शहरे खामोशां में जिंदगी की चंद बातें
जय गोपाल कुमरा
85-वर्षीय जय गोपाल कुमरा आज जब टेलीविज़न पर प्रवासी मजदूरों की बदहाली देखते हैं तो व्यथित हो उठते हैं। उन्होंने किशोरावस्था में देश का विभाजन देखा था और उस वक़्त भी लाखों लोग इसी तरह सड़कों पर उतरे हुए थे लेकिन कुमरा जी को आज के हालात बदतर लग रहे हैं। पार्थिव कुमार ने उनसे हुई बातचीत को लगभग उन्हीं के शब्दों में यहाँ उतारा है।
उम्र के पिचासी साल गुजार दिए। मगर इंसानियत के लिये ऐसा औखा (मुश्किल) वक्त पहले कभी नहीं देखा जैसा अब देख रहे हैं। तब भी नहीं जब मुल्क तकसीम हुआ था। लाखों लाचार और कमनसीब मर्दों, औरतों, बुजुर्गों और बच्चों के बदहवास जत्थे चले जाते हैं - सिर पर उस छोटी सी पोटली को उठाये जिसे गृहस्थी कहते हैं। पीठ पर पिछली पीढ़ी को लादे और गोद में भविष्य को संभाले। बिल्कुल वैसे ही जैसे सन सैंतालीस में उस पार से इधर आये थे। मगर एक फर्क है। तब किसी ने गले लगा कर छलकती आंखों से विदा किया था। थैली में चुपके से घी में चुपड़ी रोटियां और गुड़ की डली डाल दी थी रस्ते के वास्ते। लेकिन इस दफा किसी ने दुनियादारी में भी नहीं कहा कि लौट आना, तेरा इंतजार रहेगा। तब आंखों में पानी था, अब रेत भरी है।
बच्चों ने कहा, बच के रहना। कोविड से बुजुर्गों को सबसे ज्यादा खतरा है। लिहाज़ा इन दिनों घर से बाहर नहीं निकलता। अखबार वाले ने भी आना बंद कर रखा है। समय काटने के लिये टेलीविजन खोलता हूं तो शोर से जी घबराने लगता है। एक छोटी सी लड़की स्क्रीन के इस से उस छोर तक गुजर जाती है। उसके पांवों में फफोले हैं जिनसे खून रिस रहा है। जमीन पर एक आड़ी-तिरछी, लाल रेखा बनती जाती है। गोया धूल वाली कच्ची सड़क पर कोई बैलगाड़ी अपने पहियों के निशान छोड़ती चली जा रही हो।
बहत्तर बरस पहले देश के सीने पर एक लकीर खींची गयी थी। अब हमने सैंकड़ों सरहदें खड़ी कर दी हैं। एक सूबे से दूसरे में घुसने की इजाजत नहीं है। दूसरी तरफ लॉकडाउन ने जिनके मुंह का निवाला छीन लिया वो अपने घरों को लौटने के लिये बेचैन तो होंगे ही। हुक्मउदूली करने वालों पर अपनी ताकत आजमाने के लिये मजबूत लोहे की, पहियों वाली पीली बाड़ों के पीछे पुलिस मुस्तैद खड़ी है। ये भी सुना कि पुलिस की निगाहों से बचने के लिये लोग रात के अंधेरे में कमर में ट्यूब बांध कर जमना में छलांग लगा रहे हैं।
ऐसे हालात देखता हूँ तो चौबीसों घंटे एक अजीब सी कशमकश रहती है। आंखें बंद करो तो नींद नहीं आती। पलकों के नीचे बड़े खौफनाक से मंज़र देर रात आये मेहमान की तरह ठहर गये हैं। सड़क के बीचों-बीच एक लाश पड़ी है। कई दिनों तक खाना नहीं मिलने की वजह से पेट और पीठ एक हो रही है उसकी। अभी-अभी खुले आसमान के नीचे एक नन्हीं सी जान ने आंखें खोली हैं। खून से लथपथ अपनी साड़ी को किसी तरह संभालती जच्चा उसे उठाये डगमगाती हुई अपने को जैसे घसीटती हुई आगे बढ़ती जाती है।
दिन और रात के नीम सन्नाटे एक उदास फिल्म की तरह हैं। पैरों से लाचार एक नौजवान आखिरी दम तक अपनी हाथ गाड़ी को धकेल ले जाने की जिद पर अड़ा है। बूढ़े बाप को कैरियर पर बिठाये एक कमजोर सी लड़की साइकिल से सैंकड़ों मील का फासला तय कर अपने गांव पहुंचने की जद्दोजहद में है। एक औरत ने कंधे पर एक बतख और एक पिल्ले को उठा रखा है। पल भर में पराए हो गये शहर में कहां और किसके सहारे छोड़ आती इन बेज़ुबानों को।
जाने कितने ही मज़लूम भूख, थकान और बीमारी से सफर के बीच में ही दम तोड़ गये। सड़क और रेल हादसों में भी सैंकड़ों की जानें गयीं। फिर भी इंसान चींटियों की तरह मुसलसल भागा जाता है। रोटी की तलाश में गांव से शहर आये थे। अब उसी रोटी ने शहर से गांव की तरफ भागने को मजबूर कर दिया। बूढ़े बापू के मोतिये का इलाज, बीवी की साड़ी और बच्चे को बाबू बनाने का सपना अधूरा रह गया। रास्ते में पड़ने वाले हर मंदिर के बंद दरवाज़ों के सामने हाथ जोड़ते जाते हैं कि बस, किसी तरह ज़िंदा घर पहुंच जायें।
हमारा परिवार आज़ादी से पांच बरस पहले ही लाहौर के मुगलपुरा से आकर दिल्ली में बस गया था। पिता सरकारी मुलाज़िम थे। बंटवारे के वक्त अजमेरी गेट के नजदीक थॉमसन रोड पर सरकारी क्वार्टर में रहते थे हम। स्कूल कश्मीरी गेट के इलाके में था। नया बाजार, खारी बावली और कौड़िया पुल के रास्ते पैदल ही जाना होता था। सरहद पार से रिफ्यूजी पहुंचना शुरू हुए तो इलाके में सरगर्मी बढ़ गयी। दिल्ली वालों ने अपने दिल और दरवाजे दोनों ही अजनबियों तक के लिये खोल दिये। जिन्हें कैंपों में जगह नहीं मिली उन्हें अपने घरों में पनाह दी। रोज़गार जमाने के लिये अपनी दुकानों की दहलीज पर ही जगह भी दे दी।
अभी आंखें खोली ही थीं आजाद हिंदुस्तान ने। घुटनों के बल रेंगना तक नहीं आया था। सरकार का खजाना पेंदे तक खाली था। तिस पर कैसा खूनखराबा मचा था समूचे शहर में। डेढ़ महीनों तक तो कर्फ़्यू ही लगा रहा था। मगर हुकूमत और अवाम दोनों में ईमानदारी और हौसले की कमी नहीं थी। सब मिल कर रिफ्यूजियों की सेवा और उनके लिये ज़रूरी सामान के बंदोबस्त में जुट गये। खाने पीने की चीजों, कपड़ों, जूते-चप्पलों और बीमारों के लिये दवाओं के इंतजाम में कोई कसर नहीं छोड़ी। नेताओं ने भी खुद को अपने बंगलों में कैद नहीं रखा। बाहर निकल कर राहत के काम में लगे सरकारी मुलाज़िमों और बाकी नौजवानों की हौसला अफजाई करते रहे। पंडित नेहरू अमन की बहाली के लिये चांदनी चौक और उसके आसपास के कूचों-कटरों में गश्त कर रहे थे। सुशीला नायर और अनीस किदवई तो कैंपों में लगभग रोज़ाना ही दिखाई दे जाती थीं।
दिल और जिस्म के घावों पर मरहम रख दिया गया तो रिफ्यूजियों को सुकून मिला। जो पीछे छोड़ आये उनकी यादें और जो ज़ख्म मिले उनका दर्द मन के किसी कोने में दफ्न हो गया। नयी ज़मीन पर नये सपनों ने आंखें खोलीं और जिंदगी अपनी राह चल पड़ी। कुछ ही अरसे में रिफ्यूजी दिल्ली की तहज़ीब में ऐसे रच गये जैसे दरिया जमना में शक्कर घोल दी गयी हो।
लेकिन अब सिक्का बदल चुका है। गांधी और नेहरू का देश नहीं रहा यह। सियासत शतरंज की बिसात हो गयी है। शातिर एक दूसरे को मात देने के लिये मोहरे चल रहे हैं। जो नाखुदा था उसी ने किश्ती डुबोने का बीड़ा उठा लिया है। जो बदहवासी में भागते बदनसीब मजदूरों को दो निवाले और ओक भर पानी देकर मदद करना चाहते हैं उन्हें ही कैद में डाला जा रहा है। मजूर जान की बाजी लगा कर ट्रकों और ट्रैक्टरों के पीछे इंतहाई खतरनाक ढंग से लटके चले जाते हैं। लेकिन कोई इन्हें ढोने के लिये बसों की पेशकश करे तो उससे इनके मामून होने का सनद मांगा जाता है।
लाखों को जिंदा रखने के लिये करोड़ों को मौत के मुंह में धकेल देने का रिवाज नया चला है। जिन्होंने हमारे मकानों की बुनियाद रखी उनके लिये हमदर्दी के दो लफ्ज़ भी नहीं हैं किसी के पास। अपनों से मिलना तक मुनासिब नहीं रहा तो उनकी क्या सोचें जिन्हें कभी अपना समझा ही नहीं। दौलतमंदों ने तो ज़रूरत के तमाम सामान बटोर कर खुद को अपने घरों में समेट लिया है। दरवाज़ों के पीछे से ऊंची आवाज़ में बजते संगीत की आवाज़ें और देसी घी में छनते पकवानों की खुशबू आती है। राह चलते मेहनतकशों की अंतड़ियों में एक बगूला सा उठता है मगर सांकल किसकी खड़काएं? और उनका ये इम्तिहान जाने कब तक ऐसे ही चलता रहेगा!
रोते हैं यहां, हंस के मुलाकातें नहीं करते
ये शहरे खामोशां है, यहां बातें नहीं करते।
****