असंभव के दरवाज़े पर खटखटाहट —तर्क की हिलती दीवारें
डॉ मधु कपूर के लेखों के माध्यम से हम दर्शनशास्त्र के ऐसे आयामों को भी छू लेते हैं जो अन्यथा हमारे जैसे आम पाठक के लिए अछूते ही रहते। आज के लेख के बारे में यदि हम यहाँ बताने की कोशिश करेंगे तो कहीं कुछ गलती भी हो सकती है, इसलिए हम कुछ ना कहेंगे. (सिवाय इसके कि नीचे वाला लेख पढ़कर आप यह भी कह सकते हैं कि हमारे कुछ ना कहने में भी बहुत कुछ छिपा है.) डॉ कपूर के पिछले लेखों को पढ़ने के लिए आप उनके नाम पर क्लिक् कर सकते हैं या हमारी अध्यात्म एवं दर्शन की केटेगरी देख सकते हैं.
असंभव के दरवाज़े पर खटखटाहट —तर्क की हिलती दीवारें
डॉ मधु कपूर
“दोपहर के २ बज चुके है । एयरपोर्ट पहुंचना अब असंभव है, चलो, लौट चले,” मैंने झुंझला कर कहा। “फ्लाइट दोपहर 2:30 की है और यह ट्रैफिक जाम ! स्टार ट्रेक का ट्रांसपोर्टर तो पास में है नहीं”! नेपोलियन ने पता नहीं कैसे कहा कि ‘असंभव’ शब्द मूर्खो के शब्दकोश में मिलता होगा। मेरे शब्दकोश में इस समय ‘असंभव’ शब्द अंगार की तरह दहक रहा था।
क्या ऐसा संभव हो सकता है कि शब्दकोश में ‘असंभव’ के साथ साथ ‘संभव’ को भी साझा किया जाए । हाँ, यदि मैं सुबह सुबह निकल गई होती, यदि मैं कल रात ही एयरपोर्ट पर पहुँच जाती, यदि मैं आगामी दिन का टिकट काटती, यदि मैं जाने का प्लान ही नहीं बनाती इत्यादि कई ㄧविकल्प थे और फ्लाईट भी नहीं छूटती। लेकिन अब जब मैंने आज २.३० दोपहर का ही फ्लाईट बुक किया, तो यही होना था जो अभी मेरे साथ हुआ यानी वापस लौटना पड़ा और जो जो काम करना था इस वक्त सब असंभव हो चुके थे ।
लाईबनिज (Gottfried Wilhelm von Leibniz) १७वीं शताब्दी के एक जर्मन दार्शनिक, का दावा है कि यह घटना कोई आकस्मिक नहीं है, यह वास्तव में अनिवार्य घटना है। ‘चौबीस जुलाई २०२५, दोपहर २.३० बजे की फ्लाईट का छूटना’ हमेशा हमेशा के लिए सत्य हो चुका है, जिसे कोई मिथ्या नहीं कर सकता। जैसा कि वे कहते हैं सृष्टि के पूर्व ईश्वर की कल्पना में असंख्य संभाव्य विकल्प थे, किन्तु उसने उन सत्यों के समूह से हमारे इस "श्रेष्ठतम विश्व" का ही चयन किया, और एकबार जब चयन हो गया तो यह अनिवार्य सत्य हो गया।
मूलतः 'असंभव’ वह होता है, जो तार्किक नियमों का तथा प्रकृति के नियमों का उल्लंघन करता हो । जैसे, वास्तव जगत में चतुर्भुज-वृत्त (square circle), दो और दो मिलकर पांच होना, एक ही वस्तु का दो भिन्न भिन्न स्थानों पर एक ही समय में होना, इंसानों का बाहें फैला कर पक्षी की तरह उड़ना, अपनी आँखों को अपनी ही आँखों से देखना, अपने ही कन्धों पर चढ़कर मेला देखना, नीचे से ऊपर की ओर गिरना इत्यादि असंभव कार्य कहे जाते है । कुछ ‘असंभव’ तकनीकी कारणों से हो सकते है जैसे, पृथ्वी पर खड़े होकर चंद्रमा पर एक साधारण पिस्तौल से फायर करना, प्रकाश की गति से तेज़ यात्रा करना, अतीत में लौट जाना इत्यादि। जो आज असंभव लगता है, वह कल संभव हो सकता है, जैसे चन्द्रमा पर पहुँचना—कभी अबूझ माना जाता था, आज यथार्थ हैं।
वास्तव में तर्क को एक ऐसा अनुशासन माना जाता है, जो सोचने और करने के बीच संगति स्थापित करता है। जिसके दो ही मानक बिंदु होते हैं ㅡ सत्य और मिथ्या । वास्तव जगत में ‘बरसात हो रही है’ यह वाक्य सत्य है, यदि बरसात हो रही है और यदि नहीं हो रही है तो वाक्य मिथ्या हो जायेगा । जैसा कि अक्सर वकील गवाही देने वालों से कहते है ‘जो प्रश्न पूछा गया है उसका उत्तर ‘हाँ’ या ‘ना’ में दो, बस’। तर्कशास्त्रियों की भी प्राथमिक अंतर्दृष्टि यही होती है कि कोई घटना या तो संभव (सत्य) होती है या असंभव (असत्य), तीसरे का कोई स्थान नहीं हैं ।
अब प्रश्न उठता है उन संभावित प्रश्नों का क्या होगा जो हम आए दिन और ज्यादातर बातचीत में करते है? जैसे ‘अगले चुनाव में कौन जीतेगा’? ‘कल आप कहाँ जा रहे थे’? ‘आज की खास खबर क्या है’? इत्यादि । एरिस्टोटल (अरस्तु) के तर्कशास्त्र से भिन्न Modal Logic में संभावनाओं का क्षेत्र काफी विस्तृत हो चुका है, जो सत्य और मिथ्या के ढांचे में अब कैद नहीं है। जैसे, बहुत दिन बाद मुलाकात होने पर किसी मित्र के प्रश्न के जवाब में कि ‘कैसे हो?’ का उत्तर ‘हाँ’ या ‘ना’ में नहीं दिया जा सकता है। अर्थात ‘सम्भावना’, ‘अनिवार्यता’ और ‘आकस्मिकता’ भी तार्किक चौखटे में शामिल होने लगे है। इलेक्ट्रोनिक्स उपकरणों के बारे में जैसे, ‘वाशिंग मशीन’ व्यवहार करने वाले जानते है कि सूती, ऊनी, रेशमी इत्यादि कपड़ों को ठंडे या गरम पानी में धोने के लिए अलग अलग बटन दबाने पड़ते हैं। तरह तरह के कपड़ों के लिए एक बटन से काम नहीं चलता है। उनकी समयसीमा भी अलग अलग निर्धारित होती है । कहने का तात्पर्य है हमें अपनी जरूरत के अनुसार मशीन को आपरेट करना पड़ता है ।
यद्यपि तर्क हमें कल्पना के द्वारा विपरीत सोचने की आदत भी डाल देता है, जैसे, "अगर ऐसा न होता...तो क्या होता” । जैसे ‘रावण ने यदि सीता का हरण नहीं किया होता’? ‘स्वर्ण मृग यदि सीता ने नहीं देखा होता’? ‘लक्ष्मण यदि राम को बचाने नहीं जाते’? यहाँ वक्ता एक विपरीत स्थिति पर विचार कर रहा है कि तब रामायण क्या लिखी जाती? हम सोच सकते है कि पानी से आग क्यों नहीं उत्पन्न होती, आग को खाने से पेट क्यों नहीं भरता इत्यादि ! ये सभी उदाहरण counterfactual तर्क है जो ख़ारिज हो जाते है, क्योंकि वास्तव में रामायण में ऐसा कुछ हुआ नहीं है, या घटनाएँ वैसी होती नहीं हैं जैसी हम सोचते है ।
इसके अतिरिक Reductio ad absurdum एक ऐसी तर्कशास्त्रीय विधि है जिसमें किसी प्रस्ताव को सच मानकर उससे एक असंभव परिणाम की निष्पत्ति करते हैं । जैसे वक्ता कहता है, "सभी लोग हमेशा झूठ बोलते हैं" ㄧहम वक्ता के प्रस्ताव को एक बार स्वीकार कर लेते हैं। वक्ता यदि झूठ नहीं बोलता है, तो ‘सभी लोग झूठ बोलते है’ ㅡइस वाक्य का अर्थ होगा वक्ता भी झूठ बोल रहा है। इस स्थिति में उसका वाक्य मिथ्या प्रमाणित हो जायेगा। लेकिन वक्ता यदि सच बोल रहा है, तो कम-से-कम एक व्यक्ति वक्ता) हैं, जो सच बोल रहा है अर्थात ‘सभी लोग झूठ बोलते है’ मूल प्रस्ताव में विरोधाभास उत्पन्न होगा, अतएव यह प्रस्ताव दोषपूर्ण है कि "सभी लोग हमेशा झूठ बोलते हैं"।


स्वीडिश कलाकार ऑस्कर रॉयटर्सवर्ड को "असंभव आकृतियों का जनक" कहा जाता है। उन्होंने ऐसी त्रि-आयामी आकृतियाँ बनाई जो देखने में वास्तविक लगती हैं, लेकिन वास्तुशास्त्रीय रूप से असंभव होती है। उनकी बनाई हुई आकृतियाँ हमें तर्क की सीमाओं और कल्पना की शक्ति के बीच ऐसे स्थान पर खड़ाकर देती है, जहाँ असंभव दुनिया भी बोधगम्य हो जाती है। वास्तविक दुनिया में हर वस्तु को गुरुत्वाकर्षण, संतुलन, और सामग्रियों की सीमाओं के साथ बनाया जाता है। लेकिन उनकी असंभव आकृतियाँ ज्यामिति और तर्क के नियमों को चुनौती देती हैं। युक्लिड ज्यामिति के समतल स्थान पर वे त्रि-तल आकृतियाँ बनाते है, जो वास्तव नहीं होती हैㅡ जैसे ‘’पेनरोज़ त्रिभुज’ वास्तव में एक-आयामी होने पर भी त्रि-आयामी लगता है जो दोनों के बीच की खाई को उजागर करती हैं । ऐसी आकृति जो एक साथ अस्तित्व में है और नहीं भी । Virtual Reality में गुरुत्व और भौतिक सीमाएँ नहीं होतीं हैं! आजकल डिजिटल आर्ट और एनिमेशन में इन्हें 3D कंप्यूटर ग्राफिक्स में भी दर्शाया जाता है। पर ये केवल दृश्य-भ्रम (optical illusion) होते हैं, जो असंभव आकृतियों के माध्यम से सत्य को टटोलते है और उन्हें विचारयोग्य बनाते है।
प्रसिद्ध तर्कशास्त्री ग्राहम प्रीस्ट (Graham Priest), की एक लघुकथा है कि Sylvan Box :A Short Story and Ten Morals" । यह एक Threshold Thought (विचार-प्रयोग) है, जो संभव और असंभव के द्वार को खोल देता है । यह एक ऐसा काल्पनिक बॉक्स है, जिसमें कोई ऐसी वस्तु होती है—जो एक ही समय में ‘है भी’ और ‘नहीं भी है’, जो dialetheism (यह वह सिद्धांत है जिसके अनुसार कोई भी बात एक साथ सच और झूठ दोनों हो सकती है) के सिद्धांत को उजागर करती है, अर्थात विरोधाभासों को सच प्रमाणित कर, व्यक्ति को कई स्तरों पर सोचने के लिए बाध्य करता है। वीणा का एक तार जो संगीत उत्पन्न नहीं करता है, वह "तार्किक असंगति" का प्रतीक है, लेकिन उसके विराम में भी संगीत के सुर को महसूस किया जा सकता है।
साधारण जिन्दगी में कोई चीज़ संभव तभी मानी जाती है, जब वह विरोधाभास को उत्पन्न नहीं करती है। जैसे यदि मै कमरे के अन्दर हूँ और दरवाजा बंद हैं तो उस पर गिरती चांदनी को देखा नहीं जा सकता है, लेकिन जैसे ही दरवाजा खोलती हूँ, चाँदनी दरवाजे पर न पड़ कर कमरे में फ़ैल जाती है। पुनः बाहर निकलकर दरवाजा बंद कर दिया जाए तो चांदनी को दरवाजे पर हूबहू देखा जा सकता है। लाईबनिज मानते है कि इस तरह, दो सत्य दृष्टि परिवर्तन के साथ संभाव्य जगत में रह सकते है, दोनों के क्षेत्र अलग अलग है।
असली वस्तुएँ व्यवहारिक उपयोग में आती हैं, और असंभव वस्तुएँ कला, गणित, और मानव अनुभूति के बीच एक अनोखा सेतु तैयार करती हैं । ये हमारे देखने के तरीक़े को चुनौती देती हैं — और अनदेखे आयामों में प्रवेश करने का निमंत्रण देती हैं। स्वीडन सरकार ने 1982 में "Impossible Triangle" को एक राष्ट्रीय प्रतीक बना कर डाक टिकट की मर्यादा तक दे डाली।
इस तरह पारंपरिक तार्किक दृष्टिकोणों को छोड़कर क्वांटम सिद्धांत जैसे परस्पर विरोधी विचारों और असंभव कल्पनाओं को स्वीकार करके हम पारंपरिक जैन तर्कशास्त्र के भीतर भी झाँकने की कोशिश कर सकते है । फ़िलहाल उसकी चर्चा आगे कभी । इस तरह विरोधाभास अराजकता की पहचान नहीं है, बल्कि जटिलता का द्योतक हैं, जहाँ विरोधी तत्व, बिना अर्थहीन हुए, एक साथ रह सकते हैं। सुर इस तरह लगता है कि प्लेन पकड़ना आज असंभव जरूर हो गया, पर भविष्य में विकल्पों की सम्भावना रास्ता संभव कर देंगी ।.
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डॉ मधु कपूर कलकत्ता के एक प्रतिष्ठित कॉलेज में दर्शनशास्त्र की प्रोफेसर रही हैं। दर्शनशास्त्र के अलावा साहित्य में उनकी विशेष रुचि रही है। उन्हीं के शब्दों में, "दार्शनिक उलझनों की गुत्थियों को साहित्य के रास्ते में तलाशती हूं।" डॉ कपूर ने हिंदी से बंगला में कुछ पुस्तकों का अनुवाद किया है और कुछ कविता संग्रह भी प्रकाशित हुए हैं। दर्शन पर उनके निबंधों का एक संग्रह Dice Doodle Droll Dance प्रकाशित हुआ है।