहिक जिम्मेदारी परोक्ष रूप से सभी व्यक्तियों पर पड़ती है।
भारतीय दर्शन में सामूहिक क्रिया और नैतिक दायित्व का प्रश्न बहुत गहराई से उठाया गया है। पश्चिमी दर्शन जहाँ "व्यक्ति बनाम सामूहिक दायित्व" पर बहस करता है, वहीं भारतीय ग्रंथों में यह प्रश्न धर्म और कर्तव्य के संदर्भ में आता है। अर्जुन जब युद्ध से पीछे हटना चाहते हैं, तो श्रीकृष्ण उन्हें समझाते हैं कि यह केवल उनका व्यक्तिगत निर्णय नहीं है—यह कुल और राज्य की रक्षा का सामूहिक धर्म है। यहाँ नैतिक दायित्व ‘व्यक्ति’ और ‘समूह’ दोनों पर है: व्यक्ति को अपने धर्म का पालन करना है, और समूह को न्याय की रक्षा करनी है। वैसे ही आधुनिक आंदोलनों —चाहें नागरिक अधिकार आंदोलन हो या महिला अधिकार आंदोलन हो, हर व्यक्ति की नैतिक जिम्मेदारी होती है कि वह न्याय की रक्षा करे।
Mancur Olson ने अपनी पुस्तक The Logic of Collective Action में दिखलाया है कि बिना सामूहिक क्रिया के सामूहिक हितों को आगे नहीं बढ़ाया जा सकता है, क्योंकि जैसे-जैसे समूह बड़ा होता है, free rider problem बढ़ती जाती है—अर्थात लोग लाभ तो चाहते हैं लेकिन स्वयं निष्क्रिय बने रहते है। अपनी पार्लियामेंट इसका ज्वलंत उदाहरण है, जहाँ संसद सदस्य सभी प्रकार के लाभ तो उठाते है पर बहस में भाग लेना या उपस्थित रहना अनिवार्य नहीं समझते है। सुनने में आता है कि कोई कोई सदस्य तो सिर्फ शपथ लेने आते है। तालाब में दूध की जगह पानी डालने की कथा आप सबको याद होगी। Olson का तर्क है कि सामूहिक क्रिया को सफल बनाने के लिए समूहों को कुछ चुने हुए लोगों को ऐसा लाभ देना चाहिए, जो केवल योगदान करने वालों को मिलें, जैसे सामाजिक प्रतिष्ठा और सम्मान इत्यादि।
जयन्त भट्ट अत्यन्त प्रचलित दृष्टान्त देकर ‘कारणकूट’ की महिमा का गुणगान करते है। जैसाकि हम सभी जानते है कि आँखों के द्वাरा देखने का कार्य होता है। पर वास्तव में विचार करके देखा जाय तो ‘देखने के लिए’ केवल आँखों का होना ही पर्याप्त नहीं होता है। देखने के लिए नेत्र, मन, आत्मा, और प्रकाश—इन सबकी आवश्यकता होती है। वे कहते है नेत्र दृश्य ग्रहण करता है, मन उसे धारण करता है, प्रकाश उसे प्रकट करता है और आत्मा उस अनुभव का आधार बनती है। इन सबका “कारणकूट” ही प्रत्यक्षज्ञान को संभव बनाता है। सूरज के प्रकाश की अनुपस्थिति में समस्त जगत —क्या नेत्रवाले और क्या नेत्रहीन— सबके लिए अन्धकारमय हो जाता है ! नेत्र ऐसी अवस्था में निष्क्रिय हो जाते है। इस प्रकार, जयन्त भट्ट का दृष्टिकोण न्याय दर्शन की उस परंपरा को गहराई प्रदान करता है, जो कार्य की उत्पत्ति को बहु-कारणवाद से जोड़ता है। कवि अज्ञेय की कालजयी कविता बावरा अहेरी से उद्धৃत करना यहाँ तात्पर्यपूर्ण होगा —
“यह दीप अकेला स्नेह भरा,
है गर्व भरा मदमाता,
पर इसको भी ‘पंक्ति’ को दे दो”— मनुष्य के अस्तित्व को सार्थकता मिलती है जब वह 'पंक्ति' में शामिल होता है। 'मैं' से 'हम' तक की यह यात्रा केवल व्याकरण का बदलाव नहीं, बल्कि नैतिकता का विस्तार है, जहाँ व्यक्ति अपनी स्वायत्तता को सुरक्षित रखते हुए, सामूहिक उद्देश्य के प्रति जवाबदेह बनता है।
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डॉ मधु कपूर कलकत्ता के एक प्रतिष्ठित कॉलेज में दर्शनशास्त्र की प्रोफेसर रही हैं। दर्शनशास्त्र के अलावा साहित्य में उनकी विशेष रुचि रही है। उन्हीं के शब्दों में, "दार्शनिक उलझनों की गुत्थियों को साहित्य के रास्ते में तलाशती हूं।" डॉ कपूर ने हिंदी से बंगला में कुछ पुस्तकों का अनुवाद किया है और कुछ कविता संग्रह भी प्रकाशित हुए हैं। दर्शन पर उनके निबंधों का एक संग्रह Dice Doodle Droll Dance प्रकाशित हुआ है।