खोभारी की बकरी
बिहार के ग्राम्य जीवन की कहानियाँ सुनाने में सत्येन्द्र प्रकाश सिद्धहस्त हैं, ऐसा आप उनकी पिछली कई रचनाएँ पढ़कर जान ही चुके होंगे। उनकी एक और मर्मस्पर्शी कहानी जिसे पढ़ते हुए आपका दिल बार-बार टूटेगा!
खोभारी की बकरी
सत्येन्द्र प्रकाश
खोभारी की माई एक डलिया में दो मुट्ठी मकई लिए घोनसार (भुजा भुनने का स्थान) में बैठी अपनी बारी आने का इंतजार कर रही थी। खोभारी सुबह मतवा (गाँव की पंडिताइन) के घर से रात की एक रोटी मट्ठा के साथ खा कर आया था। दिन का तीसरा पहर बीत रहा था। छः साल का बच्चा सुबह की एक रोटी पर पूरा दिन कैसे निकालेगा। उसे भूख तो लगनी ही थी। उसकी माई उसी के लिए तो मकई भुजवा रही थी। दो गाल भुजा खा लेगा तो किसी तरह रात निकल जाएगी। कल की फिर कल सोचेगी वह।
गाँव की गोंड़िन का निहोरा कर रही थी कि उसकी मकई वह जल्दी से भूँज दें। घोनसार की भट्टी में गन्ने के सुखे पत्ते झोंकते हुए पूछ बैठी, “का बात है, काहे हल्ला मचावत हउ। बारी आवते मकई भूँज देब।“ खोभारी की माई एकदम से रूआँसा हो गई। बोली, ‘का बताईं, खोभारी की ईया (आजी/दादी) तीन दिन से बोखार में तप रही है। तीन परानी (प्राणी) के पेट भरे के चिंता और उ बीमार बुढ़िओ के देखभाल, अकेला देह कइसे करीं।“ उसकी बात अभी पूरी होती ही कि गोड़िन ने लपक कर उसकी डलिया उसके हाथ ले ली और उसकी मकई भूँजने लगी। गोंड़िन ने भुजा (भुना मकई) जैसे ही उसकी डलिया में डाला, खोभारी की माई तेजी से अपने घर की ओर भागी। खोभारी के हाथ में डलिया पकड़ा कर उसने सास की सुध ली। अभी उसका सिर बुखार से तप रहा था। वैद्य जी की दी हुई दवा खिला कर उसे के सिर पर ठंडे पानी की पट्टी देने लगी। वैद्य जी ने ही बताया था कि बुखार अधिक लगे तो ठंडे पानी की पट्टी जरूर देना।
सास के सिर पर पट्टी देते-देते वह अपनी बीती जिंदगी में खो गई। डुगुर, खोभारी के बापू, के जाते ही उसकी दुनिया बदल गई थी। पेशे से कोंहार (कुम्हार) डुगुर के हाथ के बर्तन चाहे वह हँड़िया (बड़ी हांडी), पतुकी (छोटी हांडी), कड़ाही, ढकनी, दीया, सोबरना (कुल्हड़) हो या घड़े और कलश हों, बाकी कोंहारों के बर्तनों से अलग होतीं। रंग-रूप, आकार-प्रकार, हर दृष्टि से सबसे अलग, सबसे बढ़िया। डुगुर के भाई-गोतिया समेत अन्य कोंहार उससे मन ही मन चिढ़ते थे। डुगुर के लिए भी कोंहारी का काम मात्र पेट पालने का साधन नहीं था। बल्कि उसके हुनुर की अभिव्यक्ति का यह साधन था। तभी डुगुर इसे अपना धर्म मानता था।
बर्तन गढ़ने की मिट्टी तैयार करने से लेकर, चाक पर उन्हें आकार देना और आवा की आँच में उन्हें पकाना, सारे काम पूरा ध्यान से दिल लगाकर करता था। विनम्र स्वभाव और अपनी जुबान का पक्का डुगुर सबकी जरूरतों का पूरा ख्याल रखता था। शादी-विवाह, उपनयन संस्कार जैसे जग परोजन में डुगुर जजमान की आवश्यकता के अनुसार समय पर सारे बर्तन, कलसा, चौमुख दीया, ढकनी पहुँचा देता था। उसके जजमानों की संख्या बढ़ती जा रही थी। उसके काम और व्यवहार दोनों से लोग खुश थे। बाकी कोहारों के जजमानों की संख्या कम होती जा रही थीं। डुगुर उन सबकी आँखों की किरकिरी बनता जा रहा था।
खोभारी की माई सास के सिर की पट्टी बदलने, और अपनी विचारों में इतनी खो गई थी कि यह ध्यान ही नहीं रहा कि कितनी रात निकल गई। सुबह मतवा के घर से माँड़ ला कर रखा था उसने कि रात में वही पीकर सो जाएगी। मतवा के घर ही उसने खोभारी के साथ सुबह रोटी-मट्ठा खा लिया था। मतवा के घर झाड़ू, बर्तन-चौका, कूटना-छाँटना खोभारी की ईया किया करती थी। बदले में मतवा के घर से दो-चार रोटी और थोड़ा बहुत सीधा-पिसान (चावल-आटा) मिल जाता। अपनी ईया के साथ खोभारी मतवा के घर ही जमा रहता या उनके घर के आस-पास खेलता होता। उसकी माई दिन में थोड़ी-बहुत मेहनत मजदूरी कर लेती।
सास के बीमार होने की वजह से आज कल मतवा के घर का काम खोभारी की माई को ही करना था। साथ में सास की देख-भाल भी करनी थी और खोभारी को भी देखना था। खोभारी की उम्र वैसे तो स्कूल जाने की थी। पर उसकी माई और ईया उसे स्कूल नहीं भेजती थीं। किसी तरह वह जिंदा रहे इसी में भगवान की नेमत मानती थी। कारण कि खोभारी के पहले डुगुर की कई संतानों की जिंदगी छोटी उम्र में ही मृत्यु की भेंट चढ़ गई थी। गाँवों की मान्यता के अनुरूप ऐसी स्थिति में बच्चों को कोई भद्दा नाम दे दिया जाता था कि मृत्यु उनके करीब फटकने के पहले उसके नाम से ही बिदक जाए। खोभारी नाम इसी कारण रखा गया था।
खोभारी को जब स्कूल जाना ही नहीं था, तो ईया का पल्लू थामे रहता था। उसकी ईया उसे और अपनी एकमात्र पशु धन बकरी लिए फिरती रहती थी। बकरी को घास चरने के लिए कहीं पास में बाँध देती, और खोभारी के साथ मतवा के घर पहुँच जाती। खोभारी मतवा के हाथ से जो भी मिल जाता, बासी रोटी-गुड, तो कभी मट्ठा-रोटी, या कभी माँड़-भात, जल्दी-जल्दी खा कर खेलने भाग जाता। मतवा का जब अधिक छोह उमड़ता तब खोभारी को दाल-भात के स्वाद का सुख भी मयस्सर हो जाता। बकरी के दूध से उसे अतिरिक्त पोषण मिल जाता। यह बकरी उनकी एक मात्र पशु धन नहीं, बल्कि धन के नाम पर एक मात्र यह बकरी ही उनके जीवन में बची थी।
डुगुर के जीते जी इनकी स्थिति इतनी खराब नहीं थी। वही तो खोभारी की माई उस रात सोचने लगी थी। दस-पंद्रह कट्ठा यानि आधा एकड़ अपना खेत था। मेहनत मशक्कत से थोड़ी उपज हो ही जाती थी। कुछ आमदनी जग-परोजन में जजमानों को कलसा, गगरा, हँड़िया, दीया, ढकनी बेंच कर हो जाती। ऊपर से कुछ नेग-नेछावर (न्योछावर) मिल जाता सो अलग था। दीवाली-छठ में भी दीयों और कलसों की जरूरतें भी यही पूरी करते थे। जजमानी व्यवस्था में चहेते कोंहारों, बढ़ई, हजाम आदि को जजमानों से खुशी खुशी अच्छा-खासा नेग मिल जाता। और डुगुर तो था ही पसंदीदा। उनकी जिंदगी में अगर कुछ चिंता थी तो वह एक संतान के जीवित बच जाने की। सबको लग रहा था कि विधना खोभारी को बक्श देगी। वह चार साल का हो गया था। उससे पहले उसके जो भाई बहन इस दुनिया में आए थे, साल-दो साल के अंदर काल के गाल में समा गए थे। जब खोभारी चार साल का हो गया तो सबको थोड़ी तसल्ली हो गई थी। अब वह बच जाएगा। बकरी भी तो उसी के लिए पाली गई थी। बकरी का दूध ताकत के लिए अच्छा माना जाता था। रोगों से भी बचाने का गुण उसमें होता है। गरीबों के जीवन में बकरी की अहमियत को ध्यान में रख कर ही गाँधी जी ने बकरी का दूध अपनाया था।
खोभारी को लेकर उसके माई बापू निश्चिंत हुए ही थे जब यह घटना घटी। उसके बाद उसके जीवन में कई बड़े झंझावात आए। पर वह दिन वह कैसे भूल सकती थी, जिसने उसकी जिंदगी बदल कर रख दी।
पास के गाँव के चौधरी साहब के बेटी का बिआह था। चौधरी साहब ने डुगुर को खास बुला कर लगन के लिए कलसा, चौमुख, गगरा आदि के लिए कहा था। लगन के बर्तनों के साथ बड़ी संख्या में हँड़िया, पतुकी की भी जरूरत भी थी। और सोबरना (कुल्हड़) की फरमाइश तो हजारों में थी। तब पेपर प्लेट और गिलास होते नहीं थे। खाना पत्तल में परोसा जाता था। और पानी सोबरना में। कुल्हड़ को उस क्षेत्र में सोबरना शायद उसके सुनहरे रूप रंग के कारण कहा जाता था। पानी के अतिरिक्त रस(शर्बत) के लिए भी इसी का प्रयोग होता था। चौधरी साहब के ठाठ चाहे जितने बड़े हों, पूरे बारातियों के लिए गिलास तो उनके घर में भी नहीं थी। उन दिनों पंडितों और मेहमानों के नखरे भी तो कम नहीं थे। धातु के बर्तन में छुआ-छूत का संशय रहता उसमें खाने-पीने से परहेज बता देते थे।
मिट्टी के पात्र पवित्र माने जाते थे। आग में तप कर तैयार होते थे। एक बार इस्तेमाल के बाद उन्हें फेंक दिया जाता था। फिर छुआ-छूत का और अशुद्ध होने का भय नहीं रहता।
सोबरना की आपूर्ति ही डुगुर की बड़ी चुनौती थी। वैसे तो कलसा, गगरा, दीया, हँड़िया, पतुकी भी अधिक संख्या में ही चाहिए थी। फिर भी डुगुर इन्हें आसानी से बना लेता। पर हजार-डेढ़ हजार सोबरना समय पर बना लेना आसान नहीं था। डुगुर ने दबी जुबान चौधरी साहब से सोबरना का काम दो-तीन कोंहारों के बीच बाँटने को कहा। डुगुर की बात अभी पूरी भी नहीं हुई थी कि चौधरी साहब भड़क उठे। मुझे कुछ नहीं सुनना है। इन सभी सामानों की पूरी जिम्मेदारी तुम्हारी है। तुम जानो कि तुम कैसे पूरा करोगे। डुगुर, जी हुजूर! बोल कर वापस आ गया, और अगले पल से ही काम पर लग गया।
एक-दो परिचित कोंहारों से डुगुर ने मदद माँगी। पर सब मौके की ताक में थे, कैसे इसे नीचा दिखाया जाए। अपने ऊपर काम की अधिकता की आड़ में सभी ने इनकार कर दिया। मरता क्या ना करता! डुगुर रात दिन एक कर चौधरी साहब की जरूरत के मुताबिक बर्तन तैयार करने में जुट गया। उसे पता था सारे बर्तन एक बार में आवा में आ नहीं पाएंगे। दो बार में पक जाएँ तो ठीक हैं नहीं तो तीसरा खेप भी डालना होगा। अपनी सोच के मुताबिक ही उसने मिट्टी तैयार की, लगन के सारे बर्तन कलसा, गगरा, दीया, ढकनी और करीब चार सौ सोबरना पहले खेप के लिए गढ़ लिया और उन्हें एक साथ आवा में डाल दिया। सोचा चार दिन में जबतक ये पककर तैयार होंगे, वह बाकी के बर्तन और सोबरना गढ़ लेगा।
पहला खेप आवा में डालकर डुगुर चाक पर बैठ गया। बईसाख की गर्मी तो थी ही, अब साथ में आवा की तपिश भी थी। दीया और ढिबरी के अँजोर(प्रकाश) में चाक पर बर्तन का गढ़ा जाना संभव था नहीं। अतः डुगुर को सुबह और दोपहर का ख्याल छोड़ना पड़ा। वह दिलो-जान से जुटा था। किसी भी सूरत में चौधरी साहब को शिकायत का मौका नहीं देना था। एक हप्ता अभी उसके पास था। उसे स्वयं पर पूरा भरोसा था कि वह लक्ष्य पा लेगा। किन्तु डुगुर को क्या पता था कि उसे लू की मार पड़ने वाली है। चौथे दिन आवा से पहले खेप के बर्तन निकलने वाले थे। डुगुर सुबह सुबह आवा से इन्हें निकाल लेना चाहता था। आवा जब खुलता है तो आँच कम होने पर भी भभक तो आती ही। पर गर्मी के मौसम में सुबह की शीतलता का बोध गर्मी के अहसास को कुछ तो कम कर पाएगा, यही सोच थी।
सुबह सबसे पहले आवा से पहले खेप के बर्तन निकालने के काम में वह भिड़ गया। पर उसका शरीर अंदर से टूटा जा रहा था। फिर भी परिस्थिति शरीर का सुख-दुख महसूस करने की उसे इजाजत नहीं दे रही थी। आवा खाली कर उसे अगली खेप के लिए तैयार करना था। बाकी के बर्तन भी गढ़ने थे।
उसने ऐसा ही किया। आवा को खोलकर उसे ठंडा होने के लिए छोड़ दिया और चाक पर बाकी के बर्तन गढ़ने लगा। शाम तक चौधरी साहब के आवश्यकता भर बर्तन गढ़ा जा चुका था। अगली खेप में ही पूरा तैयार हो जाएगा। उसने सोचा लगन वाले बर्तन तो तैयार हो ही चुके हैं, साथ में सोबरना की पहली खेप भी। क्यों नहीं शाम ढलते ही इन्हें चौधरी साहब के वहाँ पहुँचा दूँ। आखिर सारे बर्तन तो एक बार में जाने वाले थे नहीं। शाम तक आवा ठंडा भी हो जाएगा जब वह बर्तनों को निकाल लेगा। मन की मान उसने ऐसा ही किया। चौधरी साहब भी खुश हुए। उसकी मुस्तैदी पर। वाहवाही देते हुए बाकी बर्तनों का भी पूछ लिया। डुगुर की तैयारी सुन चौधरी साहब भी निश्चिंत हो गए।
लौट कर डुगुर हाथ मुँह धोकर खाना खाया और रात में ही आवा तैयार कर बाकी के बर्तन, जिन्हें उसने दिन में ही तैयार कर लिया था, को पकने के लिए उसमें डाल दिया। देर रात फुरसत पा वह सोने गया। शरीर कितना भी सशक्त हो, प्रकृति के समक्ष असहाय होता है। डुगुर अपनी मजबूत इच्छा-शक्ति से पूरे दिन प्रकृति के इशारे को नजरंदाज करता रहा। उसे चौधरी साहब के शुभ-मंगल की चिंता अपने शरीर से अधिक थी। किन्तु लू और आवा की भभक दोनों ने डुगुर के शरीर को अंततः पस्त कर दिया। सुबह हुई तो डुगुर का शरीर बोखार से जल रहा था। खटिया से उठने तक की शक्ति शरीर में नहीं थी। डुगुर की माई, खोभारी की ईया समझ गई कि उसे लू लग गई है। आनन फानन में कच्चे आम ढूँढ लाई। उसे आग में पका कर उसका घोल डुगुर को पिलाना शुरू कर दिया और उसी का लेप शरीर में लगाना भी। भाग कर वैद्य जी से दवा भी लाई थी। उन्होंने ही तो बताया था कच्चे आम को पका कर उसका घोल पिलाने और शरीर में लेप लगाने के लिए।
लेकिन लू का असर कुछ अधिक ही था, वैद्ययाजी की गोलियाँ और आम के घोल का कुछ खास लाभ नहीं हो पाया। चौधरी साहब की बर्तनों की माँग तो पूरी करनी ही थी। फिर खोभारी की ईया और माई ने मिल जुल कर आवा खोला। इधर आवा खुल रहा था, उधर डुगुर का शरीर बोखार से निश्चेष्ट हुआ जा रहा था। कोशिश थी कि चौधरी साहब के बाकी के बर्तनों को जल्दी से उनके वहाँ पहुँचा दिया जाए। कहीं कुछ अन्यथा हो गया तो सूतक से बर्तन अशुद्ध हो जाएंगे।
विधि का लेखा हो कर ही रहता है। बर्तन आवा से निकल भी नहीं पाए थे जब डुगुर ने दम तोड़ दिया। डुगुर की मृत्यु के बाद बाकी के बर्तन अब किसी काम के नहीं रह गए थे। डुगुर के मृत्यु की सूचना चौधरी साहब तक पहुँच गई। आखिर उन्हें बचे बर्तनों की व्यवस्था भी तो करनी थी। सूचना मिलने पर सहानुभूति के बजाय चौधरी साहब का गुस्सा फूट पड़ा। बचे बर्तनों का इंतजाम तो किसी तरह हो जाएगा, पर उनके शुभ में अपशकुन जो हुआ था उसका क्या? डुगुर के परिवार को इसका प्रायश्चित तो करना ही होगा। उन्हें डाँड़ (दंड स्वरूप वसूली जाने वाली राशि अवश्य देना होगा। चौधरी साहब के पुरोहित भी मुखर हो गए। हाँ बिल्कुल! प्रायश्चित के लिए दान-दक्षिणा और शांति पूजा हेतु उन्हें तुरंत ५१ रुपये पुरोहित के पास जमा कराने होंगे। शांति पूजा शीघ्र ही शुरू करनी होगी। तनिक विलंब भी अनिष्ट को नेवता देने जैसा होगा।
डुगुर की मुसमात (बेवा) और उसकी बूढ़ी माई डुगुर के शरीर को फूँकने की व्यवस्था देखें या प्रायश्चित के इन पैसों की। उनके कुछ समझ आता उससे पहले गाँव के बाबू साहब ने डुगुर के खेत को अपने पास रेहन पर रख ५१ रुपये चौधरी साहब के पुरोहित को पकड़ा दिया। गाँव देहात के सेठ-साहूकार ऐसे मौकों की ताक में रहा करते थे। तब ५१ रुपये बहुत बड़ी रकम होती थी जिसे चुकाना इन दो मुसमातों के वश का कतई नहीं था।
डुगुर और उसके हिस्से की धरती यानि उसका खेत दोनों उन्हें एक साथ छोड़ गए। उनके साथ रह गए खोभारी और एक बकरी जो खोभारी के ईया के साथ फिरते रहते थे।
जब खोभारी की माई और ईया काम कर रही होतीं तब खोभारी और बकरी दोनों को एक दूसरे का ही साथ होता। गाँव के बरम बाबा छाँव के साथ दोनों के पेट का भी ख्याल रखते। ब्रह्म देव, जो गाँव के लिए बरमबाबा थे, पीपल-बरगद में अवस्थित थे। खोभारी और उसकी बकरी दोनों का पेट तो शायद ही कभी भरता था। बरगद पीपल का गोदा खोभारी को बरम बाबा का प्रसाद लगता। उन्हें चुन कर खोभारी खाता भी और इकट्ठे भी करता। छोटे खोभारी को माई और ईया की भी चिंता होती। उन्हीं के लिए तो वह गोदा इकट्ठा करता। उन्हें भी तो कभी भर पेट खाना नहीं मिलता! उसकी खोभारी की बकरी इस दरम्यान हरे पत्ते चबाते रहती। उसे पीपल-बरगद के कुछ गिरे पत्ते मिल जाते। आस पास जो छोटे पौधे उग आए होते वे भी बकरी की क्षुधा शांत करते।
खोभारी और उसकी बकरी की कल्पना एक दूसरे से अलग करना संभव नहीं होता। खोभारी का साथ छोड़ कर बकरी कभी पास के खेतों में मुँह मारने चली जाती। खेत वाले खोभारी के ईया या माई से उसकी शिकायत लगाते। उसके उम्र के बच्चे तो मजदूरी करने लग जाते। इससे तो एक बकरी भी नहीं संभलती। लोग यह भी कह डालते कि खोभारी थोड़ा ‘बहबल’ (लापरवाह) है। डुगुर जितना ही मुस्तैद था, खोभारी उतना ही ढीला है। पर खोभारी को कोई कुछ नहीं कहता। जो भी सुनना-सुनाना होता, लोग उसकी ईया और माई को ही सुनाते। डुगुर की असमय मृत्यु से खोभारी के प्रति थोड़ी-बहुत सहानुभूति सभी को थी।
मतवा के मट्ठा-रोटी, माँड़-भात, बरम बाबा के गोदा-पकुवा और अपनी बकरी के दूध पर खोभारी पल-बढ़ रहा था। उसकी ईया भी स्वस्थ हो गईं थी और उनके साथ उसके माई की मेहनत-मजूरी भी वैसे ही चल रही थी। उनकी जिंदगी अपनी पटरी पर धीमे-धीमे डगर रही थी। खोभारी जीवित रह जाएगा और डुगुर का वंश आगे चलेगा, लोगों को भरोसा होने लगा था, कि एक दिन सुबह बकरी की ‘में-में’ सुनाई नहीं दी। कई बार वह डोर खोल आस-पास घास पत्ते खाने निकल जाती। खोभारी की ईया और माई ने भाग कर उन जगहों पर अपनी नजरें फिराई जहाँ अक्सर घास-पत्ते खाने उनकी बकरी चली जाती। उसका कहीं अता-पता नहीं था।
मन में संशय घर करने लगा। कहीं कोई पकड़ कर फाटक (मवेशियों की जब्ती घर) में तो नहीं जमा कर दिया है। क्या पता डोर छुड़ा कर किसी के फसल में मुँह मारने चली गई होगी। पहले भी कई बार लोगों ने ताकीद की थी कि वे अपनी बकरी का ध्यान रखें। अगर फसल का नुकसान करेगी तो फाटक में दे दिया जाएगा! पर किसी ने कभी ऐसा किया नहीं था। इन्हें भी लगता था कि महज उन्हें डराने के लिए लोग धमकी दे डालते थे। पर इस बार क्या सच में किसी ने ऐसा कर दिया था? बकरी अगर फाटक में है फिर गनीमत है। रो-गिड़गिड़ा कर छुड़ा लेंगे।
पर उन दिनों तो माल मवेशियों की चोरी भी तो आम थी। और मनचलों का ध्यान तो बकरियों-मुर्गियों पर अधिक रहता था। खान-पान की किल्लत के दिन थे वे। फिर ये छोटे जीव ऐसे चोरों के शिकार हो जाते। एक वक्त कुछ विशेष भोजन का प्रबंध हो जाता। लोगों की अटकलें सुन-सुन कर खोभारी का दिल बैठा जा रहा था। उसकी बकरी उसकी हमजोली जो थी। ऊपर से खोभारी को उसके दूध का आसरा भी था। पर वह असहाय था, कर भी क्या सकता था। फाटक जाकर पता करने की कोशिश हुई। पर उस दिन किसी ने कोई बकरी जब्त नहीं कराई थी।
चोरों की मति-गति कौन जाने, लगने लगा खोभारी की बकरी उन्हीं के हाथों लग गई थी। कानाफूसी भी होने लगी थी कल रात तड़बाना (ताड़ का बगीचा) में मीट की दावत हुई है। हो ना हो, खोभारी की बकरी ही उनके स्वाद की भेंट चढ़ी है। सुनकर खोभारी की सिसकियाँ शुरू हुई तो थमने का नाम ही ना लें, आखिर वह उसकी हमजोली जो थी।
महीनों तक गोदा-पकुवा चुनते-चुनते खोभारी को लगता कि उसकी बकरी ‘में-में’ कर उसे बुला रही है। उसे लगता कि शायद पास के खेत वाले ने उसे पकड़ लिया है, क्योंकि वह घास के बहाने फसल चरने लगी है। फिर जैसे खोभारी की तंद्रा टूटती और वह मन मसोस लेता।
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सत्येन्द्र प्रकाश भारतीय सूचना सेवा के सेवा निवृत्त अधिकारी हैं। इन्होंने केन्द्रीय संचार ब्यूरो और पत्र सूचना कार्यालय (पीआईबी) के प्रधान महानिदेशक के रूप में अपनी सेवाएँ दी है। रचनात्मक लेखन के साथ साथ आध्यात्म, फ़ोटोग्राफ़ी और वन तथा वन्यजीवों में भी इनकी रुचि रही है।