एक फिल्म, एक शायर: एक वतन
राजेन्द्र भट्ट की कहानी अभी दो दिन पहले ही प्रकाशित हुई है. आम तौर पर हम एक ही लेखक की दूसरी रचना में कुछ गैप रखना चाहते हैं. हमने उनके सामने अपनी ये दुविधा रखी तो उन्होंने बताया कि एक फिल्म पर लिखा है जो पुरानी ना हो जाए. हमने लेख पढ़ा तो पाया कि उसमें फिल्म के अलावा भी जो है, वो बेशकीमती है. आइये, आप भी पढ़िए.
एक फिल्म, एक शायर: एक वतन
राजेन्द्र भट्ट
एक अंग्रेज लेखक थे, नाम भूल रहा हूँ। उन्होंने कहा था कि निबंध का शीर्षक तो बस खूंटी होता है जिस आप अपने विचारों का हैट टांग सकें। मैं यहाँ दो-चार हैट, बेतरतीब टाँगने वाला हूँ। पहले ही बता दिया, झेल लें।
एक फिल्म है –‘सिटकॉम’ जैसी, प्यारी सी- जैसे कभी दूरदर्शन के ‘हम लोग’ / ‘बुनियाद’ जैसे सीरियल, या फिर बासु चटर्जी की फिल्में होती थीं। सहज-सरल लोगों के चुटीले, हल्की मुस्कान लाने वाले, मखमल से अनायास फिसलते संवादों के बीच उलझती, और उलझती, आखिर में सुलझ जाती स्थितियाँ।
‘सिटकॉम’ कहते ही मुझे ऐसी ‘कथा-कहन’ के जादूगर मनोहर श्याम जोशी याद या गए। उनकी एक किताब में पढ़ा था ( थोड़ा जोड़-तोड़ कर रहा हूँ, पर भाव वही है) कि इन कथाओं में कोई भी दृश्य, संवाद या वस्तु – स्टूल हो या छतरी - तभी दृश्य में होने चाहिए, जब आगे की कथा में उनसे जुड़ी कोई बात हो।
और यह बात इस खुशनुमा शुरूआत वाली फिल्म पर भी लागू होती है: ‘द ग्रेट शम्सुद्दीन फैमिली’।
जाहिर है, फिल्म मुसलमानों के बारे में है। लेकिन कैसे मुसलमान! तो जैसा ऊपर जोशी जी ने बताया, शुरू में ही साफ हो गया कि एक अहम पात्र को अपनी अमेरिका की पढ़ाई पक्की करने के लिए उसी दिन अपना ‘प्रजेंटेसन’ तैयार करके भेज देना है; और बीच में आ जाता है उसकी अम्मी का फोन कि उन्हें अपना पासपोर्ट लेने आना है क्योंकि उन्हें और परिवार की दो और बुजुर्ग महिलाओं को उमरा के लिए जाना है।
और इस बेमतलब ‘डिस्टर्बेंस’ से चिढ़ कर बानो कहती है कि नमाज़ तक तो आपको कभी पढ़ते नहीं देखा ( और अब उमरा जा रही हैं!)
तो ये स्थितियाँ और संवाद तय कर देते हैं कि नई दिल्ली के संभ्रांत निज़ामुद्दीन इलाके (कहा नहीं गया, पर पृष्ठभूमि में हुमायूँ का मक़बरा है) का यह कैसा मुसलमान परिवार है। जाहिर है, राष्ट्रीय नेताओं-कार्यकर्ताओं द्वारा ‘पोशाक से पहचाने जाने वाले’, तीन तलाक, बम और पंक्चर वाले, देश (नहीं, ‘राष्ट्र’) पर बोझ, शक के दायरे वाले तो नहीं लगते।
आगे हम इस ‘क्लास’ के कई मज़ेदार, एकदम अपने ( बिना ‘टैग’ लगे) जैसे मुसलमानों (और उनके दोस्त हिंदुओं को भी) देखते हैं जिनमें ज्यादा स्त्रियां और कुछ पुरुष (‘मर्द’-टाइप नहीं ) हैं। उमरा जाने वाली पुरानी पीढ़ी वाली मुसलमान औरतें भी अपने घर की लगती हैं। अपनी चाची-ताई-बुआ की तरह वे भी फुसफुसाती, परिवार में गुटबाज़ी और थोड़ा झूठ-प्रपंच करतीं, चटोरी, नाच-गाने की शौकीन – पर दिल से बेहद भलीं स्त्रियाँ हैं। खतरों से बचने वाली दुनियादार हैं, पर जब वाकई बात इंसानी वफादारी और करुणा की आती है तो पूरे ‘ग्रेस’ और बहादुरी से प्रेम का, इंसानियत का साथ देती हैं।
इन मुसलमानों की नई पीढ़ी में भी वो स्टीरिओटाइप नहीं हैं, जिनका संस्कारी-जनों को जबरन कल्याण करना पड़े। यहाँ अमेरिका जाने वाली लड़कियां हैं। ये दोस्तों से, बिना मजहब को खयाल किए मिलते/मिलती हैं। अधिकारों के प्रति सजग, ‘कमिटेड’ हैं, पर थोड़ा ‘कंप्रोमाइज’ कर लेती/लेते हैं। झकझकिया स्कॉलर है जो छल्लेदार बौद्धिकता से लड़कियों को प्रभावित (हिन्दू-मुसलमान, दोनों को) करता है; मल्टी नेशनल वाले प्रोफेशनल हैं, प्रेम में पगे जोड़े हैं जिनमें एक मुसलमान लड़के को, पूरे भरोसे से साथ आ गई हिन्दू दोस्त से शादी भी करनी है – हर खतरे के सामने दोनों की वफादारी ‘रॉक सॉलिड’ है। ये सुन्दर-सलोने-शालीन मुसलमान ( और उनके हिन्दू साथी) हैं। हाड़-माँस के इंसान हैं – अपने-अपने सुखों को तलाशते, मदद मांगते, थोड़ा तीन-पाँच भी कर लेते - लेकिन इंसानियत का इम्तिहान आने पर एकदम खरे उतरने वाले।
पर – हैं तो मुसलमान ना! बरबस याद आ जाता है कि तरक्कीपसंद अदीब मंटो जब देश-विभाजन के बाद पाकिस्तान जाने का मन बना रहे थे तो उनके हिन्दू दोस्त, मशहूर अभिनेता श्याम ने उनसे पूछा था कि तुम तो यार, ऐसे मुसलमान भी नहीं हो। शराब पीते हो, नमाज़ नहीं पढ़ते, वगैरह.... ; तो मंटो ने तुर्श जवाब दिया था, “मगर इतना मुसलमान तो हूँ कि दंगों में मारा जा सकूँ।“
खैर, इतना तो नहीं, पर दिल्ली का जो दमघोंटू प्रदूषण है – हवा में, और समाज में भी - वह इस पॉश कॉलोनी की खिड़कियों से घरों के अंदर भी पसर गया है। कोई नारे, उन्माद, जयकारे, मन्दिर-मस्जिद – या फिर इन पर राजनीतिक विमर्श – फिल्म में नहीं है। पर एक ‘इंटर फेथ’ जोड़े से ‘लव ज़ेहाद’ के आरोप का खतरनाक तनाव है कि ‘जानते हो, कैसा वक्त है।‘ गुड़गांव से दिल्ली के रास्ते में अगर आगजनी में कार को जला दिए जाने की खबर है तो बेशक मल्टी नेशनल वाले, पर मुसलमान पर खतरे की कातरता छा जाती है। और एक भली, जहीन लड़की, जो मुसलमान भी है - उसका जो मन उचाट हुआ है, जो ‘एलीनेशन’ है, देश-समाज छोड़ कर अमेरिका चले जाना चाहती है, तो उसके पीछे भी इस समाजी ढांचे और खास तौर पर, आजकल के हालात का अनकहा असर है।
फिल्म में कोई गहन विश्लेषण नहीं – पर इन सभी घटनाओं का लब्बो-लुआब इस समझदार संवाद में समा जाता है कि ‘रिश्वत अपने देश में सेक्युलर होती है।‘ अब इसका विस्तार करें तो तमाम उन्माद, जयकारों, कब्रिस्तान-श्मसान और विवेक-हरण का सत्ता पर कब्जे और बड़ी-छोटी कमाई के रूप में जो परिणाम-इनाम मिलता है, वह पूरी तरह सेक्युलर, जाति-निरपेक्ष होता है – इनसे कमाई करने वाले एक जैसे क्रूर-धूर्त होते हैं, एक जैसी मलाई खाते हैं।
बहरहाल, हर खुशनुमा ‘सिटकॉम’ में भी तनाव के चरम क्षण आते हैं और यहाँ भी -करीब आधी फिल्म हो जाने पर ‘डोर बैल’ और मोबाइल की चटपटी-चिढ़ाऊ आवाज और प्यारे इंसानों द्वारा पैदा की गई स्थितियाँ, अब शम्सुद्दीन फैमिली, और किसी भी अपना आसमान तलाशती ‘मिडिल क्लास फैमिली’ के लिए वाकई बड़े खतरे की घंटियाँ लगने लगती हैं। यहाँ ‘महान राष्ट्र’ के धर्म-संस्कृति रक्षकों का डर, सरकारी एजेंसियों का डर, एक मुसलमान के दंगे में घर न लौट पाने का डर, सिर छिपाने अमेरिका नहीं जा पाने का डर और पुरानी पीढ़ी के अचानक निर्मम-समझदार या दकियानूस हो जाने का डर – अब असली लगने लगते हैं।
लेकिन यह कोई ‘प्रीची’, इन्कलाबी फिल्म नहीं है। यहाँ बढ़िया ‘सिटकॉम’ के क्राफ्ट की तरह, बिना ज्यादा ‘फुटेज’ बर्बाद किए, ‘क्विक फिक्स’ समाधान होने लगते हैं। शुरूआत में, अप्रत्याशित रूप से झकझकिया स्कॉलर और सेक्युलर रिश्वत राह निकालते हैं और फिर कमान संभाल लेती हैं -थोड़ा कम नमाज़ी, लेकिन उमरा करने जा रही पुरानी पीढ़ी की थोड़ा चंट, लेकिन खरे सोने से दिल वाली पुरानी पीढ़ी की औरतें, जो आपसी शिकवे निपटाने के बाद, आपस में झप्पी डाल लेती हैं। और फिर, ताजा-ताजा निपटी सरकारी शादी के बाद प्यारा-सा ‘बन्नो’ गाकर, ढोल-थाली बजा कर, और जो मिले - मीठा खा-खिला कर शम्सुद्दीन फैमिली को सुरक्षा-कवच पहना देती हैं।
सोचिए जरा, अगर प्रगतिशील नाटकों की पृष्ठभूमि वाला कोई निर्देशक नाटक के अंत में ‘विंग्स’ और ‘’आइल’ से झंडे लिए कलाकारों को ‘हम होंगे कामयाब’ गाते हुए स्टेज तक पँहुचाता तो क्या वह हिंदुस्तान के शम्सुद्दीन – या किसी भी परिवार के लिए पुख्ता समाधान होता? असली समाधान तो तभी होगा जब अपने देश में ‘हम होंगे कामयाब’ बन्नो वाले गीतों में समा जाए।
फिर तो फटाफट सब ठीक होने लगता है। दंगों की आग के बीच से सुरक्षित प्यारा-सा ‘मर्द’ घर लौट आता है। पैसे का, और रिश्तों का कोई ‘फ्रॉड’ नहीं हुआ होता – और सबसे बढ़ कर – शुरू के दृश्य से ही मौजूद, सबकी मदद करती और खुद घुटती बानो को भी आदित्य के मिलने की उम्मीद बंध जाती है। देश-भक्ति के एक खूबसूरत गीत के साथ, बानो को समझ में आ जाता है कि अमेरिका में नहीं, अब तो अपने ही मुल्क में रहना है। यह गीत खास खूबसूरत और मार्मिक इसलिए भी है कि यह, दूसरे देश-भक्ति के गीतों की तरह ‘सारे जहां से अच्छा’ और ‘विश्व-विजेता’ नहीं कहता, पर बड़ी बात कहता है कि अपना मुल्क तो अपना ही है ना! ‘बुलबुल को गुल मुबारक गुल को चमन मुबारक। हम बेकसों को अपना प्यारा वतन मुबारक।‘
xxxxxx
जैसा पहले ही कह दिया था, अब मैं लेख का ‘हैट’ बदल रहा हूँ। मन में बरबस इच्छा जगी कि इसके शायर और पूरे गीत को जाना जाए। खोजना शुरू किया।
इंटरनेट बढ़िया चीज है। समझदारी और नेकदिली से खोजें तो मोती मिलते हैं, अमृत मिलता है और आप को विवेक का धनी बना देते हैं। अगर तंगदिली और जाहिलपने से खोजें तो कचरा और ज़हर मिलते हैं और ज्यादा उजड्ड बना देते हैं।
बहरहाल, शायर हैं – पंडित ब्रजनारायण चकबस्त - उर्दू में लिखने वाले कश्मीरी ‘पंडित’, जिनके पुरखे लखनऊ में बस गए। और देखिए, अयोध्या, यानी तब के फैज़ाबाद में 1882 में पैदा हुए।
इनके पिता उदित नारायण भी अच्छे शायर थे और उस ज़माने में डिप्टी कमिश्नर थे। पिता इनकी अल्पावस्था ही में गुजर गए। माता तथा बड़े भाई ने इन्हें अच्छी शिक्षा दिलाई। सफल वकील बने। समाज के कामों में भी वक्त देते थे और उस दौर में, लोकमान्य तिलक और एनी बेसेंट जैसी हस्तियों द्वारा चलाए गए स्व-शासन के लिए चलाए गए होम रूल आन्दोलन से भी जुड़े थे। इस नेक इंसान और बड़े शायर का 1926 में महज 44 साल की उम्र में निधन हो गया।
चकबस्त उर्दू गद्य और शायरी – दोनों में ऊंचे पाये के अदीब थे। आपके और भी खोजने के सुख को कम न करते हुए, उनकी एक लम्बी मार्मिक नज़्म का बस, जिक्र कर रहा हूँ – ‘रामायन का एक सीन’। इसमें रामचन्द्र जी के वन-गमन का प्रसंग है। भगवान राम को मानवीय रूप दे कर जो भावमयी रचनाएं हुई हैं, यह उनमें सरताज रचनाओं में मानी जा सकती है। आखिर ‘अजोध्या के पंडित’ के तो सांस-सांस में राम बसे होंगे। फिर रचना क्यों नहीं सुन्दर होगी! काश! वह पूरी रामायण लिख पाते!
आप भी खोजिए, समृद्ध हो जाइए – अच्छी उर्दू जानते हैं तो और भी रस में डूबेंगे। यहाँ बस कुछ पंक्तियाँ पेश हैं – पिता से विदा लेकर राम माता कौशल्या के पास आ रहे हैं:
रुख़्सत हुआ वो बाप से ले कर ख़ुदा का नाम
राह-ए-वफ़ा की मंज़िल-ए-अव्वल हुई तमाम।
मंज़ूर था जो माँ की ज़ियारत का इंतिज़ाम
दामन से अश्क पोंछ के दिल से किया कलाम।
इज़हार-ए-बेकसी से सितम होगा और भी
देखा हमें उदास तो ग़म होगा और भी।
दिल को सँभालता हुआ आख़िर वो नौनिहाल
ख़ामोश माँ के पास गया सूरत-ए-ख़याल।
देखा तो एक दर में है बैठी वो ख़स्ता-हाल
सकता सा हो गया है ये है शिद्दत-ए-मलाल।
तन में लहू का नाम नहीं ज़र्द रंग है
गोया बशर नहीं कोई तस्वीर-ए-संग है।
सब की ख़ुशी यही है तो सहरा को हो रवाँ
लेकिन मैं अपने मुँह से न हरगिज़ कहूँगी हाँ।
किस तरह बन में आँखों के तारे को भेज दूँ
जोगी बना के राज-दुलारे को भेज दूँ।
चलिए,अपनी देशभक्ति की नज़्म पर लौटते हैं। कुछ और खोजा तो पाया कि अपने एक ज़हीन सांसद हैं मनोज झा – ऐसे सांसद जिनसे संसद की गरिमा के प्रति उम्मीदें बनी रहती हैं। उन्होंने 18 सितंबर 2023 को राज्य सभा में इस नज़्म का जिक्र करते हुए बताया कि संविधान सभा की 11 दिसंबर, 1946 की बैठक में सभा के कार्यवाहक अध्यक्ष सच्चिदानन्द सिन्हा ने महान स्वतंत्रता-सेनानी और उतने ही ऊंचे कद की विदुषी लेखिका – सरोजिनी नायडू से अपनी बात कविता में रखने का आग्रह किया तो उन्होंने भी चकबस्त साहब की वही दो पंक्तियाँ पढ़ीं जो फिल्म में कही गई हैं।
‘खाक-ए-हिन्द’ शीर्षक की इस नज़्म की कुछ और मार्मिक पंक्तियां यहाँ पेश हैं – उम्मीद है, अब आप पूरी नज़्म पढ़ेंगे:
मुर्दा तबीअतों की अफ़्सुर्दगी मिटा दे
उठते हुए शरारे इस राख से दिखा दे।
हुब्ब-ए-वतन समाए आँखों में नूर हो कर
सर में ख़ुमार हो कर दिल में सुरूर हो कर।
शैदा-ए-बोस्ताँ को सर्व-ओ-समन मुबारक
रंगीं तबीअतों को रंग-ए-सुख़न मुबारक।
बुलबुल को गुल मुबारक, गुल को चमन मुबारक
हम बे-कसों को अपना प्यारा वतन मुबारक।
ग़ुंचे हमारे दिल के इस बाग़ में खिलेंगे
इस ख़ाक से उठे हैं इस ख़ाक में मिलेंगे।
और, यह सब लिख कर रात में एक सपना देखा। बढ़िया नाटक के आखिरी दृश्य के बाद जैसा होता है -इस फिल्म की निर्देशक अनुषा रिज़वी और सारा ‘कास्ट एंड क्रू’ -बानो, इराम, साफिया, अक्को, अमिताभ, आसिया, हुमाइरा, नबीला, पल्लवी, ज़ोहेब, तौशीब, खुशी – यानी कृतिका कामरा, श्रेया धन्वन्तरी, शीबा चड्डा, फरीदा जलाल, पूरब कोहली, डॉली अहलूवालिया, जूही बब्बर, नताशा रस्तोगी, जोयीता दत्ता, अनुष्का बनर्जी, निशंक वर्मा, अनूप सोनी, मनीषा गुप्ता वगैरह - बल्कि ‘विंग्स’ में अनुष्का की पुरानी फिल्म ‘पीपली लाइव’ के भी मजेदार लोग स्टेज पर खड़े हैं, और हर जात-मजहब-इलाके के प्यारे-प्यारे लोग तालियों के साथ ‘स्टेंडिंग ओवेशन’ दे रहे हैं। पूरी फिज़ा जैसे कह रही है – मन की सारी तंग गांठें खोल कर निर्भय हो जाओ- ये हम सब का अहले-वतन, प्यारा चमन है।
सपना थोड़ा लम्बा हो रहा था – पर मैंने चलने दिया। आखिर रात के आखिरी पहर का था। दुआ करें, सच हो जाए।
***************

*लंबे समय तक सम्पादन और जन-संचार से जुड़े रहे राजेन्द्र भट्ट अब स्वतंत्र लेखन करते हैं। वह नियमित रूप से इस वेब पत्रिका में लिखते रहे हैं।