ट्रम्प और नेतन्याहू के हसीन ख्व़ाब कहीं दुनिया को ना ले डूबें
ईरान पर इज़राइल-अमेरिका के वहशियाना हमले को अब पूरा एक महीना या बल्कि उससे भी दो दिन ज़्यादा ही हो चुके हैं. इस एक महीने में काफी कुछ स्पष्ट हो गया है और सबसे बड़ी बात यह पता चली है कि ईरान अपनी संप्रभुता का समपर्ण नहीं करने वाला. ईरान ने जिस तरह से इज़राइल-अमेरिका के ठिकानों पर अचूक हमले किये हैं, उससे लगता है कि ये दोनों हमलावर पहले ही ईरान से हार चुके हैं. अब अमेरिका या यूँ कहें कि ट्रम्प यह हल्ला कर रहा है कि वह ईरान पर ज़मीनी लड़ाई लडेगा और अपने सैनिक ईरान की धरती पर उतारेगा. अगर यह केवल बन्दर-घुड़की नहीं है और सचमुच अमेरिकी सैनिक ईरान की ज़मीन पर उतारता है तो फिर कहना होगा कि अपने अहंकार के चलते ट्रम्प अपने सैनिकों को मौत के मुंह में धकेल रहा है. हमारी चिंता यह है कि अगर यह युद्ध ऐसे ही चलता रहा तो कहीं यह एक विश्वयुद्ध में ना बदल जाए और कहीं ऐसा ना हो कि युद्धरत देश एक दूसरे के विरुद्ध आणविक हथियारों का इस्तेमाल ना शुरू कर दें.
ट्रम्प और नेतन्याहू के हसीन ख्व़ाब कहीं दुनिया को ना ले डूबें
विद्या भूषण अरोरा
सोचा था कि दूसरी सब देशी और विदेशी घटनाओं की तरह ईरान पर इज़राइल-अमेरिका के वहशियाना हमले की घटना भी यूँहीं गुज़र जायेगी और हमारा स्वयं से जो कुछ नया ना लिखने का वायदा सा हो रखा है, वह ऐसे ही निभता जाएगा. अब जब युद्ध महीना भर पुराना हो गया है और ख़त्म होने की बजाय लम्बा खिंचता लग रहा है तो अब ऐसा महसूस हो रहा है कि अपने भीतर हो रही कुलबुलाहट को अगर पूरी तरह ना भी कहें तो आधा-अधूरा ही सही, कुछ तो कहना ही होगा. वैसे तो अब जब हम एक ऐसे युग में पहुँच चुके हैं जब चैट जीपीटी या गूगल जेमिनाई जैसे किसी भी ए आई टूल की मदद से बिना कोई एक्स्ट्रा पैसे खर्चे, ना केवल आप सारी उपलब्ध जानकारी और विशेषज्ञों की राय इकठ्ठा कर सकते हैं बल्कि इस विषय पर (या किसी भी विषय पर) अपना ही लेख भी लिख सकते हैं तो फिर हम आपको अपने इस लेख में क्या ही नया बताएँगे. लेकिन फिर भी सुनिए आप हमारी बात!
आप कुछ यूँ समझ लीजिए कि हम इस युद्ध से उपज रही अपनी खीझ बल्कि उससे भी बढ़कर अपना दुःख और अपनी चिंताएं आपसे शेयर कर लेना चाहते हैं. अब आप ही बताइये कि इन दो राष्ट्राध्यक्षों की जोड़ी को क्या कहा जाए जिन्होंने (अपने ही देशवासियों की मर्ज़ी के विरुद्ध जाकर) बातचीत की मेज़ पर बैठे केवल ईरान पर ही यह वहशियाना युद्ध नहीं थोपा बल्कि लगभग पूरी दुनिया को ही जाने कितने समय के लिए उर्जा संकट के अँधेरे में धकेल दिया. ट्रम्प-नेतान्याहू की इस आपराधिक मूर्खता का ख़ामियाज़ा यह धरती माँ किस-किस रूप में भुगतेगी, इसका पूरा आकलन तो हमारे बाद आने वाली पीढियां ही कर पाएँगीं लेकिन हम जो तुरंत देखने वाले हैं वो ये है कि पूरी दुनिया की आर्थिक प्रगति पर ब्रेक लग जाएगा और उसका सबसे ज़्यादा असर दुनिया भर के गरीब पर ही पड़ेगा. कहने की आवश्यकता नहीं कि भारत जैसे देश जो अपनी उर्जा आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए युद्धरत पश्चिम एशिया के देशों पर ही निर्भर हैं, उन्हें इसके लिए ज़्यादा खर्च करना होगा और वैकल्पिक स्रोत तलाशने होंगे. पश्चिम एशिया के देशों में काम कर रहे लाखों भारतीय श्रमिकों के रोज़गार पर अगर अस्थायी असर भी पड़ा तो इसका सीधा असर हमारी अर्थव्यवस्था पर पडेगा और लाखों परिवारों के खर्च करने की क्षमता पर बहुत गहरा नकारात्मक असर पड़ेगा. इसके अलावा हमारी कृषि भी इस युद्ध के कारण नकारात्मक रूप से प्रभावित हो सकती है क्योंकि प्राकृतिक गैस के कम मिलने से यूरिया उत्पादन पर असर पड़ सकता है.
फ़िलहाल अगर हम भारत और भारत जैसे विकासशील देशों की अर्थव्यवस्था की चिंता को एक बार दरकिनार भी कर दें और युद्ध के नैतिक पक्ष पर ही बात करें तो कहना होगा कि अमेरिका और इज़राइल ने अपने-अपने लालच और अहंकार के चलते विश्व की सबसे प्राचीन सभ्यताओं में से एक पर यह हमला कर दिया और युद्ध के पहले ही दिन ना केवल ईरान के शीर्ष नेताओं की हत्या कर दी बल्कि दिन-दहाड़े एक स्कूल पर बम गिराकर 180 मासूम बच्चियों की भी ह्त्या कर दी! इन दोनों को यह उम्मीद थी कि इन नृशंस हत्याओं से घबराकर ईरान की जनता विद्रोह कर देगी और खुद से अमेरिका को हस्तक्षेप के लिए आमंत्रित करेगी. लेकिन हुआ इसका उलटा – ईरान की सरकार के धुर विरोधी भी इस कठिन समय में ना केवल सत्तापक्ष के साथ हो गए बल्कि ईरान की शहादत देने की परम्परा के अनुरूप ही पूरी जनता निडर होकर अमेरिका और इज़राइल के खिलाफ सड़कों पर प्रदर्शन करने उतर आई – एक तरह से इस जोड़ी को खुली चुनौती देती हुई कि आओ डालो बम हम पर भी!
फिर उसके बाद दुनिया भर ने देखी ईरान की मिसाइलों की ताक़त जिन्होंने पिछले एक माह में इज़राइल के विभिन्न सैन्य और औद्योगिक ठिकानों के साथ-साथ अरब देशों में स्थित अमरीकी अड्डों को भी नेस्तनाबूद कर दिया. हैरानी की बात है कि अपनी जासूसी क्षमताओं पर गर्व करने वाले इज़राइल को क्या इतना भी मालूम ना था कि ईरान की क्षमताएं क्या हैं या उसने ट्रम्प को बेवकूफ बना दिया जैसा कि बहुत सारे लोग मानते हैं. लेकिन फिर क्या उसे यह अन्दाज़ नहीं था कि अमेरिका भी ईरान पर काबू नहीं कर सकेगा और इतनी देर में इज़राइल तो ईरानी मिसाइलों से तबाह जैसा हो जायगा?
ईरान की ताक़त किसी से छिपी तो ही नहीं सकती क्योंकि पूरी दुनिया के सामने है कि वर्षों से अमेरिका द्वारा थोपे गए तमाम प्रतिबंधों के बावजूद ईरान में वैज्ञानिक और तकनीकी शिक्षा का स्तर बहुत अच्छा है और वहां महिलाओं समेत लगभग सभी पढ़े-लिखे हैं अर्थात साक्षरता दर लगभग शत-प्रतिशत है. ईरान की औरतें विज्ञानं और गणित की पढाई में पुरुषों से भी आगे नज़र आती हैं और बड़ी संख्या में वह वैज्ञानिक और डॉक्टर्स के रूप में काम कर रही हैं. ईरान ने प्रतिबंधों के बावजूद मिसाइल टेक्नोलोजी में अद्भुत दक्षता दिखाई है जिसकी बानगी हम आजकल देख ही रहे हैं. ईरान की फार्मा इंडस्ट्री भी विकसित देशों के मुकाबले की है बल्कि उनसे इस मायने में बेहतर है कि उनसे कहीं कम लागत में जटिल दवाओं का उत्पादन कर लेती है.डब्ल्यू एच ओ (WHO) ने अपने एक अध्ययन में बताया है कि कैंसर जैसे कई गंभीर रोगों की दवाएं ईरान में सस्ते दामों पर उपलब्ध हैं.
ऐसे में हम यह मानने को तैयार नहीं कि अमेरिका- इज़राइल की इस शैतान रूपी जोड़ी को ईरान की इन खूबियों का अन्दाज़ नहीं था. हो सकता है कि यह अंदाज़ ना हो कि ईरानी कारवाई इतनी त्वरित और कारगर होगी लेकिन पिछले वर्ष जून में ही जब ईरान ने यह दिखा दिया था कि वह इज़राइल के रक्षाकवच को धत्ता बताकर उसपर मिसाइलों से हमला कर सकता है तो फिर शक़ की कोई गुंजायश नहीं होनी चाहिए थी. लेकिन सवाल यह है कि अगर अमेरिका और इज़राइल के इस जुनून में कमी ना आई कि उन्हें ईरान में अपनी पिट्ठू सरकार ही चाहिए और इज़राइल को अपना ग्रेटर इज़राइल का सपना पूरा करना ही है तो फिर पता नहीं आने वाले वर्षों में विश्व में कभी शांति आएगी भी या नहीं!
यहीं से हमारी चिंता शुरू होती है. तेल के लिए अपने अनियंत्रित लालच के चलते अमेरिका और ईरान को हथियाकर ग्रेटर इज़राइल का अपना शैतानी सपना पूरा करने के लिए इज़राइल - क्या ये दोनों अपने इन इरादों को पूरा करने के लिए किसी भी सीमा तक जा सकते हैं? बस यही बड़ी चिंता का विषय है. अभी कल ही प्रकाशित हुए फ़ाइनन्शिअल टाइम्स के इंटरव्यू में ट्रम्प ने फिर से एक बार बेशर्मी से दोहराया है कि हमें ईरान का तेल चाहिए. लेकिन अभी एक महीने की लड़ाई में यह तो स्पष्ट हो चुका है कि ईरान ऐसी आसानी से अपनी संप्रभुता को नहीं जाने देगा. अब अगर इस व्यक्ति ने इसे व्यक्तिगत प्रतिष्ठा का विषय बना लिया और अमेरिका का संस्थागत ढांचा अपने सनकी राष्ट्रपति को नियंत्रित ना कर सका तो कहीं वह इज़राइल के साथ मिलकर युद्ध में आणविक हथियारों के इस्तेमाल की बात तो नहीं सोचने लगेगा?
ट्रम्प के व्यक्तित्व में गंभीर खामियों के बावजूद हमें विश्वास रखना चाहिए कि दुनिया आणविक युद्ध की ओर नहीं जा रही और अमेरिका के तमाम शहरों में ट्रम्प के ख़िलाफ़ हाल ही में जो भारी प्रदर्शन हुए हैं, उनका कुछ असर तो अमेरिकी राष्ट्रपति पर पड़ेगा और वह युद्ध से निकलने का ज़रूर कोई व्यवहारिक रास्ता निकल आएगा.
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