विनेश फोगाट : फेडरेशन ही नहीं, देश भी शर्मसार
पेरिस ओलंपिक में भारतीय खेल जगत की जो जगहंसाई हुई और देश के खेल तंत्र की जो कलई खुली, उसे भले ही वक्त के साथ भुला दिया जाएगा लेकिन 29 साल की पहलवान विनेश फोगट के साथ विदेश में कुश्ती के मैदान में जाने-अनजाने जो बर्ताव हुआ, उसके घाव न केवल भारतीय कुश्ती महासंघ बल्कि देश के दूसरे खेलों की तैयारियों और प्रतिस्पर्धाओं में हमेशा याद रखे जाएंगे।
अब इस बात के कोई मायने नहीं कि पेरिस में खेल मध्यस्थता कोर्ट में विनेश फोगाट की पैरवी करने से कुछ लाज बच गई। असली सवाल जिसका जवाब पूरे देश और खेल जगत को चाहिए कि गोल्ड मेडल छिन जाने और बाकी स्पर्धाओं से बाहर होने के हैरतअंगेज़ घटनाक्रम की क्या निष्पक्ष उच्चस्तरीय जांच मुमकिन हो सकेगी? जब तक जांच नहीं होगी और विनेश के खेल के साथ हुए सियासी षड्यंत्र से पर्दा नहीं उठेगा, जब तक इस प्रकरण में सवालों के गुबार को थमने से नहीं रोका जा सकेगा।
भारतीय कुश्ती महासंघ सबसे ज्यादा कठघरे में इसलिए भी है कि विनेश के 100 ग्राम बढ़े वजन की जवाबदेही से कोच और डाईटिशन कैसे बच सकते हैं? जब कोई भी खिलाड़ी ओलंपिक जैसे दुनिया के खेल महाकुंभ में पदक जीतने के लिए चौतरफा मानसिक व शारीरिक दबाव से गुजरता है तो ऐसी सूरत में खान-पान और डाईट नियंत्रण की जिम्मेदारी कोच और डाइटिशियन के बजाय किस पर डाली जाए? हैरत यह है कि कोच और डाईटेशन की ओर से 100 ग्राम वजन बढ़ने के विवाद पर इन पंक्तियों के लिखे जाने तक कोई सफाई या प्रतिक्रिया नहीं आई है।
वास्तव में विनेश फोगाट जैसी एक होनहार अंतर्राष्ट्रीय पहलवान पर खेल के मैदान के लिए चार साल तक जो कड़ी तैयारी करनी थी, उससे वह भारत के कुश्ती फेडरेशन के कुप्रबंधन और इसमें व्याप्त तमाम बुराइयों की उलटबांसियों के कारण बुरी तरह वंचित कर दी गई थी। विगत वर्ष दिल्ली के जंतर मंतर पर उसे कई दिन खुले आसमान में ठंड, बारिश और प्रदूषण में रातें गुजारनी पड़ीं और उसके पहले और बाद में थानों और कोर्ट के चक्कर काटने पड़े। जाहिर है कि विनेश और उनके साथी खिलाड़ियों की लड़ाई आत्मसम्मान बचाने की खातिर सत्ता के एक ताकतवर राजनेता की कथित करतूतों को उजागर करने के लिए थी, जिसमें वह देशव्यापी जनसमर्थन से काफी हद तक सफल भी हो सकीं।
सारी दुनिया बखूबी जानती है कि भारतीय कुश्ती महासंघ के अध्यक्ष रहे और सत्ताधारी भाजपा के प्रभावशाली नेता पर यौन उत्पीड़न के आरोप लगाने और तरह तरह की प्रताड़ना और पुलिस में शिकायत के बाद भी केंद्र सरकार की सत्ता के संरक्षण के कारण विनेश और उसके साथी खिलाड़ियों को पिछले साल जंतर मंतर पर धरने पर बैठना पड़ा। केंद्र सरकार चूंकि उत्पीड़न के दोषियों को राजनीतिक कारणों और देश के सबसे बड़े प्रदेश में वोटों के समीकरण गड़बड़ाने के कारण पूरा संरक्षण दे रही थी। हैरत तो यह है कि दिल्ली की राउज एवेन्यू कोर्ट में भाजपा के पूर्व सांसद बृजभूषण शरण सिंह के खिलाफ दिल्ली पुलिस की चार्ज शीट दाखिल हुए कई माह बीत गए लेकिन ज्यादातर लोगों को यही अंदेशा है कि अदालती दांवपेंचों के लंबे खिंच जाने की वजह से इस केस का भी वही हश्र हो सकता है जैसे कि सत्ता का संरक्षण पाए नेताओं के मामलों में अक्सर होता है।
सवाल तो इस बात पर उठाए जा रहे हैं कि जब विनेश को 53 किग्रा की प्रतिस्पर्धा में तुर्की की जिनेप येतगिल के खिलाफ न उतारने के पीछे क्या विवशता थी। ज्ञात रहे कि इस वर्ग में अंतिम पंघाल को उतार दिया गया जो पहले ही राउंड में उस मुकाबले से बुरी तरह हार कर बाहर हो गई।
विशेषज्ञों को आशंका है कि इस संभावना से पूरी तरह इनकार नहीं किया जा सकता कि हो सकता है ऐसा जानबूझकर किया गया हो क्योंकि यह बात सबको पता थी कि जापानी पहलवान बड़ी चैंपियन थी और उसके मुकाबले विनेश को इसी मंशा से उतारा गया होगा ताकि वह मात खाकर बाहर हो जाए लेकिन इतनी बड़ी खिलाड़ी को पटखनी देकर खिताब अपने नाम करने से ही भारतीय कुश्ती के मौजूदा और पूर्व दिग्गजों को विनेश की इस ऐतिहासिक कामयाबी से करारा झटका लगना ही था। इतना ही नहीं उस मुकाम तक पहंचने वाली विनेश ने पहली भारतीय महिला होने का खिताब भी अपने नाम करने में सफलता पाई।
भारतीय कुश्ती फेडरेशन के मामले में एक बात खुलकर सामने आती है कि जहां भी सत्ता के ताकतवर लोगों के हाथों में फेडरेशन की कमान जाती है तो इनमें गैर पेशेवर लोगों का बोलबाला बढ़ने के दुष्प्रभाव सामने आते हैं। खासतौर पर राजनीतिक रसूख के लोगों को क्रिकेट समेत देश की शीर्ष खेल संस्थाओं में स्थापित करने से कई तरह की विकृतियां और हितों के टकराव सामने आए हैं।
विनेश को जब 100 ग्राम कम वजन की वजह से खिताब से बाहर किया गया, इस मामले को लेकर भारत की राजनीति में तूफान मच गया। संसद के दोनों सदनों में विपक्ष ने जोर शोर से इस मामले को उठाया और सरकार से जवाब देने की मांग की तो मोदी सरकार एक तरह से कठघरे में खड़ी हो गई। जाहिर है कि बृजभूषण शरण के मामले में मोदी सरकार पहले ही निशाने पर थी। संसद में एकजुट विपक्ष ने विनेश को वजन ज्यादा होने को बहाना बनाने को राजनीतिक चालबाजी का हिस्सा बताते हुए साफ अंदेशा जताया कि उन्हें पूर्वाग्रहों से प्रेरित षड्यंत्र का शिकार बनाया गया।
लोगों को हैरत तो तब हुई जब संसद में इस मुद्दे पर हंगामा व वाकआउट के बीच खेल मंत्री मनसुख मांडिया ने मूल मुद्दे पर सवालों के जवाब देने के बजाय इस साल पेरिस ओलंपिक की तैयारियों के सिलसिले में खिलाड़ियों के लिए जारी बजट के आंकड़े देने शुरू किए। विपक्ष और खेल विशेषज्ञों को आपत्ति इस बात से है कि मंत्री को विनेश के साथ हुई नाइंसाफी के बजाय ओलंपिक की तैयारियों के लिए बजट के आंकड़े जारी करने का औचित्य क्या था।
जानकारों का मानना है कि चूंकि विनेश फोगाट और साक्षी मलिक जैसी खिलाड़ियों ने बृजभूषण शरण और उनके गूर्गों को बेनकाब करने का साहस किया इसलिए सच दुनिया के सामने आ गया लेकिन ज्यादातर यौन शोषण और उत्पीड़न की शिकार लड़कियां जुबान खोलने की हिम्मत नहीं जुटा पातीं। उनके उपर कई तरह के मनोवैज्ञानिक दबाव, कैरियर की अनिश्चितता, ताकतवर लोगों से डर और समाज व परिवार की इज्जत की चिंता कहीं ज्यादा होती है।

(लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं। राजधानी के कई प्रमुख अखबारों में दशकों कार्यरत रहे हैं।)
(डिस्क्लेमर : इस लेख में व्यक्त विचार लेखक के स्वयं के हैं। रागदिल्ली.कॉम के संपादकीय मंडल का इन विचारों से कोई लेना-देना नहीं है।)