संवेदना और अभिव्यक्ति के अन्तराल में अनकहा सौंदर्य
डॉ मधु कपूर पिछले काफी समय से दर्शनशास्त्र की सघन दुनिया से हमारा परिचय करवा रही हैं। उन्होंने पिछले लगभग एक वर्ष से दर्शनशास्त्र के विभिन्न आयामों के बारे में हमें इस जटिल विषय को सुबोधगम्य लेखों के माध्यम से समझाया है। हाल ही में दर्शनशास्त्र और भाषा पर उनकी सीरीज़ सम्पन्न हुई है। दर्शनशास्त्र की एक गली सौंदर्यशास्त्र की तरफ भी मुड़ती है। इस लेख के साथ डॉ मधु कपूर सौंदर्यशास्त्र को हमारे पाठकों के लिए सरल बनाने के लिए एक शृंखला प्रारम्भ कर रही हैं जिसका पहला लेख आप यहाँ पढ़ रहे हैं।
संवेदना और अभिव्यक्ति के अन्तराल में अनकहा सौंदर्य
डॉ मधु कपूर
प्रायः सभी संस्कृतियों में ऐसा चलन है कि जब आप कृतज्ञतावशत किसी को ‘धन्यवाद’ कहते है, तो उत्तर अक्सर मिलता है, ‘ओह, यह तो मेरा सौभाग्य है’ अर्थात निरपेक्ष आनंद का एहसास! शायद इसी टिप्पणी से मैं अपनी बात शुरू कर सकती हूँ।
“अरे, तूने तो गजब की चाय बनाई है! तेरे हाथ में जादू है, बिलकुल मेरी मनपसंद चाय है, असल में मुझे सबके हाथ की चाय पसन्द जो नहीं आती”। पसन्द-नापसंद पर चर्चा करना वास्तव में मुश्किल है। यह अक्सर इसलिए भी मुश्किल लगता है, क्योंकि हमारे पास दूसरे व्यक्ति की प्रशंसा कैसे करनी चाहिए इसका कोई फार्मूला नहीं होता है। क्यों पसन्द है, इसका कारण भी नहीं मालूम होता है। पर ‘पसन्द है’, ‘सुन्दर लग रहा है’ ‘वाह ! क्या अद्भुत तान उठाई’ , ‘क्या सजावट है कमरे की तुमने’, ‘अमुक फिल्म के डायलॉग सुने, एकदम ध्यान लगा कर सुनना पड़ता है, कहीं कुछ छूट न जाएँ’- इत्यादि अभिव्यक्तियों के द्वारा हम किसी भी कला या शिल्प का मूल्यांकन करते हैं।
कभी-कभी हम अपनी पसन्द दूसरों पर थोपने की कोशिश भी करते हैं, ‘चलो तुम भी देख आओ अमुक फिल्म’, ‘तुम भी यहीं से सामान ख़रीदा करो, अच्छा माल रखता है।’ मेरे एक परिचित तो यहाँ तक कह देते है, ‘अरे, शास्त्रीय संगीत में क्या रक्खा है, यह तो पूरा अंकों का खेल है, उसमें क्या आनंद?’ संगीत यदि अंकों का खेल है तो गणित की समस्याओं का हल करना भी सांगीतिक रस है। बात कुछ यूँ है कि जो चीज हमें पसंद है, वह दूसरों को भी पसंद आनी चाहिए ㄧ इसके मूल में कहीं अपनी पसन्द को श्रेष्ठ बताना तो नहीं हैं ? यद्यपि ऐसी टिप्पणियों से कोई ‘सुन्दर’ कहने का अर्थ स्पष्ट नहीं होता है, तथापि कहीं-न-कहीं यह हमारे सौन्दर्य बोध में सुगबुगाहट तो मचाता ही है।
कहा जाता है कलाकार प्रकृति का अनुकरण करता है। जैसे सप्तसुरों का अनुकरण पक्षियों और जानवरों की बोलियों से किया गया है, जो संगीत का उत्स है। झरने का कलकल निनाद, पत्तों की सरसराहट, पहाड़ों और घाटियों में गूंजती अनवरत पुकार संगीत-कला को समृद्ध बनाती है। एक ही शब्द के तमाम अर्थ साहित्य की विपुल सम्पदा को एक नई दिशा देते है। किसी मन को भाने वाला दृश्य देखकर कैमरे में कैद कर लेने की इच्छा होती है।
अरस्तू ने ठीक ही कहा कि अनुकरण मानवता की एक स्वाभाविक प्रवृत्ति है और सभी मानवीय कलात्मकता प्रकृति का अनुसरण करती है। भरतमुनि के नाट्यशास्त्र में भी ‘अनुकीर्तन’ शब्द का प्रयोग हू-ब-हू अर्थ में किया गया है। प्लेटो अपने आदर्श गणराज्य से कवियों और चित्रकारों पर प्रतिबंध लगाने की सिफारिश करते हैं, क्योंकि वे अनुकरण या नकल की नैतिकता के विरुद्ध थे। बात कुछ हद तक जंचती भी है। एक घोड़े का चित्रांकन ‘ज्यों का त्यों’ आंकने में कलाकार कोई नवीन संयोजन तो करता नहीं है। हाँ, हुसैन साहब के घोड़े के चित्रों को देख कर जरूर नवीनता, ताजगी और और कुछ-न-समझने का एहसास भी होता है।
इसके विपरीत अरस्तू कला को एक आवश्यक विरेचन (catharsis) के रूप में पुनर्वासित करते है। आज जिसे हम अमूर्त चित्रकला कहते है, जिसमें वस्तुओं को वैसा नहीं दिखाया जाता है, जैसी वे होती हैं बल्कि कलाकार उसके बारे में क्या सोचता है, यह आवश्यक होता है। उस नृत्यांगना को स्मरण करें, जिसने कनिष्क विमान दुर्घटना में अपने पति और दो बच्चों को खो दिया था। उसने तो नृत्य करना ही छोड़ दिया था। कई सालों के बाद जब उसने नृत्य नाटिका “आग” प्रस्तुत की, तो उसने वह सारा आवेग उंडेल दिया जो अब तक वह अभिव्यक्त नहीं कर पा रही थी। लोग बस उसका नृत्य देखते रहे और ‘वाह! अति सुन्दर’ ही कहते रहे। पर नृत्य-नाटिका ने विस्थापित नृत्यांगना को पुनः स्थापित कर दिया। कहने का तात्पर्य है कि विभिन्न ललित-कलायें कुछ हद तक अपने व्यक्तिगत अनुभवों को भी कला का विषय बनाती है।
इस तरह सौन्दर्य शास्त्र खोज करता है कि कला क्या है? और इसके लिए आवश्यकता है कुछ मानकों की जो निर्धारित करें कि किसी कलाकृति को ‘सुन्दर’ कहने के पूर्व उस कला के सम्बन्ध में पर्याप्त जानकारी हासिल होनी चाहिए। उदाहरण के लिए यदि हमें भारतीय शास्त्रीय संगीत की बारीकियों का ज्ञान है तभी हम किसी गायक के गायन की समीक्षा कर सकते हैं। बिना माइकेल एन्जेलो की चित्रकला की सूक्ष्मता को जाने उसकी आलोचना या प्रशंसा नहीं की जा सकती। जिन विशेषताओं के कारण घोड़े को सुंदर माना जाता हैㄧजैसे विकसित कूल्हे, टेढ़ी पीठ, तेज गति वगैरह, वही विशेषतायें मनुष्य के क्षेत्र में कुरूप मानी जाती है। इसलिए कई समीक्षक यह मानते है कि सुन्दरता का मूल्यांकन गणितीय पद्धति के आधार पर होना चाहिए, अर्थात किसी कला के अन्तर्गत व्याकरणिक नियमानुसार ही कला की विवेचना होनी चाहिए। क्या क्रिकेट की समीक्षा फुटबॉल के नियमों के अनुसार की जा सकती है? जिस तरह लययुक्त-स्पन्दन ह्रदय की सहजावस्था को प्रदर्शित करता है, और स्पन्दन की गति अत्यन्त धीमी या अत्यन्त तीव्र ह्रदय को अस्वस्थ कर देती है, उसी तरह सहज प्राप्य कला ही सुन्दर होती है।
यद्यपि कला की शुरुआत ऐंद्रिय अनुभव से होती है, जो हमारे किसी उद्देश्य से जुड़ी रहती है, जैसा कि ऊपर कहा गया ‘चाय का अच्छा होना’ हमारी जिह्वा के, गायन हमारी श्रवणेन्द्रियों के, चित्रकला हमारी चक्षुरिन्द्रियों के सुख से सम्बंधित है। कहा गया है कि "सुंदरता देखने वाले की आंखों में होती है।" चूँकि सबके सुख भिन्न भिन्न होते है, इसलिए सुन्दरता भी आत्मनिष्ठ होनी चाहिए। लेकिन सौन्दर्य की उपलब्धि शर्त निरपेक्ष आनन्द से सम्बंधित है, क्योंकि यह आनंद किसी लाभ हानि से जुड़ा नहीं होता है। वह देश काल के बंधन का अतिक्रमण कर समय और स्थान की सापेक्षता से मुक्त हो कर ही उपलब्ध होता है। सत्य और शिव के समान सुन्दर भी चरम मूल्य की खोज कुछ मानकों के आधार पर करता है, पर सौंदर्यानुभूति क्या है, यह तो शायद ही कोई बता सके। हाँ, सच यह है कि हम उसे पहचान लेते है।
इस तरह दो बाते बिलकुल स्पष्ट हो जाती है ㄧ कला की समीक्षा करना एक बात है और उससे आनंद की उपलब्धि करना दूसरी बात। बिना किसी साहित्यिक कला के नियमों को जाने भी कविता हमें सुन्दर लग सकती है, शास्त्रीय संगीत का आनंद लिया जा सकता है, लियोनार्दो या मोजार्ट की कृतियों का सम्मोहन हमें बाँध सकता है। पर बिना किसी शास्त्रीय परिचय के समीक्षा नहीं की जा सकती। अतएव सौंदर्य की उपलब्धि किसी ज्ञानीय पूर्वग्रह से मुक्त होती है, पर उसकी समीक्षा अवश्य ही कुछ मानकों की अपेक्षा रखती है।
सामने टेबल पर “किसी वस्तु ” को देख कर द्रष्टा की इन्द्रियगत संवेदनाऐं सूचना देती है कि ‘यह पुस्तक है’ जो वह अपने पूर्व ज्ञान या शिक्षण से प्राप्त करता है। लेकिन गुलज़ार साहब जब अपनी कविता में कहते है:
किताबें झाँकती हैं बंद अलमारी के शीशों से
बड़ी हसरत से तकती हैं
महीनों अब मुलाक़ातें नहीं होतीं
जो शामें उन की सोहबत में कटा करती थीं, अब अक्सर
गुज़र जाती हैं कंप्यूटर के पर्दों पर
बड़ी बेचैन रहती हैं किताबें
उन्हें अब नींद में चलने की आदत हो गई है।।
कोई सफ़्हा पलटता हूँ तो इक सिसकी निकलती है
किताबों से जो ज़ाती राब्ता था कट गया है
कभी सीने पे रख के लेट जाते थे
कभी गोदी में लेते थे
किताबें माँगने गिरने उठाने के बहाने रिश्ते बनते थे
तो किताब के सम्बन्ध में उनकी कल्पना का जो मुक्त खेल चलता है, वह कवि की कला को प्रदर्शित करता है।
सौंदर्यबोध और रोज़मर्रा के अनुभव के बीच इस तनाव को स्पष्ट करने के लिए जो चरम स्थितियाँ काम करती हैं, वह है ㄧ उदात्तता (Sublime) अर्थात कलाकार अपनी व्यक्तिगत सुख-दुःख की अनुभूतियों से छन कर एक अद्भुत कृति को जन्म देता है, और उसे ऐसे शिखर पर ले जाता है, जहाँ वह अपनी अनुभूतियों से तटस्थ हो जाता है। निराला की “सरोज-स्मृति” कविता इसका प्रमाण है। ‘सुन्दरता’ जो साधारण व्यक्ति को रास्ते में पड़े एक अनगढ़ पत्थर में दिखाई नहीं देती है, एक शिल्पी के लिए वह कला का उत्कृष्ट नमूना बन जाती है। अ-कला और कला के बीच का यह तनाव छेनी के आघात से कृति के रूप में उभर आता है।
इसी तरह किसी नाटक या गायन के मंचन पर दर्शक और श्रोता भी उस अभिव्यक्ति के साथ अपने व्यक्तिगत सुख-दुःख को एकात्म कर लेते हैं और एक सामूहिक चेतना के साथ उदात्तता में उसे विलीन कर देते है। इस तरह सौन्दर्यानुभूति उदात्तता के साथ अभिन्न हो जाती है। सौंदर्यानूभूति व्यष्टि से समष्टि के धरातल में समा जाती है, लौकिकता के धरातल से विस्थापित होकर एक अलौकिक आधार प्राप्त कर लेती है। इस तरह कला हमें दैनन्दिन जीवन के संघर्षों से मुक्ति दिला कर स्व को विस्तृत करने का वरदान देती है।
जैसे दो पत्थरों के घर्षण से आग निकलती है, वैसे ही बाह्य वस्तुपरक दुनिया की गतिशीलता, द्वंद्व और संघर्ष कलाकार की आत्मा में हलचल पैदा कर देती है। क्रौंच पक्षी का वध और क्रौंची का रुदन वाल्मीकि को करुणा एवं शोक से भर देता है, जो श्लोक के रूप में उमड़ पड़ता है। यह बात बार बार दुहरायी गयी है कि कला का उद्गम पीड़ा है, पर यह भी सच है कि मनुष्य को पीड़ा से वह मुक्त भी करती है। यही वह बिंदु है जो सौन्दर्य एवं सौन्दर्य-दृष्टि से निर्मित कला को रहस्यमयी बनाता है, जिसकी अनुभूति तर्कातीत है, जो सिर्फ भाव जगत की वृत्तियों के साक्षीभाव (contemplation) की मांग करती है।
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डॉ मधु कपूर कलकत्ता के एक प्रतिष्ठित कॉलेज में दर्शनशास्त्र की प्रोफेसर रही हैं। दर्शनशास्त्र के अलावा साहित्य में उनकी विशेष रुचि रही है। उन्हीं के शब्दों में, "दार्शनिक उलझनों की गुत्थियों को साहित्य के रास्ते में तलाशती हूं।" डॉ कपूर ने हिंदी से बंगला में कुछ पुस्तकों का अनुवाद किया है और कुछ कविता संग्रह भी प्रकाशित हुए हैं। दर्शन पर उनके निबंधों का एक संग्रह Dice Doodle Droll Dance प्रकाशित हुआ हुआ है।