नृशंसता की छाया में करुणा की धारा अर्थात आनृशंसता
डॉ मधु कपूर के इस लेख को इंट्रोड्यूस करते समय हमें ‘आनृशंसता’ शब्द के बारे में कुछ दुविधा महसूस हो रही थी. होती भी कैसा ना? पहली बार जो सुना था. कुछ झिझकते हुए डॉ मधु कपूर को फोन लगाया तो उन्होंने इसका अर्थ और संदर्भ समझाया. उन्होंने बताया कि महाभारत में अहिंसा के विपरीत “आनृशंस्य परमो धर्मः” का उल्लेख एक बार नहीं कई बार किया गया हैं। इस लेख को पढ़कर शायद महात्मा गाँधी का यह कथन भी थोडा-बहुत समझ आया कि ‘कायरता से तो हिंसा भली’!
नृशंसता की छाया में करुणा की धारा अर्थात आनृशंसता
डॉ मधु कपूर
“अहिंसा परमो धर्मः” यह कथन चुनौती पूर्ण है, क्योंकि जीवन धारण करने के लिए मनुष्य को हिंसा करनी ही पड़ती है । यह एक ऐसी व्यवस्था है जिसमें साँस लेने, पेड़ से फूल तोड़ने और पैदल चलने से भी हिंसा होती है । महाभारत के एक कथा-प्रसंग में व्याध कहता है ㄧप्राणसंहार करके ही प्राण बचता है । लोकव्यवहार का जीवन तो हिंसा के बिना सोचा भी नहीं जा सकता है । जिसे हम तथाकथित अहिंसा कहते हैं, उसका सम्बन्ध निवृत्ति-मार्गी साधक से माना जाता है। मुकुंद लाठ अपनी पुस्तक ‘धर्मसंकट’ में कहते है: “अहिंसा का साधक-मुनि जीव-हत्या से विरत होता हुआ मनुष्यों का भी संग त्याग देता है, वन में स्वतः वृक्षों से गिरे फल खाता, ‘पर्णभुक’ हो जाता है और अंत में वायुभुक हो जाता है—हवा पर जीता है । अहिंसा उसे सर्वदा निःसंग कर देती है।”
अहिंसा, ‘हाथी के पैर की छाप की तरह एक ऐसी व्यापक धारणा है, जिसमें हर पशु का पैर समा जाता है’, अर्थात यह केवल हिंसा का विरोध नहीं, बल्कि सत्य, करुणा और आत्मसंयम आदि सभी सद्गुणों को अपने में समेट लेती है। अतः व्यावहारिक जीवन और निवृत्तिमार्गी साधकों के पथ एक नहीं हो सकते। इनकी पृथक पहचान होना आवश्यक हो जाता है। किसी गृहस्थ स्त्री ने किसी साधक से पूछा, “...और नहीं सहा जाता, गुरुदेव, क्या करूँ?” उन्होंने जवाब दिया । आध्यात्मिक दिशा में अग्रसर होने वाले संन्यासी के लिए धैर्य की कोई सीमा नहीं होती है, उसे तो सहना ही चाहिए । पर गृहस्थ जीवन में सहने की सीमा होती है । एक गृहस्थ व्यक्ति, लोगों के कटु व्यवहार को अक्सर सहन कर लेता है, पर बात जब हद से बाहर चली जाती है, तो वह अपना धैर्य छोड़, स्वयं कटु भाषा का प्रयोग करने लगता है । “इसलिए तुझे जो ठीक लगे, तू वही कर।”
महाभारत में अहिंसा के विपरीत “आनृशंस्य परमो धर्मः” का उल्लेख एक बार नहीं कई बार किया गया हैं । इसकी निष्ठा युधिष्ठिर के द्वारा यक्ष-प्रश्न के उत्तर में छिपी है । एक आख्यान में यक्ष के प्रश्न – ‘परम धर्म क्या है’? के उत्तर में युधिष्ठिर “आनृशंस्य परमो धर्मः” कहते हैं । युधिष्ठिर के उत्तर से प्रसन्न होकर यक्ष कहता है ‘...चलो अपने किसी एक भाई के प्राण वापस ले लो’। युधिष्ठिर माद्री-पुत्र नकुल को जीवित करा लेते हैं। यक्ष कहता है ‘वह तुम्हारे किस काम आयेगा? वह तो तुम्हारा सगा भाई भी नहीं है।’ लेकिन युधिष्ठिर का मानना है कि उन्होंने कुंती को वचन दिया था माद्री-पुत्रों की रक्षा करने की ㄧ उनका कथन इस सन्दर्भ में आनृशंस की ओर संकेत करता है।
सामने खड़े सभी आत्मीय स्वजनों को देखकर अर्जुन का संशय भी स्पष्ट है कि युद्ध करूँ या न करूँ? उन्हें मारना अर्जुन को नीति-विरुद्ध लग रहा है । अर्जुन की नैतिक दुविधा को अनदेखा भी नहीं किया जा सकता है। ऐसी परिस्थिति में कृष्ण अर्जुन को कर्त्तव्यविमुख न कर, न्याय की रक्षा हेतु व्यवहारिक भूमि पर खड़ा कर युद्ध के लिए प्रेरित करते हैं, जो आनृशंस का ही स्वरूप है। सामाजिक व्यवस्था को सुचारु रूप से बनाए रखने के लिए हिंसा को नकारना असंभव है।
आनृशंस अहिंसा के समकक्ष अर्थात “नृशंसता” के विपरीत ही माना जाता है। लेकिन अहिंसा जहाँ सम्पूर्ण रूप से हिंसा का निषेध करती है, वहीँ आनृशंसता हिंसा का निषेध नहीं करती है, उसमें करुणा, सहानुभूति की गहरी संवेदना भी शामिल करती है, जिसे ‘अनुक्रोश’ कहा जाता है । माएँ अक्सर बच्चों के हित को ध्यान में रखकर उन्हें मारती-पीटती है, पर तत्पश्चात वे उनके दुःख से स्वयं भी कराह उठती है । जिस तरह युधिष्ठिर युद्ध में विजय हासिल करके भी आत्मग्लानि और आत्मधिक्कार की ज्वाला में जलते है।
आनृशंस्य शुद्ध अहिंसा की बात नहीं करता, बल्कि इसके विपरीत ऐसे धर्म की बात करता है, जो जीवन के ठोस धरातल पर खड़ा होकर व्यक्ति के आचरण को नियंत्रित करता है और प्रयोजनानुसार हिंसा को स्वीकृति प्रदान करता है । यदि कोई व्यक्ति करुणा से प्रेरित होकर निर्दोष की रक्षा के लिए हिंसा करता है, तो हिंसक होने पर भी उसका कर्म आनृशंस से उद्बुद्ध कहा जाएगा । लेकिन यदि वही कार्य क्रोध, लोभ या प्रतिशोध से किया जाए, तो वह आनृशंस नहीं कहा जाएगा । द्रौपदी के वस्त्रहरण की घटना नृशंसता का चरम था, जो ‘अनुक्रोश’ यानी सहानुभूति और करुणा से विहीन था, क्योंकि इस कर्म में अनुताप का लेश मात्र भी नहीं था। धृतराष्ट्र के पुत्र-स्नेह ने पूरे कौरव वंश का नाश होने दिया, वहीँ गांधारी के पुत्र-शोक ने पूरे यदुवंश को अभिशाप दे डाला । आनृशंसता में हिंसा के प्रति अनिच्छा जरूर होती है, लेकिन उसमें हिंसा का अभाव नहीं है । कोई व्यक्ति अहिंसक हो सकता है, लेकिन यदि उसमें करुणा नहीं है, तो वह आनृशंस नहीं कहा जाएगा। शांति पर्व में भीष्म “आनृशंसता” को एक राजधर्म और नैतिक गुण के साथ एक जीवन दृष्टि के रूप में स्वीकार करते है, जो हिंसा और करुणा का सम्मिलितरूप है।
अर्जुन की तरह आज हर व्यक्ति रोज़मर्रा की ज़िंदगी में कर्तव्य और सत्य के टकराव से जूझ रहा है । समस्या है ㅡ क्या एक पुलिस अधिकारी को अपने भाई के अपराध की रिपोर्ट करनी चाहिए? एक डॉक्टर को अपने मरीज की घातक बीमारी का सच क्या उसे बताना चाहिए? एक वकील को अपने अपराधी मुवक्किल का क्या बचाव करना चाहिए या उसके अपराध का पर्दाफाश कर, केस और प्रतिष्ठा को दांव पर लगा देना चाहिए? एक पत्रकार को किसी संवेदनशील मुद्दे की रिपोर्ट प्रकाशित कर देनी चाहिए या लोगों को खतरे से बचाने के लिए तथ्यों को सेंसर कर देना चाहिए? एक मित्र को अपने मित्र के विश्वासघात को माफ करना चाहिए? दृष्टान्त स्वरूप एक निरपराधी का पीछा करते हुए कुछ दस्यु कौशिक मुनि की कुटी में आकर निरपराधी के बारे में पूछने पर वे सच-सच बतला देते हैं कि अपराधी पास ही झाड़ी में छुपा है, क्योंकि उन्होंने सत्य बोलने का प्रण लिया था। फलस्वरूप दस्युओं ने उसे पकड़ लिया । निरपराध की मृत्यु का दायित्व कौशिक मुनि को नरक जाकर भोगना पड़ा । प्रश्न है क्या मुनि ने ठीक किया सत्य वचन कह कर? इस तरह सत्य और अहिंसा एक दूसरे के विरुद्ध खड़े हो जाते है।
दुविधा उपस्थित होती है तब, जब व्यक्ति निश्चित नहीं कर पाता है कि किसी अपराधी को दंड देने से उसके निरपराध परिवारजन भी दण्डित हो जाते हैं, और यदि अपराधी को दंड न दिया जाए, तो अपराधी बार-बार अपराध करता है । चुनाव कठिन है, पर व्यक्ति को परिस्थितियों के अनुकूल न्याय रक्षा के लिए हिंसा करने को विवश होना पड़ता है। कर्तव्य यदि व्यष्टि का हो, तो संकट उतना गहरा नहीं होता है, लेकिन कर्तव्य जब समष्टि से जुड़ जाता है, तो समस्या गहरी हो जाती है। उदाहरण के लिए जब सहज प्रवाह से यातायात व्यवस्था चलती रहती है, तो ट्रैफिक में कोई समस्या उत्पन्न नहीं होती है, किन्तु यदि किसी दुर्घटना, जुलूस (कोलकता में जो हरदम देखा जा सकता है) आदि की वजह से ट्रैफिक में गतिरोध उत्पन्न हो जाए, तो उस प्रवाह को किसी अ-नियमित व्यवस्था से नियमित किया जाता है। जैसे अस्वस्थ शरीर को औषधि, खान-पान और विश्राम से नियंत्रित करके पुनः उसे स्वस्थ नियमित दिनचर्या में बहाल किया जाता है ।
इस तरह आनृशंस्य अहिंसा तथा सार्वजनीन हित का बेजोड़ संगम है। आनृशंस्य अहिंसा का रूप है भी और नहीं भी। तात्पर्य है कि आनृशंस्य कर्त्तव्य पथ का कोई निश्चित निर्देश नहीं करता है या यूँ कहे कि कर्त्तव्य मार्ग कोई पकी-पकाई सिद्ध वस्तु नहीं है, इसे साधना पड़ता है । यह वह साध्यतत्त्व है, जिसे अपनी रूचि, प्रयोजन और स्वाद के अनुसार पकाना पड़ता है । अर्थात यह निर्णय व्यक्ति को खुद लेना पड़ता है कि क्या करना उचित है?
कृष्ण न केवल अर्जुन की दुविधा का समाधान करते हैं, बल्कि यह भी बतलाते हैं कि सत्य और कर्तव्य के बीच विरोधाभास को कैसे संतुलित किया जाए? उन्होंने द्रोण को छल से मरवाने का उपक्रम किया, कर्ण के रथ का पहिया जब कीचड़ में फँस गया तो नियमों के विरुद्ध जाकर अर्जुन को कर्ण का वध करने के लिए प्रेरित किया। अर्जुन जब युधिष्ठिर को मारने के लिए उद्यत हुए, तो कृष्ण ने ‘सिर्फ प्रतिज्ञा रक्षा के लिए ज्येष्ठ भाई को मारना उचित नहीं है’ कह कर उन्हें ऐसा करने से रोका। स्थिति का लाभ उठाकर भगवान कृष्ण ने कर्ण को युद्ध से विरत करने के लिए उसे उसकी असली पहचान भी बतलाई । इस तरह छोटी छोटी घटनाएँ साबित करती है कि संशयग्रस्त अवस्था में कर्तव्य निर्णय करना दुसाध्य कार्य है, जिसका कोई सहज सूत्र उपलब्ध नहीं है।
कर्तव्य-पथ का निर्धारण कमोबेश लीक से हटकर पगडंडियाँ बनाता चलता है और मनुष्य अपनी पहचान खोजकर संकट से उबरने का प्रयास करता है। ऐसे कर्तव्य-कर्म को अक्सर अपवाद या आपद धर्म की संज्ञा भी दी जाती है। यह पहचान प्रत्येक व्यक्ति की निजी प्रज्ञा या वासना-निष्ठ-स्वाभाविक प्रवृत्ति होती है। इस प्रवृत्ति को समझने का उपाय है, मनुष्य की गतिविधियों को अत्यन्त निकट से परखना। उदाहरण के लिए किसी व्यक्ति को किसी समस्या के सम्बन्ध में उचित सलाह देने के बावजूद भी वह व्यक्ति वही करता है जो उसकी स्वाभाविक प्रवृत्ति चाहती है। उस्ताद अल्लाउद्दीन खां संगीत सीखना चाहते थे, उन्होंने दस बरस की उम्र में घर छोड़ दिया और तकलीफों का सामना करते हुए अपनी मंजिल तक पहुंचे। दूसरी ओर एक शिक्षित व्यक्ति अच्छा परिवेश पाने के बावजूद अपराध कार्यों में लिप्त हो जाता है।
ऐसा क्यों होता है ㅡइसका उचित उत्तर पाना अलभ्य है।
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डॉ मधु कपूर कलकत्ता के एक प्रतिष्ठित कॉलेज में दर्शनशास्त्र की प्रोफेसर रही हैं। दर्शनशास्त्र के अलावा साहित्य में उनकी विशेष रुचि रही है। उन्हीं के शब्दों में, "दार्शनिक उलझनों की गुत्थियों को साहित्य के रास्ते में तलाशती हूं।" डॉ कपूर ने हिंदी से बंगला में कुछ पुस्तकों का अनुवाद किया है और कुछ कविता संग्रह भी प्रकाशित हुए हैं। दर्शन पर उनके निबंधों का एक संग्रह Dice Doodle Droll Dance प्रकाशित हुआ है।