सिनेमा ऐसे देखो
राजेंद्र भट्ट रागदिल्ली परिवार को अपना ही मानते हैं. आज पाठकों को यह बताने का भी मन है कि राजेन्द्र भट्ट इस वेबपत्रिका के शुरू होने के समय से इससे पूरी तरह जुड़ना चाहते थे और हमारे साथ सम्पादकीय ज़िम्मेवारी भी निभाना चाहते थे किन्तु उनके पारिवारिक एवं प्रोफेशनल उत्तरदायित्वों के चलते रागदिल्ली परिवार अभी भी उनके सक्रिय सहयोग की प्रतीक्षा में है. बहरहाल, तब तक वह इसी तरह अपने लेख एवं विश्लेषण नियमित रूप से भेजते रहें, हम आभारी रहेंगे. यह सम्पादकीय वक्तव्य कुछ भटक गया - हम बता रहे थे कि राजेन्द्र इस वेबपत्रिका से जुड़े लोगों को अपने परिवार की तरह ही मानते हैं और यदि वह कोई अच्छी 'चीज़' पढ़ते हैं तो उनका मन होता है कि वह पाठकों के साथ भी शेयर करें. अब देखिये, इस बार वह सिनेमा के तकनीकी पक्षों पर पढ़ी एफ़टीटीआई की पत्रिका के लेखों को आपके सामने ला रहे हैं.
सिनेमा ऐसे देखो
राजेंद्र भट्ट
संस्कृत की उक्ति है - ‘काव्येषु नाटकं रम्यं।’ साहित्य की सभी विधाओं में भाव-जगत की सबसे अधिक विविधता, विस्तार, गहनता और ‘इंटेन्स’ अनुभव नाटक में मिलते हैं। एक सशक्त नाटक सभी विधाओं का अबाध, ‘सीमलेस’ संश्लेषण है, ‘कैलाइडोस्कोपिक विजन’ है। कालजयी नाटकों में कथा की दृष्टि, गीत की भाव-तीव्रता, उपन्यास के विस्तार और महाकाव्य के गहरे और देर तक रहने वाले भाव-बोध के ‘शेड्स’ - एक समन्वित, समृद्ध प्रभाव छोड़ते हैं। साथ ही, नाटक की मंच-सज्जा के ‘प्रौप्स’ में बढ़ई का भी काम है, कारीगर का भी; पर्दे-सजावट वाले और प्रकाश-संयोजन के लिए इलेक्ट्रिसियन का भी। इतना ही नहीं, नाटक दूसरी ललित कलाओं - संगीत से, चित्रकला से, स्थापत्य- मूर्तिकला से भी ग्रहण करता है और सहृदय दर्शक अधिक भाव-समृद्ध हो कर लौटता है। तभी तो शेक्सपियर कह गए हैं – ‘यह दुनिया बस एक रंगमंच है जहां स्त्री-पुरुष (मंच पर) आते-जाते रहते हैं; एक इंसान (वक्त-वक्त पर) कई पात्रों का अभिनय करता है....”
लेकिन संस्कृत की उक्ति जब लिखी गई, तब सिनेमा नहीं आया था -और आज बात सिनेमा की करनी है।
अच्छा सिनेमा भी ऐसी ही ‘इंटेंस’ कला-विधा है जो सवा सौ साल पहले, नाटक के साथ टैक्नोलॉजी के मेल से शुरू हुई और लगातार इसकी टैक्नोलॉजी और कला-प्रयोगों का विस्तार होता रहा है। यों पक्के नाटक-रसिक कह सकते हैं कि नाटक में, सिनेमा से कहीं गहरा भाव-प्रभाव होता है क्योंकि यहाँ दर्शक के समक्ष सीधी उपस्थिति, उससे सीधा संवाद होता है। कल्पनाशील प्रस्तुति तथा मंच-संयोजन के समग्र प्रभाव और अभिनय की भाव-प्रवणता तथा ओजस्विता के जरिए नाटककार, निर्देशक और कलाकार दर्शकों से सीधे और गहरे ‘कनेक्ट’ करते हैं; दर्शक को, सिनेमा से कहीं अधिक गहराई तक, समृद्ध-झंकृत कर सकते हैं।
लेकिन नाटक के इस ‘नोस्टेल्जिया’ से हट कर देखें तो सिनेमा अब वर्तमान और भविष्य की विधा है – नाटक का ही, तकनीक से समृद्ध कलात्मक विस्तार है। यहाँ भी ‘कैलाइडोस्कोपिक’ विविधता है – साहित्य है, गीत-संगीत है, सिनेमा का ‘आर्किटेक्चर’ है, फोटोग्राफी-वीडिओग्राफी का संयोजन- सिनेमेटोग्राफी है, ध्वनि-प्रकाश संयोजन है – लेखक-निर्देशक की ‘दृष्टि’ है - और इन सब से मिल कर एक समग्र प्रभाव है जो, फ़िल्म बनाने वाले की प्रतिभा और नीयत के हिसाब से, सतही-सपाट-कुत्सित से लेकर गहन-गंभीर-मानवीय हो सकता है।
लेकिन इतनी कलाओं और शिल्पों के संयोजन वाले सिनेमा का सही रसास्वादन यानी ‘एप्रिसिएशन’ तभी हो सकता है जब इसके निर्माण के तमाम भागीदार – लेखक-पटकथाकार, गीत-संगीतकार, निर्माता-निर्देशक, सिनेमेटोग्राफर, कॉस्टयूम डिजाइनर से इलेक्ट्रिसियन तक – इसकी एकरूप ‘भाषा’ और ‘क्राफ्ट’ को जानते-समझते हों, सिद्धहस्त और भाव-समृद्ध हों, और उसी कौशल-समझ से फिल्म का अपना हिस्सा बुनते-गढ़ते हों। साथ ही, सिनेमा की कड़ी के आखिरी, लेकिन सबसे महत्वपूर्ण छोर पर स्थित – इसके दर्शक भी संवाद की इस ‘भाषा’ और ‘क्राफ्ट’ को समझ सकें – उसका ‘रसास्वादन’ कर सकें। तभी सिनेमा को बनाने और देखे जाने की पूरी सार्थकता हो सकती है।
अपने नव-स्वतंत्र देश का यह सौभाग्य रहा कि लोकतन्त्र को पुख्ता बनाने वाली संस्थाओं का हम निर्माण कर सके – जन-जन को रोटी-कपड़ा-मकान-स्वास्थ्य-शिक्षा जुटाने वाली संस्थाएं, उद्योगों तथा ज्ञान-विज्ञान की संस्थाएं, और हृदय तथा व्यक्तित्व को विराटता-समग्रता देने वाली सामाजिक-सांस्कृतिक संस्थाएं। हमने इन संस्थाओं को रोपा, उन्हें बड़े कद के विद्वानों-विशेषज्ञों की छांव में निर्बाध पनपने दिया। तभी तो ये संस्थान, सरकार के प्रश्रय के बावजूद, सरकारी सीमाओं के ‘बोनसाई’ नहीं, छतनार वट-वृक्ष बने, उनकी वैश्विक पहचान बनी। पुणे(महाराष्ट्र) का भारतीय फिल्म और टेलीविज़न संस्थान (Film and Television Institute of India (FTII) ऐसा ही एक छतनार वटवृक्ष है जिसका पौधा 1960 में रोपा गया था।
अब भी अक्सर ऐसे सुखद संयोग हो जाते हैं कि कला-भाषा-संस्कृति के सरकारी संस्थानों को ऐसे मुखिया अफसर मिल जाते हैं जिनमें सघन संवेदना, सहृदयता और समझ होती है। 2021 में संस्थान के निदेशक श्री भूपेन्द्र कैंथोला की पारखी नज़र गई संस्थान की अंग्रेजी छमाही पत्रिका ‘लेंसाइट (Lensight)’ पर। यह संस्थान की फ़ैकल्टी और विद्यार्थियों की पत्रिका है – यानी सिनेमा ‘सीखे हुए’ और ‘विधिवत सीखते हुए’ प्रोफेसनल्स की, सिनेमा के विविध पक्षों की बारीकियाँ बताने वाले, सिनेमा-आस्वाद को बढ़ाने वाले लेखों से समृद्ध प्रतिष्ठित पत्रिका। भूपेन्द्र जी को लगा कि तकनीकी और विशेषज्ञता के विविध क्षेत्रों में श्रेष्ठ सामग्री से वंचित हिन्दी पाठक ( और इस मामले में, सिनेमा का विद्यार्थी और अनुरागी दर्शक) कम से कम इस क्षेत्र में तो अभागा न रहे। उन्होंने ‘लेंसाइट’ के पुराने अंकों के हिन्दी रूपांतर प्रस्तुत करने का मन बनाया।
कभी-कभी नेक इरादों के साथ अच्छे संयोग जुड़ जाते हैं। भूपेन्द्र जी को साथ मिल गया श्री मनमोहन चड्डा का – संस्थान के पूर्व-अधिकारी और सिनेमा लेखन-अनुसंधान के अग्रणी हस्ताक्षर। उनकी पुस्तक ‘हिन्दी सिनेमा का इतिहास’ सर्वोत्तम सिनेमा-लेखन का राष्ट्रीय पुरस्कार पा चुकी है। सिनेमा पर उनकी अनेक अन्य पुस्तकें हैं।
सिनेमा के विविध तकनीकी-कलात्मक पक्षों पर शिखर-विशेषज्ञों के अंग्रेजी लेखों को हिन्दी में प्रस्तुत करना बड़ी चुनौती है – खास कर सरकारी सीमाओं में बंधे किसी विभाग के लिए। यहाँ ढर्रे का सरकारी अनुवाद नहीं चाहिए – ऐसा होने से काम महज सूची में तो दर्ज हो जाएगा। लेकिन बस, बेरंग, बेजान, उबाऊ शब्दों का ढेर मिल सकेगा। सिनेमा की तो अपनी भाषा, अपनी लय, अपनी शैली और अपना मुहावरा (ईडियम) है। सिनेमा के ‘आस्वाद’ और ‘संवेदन’ की पहचान, साथ ही अंग्रेजी और हिन्दी साहित्य की गहरी, अनुरागी समझ तथा कलात्मक दृष्टि - चड्डा जी में इन सभी पक्षों का मनोरम संयोग है। (हालांकि अगर आप उनसे मिलें, बात करें तो उनके कद की थाह लेने में उनकी अतिशय विनम्रता, बल्कि ‘सेल्फ-इफेसमेंट’ की प्रवृत्ति आड़े आ जाती है।)
इरादा नेक था, नेतृत्व सहृदय, समझदार; और सहयोगी सिनेमा के समग्र विद्वान – काम आगे बढ़ा। अनुवादक ढूँढे गए। मैं भी उनमें एक था – अपने बारे में तो यही कह सकता हूँ कि सिनेमा से अनुराग था, पर कोई सनद-डिग्री इस काम की नहीं थी। बस, ज़िम्मेदारी का बड़ा बोध था कि पत्रिका, संस्थान और लेखक जितने बड़े हैं, उनकी प्रतिष्ठा रह जाए। ‘अनुवाद’ न लगे, बल्कि भाव, भाषा, लय और ईडियम ऐसा बने कि हिन्दी का सहृदय दर्शक और हिन्दी माध्यम से सिनेमा को समझ रहा विद्यार्थी इस विधा का ‘आस्वाद’ ले सके, बहुआयामी समझ से समृद्ध हो सके। चड्डा जी की अंगुली पकड़ कर चलने से मेरा काम तो आसान और मनपसंद हो गया।
तो ‘लेंसाइट’ (हिन्दी) का पहला जुलाई-दिसंबर 2021 का अंक देर-सबेर निकल ही गया। इसमें आठ लेख हैं। मेरे अलावा अन्य अनुवादक हैं: सुश्री सुनीता डागा और श्री अशोक पांडे।
इस अंक के सात लेख 1990 के दशक में ‘लेंसाइट’ (अंगेजी) के अंकों में प्रकाशित हुए। इन सभी के लेखक एफ़टीटीआई के विद्यार्थी और फिर संस्थान में सिनेमा अनुसंधान, अध्यापन, सिनेमेटोग्राफी और लेंसाइट पत्रिका के सम्पादन से जुड़े रहे हैं। भारतीय सिनेमा के जिन शिखर-पुरुषों पर ये लेख हैं, उनमें कुछ ने तो अपनी सिने-यात्रा देश की आज़ादी के दशक या उससे भी पहले शुरू की थी और इन लेखों में उन यात्राओं-अनुभवों-प्रयोगों का बहुत बारीकी-दिलचस्पी से विवरण दिया गया है। ये सभी शिखर-व्यक्तित्व सिनेमा के भाव और तकनीक – दोनों से जमीनी तौर पर जुड़े रहे, प्रयोग करते रहे। इस परिप्रेक्ष्य में, यह अंक बीसवीं सदी के उत्तरार्ध में भारतीय सिनेमा-यात्रा का अनूठा ‘डोक्यूमेंटेशन’ भी है, इतिहास-स्रोत है।
दूसरे, यहाँ सिने-विशेषज्ञों के प्रोफेसनल अनुभव सिनेमा को समर्पित गंभीर पत्रिका में भावी विशेषज्ञों-प्रोफेसनल्स के लिए प्रस्तुत किए गए हैं। इसलिए ये फिल्मी हस्तियों की सामान्य प्रशस्ति-वाचक जीवनियाँ नहीं, बल्कि बीसवीं सदी के उत्तरार्ध में, उपलब्ध प्रौद्योगिकियों के बरक्स, सिनेमा-कर्मियों के उन नूतन प्रयोगों की रोचक गाथाएँ भी हैं जिनके जरिए उन्होंने, अपने समय और प्रविधि की सीमाओं में, सिनेमा के जरिए नए-नए तरीकों से सहृदय दर्शकों तक जटिल और सूक्ष्म भावों की इंद्र्धनुषी-सरगमी अभिव्यक्ति संभव बनाई। चूंकि इन लेखों के लेखक उन फिल्मी हस्तियों से सुपरिचित भी थे, इसलिए इन लेखों में समृद्ध, आत्मीय संवाद शैली भी है। हिन्दी अनुवादों में इन गहनतम अनुभूतियों को, सिनेमा की भाषा में, प्रवाहपूर्ण तरीके से सँजोने का प्रयास किया गया है। इसलिए हिन्दी माध्यम वाले सिनेमा के विद्यार्थी और सिनेमा का ‘आस्वाद’ करने के इच्छुक दर्शकों को ये लेख एक विशिष्ट ‘दृष्टि’ भी देते हैं कि - ‘एक समग्र दृश्य-श्रव्य अनुभव के लिए सिनेमा को इधर से और यों देखो।‘
पहला लेख है फाल्के पुरस्कार से सम्मानित 1930 के दशक से 1980 के दशक तक सक्रिय अभिनेता पैडी जयराज पर। इसे लिखा है एफ़टीआईआई के विद्यार्थी और फिर फिल्म सम्पादन विभाग के प्रमुख रहे फिल्म-मर्मज्ञ योगेश माथुर ने। जयराज मूक फिल्मों के दौर में भी सक्रिय रहे। अभिनेता के तौर पर नाम कमाने के अलावा, उन्होंने फिल्म निर्देशन, सम्पादन में सहायक और कैमरामैन के काम भी संभाले। इस लेख में, हिन्दी सिनेमा के शुरूआती दशकों में, उस जमाने की प्रविधि और उपकरणों के साथ फिल्म-कर्मियों को क्या-क्या सीखना पड़ता था, कैसे प्रयोग करने होते थे और कैसे प्रभाव और सम्प्रेषण के लक्ष्य पूरे किए जाते थे – इन सब का दिलचस्प विवरण है। अपने जमाने के मूवी कैमरा को बिना ‘जर्क’ के चलाने का हुनर जयराज ने दर्जी की मशीन से सीखा। मूक फिल्मों के बाद ‘टॉकीज़’ में संक्रमण के दौर में, अभिनेता को भाषा और ‘डायलॉग डिलिवरी’ से जुड़े किन बदलावों के गुजरना पड़ता था, यह विवरण दिलचस्प भी है और इस माध्यम की समझ भी बढ़ाता है।
1940 से 1960 के दशकों के प्रख्यात निर्देशक केदार शर्मा ने चित्रलेखा, जोगन, बावरे नैन जैसी अनेक महत्वपूर्ण फिल्में बनाईं। एफ़टीटीआई के विद्यार्थी और प्रख्यात पंजाबी फिल्म-निर्देशक सुरिंदर सिंह को दिए साक्षात्कार में केदार शर्मा के संघर्ष और एकदम जमीनी, सहज-सरल व्यक्तित्व की आभा नज़र आती है। अपने जमाने के अंग्रेजी साहित्य के एमए केदार शर्मा सिनेमा से जुड़े हर पांडित्य-पूर्ण सवाल के जवाब में, ‘जार्गन’ से बचते हुए, कुछ ऐसे मोहक सूक्ति-वचन कहते हैं: ‘अभिनेता अपनी आँखों से बात करता है और अभिनय अपने आप को भूल जाना और... चरित्र में उतरना होता है।‘
‘मैं सेट का उपयोग इस तरह से करता हूँ कि वह सेट नहीं प्रतीत होता है।‘
‘हर चीज भीतर से आती है... जब आप ... माध्यम में... अपने को डुबा देते हैं तो आपका रचनात्मक आवेग आपका मार्गदर्शन करता है।‘
सुरों के सरताज गायक मन्ना डे पर लेख भी योगेश माथुर का है। 1940 के दशक से फिल्मों के लिए गा रहे मन्ना दा अपने समय के महान गायक कृष्ण चन्द्र डे के भतीजे थे। इस लेख में गायन और रिकॉर्डिंग की गुजरे ज़मानों की तकनीक से जुड़ी सीमाओं-दिक्कतों को दिलचस्प विवरण है। एक ही माइक्रोफोन पर अनेक गायक गाते थे और संगीतकार साज बजाते थे। इस गायन और संगीत को एक लय में लाने की अद्भुत प्रतिभा तबके रिकॉर्डिस्टों में होती थी। मन्ना डे ने वह दौर भी देखा जब फिल्म की ज़रूरत के हिसाब से गीत पहले लिखे जाते थे और फिर उनकी धुनें बनती थीं। फिर, इसके उलट, पहले धुनें बनाने जाने का बाद का दौर भी देखा। मन्ना डे का शास्त्रीय और सुगम – सभी गायन-शैलियों पर पूरा अधिकार था। यह लेख हमें मन्ना डे के साथ एक सुरीली यात्रा पर ले जाता है।
अनाड़ी, अनुपमा, अनुराधा, आशीर्वाद, आनंद, नमकहराम, गुड्डी और खूबसूरत - अनेक खूबसूरत फिल्में बनाने वाले और 1960 से 1980 के दौर के हिन्दी सिनेमा के लगभग सभी चोटी के कलाकारों को माँजने-तराशने वाले हृषीकेश मुखर्जी को कौन सिनेमा-प्रेमी भूल सकता है! उन पर भी लेख योगेश माथुर का ही है। यह लेख हमें, फिल्म-निर्देशक हृषी’दा बनने से पहले के, बेहद कल्पनाशील फिल्म संपादक हृषीकेश मुखर्जी से भी परिचित कराता है जो हिन्दी के सबसे सार्थक फिल्म-आंदोलन के प्रेरणा-स्रोत बिमल रॉय के सहायक थे। टैक्नोलॉजी की सीमाओं के बीच, फिल्म एडिटिंग की तकनीकों की मौलिक संभावनाओं के हृषीकेश मुखर्जी द्वारा उपयोग के रोचक-मार्मिक विवरण हैं। तकनीकी होते हुए भी यह विवरण मधुर-रोचक लगता है। सबसे मार्मिक तो कालजयी फिल्म ‘दो बीघा जमीन’ में रिक्शा-चालक बने, सार्वकालिक महान अभिनेता बलराज साहनी के रिक्शे के पहिये के उखड़ जाने के बीच, घूमते पहिये के शॉट के साथ, घर पर उनका इंतजार करते बच्चे के इस संवाद के शॉट को जोड़ने का विवरण है, “आज बाबा घर क्यों नहीं आए?” इस दृश्य के सम्पादन में हृषीकेश मुखर्जी ने, अपनी रचनात्मक बेचैनी में, अपने गुरु बिमल रॉय के स्वीकृत दृश्य को भी बदल दिया, जिसे बिमल रॉय का अनुमोदन भी मिला।
स्वतन्त्रता-प्राप्ति के बाद के दशकों में, आदर्शवादी नायक के मोहभंग की मार्मिक फिल्म ‘सत्यकाम’ का प्रसंग भी सिनेमा-प्रेमियों को समृद्ध करेगा। लेख टेलीविजन सीरियलों की दुनिया में भी हृषीकेश मुखर्जी के अनूठे योगदान को रेखांकित करता है।
विजय तेंदुलकर के ‘सखाराम बाइंडर’ नाटक और पिंजरा, सामना, सिंहासन और जैत रे जैत जैसी मराठी फिल्मों के दमदार अभिनेता नीलू फुले को कौन फिल्म-प्रेमी भुला सकता है? उन्होंने कुछ हिन्दी फिल्मों में भी, हृषीकेश मुखर्जी, बासु चटर्जी, मनमोहन देसाई और महेश भट्ट जैसे समर्थ निर्देशकों के साथ काम किया। कहते हैं कि अनेक छुटभैये नेता अपने राजनैतिक जीवन में नीलू फुले की नकल करने लगे थे। नीलू फुले की ‘फिल्मोग्राफी’ से समृद्ध इस लेख में उनके अभिनय के बहुमुखी ‘शेड्स’ का पता चलता है – खास कर, डॉ. श्रीराम लागू, अनुपम खेर जैसे अभिनेताओं के साथ उनकी पर्दे पर जीवंत ‘टक्करों’ के बारे में। आम जन के हित में फुले के ‘फ़िलान्थ्रोपिक’ पक्ष को भी उजागर करता यह लेख एफ़टीटीआई से जुड़े चंद्रशेखर जोशी का है।
रजनीगंधा, चितचोर, छोटी सी बात जैसी लुभावनी फिल्मों और रजनी तथा दर्पण जैसे टेलीविज़न सीरियलों के निर्देशक बासु चटर्जी पर लेख भी चंद्रशेखर जोशी ने ही लिखा है। यहाँ भी, बासु’दा की फिल्मोग्राफी के जरिए, उनकी फिल्म-यात्रा को, उनकी फिल्मों जैसी ही सरस शैली में बताया गया है। 1927 में जन्मे बासु’दा 1949-50 में तबकी मशहूर राजनैतिक पत्रिका ‘ब्लिट्ज़’ में कार्टून बनाते थे; फिल्म सोसाइटी आंदोलन के जरिए फिल्मी दुनिया में घुसे; ‘तीसरी कसम’ और ‘सरस्वतीचन्द्र’ जैसी सुपरिचित फिल्मों में बासु भट्टाचार्य और गोविंद सरैया जैसे निर्देशकों की शागिर्दी की और ‘सारा आकाश’ जैसी एकदम जमीनी लोकेशन्स वाली सादी-सुंदर फिल्म बना डाली। बिमल रॉय स्कूल के फ़िल्मकारों की तरह, बासु’दा भी डी सीका की कालजयी फिल्म ‘द बाइसिकिल थीफ’ से प्रभावित थे। ‘सारा आकाश’ के बाद, राजश्री जैसे प्रतिष्ठित निर्माताओं की ‘पिया का घर’ – और फिर तो रजनीगंधा, छोटी सी बात, चितचोर, खट्टा-मीठा, शौकीन, एक रुका हुआ फैसला; और टेलीविज़न सीरियलों में रजनी, दर्पण, कक्काजी कहिन, ब्योमकेश बक्शी – बासु’दा ने मध्यवर्ग को अनेक लुभावने नायक-नायिका, एक्टिविस्ट रजनी और चुलबुले बुजुर्ग दे दिए।
तमिल, मलयालम और तेलुगू फिल्मों के अद्भुत प्रतिभाशाली बालू महेंद्र को हिन्दी सिनेमा-प्रेमी कमलहासन-श्रीदेवी के शानदार अभिनय वाली ‘सदमा’ फिल्म से जानते हैं। बुढ़ापे और वृद्ध-जनों पर उनकी मार्मिक तमिल फिल्म है ‘संध्या रागम।‘ सिनेमा-निर्माण की वन-मैन आर्मी’ थे बालू – ऐसे निर्देशक जो कैमरा भी खुद संभालते थे, एडिटर की कैंची भी -और स्क्रिप्ट को लेकर भी कलाकारों के डिक्टेटर थे। आत्मालाप-शैली के लेख में उनके अनुभव उन्हीं के शब्दों में ‘देखें’:
‘जब आप चालीस पार करते हैं तब आपको लगने लगता है कि दोपहर खत्म हो गई है। यह शाम है और बस रात घिरने वाली है....... परिवार वाले यह समझ नहीं पाते कि बूढ़ा आदमी परिपक्व नहीं होता….. मानसिक धरातल पर वह एक बार फिर से बच्चा होता है।...’
‘कैमरा-संचालन, प्रदर्शन, कला-निर्देशन, प्रकाश-योजना, सम्पादन की पद्धति, वेषभूषा ... (सबका) एकीकृत रूपक तैयार करना होगा....’
‘लाइटिंग पैटर्न घर के पात्रों को परिभाषित करता है। जैसे कपड़े किसी व्यक्ति के चरित्र को परिभाषित कर सकते हैं।‘
‘मैं शूट से पहले अपने अभिनय-कर्मियों को स्क्रिप्ट पढ़ने की इजाजत नहीं देता... वे स्क्रिप्ट को लेकर किसी बनी-बनाए सोच को लेकर नहीं आएँ।‘
‘जब तक निर्देशक कैमरामैन को छूता है तब तक मूवमेंट खत्म हो जाता है।‘
इन उद्गारों को लेख में पिरोया है एफ़टीटीआई के पूर्व-सिनेमेटोग्राफर-लेखक पिंटू चौधरी ने।
‘लेंसाइट (हिन्दी)’ के इस अंक का आठवाँ लेख अंग्रेजी प्राध्यापक और फिल्म-मर्मज्ञ एन. मनु चक्रवर्ती के अंग्रेजी में व्याख्यान का हिन्दी रूपांतर है जिसमें प्रतिष्ठित मराठी निर्देशक सुमित्रा भावे ( और उनके निरंतर सहयोगी सुनील सुखथंकर ) की 1980 के दशक के मध्य से 1910 के दशक के अंत तक की सिने-यात्रा का विहंगम विश्लेषण है। लेख में उनकी प्रथम फिल्म ‘दोघी’(1995) से लेकर दिठी (2019) ( जिसमें सुखथंकर शामिल नहीं थे) तक की 12 फिल्मों की यात्रा समेटी गई है। सुमित्रा भावे के सरोकारों, नैतिक दृष्टि, कलात्मक अभिव्यक्ति और सांस्कृतिक मूल्यों की उनकी समझ का यह गहन विश्लेषण है। सुमित्रा जी का कैनवास विशाल है और स्त्री-विमर्श, राजनीति और सामाजिक नैतिकता के विविध आयामों पर उन्होंने विचारोत्तेजक फिल्में बनाई हैं।
कुल मिलाकर, ऐसे लेखों को तन्मय होकर पढ़ा जाए तो अच्छा सिनेमा देखने का अनुभव ज्यादा सार्थक-सुकूनदेह हो सकता है। हिन्दी में ऐसी सामग्री देकर एफ़टीटीआई ने वाकई सिनेमा-गुरु की अपनी भूमिका का विस्तार किया है। कम से कम, मैं तो सिनेमा के क्षेत्र में, कुछ और पढ़ा-लिखा महसूस कर रहा हूँ।
सुखद बात यह है कि इस सिलसिले के जारी रहने के आसार बने।
अगली बार – लेंसाइट (हिन्दी) -2 (लेख के अगले भाग के लिए कृपया लिंक पर जाएँ)

लंबे समय तक सम्पादन और जन-संचार से जुड़े रहे राजेन्द्र भट्ट अब स्वतंत्र लेखन करते हैं। वह नियमित रूप से रागदिल्ली.कॉम में लिखते रहे हैं।