अलग पिच पर गरमा रही है यूपी की सियासत
राजकेश्वर सिंह उत्तर प्रदेश की राजनीति के गहन अध्येता हैं. अभी उत्तर प्रदेश में विधान सभा चुनाव करीब सात महीने दूर हैं किन्तु अपने लेख में राजकेश्वर बता रहे हैं कि कैसे बिसातें बिछनी शुरू हो गई हैं. अभी उन्होंने इस लेख में केवल संभावित साम्प्रदायिक ध्रुवीकरण वाले कोण की ओर इशारा किया है. हम उनसे अनुरोध करेंगे कि आने वाले दिनों में वह दिल्ली और उत्तरप्रदेश के भाजपा नेताओं के बीच क्या चल रहा है, इस पर भी हमारे पाठकों को अपने दृष्टिकोण से वाकिफ करवाएं.
अलग पिच पर गरमा रही है यूपी की सियासत
राजकेश्वर सिंह
वैसे तो देश के सात राज्यों में विधानसभा चुनाव अगले साल होने हैं, लेकिन सबकी नज़रें अभी से उत्तर प्रदेश पर टिक गई हैं। वजह यह है कि चुनाव के मद्देनजर सांप्रदायिक और जातीय ध्रुवीकरण की जैसी हलचल उत्तर प्रदेश में है, वैसी चुनाव वाले दूसरे राज्यों में फिलहाल नहीं हैं। बीते साल-डेढ़ साल से राज्य में मस्जिद, मदरसा और मजारों को बहस के केंद्र में ला दिया गया है। हिंदू संगठन ही नहीं, राज्य सरकार भी मस्जिदों, मदरसों और मजारों के अतिक्रमण को लेकर न सिर्फ गंभीर है, बल्कि इस मामले में लगातार सख्त कार्रवाई कर रही है। हालांकि, यह अलग बात है कि अतिक्रमण करके बने दूसरे धर्मों और संप्रदायों के धार्मिक स्थलों की भी भरमार है, लेकिन अभी तक ऐसी कोई तस्वीर सामने नहीं आई है, जिससे लगे कि सरकार की नज़र उस तरफ भी है। इन हालात में सूबे की मौजूदा स्थिति पर यह शेर ज्यादा मौजू है, “सियासत का अगर तीर चलता रहेगा, तो फिर वक्त के जख्म कैसे भरेंगे”।
इंग्लैंड के तत्कालीन मुख्य न्यायाधीश लॉर्ड हेवार्ड ने 1924 में एक मामले की सुनवाई के दौरान कहा था, “जस्टिस मस्ट नॉट ओनली बी डन, बट मस्ट आलसो बी सीन टू बी डन”। मतलब यह कि न्यायपालिका का काम केवल निष्पक्ष फैसला देना ही नहीं है, बल्कि आम जनता को यह साफ-साफ दिखाई भी देना चाहिए कि न्याय निष्पक्ष तरीके से हुआ है। भारतीय संविधान के अनुच्छेद 15 (1) में यह व्यवस्था है कि राज्य किसी भी नागरिक के खिलाफ केवल धर्म, मूलवंश, जाति, लिंग, जन्म स्थान या इनमें से किसी भी आधार पर किसी के साथ भेदभाव नहीं करेगा। मतलब साफ है कि सरकारें प्रत्येक नागरिक और समाज को बराबर नज़र से देखेंगी। ऐसे में यह प्रश्न वाजिब है कि कार्रवाई कभी भी एकतरफा नहीं होनी चाहिए। सरकार को अतिक्रमण करके बनाए गए हर धार्मिक स्थल के खिलाफ समान ढंग से कार्रवाई करनी चाहिए, लेकिन क्या वैसा ही हो रहा है ? यह विचारणीय विषय है।
बीते पांच सितंबर को सहारनपुर कलेक्ट्रेट परिसर स्थित 100 साल से ज्यादा पुरानी दो मंज़िला मस्जिद को सुबह पांच बजे सात बुलडोजर लगाकर ढहा दिया गया। सुबह शुरू हुई कार्रवाई के क्रम में दिन के 12 बजते-बजते पूरी मस्जिद मलवे में तबदील हो गई। मस्जिद के सरकारी जमीन पर अतिक्रमण करके बनी होने को लेकर जनवरी 2025 में मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ से शिकायत की गई थी। उस पर आगे की कार्रवाई में सिटी मजिस्ट्रेट की कोर्ट ने 16 जुलाई को मस्जिद को अवैध करार दे दिया। मस्जिद की इंतजामिया कमेटी ने जिला जज की अदालत में उक्त फैसले इस दलील के साथ चुनौती दी कि मस्जिद 150 सौ साल पुरानी है। कमेटी ने इस बाबत 1911 का बिजली का बिल भी पेश किया, फिर भी जिला जज ने दो सितंबर को याचिका खारिज कर दी। मस्जिद की इंतजामिया कमेटी उस फैसले को उच्च अदालत में चुनौती देती, उससे पहले प्रशासन ने पांच सितंबर को मस्जिद को ध्वस्त कर दिया।
मस्जिद, मदरसों और मजारों को अतिक्रमण करके बनाए जाने के राज्य में ढेर सारे मामले हाल के वर्षों में सामने आए हैं। इन मामलों का खुलासा इसलिए हुआ कि उनकी शिकायतें लोगों ने की। साथ ही सरकार ने भी धार्मिक इदारों के जरिए सरकारी ज़मीनों पर हुए अतिक्रमण की निगरानी और कार्रवाई पर ज़ोर दिया गया। मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक नेपाल सीमा से सटे उत्तर प्रदेश के सिद्धार्थनगर, महराजगंज, श्रावस्ती, बहराइच, लखीमपुर खीरी और पीलीभीत जिलों में ही ऐसे सैकड़ों मदरसों और मज़ारें चिन्हित कर उनके विरुद्ध कार्रवाई की गई है, जो अतिक्रमण कर बनाए गए थे। इसके लिए नेपाल सीमा से सटे उत्तर प्रदेश की सीमा में दस किलोमीटर के दायरे में विशेष अभियान चलाया गया। कई मदरसे सील किए गए, जबकि दूसरी तमाम मस्जिद, मदरसों, मजारों व ईदगाह को ध्वस्त भी किया गया।
उधर, संभल (चंदौसी) की शाही जामा मस्जिद का विवाद 2024 से सुर्खियों में है। उसके सर्वे को लेकर वहां दंगा तक हो चुका है। हिंदू पक्ष उसे श्री हरिहर मंदिर मानता है। यह मामला धार्मिक ही नहीं, बल्कि सियासी रूप से इतना तूल पकड़ चुका है कि उसमें चुनावी नफा-नुकसान देखा जा रहा है। संभल में मुस्लिम आबादी लगभग 70 फीसद बताई जाती है। जाहिर है कि यदि वहां पर सांप्रदायिक माहौल गरम होता है तो उसका असर आसपास के क्षेत्रों पर भी पड़ना लाजिमी है। वैसे भी पश्चिमी उत्तर प्रदेश में चुनावी हार-जीत के मामले में मुस्लिम आबादी बहुत मायने रखती है। एक अनुमान के मुताबिक पश्चिमी उत्तर प्रदेश के बिजनौर जिले में लगभग 43 फीसद, मुरादाबाद में 47 फीसद, सहारनपुर 42 फीसद, शामली 42 फीसद, मुजफ्फरनगर 41 फीसद और अमरोहा में 41 फीसद मुस्लिम आबादी है। यह किसी से छिपा नहीं है कि बीते एक दशक में उत्तर प्रदेश में हिंदू-मुस्लिम की सियासत बड़ी तेजी से परवान चढ़ी है। सत्तापक्ष और विपक्ष की राजनीति पर सांप्रदायिक ध्रुवीकरण का बड़ा असर पड़ता है। ऐसे में दोनों पक्ष इसको अपने-अपने तरीके से पेश करते हैं।
उत्तर प्रदेश समेत हिमाचल, पंजाब, उत्तराखंड, गोवा, मणिपुर, गुजरात अगले साल विधानसभा चुनाव होने हैं, लेकिन यूपी की सियासत अभी से एक अलग पिच पर दिख रही है। अयोध्या में राम मंदिर बन जाने के बाद काशी और मथुरा के विवादित मामलों को बार-बार बहस के केंद्र में लाया जा रहा है। मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ मुख्य विपक्षी पार्टी के मुखिया अखिलेश यादव को बार-बार यह चुनौती दे रहे हैं कि यदि वह सचमुच खुद को धार्मिक मानते हैं तो उन्हें मथुरा के श्रीकृष्ण जन्म भूमि विवाद और मंदिर निर्माण के समर्थन में खुलकर बोलना चाहिए। योगी के उस बयान के बाद भाजपा और सपा में जुबानी जंग तेज हो गई है 2027 के विधानसभा चुनाव के मद्देनजर मथुरा के इस विवाद को चुनावी मुद्दा बनाने का प्रयास शुरू हो गया है।
दूसरी तरफ, अगड़े-पिछड़े कि सियासत है। भाजपा और सपा दोनों ही अपने-अपने कोर वोट बैंक के अलावा मायावती के बसपा से विमुख हो चुके दलितों को अपने-अपने पाले में लाने का प्रयास कर रहे हैं। योगी आदित्यनाथ महिलाओं को समृद्ध बनाने के मद्देनजर चुनाव से पहले उनके बैंक खातों में दो किस्तों का 20 हज़ार रुपए डालने का ऐलान कर चुके हैं। दस-दस हज़ार रुपए की तीन किस्तें चुनाव बाद दी जाएंगी। सपा ने कहा है कि चुनाव बाद उसकी सरकार बनी तो महिलाओं को 40 हज़ार रुपए दिये जाएंगे। इस बीच, जेन-जी के मोर्चे पर भी सभी दल सक्रिय हो गए हैं। उन्हें अपने साथ जोड़ने की हर संभव कोशिश हो रही है। इस तरह देखें तो चुनावी नजरिए से उत्तर प्रदेश को अलग तरह से गरमाने का प्रयास अभी से शुरू हो चुका है।
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राजकेश्वर सिंह राजनीतिक विश्लेषक व वरिष्ठ पत्रकार हैं। वह नियमित रूप से रागदिल्ली.कॉम के लिए लिखते रहते हैं।
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