शब्द और अर्थ का भेद केवल व्यावहारिक - दोनों एक ही सत्ता के रूप
संबंधों को लेकर डॉ मधु कपूर ने अपने दार्शनिक निबंधों की श्रृंखला में पहला निबंध २६ जुलाई को लिखा था जिसका शीर्षक था – सम्बन्ध की सत्ता : यथार्थ या मानसिक कल्पना। इसके बाद उन्होंने इसी श्रृंखला में छह निबंध लिखे। अपने आज के निबंध के बारे में उन्होंने सूचित किया है कि सम्बन्ध श्रृंखला का यह अंतिम से पूर्व का निबंध है अर्थात इसके बाद एक और निबंध आएगा और उसके बाद यह श्रृंखला सम्पन्न हो जाये। इस निबंध में डॉ मधु कपूर हमें इस भारतीय परंपरा से परिचित कराती हैं जो यह प्रतिपादित करती है कि भाषा, चेतना और ब्रह्माण्ड तीन अलग-अलग चीजें नहीं, बल्कि एक ही परम सत्य के विभिन्न आयाम हैं। शब्द और अर्थ कितना भेदरहित हैं, इसको समझाने के लिए वह गोस्वामी तुलसीदास की यह चौपाई भी उधृत करती हैं – “गिरा अर्थ जल बीच सम, कहियत भिन्न न भिन्न”! पूरी बात समझने के लिए आइये पढ़ते हैं यह लेख।
शब्द और अर्थ का भेद केवल व्यावहारिक - दोनों एक ही सत्ता के रूप
डॉ मधु कपूर
वक्ता जब कोई शब्द उच्चारण करता है तो उस भाषा के जानकार श्रोता को सहज ही उससे अर्थ बोध हो जाता है। साधारणत शब्द और अर्थ के बीच इस सम्बन्ध को सामयिक कहा जाता हैं अर्थात जो लोक व्यवहार के द्वारा निर्धारित होता है। एक विशेष शब्द को सुनने के साथ ही साथ एक विशेष अर्थ उपस्थित हो जाता है। यह शब्द निहित शक्ति का चमत्कार है जो अर्थबोध करवाने में समर्थ होता है।
जब वक्ता कुछ बोलता है, तो हवा में ध्वनियाँ (वर्ण) पैदा होती हैं—प, व, न (पवन)। ये ध्वनियाँ एक-एक करके गायब हो जाती हैं, लेकिन श्रोता के मन में इन सबका योग होकर एक वैचारिक स्फुरण पैदा होता है, जिसे 'स्फोट' कहा जाता है। अलग-अलग ध्वनियों को सुनकर, जैसे ही अंतिम अक्षर की ध्वनि खत्म होती है, पूरे शब्द का एक निश्चित अर्थ श्रोता के दिमाग में कौंध उठता है। अक्षरों की ध्वनियाँ तो बाह्यिक है, असली शब्द श्रोता के मन में अखंड रूप में पहले से मौजूद होता है जो अचानक स्फुटित हो उठता है, और श्रोता को तुरंत अर्थ बोध हो जाता है। शब्द और अर्थ के इस सम्बन्ध को वाच्य-वाचक-भाव कहा जाता है।
भर्तृहरि के अनुसार, यह स्फोट ही 'शब्दब्रह्म' है। पूरी सृष्टि इसी शब्द-तत्व से पैदा हुई है। जिस प्रकार एक बीज में पूरा वृक्ष छिपा होता है, उसी प्रकार चेतना से आवृत शब्दब्रह्म में ही संपूर्ण सृष्टि का अर्थ छिपा होता है। इसलिए, शब्द और अर्थ अलग नहीं हैं—वे एक ही चेतना के दो पहलू होते है। कवि कालिदास की विख्यात उक्ति से कौन नहीं परिचित है —वागर्थ इव संपृक्तौ। इस तरह हमारा चिंतन भाषा के आवर्त में कर्ण के कवच और कुण्डल की तरह मढ़ा होता है।
यदि शब्द और अर्थ में तादात्म्य न हो, तो भाषा के जरिए विचारों का सम्प्रेषण असंभव हो जाएगा। कविता या साहित्य पढ़ते समय जब पाठक शब्द के साथ उसके भाव (अर्थ) में पूरी तरह डूब जाता है, तो वह इसी तादात्म्य के कारण ही काव्यानंद ले पाता है। उदाहरण के लिए यदि कोई कहे, "सूर्यास्त हो गया।" तो वाक्य का वाच्यार्थ है सूरज डूब गया। ध्वन्यार्थ है विद्यार्थी के लिए पढने का समय हो गया, चरवाहे के लिए घर लौटने का समय हो गया, और भक्त के लिए संध्या आरती का समय हो गया है, चोर के लिए चोरी का समय हो गया है।
भाषा का मूल आधार यही सम्बन्ध है। प्रश्न है कि यह सम्बन्ध कहाँ रहता है? देखा जाए तो यह सम्बन्ध न तो शब्द में निहित होता है और न ही केवल अर्थ में। यद्यपि वैयाकरण आचार्य मानते है कि सम्बन्ध के कारण ही भाषा जीवित और सार्थक बनती है। तथापि सवाल अनुत्तरित रह जाता है कि यह सम्बन्ध कहाँ रहता है?
कुछ वैयाकरण शब्द और अर्थ का सम्बन्ध स्वाभाविक मानते हैं। जैसे माता पुत्र का सम्बन्ध स्वाभाविक है, लेकिन भीड़ में यह पता लगाना मुश्किल हो जाता है कि ‘कौन पुत्र है’ और ‘कौन माता है’ और यह निर्भर करता है ज्ञाता पर जो उस सम्बन्ध से परिचित है। इसी तरह ‘जल’ शब्द से जिस सामान्य जल पदार्थ का बोध होता है, उसे पहले ही समाज ने स्वीकृति प्रदान कर दी है। इसलिए ‘जल’ शब्द सुनने से जल पदार्थ का बोध सहज भाव से श्रोता को हो जाता है। लेकिन समुद्र का जल अथवा नदी का जल या तालाब का जल यह प्रकरण सापेक्ष होता है। जिस प्रकार चक्षुरिन्द्रियों की स्वाभाविक योग्यता प्रत्यक्ष कराना है, उसी प्रकार शब्द की स्वाभाविक योग्यता अर्थ-बोध कराना है।
यूँ तो वैयाकरणों ने इस शब्दवृत्ति (शक्ति) को कई रूपों में देखा है। जैसे शब्द का मुख्यार्थ बताने वाली शक्ति को अभिधा शक्ति कहते हैं। उदाहरण स्वरूप ‘वृक्ष’ शब्द का अर्थ वृक्ष पदार्थ के लिए निश्चित कर दिया गया है। अतः ‘वृक्ष’ शब्द सुनने मात्र से हमें सामान्य वृक्ष का बोध हो जाता है। लेकिन जब मुख्य अर्थ के साथ अर्थ की संगति नहीं होती है, तो लाक्षणिक अर्थ ग्रहण करना पड़ता है। उदाहरण के लिए यदि कोई वक्ता कहे ‘मोहन गधा है’ तो इसका लाक्षणिक अर्थ है मोहन मूर्ख या विवेकहीन है। लेकिन जब शब्द की दोनों ही शक्तियां काम नहीं करती है, तो वहां व्यञ्जना शक्ति का सहारा लेना पड़ता है। दृष्टान्त स्वरूप ‘दूरस्था भूधरा रम्या, समीपस्था तु बर्बरा’ — इसका शाब्दिक अर्थ है — दूर से देखने पर पर्वत सुहाने लगते है पर निकट जाने पर उबड़-खाबड़ दिखाई देते है। किन्तु इसका व्यञ्जनार्थ है राजा दूर से लगते है, पास जाने पर उनके राजकीय रोष आदि का सामना करना पड़ता है। काव्य साहित्य तो इसी व्यंजना की गुणवत्ता पर ही टिका रहता है।
कुछ आचार्य इस सम्बन्ध को नैसर्गिक आवाज़ मानते हैं। जैसे —फड़फड़ाना, घरघराना, पटपटाना, कड़कडाना, फटफटाना, सरसराना इत्यादि — ये ऐसे शब्द है जो ध्वनि सापेक्ष होते है। इस तरह शब्द और अर्थ के बीच का सम्बन्ध केवल व्याकरणिक नहीं, बल्कि अस्तित्वगत भी होता है। ‘सरसराना’ शब्द किसी रेंगने वाले प्राणी के लिए प्रयुक्त होता है। इसी तरह ‘घट’ शब्द कहने से न तो घट के किसी एक हिस्से का और न ही किसी पट पदार्थ का बोध होता है, बल्कि एक समग्र घट पदार्थ का बोध होता है। व्याकरण की दृष्टि से अर्थ या वस्तु की सत्ता बাह्यिक जगत में होती है, किन्तु अक्सर यह वस्तु बुद्धिस्थ भी होती है उदाहरण के लिए जब हम परी कथाओं के सम्बन्ध में पढ़ते है, तो उनका बाह्यार्थ न होने पर भी उन काल्पनिक कथानकों का अर्थ बोध हमें सहज रूप से हो जाता है, क्योंकि शब्द अपने बौद्धार्थ के साथ एकाकार हो जाता है। इन दोनों को जोड़ने वाला सेतु ही सम्बन्ध है। प्रश्न उठता है यह सेतु कहाँ रहता है?
हमने पिछले लेख में सम्बन्ध कारक का उल्लेख किया था जिसका अर्थ स्वामित्व और अधिकार से जुड़ा था। इसके अलावा अन्यान्य सभी विभक्तियों का संपर्क किसी न किसी प्रकार के सम्बन्ध से जुड़ा रहता है। जैसे प्रथमा विभक्ति कर्ता के सम्बन्ध को दर्शाती है—‘राम पढता है’। द्वितीया विभक्ति विषय (कर्म ) को दर्शाती है जैसे ‘राम पुस्तक पढता है’। इस वाक्य में ‘पुस्तक’ कर्म है जो पढने की क्रिया से जुड़ा है। तृतीया विभक्ति साधन या करण को दर्शाता है, जैसे ‘राम कलम से लिखता है’ या कुठार के द्वारा वृक्ष छेदन किया जाता है। इन वाक्यों में लिखने का काम कलम से तथा वृक्ष छेदन का साधन कुठार है। चतुर्थी विभक्ति किसी याचक को दान देने के अर्थ को व्यक्त करता है, जैसे ‘राम ने भिक्षुक को वस्त्र दिए’। इस वाक्य में ‘देने की’ क्रिया का सम्बन्ध दाता और प्राप्तकर्ता के बीच होता है। पंचमी विभक्ति अपादान के उस स्रोत से सम्बंधित है, जहाँ से किसी वस्तु का विच्छेद या अलगाव हुआ हो जैसे ‘पेड़ से पत्ता गिरा’, ‘गाँव से कोई व्यक्ति शहर में आया’ इत्यादि। सप्तमी विभक्ति अधिकरण को दर्शाती है, ‘जैसे खाना थाली में रखा है’ या ‘राम घर में है’ । ‘थाली’ और ‘खाना’ के बीच आधार-आधेय सम्बन्ध है। ‘घर’ और ‘राम’ के बीच आधार–आधेय सम्बन्ध है। ये सम्बन्ध एक मध्यवर्ती सत्ता है, जो शब्द और अर्थ को जोड़कर भाषा को सार्थक बनाती है। व्याकरण में सम्बन्ध केवल शब्दों को जोड़ने का साधन मात्र नहीं है, जैसे ‘राम पानी से पेड़ों को सींचता है’, बल्कि यह उनके अर्थ का अस्तित्व भी स्थापित करता है। “राम” का अस्तित्व कर्ता के रूप में तभी प्रकट होता है जब वह “सींचने” की क्रिया से जुड़ता है। “पानी” साधन के रूप में तभी अर्थपूर्ण होता है जब “से” सम्बन्ध उसे क्रिया से जोड़ता है। “पेड़” कर्म के रूप में तभी अर्थपूर्ण होते हैं जब “को” सम्बन्ध उन्हें क्रिया का लक्ष्य बनाता है। शब्दों को उनके-अपने स्थान पर स्थापित करके शब्द अर्थ का सम्पूर्ण ताना-बाना रचता है।
इस प्रकार, वैयाकरणों के अनुसार सम्बन्ध शब्द और अर्थ के बीच एक अदृश्य सूत्र है। यदि यह सम्बन्ध केवल शब्द में होता, तो हर शब्द अपने-आप ही अर्थ को प्रकट कर देता। कहने का तात्पर्य है कि जो भाषा हम नहीं जानते है उसका भी अर्थ हमारे सामने प्रकट हो जाता —पर ऐसा होता नहीं है। यदि यह सम्बन्ध केवल अर्थ में होता, तो बिना शब्द के भी अर्थ स्वयंभू हो जाता—अर्थात बिना उच्चारण किये ही प्रकट हो जाता। किन्तु सामान्य अनुभव में ऐसा होना असंभव है। अतएव कोई भी यह नहीं जानता कि इस सम्बन्ध का आरंभ कब हुआ, यह अनादि एवं नित्य परंपरा से चला आ रहा है। शब्द जब अर्थ रूप में विवर्तित होता है तो इससे फूटनेवाले अर्थ का बोध गूंगे को भी हो जाता है। भर्तृहरि के शब्दों में :
अनादि निधनं ब्रह्म शब्दतत्त्वं यदक्षरम् ।
विवर्ततेऽर्थभावेन प्रक्रिया जगतो यतः।।
यह श्लोक भारतीय परंपरा के उस अद्भुत विचार को व्यक्त करता है जिसमें भाषा, चेतना और ब्रह्माण्ड तीन अलग-अलग चीजें नहीं, बल्कि एक ही परम सत्य के विभिन्न आयाम माने गए हैं। शब्द और अर्थ का भेद केवल व्यावहारिक है, वास्तविकता में दोनों एक ही सत्ता के रूप हैं। शब्द का बाह्य उच्चारण (ध्वनि) और उसका आंतरिक अर्थ (स्फोट) अलग नहीं हैं। स्फोट ही वह शक्ति है जो अर्थ को प्रकट करती है। इस तरह शब्द और अर्थ का तादात्म्य भारतीय दर्शन में अद्वैत की परंपरा को भाषाशास्त्र में उतार लाता है।
रामचरितमानस में गोस्वामी तुलसीदास ने राम और सीता के संबंध को व्यक्त करने के लिए जो कहा है वह यहाँ उधृत किया जा सकता है : गिरा अर्थ जल बीच सम, कहियत भिन्न न भिन्न! जैसे लहर जल से अलग दिखती है लेकिन वास्तव में जल ही है, वैसे ही शब्द और अर्थ (तथा सीता और राम) भिन्न प्रतीत होते हुए भी मूलतः अभिन्न हैं।
*********

डॉ मधु कपूर कलकत्ता के एक प्रतिष्ठित कॉलेज में दर्शनशास्त्र की प्रोफेसर रही हैं। दर्शनशास्त्र के अलावा साहित्य में उनकी विशेष रुचि रही है। उन्हीं के शब्दों में, "दार्शनिक उलझनों की गुत्थियों को साहित्य के रास्ते में तलाशती हूं।" डॉ कपूर ने हिंदी से बंगला में कुछ पुस्तकों का अनुवाद किया है और कुछ कविता संग्रह भी प्रकाशित हुए हैं। दर्शन पर उनके निबंधों का एक संग्रह Dice Doodle Droll Dance प्रकाशित हुआ है।