आखिर, बूढ़े हँसते क्यों हैं...?
ओंकार केडिया*
ओंकार केडिया के पैने आलेखों की बानगी आपने उनके पिछले लेख अमलतास, गुलमोहर और गुलज़ार में देख ही चुके हैं जिसमें सुकोमल अनुभूतियों के साथ-साथ व्यंग्य का भी सहज मिश्रण था। हाल ही में उनकी व्यंग्य रचनाओं की पुस्तक ‘मल्टीप्लेक्सस में पॉपकॉर्न’ भी प्रकाशित हुई है जिसके पुस्तकांश आप इस लिंक पर जाकर पढ़ सकते हैं। आज हम उनका लिखा एक ताज़ा व्यंग्य “बूढ़े हँसते क्यों हैं?” आपके सम्मुख ला रहे हैं जिसमें उन्होंने दर्शाया है कि किस प्रकार से समाज (एवं परिवार में भी) बूढ़ों की गतिविधियां हमें अवांछित लगने लगती हैं। वर्तमान में बूढ़ों की संख्या 15 करोड़ है जो अगले ढाई दशकों में बढ़कर दुगुनी होने का अनुमान है यानि बच्चों से ज़्यादा बूढ़े! ऐसे में सिर्फ व्हाट्सएप्प पर बुज़ुर्गों का आदर करने से काम नहीं चलेगा बल्कि अपने व्यवहार में भी हमें बुज़ुर्गों को, उनकी आवश्यकताओं को खुले मन से स्वीकारना होगा। इसी गंभीर विषय को ओंकार अपने चुटीले अंदाज़ में यहाँ कह रहे हैं।
बूढ़े हँसते क्यों हैं?
मुझे बूढ़े अच्छे नहीं लगते. उनके कारण ध्वनि-प्रदूषण बहुत होता है. जब देखो, खाँसते या छींकते रहते हैं. खाँसी या छींक नहीं आती, तो कराहते रहते हैं. कितना ही इलाज करा दो, उनकी खाँसी, छींक या कराह बंद ही नहीं होती. जिस तरह बूढ़े होने पर बाल सफ़ेद या ग़ायब होने लगते हैं, दाँत गिरने लगते हैं, वैसे ही खाँसी,छींक और कराह बूढ़े होने की प्रक्रिया का एक अभिन्न हिस्सा है. इनके बिना बूढ़ा होना बहुत मुश्किल है.
मुझे समझ में नहीं आता कि बूढ़े खाँसी, छींक या कराह को रोकने की कोशिश क्यों नहीं करते? जिस तरह से दूसरी कई आवाज़ों को वे सहजता से रोक लेते हैं, इन्हें क्यों नहीं रोकते? कम-से-कम समय का तो ध्यान रख ही सकते हैं. यह क्या बात हुई कि रात को जब घर के लोग थक-हारकर सोने की कोशिश कर रहे हों, तो ये खाँसना, छींकना या कराहना शुरू कर दें? सुबह तक इंतज़ार क्यों नहीं कर लेते?
दरअसल खाँसना, छींकना और कराहना बूढ़ों की मजबूरी नहीं, बल्कि आदत है. इसी तरह की आदतों को सठियाना कहते हैं. कभी-कभी मुझे लगता है कि बूढ़े लोग जान-बूझकर खाँसते,छींकते या कराहते हैं. इसका कोई कारण मुझे समझ में नहीं आता. होगा कोई ‘हिडन एजेंडा’. जब कारण समझ में न आए, तो ‘हिडन एजेंडा’ कह देने से समस्या समाप्त हो जाती है.
वैसे, खाँसने,छींकने और कराहने पर बूढ़ों का एकाधिकार नहीं है. बच्चे और जवान भी कभी-कभार ऐसा करते हैं, पर जब वे ऐसा करते हैं, तो बुरा नहीं लगता. बूढ़ों को भी यह बात समझनी चाहिए. बच्चों से बूढ़ों की क्या बराबरी? बच्चे तो कपड़ों में पेशाब तक कर देते हैं.
आज से कुछ साल पहले अगर मैं यह लेख लिख रहा होता, तो कहता कि बूढ़ों की इन कारस्तानियों के पीछे किसी विदेशी ताक़त का हाथ है. उन दिनों ‘विदेशी ताक़त’ का मतलब अमेरिका होता था. अब हम सीधे कह देते हैं कि पाकिस्तान का हाथ है. पाकिस्तान को ‘ताक़त’ कहे हमारी जूती. हम उससे डरते थोड़ी हैं कि उसका नाम न लें.
बहुत सोच-विचार करने के बाद मुझे लगा कि बूढ़ों के खाँसने,छींकने या कराहने के पीछे पाकिस्तान का हाथ नहीं हो सकता. उनकी मदद के बिना क्या हम इतना भी नहीं कर सकते? कुछ लोग सोचते हैं कि भारत में ध्वनि-प्रदूषण बढ़ाने की पाकिस्तानी साज़िश का यह हिस्सा हो सकता है. मुझे नहीं लगता. माना कि पाकिस्तान कमज़ोर हो गया है, पर इतना कमज़ोर भी नहीं हुआ है कि इतनी छोटी साज़िश करे. ख़ासकर तब जब कि वह बड़ी साज़िश करने में सक्षम है. आख़िर उस देश का कुछ तो आत्म-सम्मान होगा, जिसके पास परमाणु बम है.
इधर कुछ सालों से बूढ़ों को हँसने का चस्का लग गया है. उन्हें डॉक्टरों ने बता दिया है कि हँसना सेहत के लिए अच्छा होता है. प्राकृतिक रूप से तो उन्हें हँसी आती नहीं. इसलिए वे ‘लाफ्टर क्लब’ बनाकर हँस रहे हैं. उन्हें इतना भी समझ में नहीं आता कि अकारण हँसना बेवकूफ़ी से आगे की चीज़ है. अकारण तो पागल ही हँसते हैं. किसी क्लब का मेंबर बन जाने से ऐसा करना कोई समझदारी का काम तो हो नहीं जाता. भाई, जब सचमुच में हँसी नहीं आती, तो हँसना ज़रूरी है क्या? सेहत बनाकर भी कौन सा तीर मार लोगे? अब समय ही कितना बचा है तुम्हारे पास?
सबसे बुरी बात यह है कि बूढ़ों के अकारण हँसने से बच्चों को बहुत दिक़्क़त होती है. उन्हें भी हँसी आ जाती है. आजकल के माँ-बाप गंभीर बच्चे चाहते हैं, हँसनेवाले नहीं. अकारण हँसनेवाले तो बिल्कुल नहीं. दूसरे, इससे बच्चों की पढ़ाई में बहुत बाधा पैदा होती है. अगर सप्ताह में दो मिनट भी बच्चे पढ़ाई न कर पाएँ, तो न जाने, परीक्षा में उनको कितने कम नंबर मिलें. फिर उनके भविष्य का क्या होगा? बूढ़ों के पास तो फ़ालतू समय बहुत है. उन्हें तो वैसे भी प्लेटफॉर्म पर इंतज़ार ही करना है. दूसरों के समय का तो सम्मान करें.
सुना है, इन आपत्तियों को देखते हुए बूढ़े अब ‘वीपिंग क्लब’ खोलना चाहते हैं. डॉक्टरों ने उनसे कहा है कि रोना भी सेहत के लिए बहुत अच्छा है. इससे मन हल्का हो जाता है. ग्रंथियाँ खुल जाती हैं. ‘वीपिंग क्लब’ में बूढ़े फूट-फूटकर रोया करेंगे. सबसे अच्छी बात यह है कि ऐसा करना अकारण नहीं होगा. बच्चों के माँ-बाप बूढ़ों को रोते हुए सुनेंगे, तो दया से भर जाएंगे. शायद अपने बच्चों के दो-तीन अंक कम आना बर्दाश्त कर लेंगे.
मशहूर शायर राहत इंदौरी का एक शेर है.
‘उसकी याद आई है, साँसों, ज़रा आहिस्ता चलो,
धड़कनों से भी इबादत में ख़लल पड़ता है.’
मैंने ग़ौर किया है कि बूढ़ों की साँसों की आवाज़ थोड़ी तेज़ होती है. उन्हें चाहिए कि साँस न लेने का अभ्यास करें. आनेवाली पीढ़ी के लिए वे इतना तो कर ही सकते हैं.
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ओंकार केडिया पूर्व सिविल सेवा अधिकारी हैं। भारत सरकार में उच्च पदों पर पदासीन रहने के बाद वह हाल तक असम रियल एस्टेट एपिलेट ट्राइब्यूनल के सदस्य रहे हैं और आजकल गुवाहाटी में रह रहे हैं। वह अपने ब्लॉगhttp://betterurlife.blogspot.com/औरhttp://onkarkedia.blogspot.com/ पर वर्षों से कवितायें और ब्लॉग लिख रहे हैं। कुछ माह पूर्व इनका कविता संग्रह इंद्रधनुष आया है जो काफी चर्चित हुआ। अंग्रेजी में इनकी कविताओं का पहला संग्रह Daddy भी हाल ही में आया है। कोरोना पर कविताओं का एक संग्रह प्रकाशाधीन है और अगले कुछ दिन में उसके आ जाने की उम्मीद है। इस वेब पत्रिका में प्रकाशित उनकी अनेक कविताओं में से कुछ आप यहाँ, यहाँ, यहाँ और यहाँ पढ़ सकते हैं।
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