कथा ज्योति की है अंधों के माध्यम से...
धर्मवीर भारती (1926-1997) अत्यंत प्रिय हैं मुझे। गद्य हो या पद्य - वह धड़कनों को शब्द देते हैं।
1960 से 1987 तक वह प्रतिष्ठित पत्रिका धर्मयुग के यशस्वी संपादक रहे। हमारी पीढ़ी भाग्यवान थी कि हमने अपने कैशोर्य और युवावस्था में धर्मवीर भारती के सम्पादन में धर्मयुग के अंक निहारे, पढ़े – सप्ताह-दर-सप्ताह, सालों-साल। ऐसा लगता था कि ज्ञान का, गहनतम भावनाओं के सहज विस्तार का, मनोरम भाषा के सौम्य प्रवाह का कोलाज पृष्ठ-दर-पृष्ठ फैला दिया गया हो। उन्होंने धर्मयुग को सुरुचि और विविधता की नई ऊँचाइयाँ दीं।
1950 के दशक में अपनी युवावस्था में ही, भारती जी ने साहित्यिक श्रेष्ठता के कई प्रतिमान बना लिए थे। कैशोर्य-प्रेम का उनका उपन्यास गुनाहों का देवता युवा दिलों की धड़कन बन गया था। सूरज का सातवाँ घोड़ा ने गहनतम भावुक कथ्य को अभावुक किस्सागोई शैली के संयत शिल्प के साथ प्रस्तुत करने की एक नई परंपरा को जन्म दिया। इन दोनों किताबों ने भारती के अलसाये, रूमानी, कस्बाई इलाहाबाद के चटकते कैशोर्य और यौवन की दिलकश तस्वीर हमारे दिलों में गढ़ दी।
राधा-कृष्ण के प्रणय पर उनकी काव्य-पुस्तक कनुप्रिया स्त्री-मन की गहन भावनाओं और सार्वकालिक सत्यों के सामने कथित राजनीति और दर्शन के भारी-भरकम लेकिन महज तात्कालिक तथ्यों के सतहीपन को भी उजागर करती है। गुलकी बन्नो जैसी उनकी कहानियों ने कोमल भावों को जैसे दिल के आईने पर उकेर दिया। उनकी कहानियाँ, कविताएं, रिपोर्ताज, यात्रा-वृतांत, डायरी-अंश – लेखन के मानक हैं। 1971 के भारत-पाक युद्ध के दौरान, खुद बांग्लादेश के मोर्चों पर जा कर लिखा गया उनका रिपोर्ताज – युद्ध-यात्रा अनुपम रचना है जिसमें शौर्य और मानवीयता का अद्भुत संयोग है।
(वैचारिक असहमति के बावजूद) भारती जी के लेखन और उनकी धर्मयुग ने, मेरी क्षमता के अनुरूप, मुझे उदारता, संवेदना और सुरुचि को दी। मुझमें जो भी भला पनपा, उसमें धर्मयुग की गढ़न है। और हाँ, उनके भावभीने ललित-गहन लेखों, संस्मरणों, डायरी-अंशों की किताब है -ठेले पर हिमालय। चढ़ती उम्र में, इस किताब के रोमान ने मुझे भाव-समृद्ध, लेकिन चोटखोर (वलनरेबल) बनाया। मैंने जिंदगी में जो पलायन किए; ढीठ जिद के साथ, दिल को दिमाग से ऊपर रख कर जो गर्दिश झेली, उसमें इस किताब का बड़ा हाथ है! धन्यवाद भारती जी!
चलिए, भटकाव से आगे बढ़ें। धर्मवीर भारती का गीत-नाटक है – अंधा युग। छोटा-सा है, पर इसमें युग की समस्याओं का निदान भी है, समाधान भी है। इसके संवाद मंत्रों जैसे गहन हैं, मोहक और ललित भी हैं। भारती जी की अन्य रचनाओं की तरह, अंधा युग भी हमें, शब्दों की अंगुली पकड़ शब्दों के पार के अर्थ को बताता है, दिखाता है।
भारती जी की तीस साल से कम उम्र में (1955 में) रची गई इस गहरे अर्थों वाली रचना का कथा-प्रसंग महाभारत के ‘महायुद्ध के अंतिम दिन की संध्या’ से शुरू होता है। रामायण और महाभारत भारतीय साहित्य के ऐसे विशाल स्रोत हैं, जिसके प्रसंगों से विभिन्न भारतीय भाषाओं के साहित्यकारों ने विषय लिए हैं। उन्हें अपने समय के अर्थों में प्रस्तुत किया है। भारतीय भाषाओं की पिछले एक हज़ार वर्ष की यात्रा में, बार-बार रामायण और महाभारत की ओर लौटने की यह प्रवृत्ति रही है।
भारत की स्वतन्त्रता के बाद के आशाओं और शंकाओं से भरे काल में, ‘अंधा युग’ महाभारत के कथानक के जरिए हमारे समय की पड़ताल करता है और अनास्था-निराशा के अंधेपन-अंधेरे से गुजरते हुए आशा-आस्था के आलोक तक ले जाता है। इस काव्य-नाटक में महाभारत के युद्ध से अंतिम अठारहवें दिन से श्रीकृष्ण द्वारा अपनी जीवन-लीला समेट लेने तक के प्रसंगों के निहितार्थों को पाँच अंकों में समेटा गया है। इस नाटक की एक-एक पंक्ति हमें आज के समाज और मानव व्यवहार को गहराई में समझाती है। नाटक के ‘मंगलाचरण’ में ही भारती ‘विष्णुपुराण’ के उद्धरणों (के भावानुवाद के) जरिए आज की समाज-व्यवस्था की विकृतियों को उजागर करते हैं:
उस भविष्य में...
सत्ता होगी उनकी / जिनकी पूंजी होगी
जिनके नकली चेहरे होंगे / केवल उन्हें महत्व मिलेगा।
राज-शक्तियाँ लोलुप होंगी/ जनता उनसे पीडित होकर
गहन गुफाओं में छिप-छिप कर दिन काटेगी
(गहन गुफाएँ: वे सचमुच की या अपने कुंठित अंतर की)
द्वापर की समाप्ति और कलियुग के प्रारम्भ के संक्रमण-काल की वह पीढ़ी भी तो स्वतन्त्रता की उम्मीदों के विरल हो जाने और देश-विभाजन के विषाद से जन्मी पीढ़ी जैसी होगी, जिसकी स्मृतियों में दूसरे विश्वयुद्ध की विभीषिका भी ज्यादा पुरानी नहीं हुई थी।
‘अंधायुग’ की कथा –अपने स्वार्थ, मानसिक विकृति और अनास्था और अर्ध सत्यों के अंधेपन में समय को आँकने और फिर मर्यादाओं के टूटने की कथा है, जिसका अंत युद्ध और विनाश में होता है। शुरू में ही कथा-गायन में कहा गया है-
टुकड़े-टुकड़े हो बिखर गई मर्यादा।
उसको दोनों ही पक्षों ने तोड़ा है...
और
दोनों ही पक्षों में विवेक था हारा।
दोनों ही पक्षों में जीता अंधापन।
कथा-प्रतीकों से अगर समझें तो हर चरित्र का अधूरापन, अंधापन, अधूरा सच व्यक्ति और समाज को हताशा और विनाश की ओर ले जाता है। धृतराष्ट्र का अन्धापन मात्र शारीरिक नहीं है। वह अपने स्वार्थों, संतान-मोह में अंधे हैं। इस अंधेपन से टूटी मर्यादा ‘महाभारत’ करवा देती है:
पर वह संसार/ स्वतः अपने अंधेपन से उपजा था ...
कौरव जो मेरी मांसलता से उपजे थे/ वे ही थे अंतिम सत्य
मेरे ममता ही वहाँ नीति थी/ मर्यादा थी।
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आज मुझे भान हुआ/ मेरी वैयक्तिक सीमाओं के बाहर भी/ सत्य हुआ करता है।
माता गांधारी की आँखों पर भी पट्टी है और पुत्र-मोह में उन्हें हर निर्णय अपने पुत्रों के खिलाफ षड्यंत्र लगता है। धर्मराज कहे जाने वाले युधिष्ठिर हैं, जो गुरु द्रोणाचार्य की हत्या के लिए, ‘अश्वत्थामा मारा गया’ का अर्धसत्य बोल कर, सुविधानुसार धर्म की व्याख्या कर देते हैं। उनके इस अर्धसत्य से अश्वत्थामा के अंदर प्रतिहिंसा का पशु जाग उठता है जो समूची मानवता को विनाश के कगार पर ले आता है:
उस दिन से/ मेरे अंदर भी/ जो शुभ था, कोमलतम था/ उसकी भ्रूण-हत्या/ युधिष्ठिर के/ अर्धसत्य ने कर दी/ धर्मराज होकर वे बोले/ ‘नर या कुंजर’/ मानव को पशु से उन्होंने पृथक नहीं किया/ उस दिन से मैं हूँ / पशुमात्र, अंध बर्बर पशु....
विदुर निस्वार्थ और विवेकशील हैं, पर निष्क्रिय हैं। संजय सब देख सकते हैं, पर कर कुछ नहीं सकते। महल के प्रहरी हैं, जो उन ‘तटस्थ’ प्रजाजनों और कारिंदों जैसे हैं, जो इतिहास के बनने-बिगड़ने के दौर में सक्रिय रूप से हिस्सेदारी नहीं करते, बल्कि एक सड़ चुकी व्यवस्था को ढोते रहते हैं और अनास्था-व्यर्थता के मनोरोगी हो जाते हैं। आज की उदासीन प्रजाओं के संदर्भ में इन प्रहरियों का ‘एलीनेशन’ और ‘सिनिसिज़्म’ सटीक लगता है:
थके हुए हैं हम/ इसलिए नहीं कि/ कहीं युद्धों में हमने भी/ बाहुबल दिखाया है/
प्रहरी थे हम केवल/ सत्रह दिनों के लोमहर्षक संग्राम में/ भाले हमारे ये/ ढालें हमारी ये
निरर्थक पड़ी रहीं/ अंगों पर बोझ बनी/ रक्षक थे हम केवल
लेकिन रक्षणीय कुछ भी नहीं था यहाँ
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कोई विक्षिप्त हुआ/ कोई शापग्रस्त हुआ/ हम जैसे पहले थे/ वैसे ही अब भी हैं
शासक बदले/ स्थितियाँ बिलकुल वैसी हैं/ इससे तो पहले के ही शासक अच्छे थे
अंधे थे.../ लेकिन वे शासन तो करते थे
ये तो संत ज्ञानी हैं/ जनते नहीं हैं ये प्रकृति प्रजाओं की।
ज्ञान और मर्यादा/ उनका क्या करें हम?
उनको क्या पीसेंगे?/ या उनको खाएँगे?/ या उनको ओढ़ेंगे?/ या उन्हें बिछाएंगे?
हमको तो अन्न मिले/ निश्चित आदेश मिले/ एक सुदृढ़ नायक मिले/ अंधा आदेश मिले
नाम उन्हें चाहे हम युद्ध दें या शांति दें।
जानते नहीं ये प्रकृति प्रजाओं की।
सोच कर देखिए, आज के हालात में, जब हम हर प्रकार की उदारता, विचारशीलता को हिकारत और हेठी से देखती आज की, ‘निश्चित आदेश देने वाले सुदृढ़, अंधे शासकों के आदेशों’ की मुरीद और उन आदेशों की पूर्ति की ‘राजभक्ति’ में तत्पर ‘प्रजाओं’, प्रजा-नायकों और ‘अंधे आदेशों’ के लिए तत्पर ब्यूरोक्रेसी को देखते हैं, तो लोकतंत्र के भविष्य को लेकर क्या कंपकपी नहीं होती?
एक प्रहरी के भाले से युयुत्सु द्वारा आत्महत्या कर लेने पर, ये प्रहरी एक और बड़ी बात कह जाते हैं:
युद्ध हो या शांति हो/ रक्तपात होता है
अस्त्र रहेंगे तो/ उपयोग में आएंगे ही
अब तक वे अस्त्र/ दूसरों के लिए उठते थे/ अब वे अपने ही विरुद्ध काम आएंगे
युयुत्सु कौरवों का वह भाई था, जो युद्ध के प्रारम्भ में पांडवों के पक्ष को सत्य और धर्म का पक्ष मान कर उनकी ओर से लड़ा था पर युद्ध के बाद उसे सभी से अपमान और संदेह झेलना पड़ा था। अधूरे सचों के दौर में, विवेकशील युयुत्सु अपने परिवेश की यथास्थिति में बने रहने की सुरक्षा तोड़ने का खतरा उठाता है, आदर्श का साथ देता हैं, लेकिन अंधे-अधूरे समाज द्वारा गलत समझा, दुत्कारा जाते हैं और आत्महत्या कर लेता है। यह एक जीवन-दृष्टि की आत्महत्या है:
मैं उस पहिये की तरह हूँ/ जो पूरे युद्ध के दौरान रथ में लगा था/
पर जिसे अब लगता है कि वह गलत धुरी में लगा था
और अब मैं अपनी उस धुरी से उतर गया हूँ!
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अंतिम परिणति में/ दोनों जर्जर करते हैं/ पक्ष चाहे सत्य का हो या असत्य का!
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आस्था नामक यह घिसा हुआ सिक्का / अब मिला अश्वस्थामा को
जिसे नकली और खोटा समझ कर मैं/ कूड़े पर फेंक चुका हूँ वर्षों पहले
यहाँ तक कि इस अंधे, नैतिक विद्रूप में विदुर जैसे अनन्य कृष्ण-भक्त की भी आस्था कभी-कभी विचलित हो जाती है:
और अब मेरा स्वर संशयग्रस्त है
क्योंकि लगता है मेरे प्रभु
उस निकम्मी धुरी की तरह हैं
जिसके सारे पहिये उतर गए हैं
और जो खुद घूम नहीं सकती
पर संशय पाप है और मैं पाप नहीं करना चाहता।
जिनके ‘धर्म’ के प्रतिनिधित्व में महाभारत युद्ध हुआ, वह विजयी धर्मराज युधिष्ठिर भी अंत में हताश हैं:
और विजय क्या है?
एक लंबा और तिल-तिल कर फलीभूत होने वाला आत्मघात।
स्वार्थ, अविवेक और अपने-अपने अर्ध-सत्यों का यह अंधापन सम्पूर्ण विनाश की ओर ले जाता है। बदले की आग में अंधा पशु - अश्वत्थामा ब्रह्मास्त्र छोड़ देता है पर उसे समेटने की क्षमता उसमें नहीं है, तभी तो व्यास चेतावनी देते हैं -
आगे आने वाली सदियों तक ---
सारी मनुष्य जाति बौनी हो जाएगी। -- रसमय वनस्पति नहीं होगी – शिशु पैदा होंगे विकलांग और कुष्ठग्रस्त – सूरज बुझ जाएगा – धरा बंजर हो जाएगी।
इस तरह, व्यक्ति और समाज के अंधेपन का यह प्राचीन मिथक – हमें– दूसरे विश्वयुद्ध और हिरोशिमा-नागासाकी के दोहराए जाने की चेतावनी देता है।
लेकिन ‘अंधा युग’ में कृष्ण भी हैं -और इसी लिए यह आशा का काव्य है। युग की हताशा, जहर उन्हें नहीं व्यापता। वह स्वार्थों से ऊपर – अनासक्त हैं – और इसीलिए, काल उन्हें प्रभावित नहीं करता:
उस दिन यह सिद्ध हुआ / जब कोई भी मनुष्य /अनासक्त होकर चुनौती देता है इतिहास को/ उस दिन नक्षत्रों की दिशा बदल जाती है / नियति नहीं है पूर्व-निर्धारित/ उसको हर क्षण मानव-निर्णय बनाता मिटाता है।
वह शांतचित्त हैं, निजी प्रतिहिंसा का अंधापन उनमें नहीं है इसलिए गांधारी के श्राप को, अश्वत्थामा की जलन को, युयुत्सु की अनास्था को – अपने सिर पर ले लेते हैं - खुद भोग लेते हैं, और आने वाले युगों के लिए आस्था का संदेश भी दे जाते हैं:
----इस अंधे युग में/ मेरा एक अंश /निष्क्रिय रहेगा, आत्मघाती रहेगा/ और विगलित रहेगा
संजय, युयुत्सु, अश्वत्थामा की तरह/ क्योंकि इनका दायित्व लिया है मैंने
लेकिन मेरा दायित्व लेंगे / बाकी सभी...
-----------मर्यादायुक्त आचरण में/ नित नूतन सृजन में
निर्भयता के/ साहस के / ममता के/ रस के/ क्षण में
जीवित और सक्रिय हो उठूँगा मैं बार-बार
कृष्ण के मृत्यु- प्रसंग में भारतीजी ने पूरे युग की दिशा तय करने वाले प्रभु के कष्ट-थकान से जूझ रहे, लेकिन अब तक छुपाए मानव रूप को उजागर कर दिया है। प्रभु के अंतिम क्षणों का यह बेहद मार्मिक- मानवीय प्रसंग है। थके-अकेले यह कृष्ण कितने अपने, कितने प्रिय लगते हैं!
लगता था कुछ-कुछ थका-थका वह नील मेघ सा तन श्यामल।
माला के सबसे बड़े कमल पर बची एक पंखुरी केवल।
अपनी दाहिनी जांघ पर रख / मृग के मुख जैसा बांया पग
टिक गए तने से ले उसाँस / बोले-कैसा विचित्र था युग। ---
अंधा युग का हर संवाद खरा सोना है। हर संवाद की गहरी अंतरध्वनियाँ हैं। भारतीय साहित्य और रंगमंच में यह नाटक मील का पत्थर माना जाता है जिसने पारंपरिक कथा को आधुनिक व्याख्या दी। यह महान नाटक, सबसे पहले आकाशवाणी के इलाहाबाद केंद्र से प्रसारित हुआ। उसके बाद तो इसकी लोकप्रियता की धूम मच गई। भारत के श्रेष्ठतम निर्देशकों – सत्यदेव दुबे, इब्राहम अल्काजी, एम. के. रैना, रतन थियम, राम गोपाल बजाज, अरविंद गौड़, मोहन महर्षि और भानु भारती ने इसकी अपने-अपने अंदाज और रंग-सज्जा में भव्य प्रस्तुति की और इसके अर्थों में नए आयाम जोड़े।
अंधा युग के प्रारम्भ में लेखक संशय और आस्था के बीच अनिश्चित लगता है:
यह कथा उन्हीं अंधों की है
या कथा ज्योति की है अंधों के माध्यम से।
आशा-आस्था के इस द्वंद्व का समापन इस मानवीय संदेश से होता है:
पर एक तत्व है बीजरूप स्थित मन में
साहस में, स्वतन्त्रता में, नूतन सर्जन में। ---
उतना जो अंश हमारे मन का है
वह अर्धसत्य से, ब्रह्मास्त्रों के भय से
मानव भविष्य को हरदम रहे बचाता
अंधे संशय, दासता, पराजय से।
साहित्य को ‘सबके हित का भाव’ कहा गया है। भारती जी की यह रचना अँधेरों के बीच भटके, त्रस्त व्यक्ति-मन और समाज-मन को वह नीला, सौम्य प्रकाश दिखाती रहेगी जो कभी मिथकीय अंधे युग में नीलकमल सी आभा वाले योगेश्वर ने दिखाया होगा।

(लंबे समय तक सम्पादन और जन-संचार से जुड़े रहे राजेन्द्र भट्ट अब स्वतंत्र लेखन करते हैं। वह नियमित रूप से रागदिल्ली.कॉम में लिखते रहे हैं।)
(डिस्क्लेमर : इस लेख में व्यक्त विचार लेखक के स्वयं के हैं। रागदिल्ली.कॉम के संपादकीय मंडल का इन विचारों से कोई लेना-देना नहीं है।)