विधान सभा चुनाव : जनता से सीधे रुबरु होना ही होगा
राजकेश्वर सिंह*
वजह भले ही कोरोना महामारी हो, लेकिन लोकतंत्र के चुनावी महापर्व में जन प्रतिनिधि बनने की चाहत रखने वालों को अब जनता से सीधे ही रूबरू होना ही होगा। उन्हें उनके आमने-सामने सीधी और साफ बात करनी होगी, जिसके वोट की उन्हें दरकार है। विधानसभा क्षेत्रों और जिलों में अपनी-अपनी पार्टी के बड़े नेताओं की चुनावी सभाएं या रैलियां कराकर वोट मांगने के बीते कई दशक से चले आ रहे फार्मूले में चुनाव आयोग के ताज़े फरमान के बाद बदलाव की नौबत आखिर आ ही गई। धन-बल और दूसरे संसाधनों की बदौलत बड़े-बड़े जुलूस निकालकर शक्ति का प्रदर्शन करने की गुंजाइश फिलहाल आगामी पंद्रह जनवरी तक तो नहीं ही है। हालात ऐसे ही रहे या और खराब हुए तो यह मियाद और आगे बढ़ाई जा सकती है। अगले महीने उत्तर प्रदेश समेत पांच राज्यों में होने वाले चुनाव के लिए घर-घर जाकर वोट मांगने की संख्या भी पांच से अधिक नहीं होगी। कोरोना महामारी के बीच होने वाले इस बार के चुनाव में निर्वाचन आयोग ने कुछ इस तरह के ही तौर तरीकों को तय किए हैं। ऐसे में यह बात काबिले-गौर है कि क्या बीते कुछ दशक से जो नेता जनता (मतदाता) से लगभग दूर हो गए थे, अब उन्हें फिर से उनके और करीब जाना ही पड़ेगा। उनके लिए महज़ बड़े नेताओं के भाषणों व कार्यकर्ताओं के संदेशों के भरोसे चुनाव लड़ने की राह उतनी आसन नहीं रह जाएगी, जितनी पहले थी।
याद कीजिए, 1960-70 और 80 के दशक को, जब विधायक या सांसद का चुनाव लड़ने वाला प्रत्याशी चुनाव के दिनों में अपने समर्थकों के साथ गांव-गांव और गली-गली जाकर वोट मांगता था। तब वह सिलसिला दिन में ही नहीं, बल्कि देर रात तक चलता था। उस समय वोट मांगने वाला और वोट देने वाला दोनों ही एक दूसरे को शक्ल से पहचाने थे। ज्यादातर मामलों में कुछ ऐसा ही होता था। वे एक-दूसरे के प्रति जवाबदेही को भी महसूस करते थे। यह वही दौर था, जब जनता का प्रतिनिधित्व करने के लिए उनके ही बीच से निकलकर कोई भी व्यक्ति चुनाव लड़ने की हिम्मत जुटा लेता था। जनता भी अपना प्रतिनिधि चुनने में प्रत्याशी की जाति-पांति, धर्म-संप्रदाय जैसे चीजों को महत्व नहीं देती थी। वह अपने जन प्रतिनिधियों से अपने क्षेत्र में विकास और थानों व तहसीलों में प्रशासनिक तंत्र की ओर से आने वाली दिक्कतों में उनकी मदद लेती थी। रिश्वत का ऐसा बोलबाला नहीं था कि हर काम के लिए दिमागी तौर से उस रास्ते से गुजरने को तैयार रहना ही पड़े। बाद के वर्षों में यह चलन एक तरह से पूरा बदल ही गया।
नब्बे के दशक के बाद देश में जातीय राजनीति के उभार के चलते जब राजनीतिक दलों का जातियों के नाम पर ही गठन होने लगा तब इन स्थितियों ने तो जैसे रफ्तार ही पकड़ ली हो। फिर तो राजनीतिक दलों ने भी वोट के लिए खुलकर जातीय आधार पर ही गोलबंदी शुरू कर दी। इस जातीय उफान के बाद दूसरी बड़ी बात यह हुई कि राजनेताओं ने उसके समानान्तर ही धर्म को भी राजनीति का हिस्सा बना दिया। नतीजा यह हुआ कि धर्म और जाति चुनावी राजनीति का अभिन्न अंग बन गए। कम से कम उत्तर और मध्य भारत के राज्यों में राजनीति की यह इबारत तो मज़बूती से लिख ही गई है। इन दोनों स्थितियों के साथ ही चुनाव में एक तीसरा फैक्टर भी बड़ा महत्वपूर्ण हो गया और ये है - धन और बाहुबल का फैक्टर जिसके बढ़ते प्रभाव के चलते देश की संसद और राज्य विधानसभाओं में आपराधिक प्रवृत्ति और दागदार छवि वाले जनप्रतिनिधियों की बढ़ती संख्या बड़े उदाहरण के रूप में हमारे सामने है। इस स्थिति को किसी हद तक इस तरह भी देखा जा सकता है कि चूंकि नेताओं की एक बड़ी संख्या अपने धन, बल और शक्ति प्रदर्शन के आधार पर चुनाव जीतकर आती है, लिहाजा जनता के प्रति उनमें वैसी जवाबदेही का अभाव दिखता है, जैसा कई दशक पहले के जन प्रतिनिधियों में दिखता था।
बदली परिस्थितियों में देश का निर्वाचन आयोग काफी अरसे बाद कुछ ऐसा करता नज़र आया है, जब यह लगे कि वह सत्तासीन पार्टी सहित राजनीतिक दलों के मनमुताबिक ही सारे फैसले नहीं भी करता। यह बात इसलिए, क्योंकि ऐसा कई बार देखा गया है जब चुनावों के दौरान राजनेताओं और राजनीतिक दलों ने मतदाताओं का वोट हासिल करने के लिए कई बार खुले मंच से वह सब किया है, जिसकी इजाजत आदर्श चुनाव आचार संहिता के प्रावधान नहीं देते, लेकिन आयोग ने प्राय: वैसी कोई कार्रवाई नहीं की, जो बाकी प्रत्याशियों के लिए नज़ीर बन सके। हालांकि, अब भी वैसा कुछ नहीं है, लेकिन आयोग के नए फरमान प्रत्याशियों व राजनीतिक दलों के लिए कुछ बंदिशों के रूप में सामने तो हैं ही। मसलन, चुनाव लड़ने वाले उम्मीदवार को नामांकन दाखिल करने के लिए चुनाव कार्यालय नहीं जाना होगा। वह यह काम ऑनलाइन कर सकेगा, जबकि नामांकन के दौरान भारी भीड़ और वाहनों का भारी जमावड़ा भी प्रत्याशियों के शक्ति प्रदर्शन का हथियार रहा है। यह सिलसिला दशकों से चला आ रहा है। अब कोई भी प्रत्याशी अपना आपराधिक रिकॉर्ड, जमानत राशि और अन्य दस्तावेज पोर्टल पर ऑनलाइन जमा का सकेगा। हालांकि, यह वैकल्पिक व्यवस्था है, लेकिन महामारी के चलते इसके प्रभावी होने की उम्मीद की जा सकती है। घर-घर जाकर प्रचार करने वालों की संख्या पांच लोगों तक सीमित करना, रैली, जनसभा, नुक्कड़ सभाओं, पदयात्रा, बाइक व साइकिल रैलियों पर 15 जनवरी तक की रोक के चलते अब प्रत्याशियों को जनता के पास जाकर सीधे वोट मांगने का प्रभावी विकल्प ही बचा है। जहां तक, सोशल मीडिया और प्रिंट व इलेक्ट्रानिक मीडिया के जरिए प्रचार का सवाल है, तो मतदाताओं को शायद वह बहुत ज्यादा प्रभावित न कर सके, क्योंकि सारी प्रत्याशी व सभी दल मतदाताओं पर सीधा असर डालने के लिए ही तो जिलों व विधानसभा क्षेत्रों में किसी जगह भारी भीड़ जुटाकर अपने राष्ट्रीय व राज्यस्तरीय बड़े नेताओं की सभाओं व रैलियों पर ज्यादा जोर देते हैं। इस स्थिति का ही दूसरा पहलू यह है कि प्रत्याशियों का आम जनता से सीधा आमना-सामना कम होता है।
राज्य विधानसभा चुनाव के लिए बनी मौजूदा परिस्थितियों में यह कहा जा सकता है कि इस बार का चुनाव कुछ अलग होगा। एक तरफ तो मतदाताओं को अपनी तरफ आकर्षित करने के लिए सभी तरह की मीडिया का भरपूर इस्तेमाल होगा, तो दूसरी तरफ प्रत्याशियों को कई दशक पुरानी परंपरा को भी प्रभावी ढंग से अपनाना होगा, जिसमें वह मतदाताओं से दरवाजे-दरवाजे जाकर संपर्क करेगा। कहा जा सकता है कि यह व्यवस्था राजनेताओं को जनता के और करीब ले जाने में कारगर हो सकती है बशर्ते, आयोग इस तालमेल को लेकर खुद भी और गंभीरता दिखाए। स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव के लिए यह कम जरूरी नहीं है कि वैसा माहौल भी बनाया जाए जिससे चुनावी महापर्व की पवित्रता भी दिखती रहे, बनिस्बत कोई भी अहम फैसला लेने में तकनीकी वजहों का सहारा लिया जाए। न्याय के सिद्धांत के मामले में कहा जाता है कि न्याय कर दिया जाना ही जरूरी नहीं, बल्कि यह प्रदर्शित भी होना चाहिए कि वाकई न्याय हुआ भी है। यही सिद्धांत स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव के मामले में भी लागू होना चाहिए।
*राजकेश्वर सिंह उत्तर प्रदेश के पूर्व सूचना आयुक्त एवं स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं।
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