पत्रकारिता में नए तहलके का संकेत है सोशल मीडिया का उभार
इस माह के आरम्भ में राजकेश्वर सिंह का लेख प्रासंगिकता खोता जा रहा है मुख्यधारा का मीडिया आपने पढ़ा होगा। आज के लेख को आप उसी लेख का दूसरा भाग मान सकते हैं। राजकेश्वर बता रहे हैं कि सोशल मीडिया के स्टार यू-ट्यूबर्ज़ के अलावा भी बहुत से ऐसे नए रिपोर्टर सामने आ रहे हैं जो केवल एक मोबाइल फ़ोन के दम पर लोकहित के सवालों को देश और समाज के सामने ला रहे हैं। हालाँकि अलग-अलग राज्यों ने प्रशासनिक आदेश लाकर इनको रोकने की कोशिशें शुरू कर दी हैं लेकिन बहुत सारे नौजवान रिपोर्टर (जिनमें लड़कियां भी शामिल हैं) अभी डटे हुए हैं और ऐसा नहीं लगता कि वह जल्दी से कहीं जाने वाले हैं. आइए, पढ़ते हैं यह लेख।
पत्रकारिता में नए तहलके का संकेत है सोशल मीडिया का उभार
राजकेश्वर सिंह
“मुख्यमंत्री जी, जोखई की जमीन लौटा दीजिए” - यह अस्सी के दशक में प्रतिष्ठित हिंदी मैगजीन रविवार की कवर पेज स्टोरी का शीर्षक था। अस्सी के दशक में उत्तर प्रदेश में एक मुख्यमंत्री थे और जोखई मुख्यमंत्री के घर पर खेती का काम करते थे। उस समय प्रकाशित रिपोर्ट के मुताबिक कागजों में कुछ जमीन जोखई के नाम थी, लेकिन उस पर कब्जा मुख्यमंत्री के परिवार का था। केंद्र और उत्तर प्रदेश में कांग्रेस की सरकारें थी। श्रीमती इंदिरा गांधी देश की प्रधानमंत्री थीं। मुख्यमंत्री के विरोधियों ने उस मैगजीन को एक कार्यक्रम के दौरान जोखई के हाथों इंदिरा गांधी तक पहुंचा दिया। कुछ महीनों बाद यूपी के उस मुख्यमंत्री को हटा दिया गया। उन दिनों रविवार के ही एक अंक में उत्तर प्रदेश सरकार के एक मंत्री के बारे में प्रकाशित खबर का शीर्षक था,“हरिजनों की छाती पर बन रहा मंत्री जी का मार्केटिंग कॉम्प्लेक्स”। क्या अखबारों, मैगजीन्स में इस तरह के शीर्षक अब कभी देखते हैं आप? ज़ाहिर है कि नहीं!
वह दौर था, जब देश सिर्फ प्रिंट मीडिया थी। सरकारें उससे डरती थीं कि उसके किसी घपले, घोटाले की खबर मीडिया की सुर्खियां न बन जायें। उस समय के पत्रकार सरकारों से सवाल पूछते थे। तब मुख्यमंत्री और प्रधानमंत्री अक्सर मीडिया से रूबरू होते थे। लगभग पांच दशक बाद अब स्थिति बदल चुकी है। प्रधानमंत्री औपचारिक प्रेस कांफ्रेस तो नहीं ही करते, उसके अलावा जो मीडिया के प्रधानमंत्री से रु-ब-रु होने के अवसर होते थे, वह सब पिछले वर्षों में समाप्त हो चुके हैं। अलबत्ता कुछ मुख्यमंत्री कभी-कभी प्रेस वालों से बात जरूर करते हैं। मुख्यधारा का मीडिया अपनी अहमियत लगभग खो चुका है।
लेकिन इसी दौर में एक बड़ा बदलाव भी सामने आया है। वह यह है कि गांव, गली, कस्बों और शहरों की जमीनी खबरों के लिए सोशल मीडिया के पत्रकारों का ऐसा विस्फोट हुआ है, जो कमियों को उजागर करने के लिए सरकारों से भी टकराने में परहेज़ नहीं कर रहा है। यह वह दौर है, जिसमें इंस्टाग्राम, यूट्यूब और एक्स (ट्विटर) पर खबरों, नई सूचनाओं की भरमार है। शायद ही कोई कस्बा, शहर और ब्लॉक, यहां तक की पंचायत तक भी, जहां सरकारी खामियों और नाकामियों का वीडियो बनाकर उजागर करने वाले यू-ट्यूबर्ज़ उपलब्ध ना हों। उनके पास न तो बढ़िया वीडियो कैमरा है और न ही बेहतरीन विडियोग्राफर, फिर भी महज एक अदद स्मार्टफोन उनकी रिपोर्टिंग का हथियार है। जिस दौर में सरकारी दबावों व विज्ञापनों की लालच में मुख्यधारा का मीडिया (प्रिंट एवं न्यूज चैनल्स) जिन खबरों से कन्नी काट रहे हैं, उन्हें सोशल मीडिया के पत्रकार धड़ल्ले से वायरल कर रहे हैं।
आजकल यू-ट्यूबर्ज़ बड़े पैमाने पर लोकहित से जुड़े मामले सबके सामने ला रहे हैं - चाहे वह सरकारी स्कूलों की दुर्दशा हो या फिर सैकड़ों, हजारों करोड़ की लागत से बनकर टूट चुकी और धंस रही सड़कें हों या फिर शासन-प्रशासन की विफलता से जुड़ी कोई और स्थिति हो। देश में सोशल मीडिया की रिपोर्टिंग की सबसे बड़ी कामयाबी को दिल्ली के जंतर मंतर पर देशभर से जुटे जेन जी के आंदोलन की सफलता से समझा जा सकता है। एक महीने से ज्यादा समय तक चले उस आंदोलन को जिस समय मुख्यधारा का मीडिया (प्रिंट और न्यूज चैनल्स) उसकी गैरजरूरी कमियों की तलाश कर, उसे बेपटरी करने में लगा था, तब वह पूरा आंदोलन यू-ट्यूबर्ज़ की रिपोर्टिंग से देश को झकझोर रहा था। उस आंदोलन ने एक महत्वपूर्ण काम और किया, वह यह कि जहां केंद्र व राज्य सरकारों के खिलाफ किसी मसले पर कोई आवाज उठाने की जुर्रत नहीं कर सकता था, वह डर छात्रों और युवाओं के ही दिल से नहीं निकाल गया, बल्कि सोशल मीडिया के पत्रकारों को भी उसने निडर बना दिया है।
इस बीच, उत्तर प्रदेश, राजस्थान, बिहार जैसे कई राज्यों ने अपने यहां के स्कूलों में किसी भी बाहरी व्यक्ति के जाने, फोटो खींचने, वीडियो बनाने, उसे सोशल मीडिया पर अपलोड करने जैसे मामलों पर पाबंदी लगा दी है। उसके लिए सर्कुलर जारी कर दिये गए हैं। लिहाजा ऐसा करने वाले सोशल मीडिया पत्रकारों के खिलाफ उन राज्यों में मुकदमे भी दर्ज किए गए हैं। अकेले यूपी में आधा दर्जन से अधिक ऐसे सोशल मीडिया पत्रकारों पर मुकदमे दर्ज हुए हैं। राजस्थान और बिहार से भी ऐसी खबरें हैं। बावजूद इसके सोशल मीडिया के जरिए पत्रकार की भूमिका निभाने वाले युवाओं में कमी नहीं आई है। कई जगहों पर ऐसा भी हुआ कि मुकदमा दर्ज होने के बाद सोशल मीडिया के पत्रकारों ने उस पर भी वीडियो बनाकर उसे अपलोड कर न सिर्फ सार्वजनिक किया, बल्कि यह भी चेताया कि सरकार की सख्ती के बाद भी वे पीछे हटने वाले नहीं हैं।
उधर विभिन्न राज्यों में स्कूली बच्चों (जेन अल्फा) ने अपने विद्यालयों में चल रही समस्याओं को लेकर और टीचर्ज़ की अनुपलब्धता जैसी बुनियादी जरूरतों के लिए सड़क पर उतरना शुरू कर दिया है। शिक्षकों की कमी के अलावा क्लासरूम, पीने का साफ पानी और साफ-सुथरे टॉयलेट जैसे सवालों पर वह आंदोलित हैं। उत्तर प्रदेश, राजस्थान, बिहार, मध्य प्रदेश और महाराष्ट्र समेत कई राज्यों से इस तरह के आंदोलन लोगों के सामने आए हैं। सरकारें जेन अल्फा के इन कदमों से डरी हुई हैं, जबकि उन आंदोलनों को भी सोशल मीडिया बढ़-चढ़कर दिखा रहा है। मध्य प्रदेश, उत्तर प्रदेश और बिहार में सैकड़ों, हजारों करोड़ की लागत से बनी सड़कों के बरसात में धंसने और टूटने के तमाम मामलों को स्थानीय अखबारों और मुख्यधारा की मीडिया ने लोगों के बीच ले जाने में भले ही कोताही की हों, लेकिन सोशल मीडिया उनकी खामियों को उजागर करने की क्लिपिंग से भरा पड़ा है।
मीडिया में बदलाव की इस विस्फोटक तस्वीर को एक दूसरे नजरिए से भी समझने की जरूरत है। केंद्र व राज्य सरकारें मुख्यधारा के प्रिंट और न्यूज चैनल्स के पत्रकारों को अपने पैरामीटर पर मान्यता प्रदान करते हैं। उससे ऐसे पत्रकारों को अपने पत्रकारीय दायित्वों को निभाने में सुविधा मिलती है, लेकिन सोशल मीडिया के जरिये सूचनाओं और खबरों को लोगों तक पहुंचाने वाले मीडिया कर्मियों के पास सरकारी मान्यता जैसी कोई सुविधा नहीं है, बावजूद इसके उनकी रिपोर्टिंग से सरकारें परेशान हैं और उन पर शिकंजा कस रही हैं। वे नहीं चाहतीं कि उनकी कमियां उजागर हों, लेकिन सोशल मीडिया के पत्रकार एक के बाद एक खुलासा करते हुए किस तरह जमीन पर डटे हैं, उसका अंदाजा यूट्यूब और इस्टाग्राम पर रोज वीडियो क्लिपिंग की बढ़ती आमद से लगाया जा सकता है।
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लेखक राजनीतिक विश्लेषक व वरिष्ठ पत्रकार हैं। उन्होंने लंबे अर्से तक राष्ट्रीय राजनीति और संसदीय रिपोर्टिंग की है। लगभग चार दशक की पत्रकारिता में उत्तर प्रदेश की राजनीति को उन्होंने प्रमुखता से कवर किया है। वह नियमित रूप से रागदिल्ली.कॉम के लिए लिखते रहते हैं।