मैं से हरि तक: तादात्म्य की यात्रा
डॉ. मधु कपूर की सम्बन्धों पर चल रही दार्शनिक श्रृंखला का यह चौथा लेख है। अपने पिछले लेख में उन्होंने स्व और स्वामित्व के बीच सम्बन्ध पर चर्चा की थी और कि बताया था कि स्वामित्व की सीमाएँ कहाँ तक जाती हैं. आज के लेख में वह भारतीय दर्शन में, विशेषकर वेदांत में उल्लिखित 'तादात्म्य सम्बन्ध' पर चर्चा कर रही हैं. लेख में भारतीय दर्शन में द्वैत और अद्वैत संबंधों को कैसे देखते हैं, इस पर भी संक्षिप्त चर्चा है और साथ ही इस विषय पर प्रसिद्ध जर्मन दार्शनिक लाइबनिज़ के सिद्धांतों की भी बानगी है.
मैं से हरि तक: तादात्म्य की यात्रा
मधु कपूर
पिछले लेख में संयोग सम्बन्ध को पृथक सत्ता के रूप में देखा गया था। बिना सम्बन्धीद्वय को हानि पहुंचाए संयोग सम्बन्ध विच्छिन्न हो जाता है। जैसे घोड़े पर सवार व्यक्ति घुड़सवार कहा जाता है पर जैसे ही वह घोड़े से उतरता है उसका सम्बन्ध घोड़े से विच्छिन्न हो जाता है। पर कुछ सम्बन्ध ऐसे होते हैं, जिनमें सम्बन्धीद्वय परस्पर के बिना नहीं रह सकते हैं, जिन्हें अयूतसिद्ध अर्थात नित्य सम्बन्ध कहा जाता है। इनमे से एक के नष्ट होने पर दूसरे का अस्तित्व भी नष्ट हो जाता है। यह वह आन्तरिक सम्बन्ध है जो वस्तु और उसके गुण, क्रिया, जाति–व्यक्ति, अवयव–अवयवी आदि के बीच अनिवार्य रूप से विद्यमान रहता है। यह सम्बन्ध समवाय कहलाता है। जैसे धागों और वस्त्र का सम्बन्ध समवाय है। धागा जला देने से कपड़े का अस्तित्व समाप्त हो जाता है। इसी तरह गुलाब की खुशबू, घोड़े का दौड़ना, मनुष्यत्व का मनुष्य से सम्बन्ध तथा परमाणुओं का परस्पर सम्बन्ध अविभाज्य होता है, अर्थात इन्हें बिना किसी प्रकार की हानि पहुंचाए अलग नहीं किया जा सकता है।
सम्बन्धों की इस अनंत यात्रा में एक और अद्भुत संबंध है जिसे हमारे ऋषियों ने 'तादात्म्य' कहा है। । 'तादात्म्य' शब्द दो शब्दों से मिलकर बना है: तत् + आत्मन् (तस्य आत्मा तदात्मा, तस्य भावः तादात्म्यम्)। इसका शाब्दिक अर्थ है—"उसका ही स्वरूप हो जाना" । भारतीय दर्शन में विशेषकर वेदांत में 'तादात्म्य सम्बन्ध' एक अत्यंत महत्वपूर्ण स्थान रखता है । उनके अनुसार समुद्र की लहरों से समुद्र का कोई अलग अस्तित्व नहीं होता है। लहर दिखती अलग है, उसका नाम अलग है, रूप अलग है, लेकिन वह है तो समुद्र ही। यही तादात्म्य है—जहाँ दो वस्तुएं इतनी घुली-मिली हों कि एक को हटाते ही दूसरी स्वतः समाप्त हो जाती है। एक सोने की अंगूठी या हार को क्या सोने से अलग किया जा सकता हैं? अंगूठी का अपना कोई स्वतंत्र वजूद नहीं है, वह मूलतः सोना ही है। यही तादात्म्य है। घड़ा मिट्टी से अलग कुछ नहीं है। घड़े का 'आत्मन' (स्वरूप) मिट्टी ही है। मिट्टी और घड़े में कोई तीसरा संबंध नहीं है, बल्कि घड़ा अपनी सत्ता के लिए पूरी तरह मिट्टी पर आश्रित है। अर्थात तादात्म्य है। अग्नि और लौ, आग और उसकी उष्णता को अलग नहीं किया जा सकता।
अद्वैतवादी सम्बन्ध जैसा कोई बाहरी सत्ता स्वीकार ही नहीं करते हैं। अद्वैत तो द्वैत का निषेध है जबकि सम्बन्ध के लिए दो का होना ज़रूरी है। जैसे जीव (आत्मा) और ब्रह्म (परमात्मा) के बीच कोई 'संयोग' या 'समवाय' संबंध नहीं है, बल्कि 'तादात्म्य' है। लहर का अस्तित्व समुद्र से पृथक नहीं है, लहरें तो स्वयं जल स्वरूप है । रूप का अंतर है, तत्व का नहीं। यही अद्वैत का तादात्म्य सम्बन्ध है। उपनिषद का प्रसिद्ध महावाक्य 'तत्त्वमसि' (वह तुम ही हो) या 'अहं ब्रह्मास्मि' (मैं ही ब्रह्म हूँ) इसी तादात्म्य को दिखाता है। यहाँ 'अहं' और 'ब्रह्म' दो अलग सत्ताएँ नहीं हैं, दोनों एक ही हैं। जहाँ केवल एक ही तत्व हो, वहाँ सिर्फ तादात्म्य होता है। अद्वैत का अर्थ है—"जहाँ दूसरा कोई न हो"। वहाँ संबंध विलीन हो जाता हैं, केवल 'स्वरूप' बचता है। इसी अद्वैतस्वरूप पर द्वैत का एक कल्पित पर्दा हम डाल देते है।
इसके विपरीत, द्वैत वेदांत (जैसे माध्वाचार्य का दर्शन) में ईश्वर और जीव को हमेशा के लिए एक-दूसरे से अलग माना जाता हैं। उनके लिए सम्बन्ध का मतलब हमेशा दो अलग सत्ताओं का जुड़ाव है।
द्वैत दर्शन कहता है कि यदि जीव और ब्रह्म एक ही हैं, तो संसार का सारा लौकिक व्यवहार समाप्त हो जाएगा। भक्त और भगवान कभी एक नहीं हो सकते हैं। द्वैतवादी किसी भी तरह से 'अभेदात्मक तादात्म्य' को स्वीकार नहीं करते। यदि वे तादात्म्य शब्द का प्रयोग करते भी हैं, तो उसका अर्थ 'सादृश्य' या 'आश्रित होना' होता है, न कि पूरी तरह से एक हो जाना। एक भक्त अपने स्वामी के विचारों में कितना भी डूब जाए, वह कभी भगवान बनना नहीं चाहता है। द्वैत के अनुसार, सम्बन्ध हमेशा दो वास्तविक वस्तुओं के बीच की यथार्थ कड़ी है।
रामानुजाचार्य के विशिष्टाद्वैत या भेदाभेद दर्शन तादात्म्य को बहुत ही व्यावहारिक रूप देते हैं: इसे 'अपृथक्सिद्धि' या 'भेद-सहिष्णु अभेद' कहते हैं। जैसे हमारा शरीर और हमारी आत्मा अलग-अलग दिखते हैं, लेकिन शरीर आत्मा के बिना रह नहीं सकता (अभेद)। संसार और जीव ईश्वर के शरीर हैं। यह ऐसा तादात्म्य है जिसमें भेद भी सुरक्षित रहता है और अभेद भी।
द्वैत की दृष्टि से सम्बन्ध यथार्थ है, क्योंकि दोनो वस्तुएं वास्तविक हैं। अद्वैत की दृष्टि से संबंध अंततः मानसिक कल्पना या अविद्या है। जब तक अज्ञान है, तब तक सम्बन्ध दिखाई देता हैं जैसे रस्सी में सांप का दिखना। जैसे ही परम ज्ञान होता है, सारे संबंध 'तादात्म्य' में बदलकर विलीन हो जाते हैं और केवल एक अद्वैत सत्ता बचती है।
यही तत्त्व न्याय दार्शनिक स्वरूप संबंध के माध्यम से समझाते है । स्वरूप संबंध में कोई अलग से सम्बन्ध अस्तित्व में नहीं होता, बल्कि वस्तु का 'अपना स्वरूप' ही सम्बन्ध का काम करता है। न्याय कहता है कि जब दो चीजों को जोड़ने के लिए दुनिया का कोई सम्बन्ध काम न आए, तो वस्तु का अपना 'होना' ही संबंध बन जाता है। जैसे खाली जमीन और उस पर बिखरा सन्नाटा। सन्नाटा और जमीन को जोड़ने के लिए किसी सम्बन्ध की आवश्यकता नहीं होती है, जमीन का स्वरूप ही उस सन्नाटे का संबंध है। हम कहते हैं—'मेज पर घड़े का अभाव है।' अब प्रश्न है कि 'मेज' और 'घड़े के अभाव' के बीच क्या संबंध है? यह सम्बन्ध न तो संयोग है न ही समवाय है। यहाँ मेज का अपना 'स्वरूप' ही उस घड़े के अभाव को थामे हुए है। इसलिए इसे स्वरूप संबंध कहते हैं। लेकिन तादात्म्य में दोनों पिघलकर एक हो जाती हैं। स्वरूप सम्बन्ध लौकिक व्यवहार के उपयुक्त है, तो तादात्म्य परम आध्यात्मिक सत्य है। जहाँ दो चीज़ें ऊपर से अलग-अलग दिखाई देती हैं, लेकिन वास्तव में वे एक ही तत्व अभेद तादात्म्य है, जो दो ऐसी सत्ताओं के बीच होता है जो एक-दूसरे के बिना रह ही नहीं सकते और अंततः एक ही तत्व में विलीन हो जाते हैं। प्रश्न उठता है —क्या दो भिन्न दिखने वाली वस्तुएं वास्तव में एक हो सकती हैं?
इस प्रसंग में जर्मन दार्शनिक गॉटफ्राइड विल्हेम लाइबनिज़ (Gottfried Wilhelm Leibniz) का 'तादात्म्य' या अभेद का सिद्धांत का उल्लेख करना गणितीय रूप से सटीक प्रतीत होता है। उनके इस सिद्धांत को Identity of Indiscernibles अर्थात उनके अनुसार यदि दो वस्तुओं में गुण, विशेषताएँ एक जैसी है, तो वे दो अलग वस्तुएँ हो ही नहीं सकतीं, वे वास्तव में एक ही होती हैं।
इसे गणितीय तर्क से इस प्रकार समझा जा सकता है:यदि क और ख के सभी गुण बिल्कुल समान हैं, तो क और ख दो नहीं एक ही सत्ता है। वे मानते हैं कि ब्रह्मांड में ऐसी दो वस्तुएँ असंभव हैं जो हर मामले में एक जैसी हों और फिर भी अलग-अलग हों। अगर उनके गुण, उनका स्थान, उनका समय—सब कुछ एक है, तो उनके बीच कोई 'भेद' नहीं रह जाता। वे दोनों मिलकर 'एक ही तत्व' (Identity) बन जाते हैं। यदि दो पत्तियों के सारे गुण परमाणु के स्तर पर एक हो जाएं, तो वे दो पत्तियां नहीं रहेंगी, वे एक ही पत्ती कहलाएंगी। लेकिन लाइबनिज़ कहते हैं कि इस दुनिया में कोई भी दो चीज़ें हूबहू एक जैसी नहीं हो सकतीं है। अगर दो चीज़ों के रंग, रूप, परमाणु और उनके रहने का स्थान बिल्कुल एक हो, तो वे कभी दो हो ही नहीं सकते। गणितीय रूप से वे दो बचेंगी ही नहीं, वे पिघलकर 'एक' हो जाएंगी पृथक हो ही नहीं सकते।
लाइबनिज़ का मानना था कि इस ब्रह्मांड के मूल उपादान Monads हैं, जो अणु स्वरूप होते है, वे स्वयं में इतने सम्पूर्ण होते है कि उनमे कोई 'खिड़कियां' नहीं होतीं है, जहाँ से कुछ भीतर आ सके। वे अपने आप में पर्याप्त होते है, इसलिए प्रत्येक Monad अपने स्वरूप में पूरा ब्रह्माण्ड सूक्ष्म रूप से समेटे रहता है, इसलिए वे स्वतंत्र होते है। उनके अनुसार, जिसे हम बाहरी संबंध कहते हैं, वह असल में ईश्वर द्वारा पहले से स्थापित सामंजस्य (Pre-established Harmony) है। सभी संबंध आंतरिक होते हैं; यदि दो चीजें सम्बंधित दिखती हैं, तो ऐसा इसलिए है क्योंकि उनके आपसी सम्बन्ध संगीत ऑर्केस्ट्रा की तरह होते है। सब कुछ पहले से ही पूर्व अभ्यास के द्वारा निर्धारित होता हैं कब कौन सा वाद्य कितने समय के लिए बजेगा। मंच पर आने पर बिना किसी कथोपकथन के अपना अपना वाद्य पूर्णता से बजाते हैं।
अद्वैत कहता है कि नाम और रूप केवल मानसिक कल्पना हैं। जब गुण मिटते हैं, तो अंतर्निहित 'सत्य' (ब्रह्म) का तादात्म्य प्रकट होता है। यानी अद्वैत गुणों को नकार कर अभेद तक पहुँचता है। इसके विपरीत, लाइबनिज़ गुणों के माध्यम से अभेद सिद्ध करते हैं। वे कहते हैं कि वस्तुएं अपने गुणों से ही पहचानी जाती हैं। अगर गुण अलग हैं, तो वस्तुएं अलग हैं। अगर गुण एक हैं, तो वस्तुएं एक हैं।
जहाँ अद्वैत वेदांत कहता है कि आभूषणों के 'रूप' को यदि नकार दे तो केवल 'सोना' बचता है, जो कि तादात्म्य है वहीं लाइबनिज़ कहते हैं कि अगर दो आभूषणों के सारे गुण एक जैसे हैं तो वे अलग-अलग आभूषण हैं ही नहीं, वे एक ही हैं। प्राच्य दर्शन जहाँ चेतना के धरातल पर सब कुछ एक कर देता है, वहीं पश्चिम तर्क और विज्ञान के धरातल पर आकर कहता है कि पूर्ण समानता ही वास्तव में 'तादात्म्य' है। कबीर दास जी के शब्दों में —
प्रेम गली अति सांकरी, जामें दोय न समाहिं।
जब मैं था तब हरि नहीं, अब हरि हैं मैं नाहिं॥
जैसे ही व्यक्ति का "मैं"-भाव समाप्त होता है, वैसे ही वह प्रभु से एक हो जाता है।
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डॉ मधु कपूर कलकत्ता के एक प्रतिष्ठित कॉलेज में दर्शनशास्त्र की प्रोफेसर रही हैं। दर्शनशास्त्र के अलावा साहित्य में उनकी विशेष रुचि रही है। उन्हीं के शब्दों में, "दार्शनिक उलझनों की गुत्थियों को साहित्य के रास्ते में तलाशती हूं।" डॉ कपूर ने हिंदी से बंगला में कुछ पुस्तकों का अनुवाद किया है और कुछ कविता संग्रह भी प्रकाशित हुए हैं। अभी हाल ही में उनकी पुस्तक "द्रष्टा दृश्य और दर्शन दर्शन - एक चौथे आयाम की खोज" प्रकाशित हुई है. इससे पहले भी उनके निबंधों का एक संग्रह Dice Doodle Droll Dance आ चुका है।