राममनोहर लोहिया : भारत की हिमालय नीति - पुस्तक समीक्षा
राममनोहर लोहिया:भारत की हिमालय नीति - अशोक पंकज की यह दूसरी पुस्तक है जो उन्होंने डॉ राम मनोहर लोहिया के विचारों को आधार बनाते हुए लिखी है. इससे पहले उनकी पुस्तक "लोहिया के सपनों का भारत - भारतीय समाजवाद की रुपरेखा" आ चुकी है जिसकी समीक्षा आप इसी वेब पत्रिका में यहाँ पढ़ चुके हैं. भारत की हिमालयी नीति में अशोक पंकज ने हिमालय एवं चीन पर डॉ लोहिया की प्रस्थापनाओं पर गंभीर विचार किया है और उन्हें सिलसिलेवार ढंग से रखा है ताकि इस विषय पर उनके विचारों को वर्तमान सन्दर्भ में समझा जा सके. पुस्तक की समीक्षा डॉ जैन बहादुर ने की है जिन्होंने उनकी पिछली पुस्तक की समीक्षा भी की थी.
राममनोहर लोहिया:भारत की हिमालय नीति
डॉ जैन बहादुर
डॉ. राममनोहर लोहिया की अधिक लोकप्रियता लोगों में एक राजनेता और सामाजिक चिंतक की रही है । अमूमन राजनीति से लेकर अकादमिक जगत तक लोहिया के राजनीतिक, सामाजिक विचारों संबंधी लेखों, भाषणों को ही लिपिबद्ध एवं उद्धरित करने का चलन रहा है । लेकिन इसके बरक्स लोहिया नीतिकार भी थे और विदेश नीति की अच्छी समझ रखने वाले व्यक्तित्व थे । लोहिया की वैचारिकी समझ में जो विविधता और गूढ़ता है उस पर लिखना निश्चित रूप चुनौतीपूर्ण बौद्धिक कार्य है ।
आजादी के पश्चात् देश के समक्ष विभिन्न प्रकार की समस्याएँ थी, जिसमें से एक भारत- चीन सीमा विवाद भी था, जो अभी भी बना हुआ है । काउंसिल फॉर सोशल डेवेलपमेंट, दिल्ली में कार्यरत प्रो. अशोक पंकज ने अपनी पुस्तक ‘राममनोहर लोहिया: भारत की हिमालय नीति’ में भारत-चीन सीमा विवाद संबंधी समस्याओं की पड़ताल की है । प्रो. अशोक पंकज इस पुस्तक में भारत-चीन सीमा विवाद समस्या को लोहिया के वैचारिक दृष्टिकोण से विश्लेषित करते है, जिसमें लोहिया के नजरिए से इस समस्या को ऐतिहासिक, सांस्कृतिक, भौगोलिक पृष्ठभूमि में समझाते हैं । इस किताब से पहले प्रो अशोक पंकज ने ‘लोहिया के सपनों का भारत, भारतीय समाजवाद की रुपरेखा’ लिखी है, जिसकी अगली कड़ी में यह पुस्तक लिपिबद्ध की गई है ।
भारत-चीन सीमा विवाद की समस्या नई नहीं है । यह दशकों से चली आ रही है जिसके समाधान के लिए अभी भी कोई पुख्ता नीति निर्मित नहीं हुई है । लेकिन लोहिया इस समस्या को इसके जन्म से लेकर जब तक जीवित रहे तब तक अवलोकित और देश को सावधान करते रहे । लोहिया चीन के प्रति दो दृष्टि रखते थे- एक आजादी से पूर्व दूसरी आजादी के पश्चात् । आजादी से पूर्व लोहिया चीन के प्रति सकारात्मक दृष्टिकोण रखते थे । जापान, चीन युद्ध के दौरान लोहिया वैचारिकी रूप से चीन के साथ थे, और उम्मीद करते थे कि चीन लोकतान्त्रिक, समाजवादी सिद्धांतों पर चलकर तीसरे खेमे के राष्ट्रों की एकता को मजबूत करेगा, लेकिन जब चीन साम्यवादी हो गया तो इसकी विस्तारवादी नीतियों, महत्वाकांक्षाओं से लोहिया सशंकित हो गए और तत्कालीन भारत सरकार को लगातार सावधान करते रहे ।
लोहिया संपूर्ण हिमालय को भारत का विस्तारित क्षेत्र मानते थे और उसके पड़ोसी राष्ट्रों (नेपाल, तिब्बत, भूटान) को ‘भाई हिमालय’ की संज्ञा देते हैं । ऐसा करके लोहिया न केवल मैत्रीपूर्ण संबंधों को बल्कि सामरिक दृष्टिकोण को भी मजबूत करना चाहते थे। लोहिया हिमालय के पड़ोसी राष्ट्रों और चीन सीमा रेखा तक के क्षेत्रों पर दावा ऐतिहासिक, सांस्कृतिक, धार्मिक, एवं परंपरागत रूप से प्रचलित मान्यताओं, मिथकों के आधार पर करते हैं, जिसमें प्रमुख रूप से मानसरोवर में शिव-पार्वती के निवास का जिक्र करते हैं ।
लेखक पुस्तक में इस बात का उल्लेख करते है कि किस प्रकार लोहिया आजादी के पश्चात् साम्यवादी चीन का तिब्बत में प्रत्यक्ष हस्तक्षेप को भारत के लिए खतरा मानते हैं । लोहिया ने तिब्बत में चीन के हस्तेक्षप, उसकी बढ़ती महत्वाकांक्षा को भांप लिया था और इस बारे में वह लगातार भारत सरकार को चेताते रहे । लेकिन लोहिया के विचारों को नजरंदाज किया जाता रहा और तत्कालीन सरकार ‘गुटनिरपेक्षता’, ‘पंचशील सिद्धांत’ एवं ‘हिंदी चीनी भाई- भाई’ जैसे सिद्धांतो से गौरवान्वित होती रही और चीन के प्रति एक तरह के स्नेहभाव में डूबी रही । चीन के प्रति इस प्रकार के गैर-जिम्मेदाराना सरकारी रवैये को देखते हुए लोहिया इस विषय को जनता के बीच लेकर जाते हैं । इस संदर्भ में लोहिया 19 जनवरी 1949 को लखनऊ सम्मेलन में कहते है कि- “हमारी उत्तरी सीमा की तरफ कम्युनिस्टों के बढ़ते खतरे की ओर मैं ध्यान आकर्षित कराना चाहता हूँ कि बड़ी संख्या में चीनी कम्युनिस्ट, तिब्बत में चले आए है और कई मठों को अपने सैद्धांतिक प्रभाव में कर लिया है और गुप्त रूप से इस सुंदर देश में हथियार जमा कर रहे हैं । उन कम्युनिस्टों ने नेपाल की तरफ भी आँखे लगा दी है और उस देश में कम्युनिस्ट क्रियाकलाप बढ़ता जा रहा है ।” लोहिया, चीन की बढ़ती अतिक्रमण गतिविधियों के प्रति सरकार का ध्यान दिलाते हुए देश को सामरिक दृष्टिकोण से मजबूत करने पर बल देते हैं ।
सरकार द्वारा भारत- चीन सीमा विवाद या हिमालय क्षेत्र के पड़ोसी देशों के प्रति ध्यान नहीं दिए जाने पर लोहिया नागपुर में दिसंबर 1950 में ‘हिमालय नीति’ की घोषणा करते हैं । इस नीति में उन्होंने हिमालय और भारत की उत्तरी सीमा की सुरक्षा के प्रश्न को प्रमुख अंग बनाया हैं । ‘हिमालय नीति’ में लोहिया तिब्बत की सुरक्षा, हिमालय क्षेत्र के पड़ोसी राष्ट्रों जैसे-नेपाल, भूटान के साथ, स्वतंत्रता, समानता, भाईचारे, एकता, अखंडता एवं संप्रभुता के संबंध पर बल देते हैं । उन्होंने इस नीति के तहत पूरे हिमालय क्षेत्र के लोगों के विकास की भी बात की हैं और हिमालय क्षेत्र के राष्ट्रों को लोकतांत्रिक एवं समाजवादी रास्ते पर चलकर तीसरे खेमे की नीति के तहत आगे बढ़ने की वकालत की हैं । अंत में भारत सरकार को एक सलाह भी देते हैं कि पूरे हिमालय क्षेत्र के विकास के लिए एक स्वतंत्र मंत्रालय की स्थापना की जाए । लोहिया हिमालय को लेकर प्रचलित ‘संतरी’ जैसे मिथक का खंडन करते हुए आज के वैज्ञानिक, तकनीकी दौर में हिमालय के अभेद्य, दुर्गम मान्यता को ख़ारिज करते हैं।
लोहिया ‘भाई हिमालय’ के साथ राजनीतिक, सामरिक संबंध सकारात्मक बनाए रखने के लिए इन देशों में सामाजिक, आर्थिक, शैक्षिक विकास और सुरक्षा की जवाबदेही भारत के प्रति तय करते हैं जिससे ‘भाई हिमालय’ न केवल भौगोलिक बल्कि भावनात्मक रूप से भी भारत का हिस्सा महसूस कर सके । इस क्रम में लोहिया तिब्बत की स्वतंत्रता की रक्षा और नेपाल एवं भूटान जैसे राष्ट्रों में लोकतान्त्रिक सुधारों को हिमालय नीति का मुख्य बिन्दु मानते हैं । लोहिया जहाँ नेपाल में आंतरिक सुरक्षा के लिए राजशाही के खिलाफ कांग्रेस जनांदोलन का समर्थन करते हैं वहीं भूटान में राजतंत्र के खिलाफ लोकतंत्र का समर्थन करते हैं । लोहिया चाहते थे कि भारत, तिब्बत, भूटान और नेपाल में होने वाले सामाजिक, राजनीतिक बदलाव का समर्थन करे जिसे भारत की विदेश एवं सामरिक नीति मजबूत हो सके अन्यथा चीन या साम्यवाद, अटलांटिक गुट इस क्षेत्र में हस्तेक्षप कर सकता है ।
सांस्कृतिक एकीकरण के दृष्टि से लोहिया उत्तर-पूर्वी क्षेत्र, जिसका औपनिवेशिक नाम ‘नेफा’ था, का भारतीयकरण करते हुए इसका नाम ‘उर्वसीअम’ और माउन्ट एवरेस्ट का नाम बदलकर ‘सगरमाथा’करते हैं जिससे भारत और हिमालयी क्षेत्रों का सांस्कृतिक आत्मसातीकरण हो सके ।
लोहिया 1950 में चीन के प्रत्यक्ष रूप से तिब्बत में घुसपैठ को ‘राक्षस’ द्वारा ‘शिशु हत्या’ की संज्ञा दी। चीन के तिब्बत में घुसपैठ को लोहिया वैचारिकी राजनीति एवं नीतिगत स्तर पर आलोचना करते हैं और इसके लिए भारत सरकार की तटस्थता को जिम्मेदार ठहराते हैं । चीन का तिब्बत में घुसपैठ के पश्चात् लोहिया भारत-चीन संबंध को नए सिरे से देखने लगते हैं और भारत सरकार को सावधान रहने की सलाह देते हैं। इस समस्या को लोहिया न केवल सरकार के समक्ष बल्कि लेखों, भाषणों सम्मेलनों के माध्यम से जनता के बीच भी लेकर जाते हैं । सोशलिस्ट पार्टी की कार्यकारिणी बैठक में तत्कालीन सरकार की आलोचना करते हुए लोहिया कहते हैं कि भारत की विदेश नीति ‘थोथे आदर्श और अति व्यावहारिकता’ से ग्रसित है। लोहिया केवल आलोचना ही नहीं करते बल्कि चीन के दुर्भावनापूर्ण एवं कपटपूर्ण पैतरों से बचने के लिए सुरक्षात्मक रूप से विभिन्न सिद्धांतों एवं तरकीबों को भी सुझाते हैं । भारत-चीन के बीच आर्थिक, सामरिक शक्ति संबंधों को मजबूती प्रदान करने के लिए लोहिया ‘बाँह और मुट्ठी’, ‘कबूतर एवं बाज’ का सिद्धांत देते हैं । वह बताते हैं कि -“आर्थिक शक्ति और सामरिक शक्ति में वही संबंध है जैसा भुजा और मुठ्ठी का यदि भुजा लंबी होगी तो मुठ्ठी जरुर मजबूत होगी ।” सामरिक दृष्टि से लोहिया कहते है कि “मैं चाहता हूँ कि अगर हमारे ऊपर हमला न हो, जमीन न जाए तो दुनिया में पूरे फाख्ते की तरह रहना चाहिए-वह फाख्ता कबूतर शांतिवाला-लेकिन कोई हमारे ऊपर हमला करे तो उस वक्त तो हमें बाज बनना चाहिए ।”
अंत में लेखक ने भारत-चीन सीमा विवाद को समसामयिक रूप से उल्लेखित किया है । युद्ध के दौरान भारत की कूटनीति, विदेश एवं सामरिक नीतियों की अंतर्क्रिया, वार्तालापों, तैयारियों, कमजोरियों का विश्लेषण किया है। लेखक ने भारत-चीन के बीच वर्तमान में आर्थिक, सामरिक जैसे अन्य संसाधनों का तुलनात्मक आँकड़ा, क्षमता को प्रस्तुत किया है । लेखक ने लोहिया के विचारों के आधार पर भारत-चीन संबंधों के संदर्भ में जिन समस्याओं, मुद्दों को उठाया है उसकी प्रासंगिकता अभी भी बनी हुई है, जिसकी परिणिति समय-समय पर देखने को मिलती है । इस पुस्तक के माध्यम से लेखक ने दशकों से विद्यमान मुद्दे पर फिर से नीतिगत स्तर सोचने, संवाद करने को मजबूर कर दिया। यह पुस्तक अकादमिक जगत में चर्चा परिचर्चा, शोध करने और विदेश नीति की अंतर्दृष्टिपूर्ण समझ विकसित करने के लिए महत्वपूर्ण स्रोत है ।
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अशोक पंकज, राममनोहर लोहिया:भारत की हिमालय नीति, 2025, रु. 300, 208 पृष्ठ, नई दिल्ली: लोकभारती प्रकाशन, ISBN 978-93-49180-81-9

डॉ जैन बहादुर
शिक्षा विभाग, दिल्ली विश्वविद्यालय से पीएचडी हैं।
ईमेल – jainbahaduryadav@gmail.com