रेडियो पत्रकारिता: समय से अनवरत संवाद
आज २३ जुलाई को राष्ट्रीय प्रसारण दिवस के रूप में मनाया जाता है। आज के ही दिन १९२७ में इंडियन ब्राडकास्टिंग कम्पनी द्वारा मुंबई से पहला रेडियो प्रसारण हुआ था। संजीव शर्मा ने, जो वर्षों से आकाशवाणी के लिए काम कर रहे हैं, हमारे लिए इस अवसर पर यह विशेष लेख लिखा है जिसमें वह रेडियो से जुड़े गौरवपूर्ण इतिहास को बताने के अलावा भविष्य के रेडियो के बारे में भी बता रहे हैं।
राष्ट्रीय प्रसारण दिवस पर विशेष
रेडियो पत्रकारिता: समय से अनवरत संवाद
संजीव शर्मा
ये आकाशवाणी है…यह महज एक आवाज नहीं बल्कि अपने आप में इतिहास है, विकास की कहानी है और भविष्य की पहचान है। इस आवाज ने करोड़ों लोगों को स्वर दिया है, लाखों अनसुनी कहानियों को पहचान दी है और कई आपदाओं के दौरान मदद का हाथ बढ़ाया है। भारत में आकाशवाणी एवं रेडियो एक दूसरे के पर्याय हैं। हमारे देश में रेडियो और रेडियो पत्रकारिता की कहानी आकाशवाणी से ही शुरू होती है और समय के साथ इसने अपने पंख निरंतर फैलाएं हैं।
जहां तक रेडियो की बात है तो यह मानव सभ्यता के लिए तकनीक का एक ऐसा चमत्कार है जो भावनाओं और संवाद की दुनिया है। रेडियो ऐसा जादुई माध्यम है, जिसने दुनिया को एक वैश्विक गांव में बदल दिया है। रेडियो माध्यम की सबसे अच्छी विशेषता यह कि यह सीमाओं से परे है और हर खास-ओ-आम के दिल के क़रीब है। यह समाज, भाषाओं, बोलियों और लोक संस्कृतियों का संरक्षक है। यह लोकतंत्र की धड़कन, अभिव्यक्ति की आवाज,स्वतंत्रता का पैरोकार और सूचना के सहज प्रवाह का माध्यम है। आज डिजिटल युग के मौजूदा दौर में भी विश्वसनीयता, जमीनी स्तर तक पहुंच और जन भागीदारी को लेकर रेडियो की बादशाहत कायम है।
हम सभी जानते हैं कि पत्रकारिता का मूल उद्देश्य समाज को सूचना देना, शिक्षित करना और जागरूक बनाना है। इस दायित्व को पूरा करने में पत्रकारिता के कई माध्यम मसलन अख़बार, रेडियो, टेलीविज़न और आज डिजिटल मीडिया अपनी जिम्मेदारी बखूबी निभा रहे हैं । इन सभी में रेडियो का अपना एक अलग और विशिष्ट स्थान है। यह ऐसा माध्यम है जो बिना किसी दृश्य के केवल आवाज़ के सहारे श्रोता के मन-मस्तिष्क में चित्र रच देता है। शब्द, ध्वनि और संगीत का संयोजन श्रोता की कल्पना को इस तरह जाग्रत करता है कि वह घटना-स्थल तक स्वयं को पहुँचता हुआ महसूस करने लगता है। यही रेडियो पत्रकारिता की सबसे बड़ी ताकत है।
शुरुआती दशकों में जब रेडियो प्रसारण शुरू हुआ तो लोगों के लिए यह किसी जादू से कम नहीं था कि दूर बैठे किसी व्यक्ति की आवाज़ उनके घर तक पहुँच रही है। धीरे-धीरे रेडियो का उपयोग मनोरंजन के साथ-साथ समाचार और सूचना प्रसारण के लिए भी होने लगा एवं दुनिया भर में रेडियो पत्रकारिता ने अपनी अलग पहचान बनाई। पत्रकारिता के लिहाज से रेडियो एक ऐसा माध्यम है जो पढ़े-लिखे और अनपढ़, शहर और गाँव, अमीर और गरीब—सभी तक समान रूप से पहुँचता है। केवल आवाज़ के सहारे यह दुनिया भर में समाचार, विचार और भावनाएँ किसी अन्य माध्यम की तुलना में लोगों तक सहजता से पहुँचा देता है। तकनीकी बदलावों और डिजिटल क्रांति के बावजूद रेडियो आज भी अपनी विश्वसनीयता और व्यापक पहुँच के कारण पत्रकारिता के महत्वपूर्ण स्तंभों में से एक है।
रेडियो पत्रकारिता का इतिहास
रेडियो पत्रकारिता से पहले रेडियो का विकास समझना जरूरी है। अब तक के अध्ययनों एवं उपलब्ध स्रोतों से यही पता चलता है कि रेडियो का विकास उन्नीसवीं सदी के अंतिम वर्षों में हुआ। इटली के वैज्ञानिक Guglielmo Marconi ने 1895 में वायरलेस संचार प्रणाली का सफल प्रयोग किया। यह प्रयोग आगे चलकर रेडियो प्रसारण की आधारशिला बना। लेकिन कई अध्ययनों से यह बात भी साबित हुई है कि सबसे पहले भारत में इस क्रांति की वैज्ञानिक आधारशिला आचार्य जगदीश चंद्र बसु ने रखी थी । उन्होंने 1890 के दशक में मिलीमीटर वेव्स पर प्रयोग किए, कोहीरर (डिटेक्टर) विकसित किया और 1895 में कलकत्ता में पहला सार्वजनिक वायरलेस प्रदर्शन किया था।
खैर, शुरुआत जैसे भी हुई हो लेकिन बीसवीं सदी के शुरुआती वर्षों में यूरोप और अमेरिका में रेडियो प्रसारण शुरू हुआ। 1920 में अमेरिका के पिट्सबर्ग शहर से दुनिया का पहला नियमित रेडियो स्टेशन KDKA Radio शुरू हुआ। इस स्टेशन ने अमेरिकी राष्ट्रपति चुनाव के परिणाम प्रसारित किए, जिसे रेडियो पत्रकारिता का शुरुआती उदाहरण माना जाता है। 1930 और 1940 के दशक में रेडियो समाचार दुनिया भर में लोकप्रिय हो गए। द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान लोगों ने युद्ध से जुड़ी खबरें रेडियो के माध्यम से ही सुनीं। उस दौर में ब्रिटेन का बीबीसी (BBC) विश्वसनीय समाचार प्रसारण के लिए प्रसिद्ध हुआ।
भारत में रेडियो पत्रकारिता
भारत में रेडियो प्रसारण का इतिहास भी काफी रोचक है। 1927 में बॉम्बे (अब मुंबई) और कलकत्ता (अब कोलकाता) में निजी रेडियो क्लबों ने प्रसारण शुरू किया। बाद में 1930 में ब्रिटिश सरकार ने रेडियो सेवा को अपने नियंत्रण में लेकर इंडियन स्टेट ब्रॉडकास्टिंग सर्विस ( Indian State Broadcasting Service) की स्थापना की। 1936 में इसका नाम बदलकर ऑल इंडिया रेडियो (All India Radio) कर दिया गया। आज हम इसे आकाशवाणी के नाम से जानते हैं। आकाशवाणी ने पूरे देश में रेडियो पत्रकारिता को अपने सटीक और विश्वसनीय तेवरों से अलग रूप दिया है। उस समय अख़बार तो हर जगह उपलब्ध नहीं थे और टेलीविज़न शुरू भी नहीं हुआ था। ऐसे में रेडियो की आवाज़ ही एकमात्र माध्यम थी जो लोगों तक दुनिया की खबरें पहुँचाती थी।
रेडियो और स्वतंत्रता आंदोलन
भारतीय स्वाधीनता संग्राम में न केवल रेडियो ने अहम भूमिका निभाई बल्कि स्वतंत्रता आंदोलन ने भी रेडियो का प्रभाव बढ़ाने में खास सहयोग किया। हम कह सकते हैं कि रेडियो पत्रकारिता के लिए स्वतंत्रता संग्राम शुरुआती मंच बना। उल्लेखनीय बात यह भी है कि उस समय रेडियो पर ब्रिटिश हुकूमत का नियंत्रण था लेकिन तब भी इसने अपनी स्वतंत्र पहचान बनाते हुए आम लोगों तक जानकारी पहुँचाने में कोई कसर नहीं छोड़ी । यहां तक कि ब्रिटिश सरकार द्वारा प्रेस पर सेंसरशिप लगाने एवं सभाओं पर रोक लगाने के दौरान भी रेडियो ने तमाम बंधन तोड़कर सूचनाएं प्रेषित की । उस दौर की रेडियो पत्रकारिता में कांग्रेस रेडियो और आज़ाद हिंद रेडियो के नाम इतिहास के पन्नों में सम्मान के साथ दर्ज हैं।
डॉ राम मनोहर लोहिया के मार्गदर्शन में उषा मेहता और उनके साथियों द्वारा 1942 में शुरू किए गए कांग्रेस रेडियो ने खुफिया ठिकानों से अपना प्रसारण जारी रखकर अंग्रेज सरकार की नींद तो उड़ाई, साथ ही अपने प्रसारण से देश के लोगों को सामूहिक संघर्ष के लिए एकजुट करने का काम भी किया । इसी तरह, जर्मनी के बाद जापान से संचालित नेताजी सुभाष चंद्र बोस के आजाद हिंद रेडियो ने ‘तुम मुझे खून दो, मैं तुम्हें आजादी दूंगा’ के नारे के जरिए देश के क्रांति की अलख जगा दी।
स्वतंत्रता के बाद रेडियो पत्रकारिता
स्वतंत्रता के बाद रेडियो पत्रकारिता के स्वर्णिम दौर की शुरुआत हुई। 15 अगस्त 1947 की मध्यरात्रि में पंडित जवाहर लाल नेहरू का प्रसिद्ध भाषण “Tryst with Destiny” रेडियो के माध्यम से ही पूरे देश में प्रसारित हुआ। यह रेडियो पत्रकारिता के इतिहास की एक महत्वपूर्ण घटना मानी जाती है।
इसी तरह, महात्मा गांधी की 12 नवंबर, 1947 को दिल्ली में आकाशवाणी के स्टूडियो की पहली एवं एकमात्र यात्रा भी इसका सशक्त उदाहरण है। महात्मा गांधी ने आकाशवाणी से इस प्रसारण में पाकिस्तान से आए शरणार्थियों को शांति और धैर्य का संदेश दिया था। इस ऐतिहासिक घटना की याद में हर साल 12 नवंबर को लोक सेवा प्रसारण दिवस मनाया जाता है।
वहीं, जब स्वतंत्रता के बाद देश नव निर्माण के साथ विकास की अंगड़ाई ले रहा था तो रेडियो अपनी पत्रकारिता से कदम से कदम मिलाकर समाज को जागरूक बनाने में महत्वपूर्ण योगदान दे रहा था। स्वतंत्रता के समय भारत में केवल 6 रेडियो स्टेशन थे, रेडियो सेट की संख्या भी बहुत कम थी और रेडियो खरीदने के लिए भी लाइसेंस लेना पड़ता था । लेकिन धीरे-धीरे सरकार ने इस माध्यम के महत्व को समझते हुए इसका विस्तार किया। साथ ही, लाइसेंस की अनिवार्यता भी समाप्त कर दी। 1960 और 1970 के दशक में रेडियो का नेटवर्क तेजी से बढ़ा।
प्रसार भारती की आधिकारिक वेबसाइट के मुताबिक आकाशवाणी आज अपने 479 स्टेशन के जरिए कुल जनसंख्या के 99.19 प्रतिशत को सेवाएं दे रही है। यह 23 भाषाओं और 179 बोलियों में कार्यक्रम प्रसारित करती है जबकि भारत में रेडियो पत्रकारिता की जनक आकाशवाणी न्यूज आज 92 भारतीय भाषाओं और बोलियों में 607 न्यूज बुलेटिन और करीब 60 घंटे का न्यूज कंटेंट प्रतिदिन प्रसारित कर रही है। आकाशवाणी के देश विदेश में 81 नियमित और 520 अंशकालीन संवाददाता है जो हर जिले में तैनात हैं। यहां यह जानना भी दिलचस्प है कि भारत में रेडियो पर पहला समाचार बुलेटिन 23 जुलाई 1927 को बांबे स्टेशन से प्रसारित हुआ था।
आपदा का साथी
आपदाओं में जहां बिजली, मोबाइल और इंटरनेट ठप हो जाते हैं, रेडियो बैटरी पर चलकर बचाव का संदेश पहुंचाता है। सुनामी, केदारनाथ त्रासदी, चक्रवात या कोविड महामारी में रेडियो ने यही भूमिका निभाई थी। पोलियो उन्मूलन और टीकाकरण अभियानों में भी इसने अफवाहों को फैलने से रोका था । ये तो महज कुछ उदाहरण है जबकि पूर्वोत्तर से लेकर सीमावर्ती राज्यों तक रेडियो बाढ़,भूकंप जैसी आपदाओं में सच्चा साथी बनकर आम लोगों की सुरक्षा सुनिश्चित करता है बल्कि उनके दुःख सुख को भी अपनी आवाज देता है क्योंकि रेडियो सिर्फ फ्रीक्वेंसी नहीं, संवेदनाओं का स्वर है।
ग्रामीण क्षेत्रों में तो दशकों बाद भी रेडियो आज भी सूचना का सबसे विश्वसनीय स्रोत है। यह मौसम की जानकारी, फसल से जुड़े सुझाव और सरकारी योजनाओं की खबरें देकर अन्नदाताओं का भरोसेमंद साथी है। रेडियो ग्रामीण भारत में देश-दुनिया की खबरें देने का सशक्त माध्यम भी है।
एफएम और सामुदायिक रेडियो
भारत में आर्थिक उदारीकरण के बाद 1990 के दशक में निजी एफएम रेडियो चैनलों को अनुमति दी गई। इसके बाद रेडियो पत्रकारिता में नई ऊर्जा आ गई। इसके फलस्वरूप शहरों में कई निजी एफएम स्टेशन शुरू हुए, जिनमें मनोरंजन, संगीत और बातचीत के साथ-साथ स्थानीय खबरें भी शामिल होने लगीं। भारत में 900 से अधिक निजी एफएम रेडियो स्टेशन कार्यरत हैं। ये स्टेशन लाखों श्रोताओं तक प्रतिदिन पहुँचते हैं और स्थानीय मुद्दों को सामने लाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।
रेडियो पत्रकारिता के विकास में सामुदायिक रेडियो का योगदान भी महत्वपूर्ण है। 2002 में भारत सरकार ने शैक्षणिक संस्थानों को सामुदायिक रेडियो चलाने की अनुमति दी और 2006 में इसे गैर-सरकारी संगठनों के लिए भी खोल दिया गया। आज भारत में लगभग 500 से अधिक सामुदायिक रेडियो स्टेशन काम कर रहे हैं। ये स्टेशन स्थानीय भाषा और संस्कृति को बढ़ावा देते हैं और ग्रामीण क्षेत्रों की समस्याओं को सामने लाते हैं।
रेडियो का डिजिटल युग
तकनीकी और मीडिया जगत में आ रहे मैराथन बदलाव के कारण यह माना जाने लगा था कि डिजिटल युग में रेडियो अपना अस्तित्व नहीं बचा पाएगा लेकिन प्रौद्योगिकी के साथ कदमताल करते हुए रेडियो ने डिजिटल दौर में अपने आकार प्रकार और प्रसारण में त्वरित बदलाव कर स्वयं को अपरिहार्य बनाए रखा है। इंटरनेट और स्मार्टफोन ने रेडियो को नई संभावनाएँ एवं नई पहचान प्रदान की है। अब रेडियो केवल ट्रांजिस्टर तक सीमित नहीं है बल्कि ऑनलाइन स्ट्रीमिंग, रेडियो ऐप्स,वेब रेडियो और पॉडकास्ट के माध्यम से और भी व्यापक हो गया है। यह अब बुजुर्ग पीढ़ी से लेकर जेन जी तक में लोकप्रिय है। इसके अलावा, प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी के मासिक प्रसारण कार्यक्रम ‘मन की बात’ ने रेडियो को नई ऊंचाईयों तक पहुंचा दिया है। सवा सौ से ज्यादा एपिसोड के इस सफ़र में मन की बात जन गण के मन की बात बन गया है।
इसके अलावा, न्यूज ऑन एआईआर, जिओ सावन, स्पोर्टिफाई, गाना, हंगामा म्यूजिक, ट्यून इन जैसे तमाम रेडियो ऐप्स ने रेडियो को घर से निकालकर कार एवं मोबाइल का हिस्सा बना दिया है। इन बदलावों से इसने रेडियो सेट से पॉकेट रेडियो तक की दूरी नाप ली है। वहीं, पॉडकास्टिंग ने रेडियो पत्रकारिता को नए स्तर तक पहुंचा दिया है। पॉडकास्टिंग के जरिए अब किसी भी विषय पर विस्तार से चर्चा भी कर सकते हैं और अपनी सुविधा के अनुसार सुन भी सकते हैं।
विजुअल रेडियो
विजुअल रेडियो को हम पारंपरिक रेडियो का ‘चित्रमय संस्करण’ कह सकते हैं। इसे रेडियो प्रसारण का भविष्य कहा जा रहा है क्योंकि यह हमारे लिए ऑडियो और विजुअल अनुभव को एक साथ लाता है। वास्तव में, विजुअल रेडियो एक आधुनिक प्रसारण तकनीक है जो पारंपरिक रेडियो की ऑडियो सामग्री को दृश्य तत्वों (विजुअल्स) के साथ जोड़ती है। इसमें रेडियो प्रसारण के साथ-साथ चित्र, वीडियो, ग्राफिक्स, टेक्स्ट, और अन्य मल्टीमीडिया सामग्री को एकीकृत किया जाता है, श्रोता जिसे दर्शक बनकर रेडियो सेट, मोबाइल ऐप या इंटरनेट के माध्यम से सुनने के साथ साथ देख भी सकते हैं। इसको हम प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के कार्यक्रम ‘मन की बात’ के प्रसारण से भी समझ सकते हैं। ‘मन की बात’ मूलतः रेडियो पर प्रसारित एक ऑडियो कार्यक्रम है लेकिन रेडियो प्लस यानि रेडियो सेट से इतर जब इसे सोशल मीडिया या अन्य मीडिया प्लेटफॉर्म्स पर प्रस्तुत किया जाता है तो उसमें दृश्य भी जोड़ दिए जाते हैं । हालांकि, भारत में विजुअल रेडियो का विकास अभी प्रारंभिक चरण में है लेकिन आकाशवाणी सहित तमाम रेडियो प्रसारक डिजिटल युग में प्रासंगिकता बनाए रखने के लिए विजुअल रेडियो की दिशा में महत्वपूर्ण कदम उठा रहे हैं इसलिए उम्मीद की जा रही है कि तकनीक का यह बेजोड़ संगम रेडियो पत्रकारिता का भविष्य गढ़ने का मार्ग प्रशस्त करेगा।
भविष्य का रेडियो
कृत्रिम बुद्धिमत्ता (एआई) के दौर में रेडियो की उड़ान को नए पंख लग गए हैं। यही वजह है कि यूनेस्को ने विश्व रेडियो दिवस 2026 का विषय — “ रेडियो और कृत्रिम बुद्धिमत्ता: एआई एक उपकरण है, आवाज नहीं ” रखा था। यह रेडियो प्रसारण में कृत्रिम बुद्धिमत्ता की बढ़ती भूमिका को रेखांकित करता है। एआई के इस्तेमाल से आने वाले समय में रेडियो पत्रकारिता तकनीकी रूप से और अधिक उन्नत हो सकती है। कृत्रिम बुद्धिमत्ता, डिजिटल संपादन और ऑनलाइन प्लेटफॉर्म के साथ रेडियो के लिए नई संभावनाओं के द्वार खुल रहें हैं इसलिए इस बात से कोई इंकार नहीं कर सकता कि रेडियो अपनी पहुंच,विश्वसनीयता, सरल भाषा, सहज प्रसारण से भविष्य में भी समाज के साथ संवाद का महत्वपूर्ण माध्यम बना रहेगा। इसका कारण यह है कि रेडियो आवाज़ के माध्यम से लोगों के मन में विश्वास और आत्मीयता पैदा करता है।
शब्दों और ध्वनियों का यह संसार जनमानस को जानकारी भी देता है और उसे सोचने के लिए प्रेरित भी करता है। इसलिए समय के साथ तकनीक बदलती रहती है, लेकिन संवाद की जरूरत हमेशा बनी रहती है। रेडियो पत्रकारिता इसी संवाद की सशक्त परंपरा का हिस्सा है। यही कारण है कि तमाम नए माध्यमों के बावजूद रेडियो पत्रकारिता की प्रासंगिकता आज भी कायम है और आने वाले समय में भी इसकी आवाज़ समाज के साथ सुर में सुर मिलाकर इसी तरह गूंजती रहेगी।
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संजीव शर्मा तीन दशक से ज्यादा समय से मीडिया में सक्रिय हैं और फिलहाल आकाशवाणी भोपाल में सहायक निदेशक समाचार का दायित्व संभाल रहे हैं। आपको प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और पूर्व उप राष्ट्रपति हामिद अंसारी के साथ जापान और अफ्रीकी देशों की यात्रा पर जाने का अवसर मिला है और इन यात्राओं पर केन्द्रित कर पुस्तक‘चार देश चालीस कहानियां’ काफी लोकप्रिय हुई है. इन्होने हाल ही में अयोध्या पर केन्द्रित ‘अयोध्या 22 जनवरी’ नामक किताब भी लिखी है. संजीव शर्मा का ‘जुगाली’ jugaali.blogspot.com के नाम से एक ब्लॉग भी है.