पलट प्रवास से तेज हो सकता है ग्रामीण भारत का विकास
कोविड -19 के दौरान लाखों प्रवासी मजदूर लॉकडाउन के समय शहरों से पैदल, साइकिल या बसों से अपने गाँव लौटे। इसे रिवर्स माइग्रेशन या पलट प्रवास कहा गया। बाद में अर्थशास्त्रियों ने पाया कि यह केवल संकट की प्रतिक्रिया नहीं है, बल्कि यह भारत की सामाजिक-आर्थिक संरचना में एक नया रुझान बन रहा है। यदि सरकार और समाज सही नीतिगत समर्थन दें—जैसे ग्रामीण रोजगार, शिक्षा और स्वास्थ्य सुविधाएँ—तो यह प्रवृत्ति ग्रामीण भारत के विकास का आधार बन सकती है। खाड़ी युद्ध के चलते देर-सवेर वहां कार्यरत करीब एक करोड़ लोगों में से बहुत सारे वापिस आना चाहेंगे और पहला अवसर मिलते ही शायद उनकी वापसी शुरू हो भी जाए। अपने इस लेख में डॉ. शैलेश शुक्ला ने फिलहाल खाड़ी के श्रमिकों की तो बात नहीं की है किन्तु पलट प्रवास से होने वाले आर्थिक प्रभावों की चर्चा की है। आज की परिस्थितियों में यह लेख हमारे पाठकों को उपयोगी लग सकता है, ऐसा मानकर हम इसे प्रकाशित कर रहे हैं। फिर कभी किसी अवसर पर हम 'रिवर्स माइग्रेशन' के समाजशास्त्रीय प्रभावों पर भी चर्चा करेंगे।
पलट प्रवास से तेज हो सकता है ग्रामीण भारत का विकास
डॉ. शैलेश शुक्ला
भारत की सामाजिक और आर्थिक संरचना लंबे समय से ग्रामीण आधार पर टिकी रही है, लेकिन औद्योगिकीकरण, शिक्षा और रोजगार के अवसरों के असमान वितरण ने पिछले कई दशकों में बड़े पैमाने पर ग्रामीण से शहरी पलायन को जन्म दिया। जनगणना 2011 के अनुसार देश की कुल आबादी का लगभग 68.84 प्रतिशत हिस्सा ग्रामीण क्षेत्रों में निवास करता था, जबकि लगभग 31 प्रतिशत जनसंख्या शहरी क्षेत्रों में थी। उसी जनगणना में यह भी दर्ज किया गया कि भारत में लगभग 45 करोड़ लोग किसी न किसी रूप में प्रवासी थे, जो कुल जनसंख्या का 37.8 प्रतिशत था। यह आँकड़ा बताता है कि आंतरिक प्रवासन भारत की आर्थिक संरचना का एक स्थायी और व्यापक घटक बन चुका है। किंतु पिछले कुछ वर्षों में, विशेषकर कोविड-19 महामारी के दौरान और उसके बाद, एक नया रुझान सामने आया जिसे पलट प्रवास या वापसी प्रवास कहा जा रहा है। यह प्रवृत्ति केवल अस्थायी संकट की प्रतिक्रिया नहीं है, बल्कि यदि सही नीतिगत समर्थन मिले तो यह ग्रामीण भारत के पुनरुत्थान और संतुलित विकास का आधार बन सकती है।
पलट प्रवास का अर्थ है उन लोगों का अपने मूल गाँवों या छोटे कस्बों में वापस लौटना, जो पहले बेहतर रोजगार, शिक्षा या जीवन सुविधाओं की तलाश में शहरों की ओर गए थे। कोविड-19 के दौरान अचानक लगे लॉकडाउन ने लाखों प्रवासी मजदूरों को अपने गाँवों की ओर लौटने के लिए मजबूर किया। हालांकि प्रारंभिक चरण में यह प्रवास संकट-प्रेरित था, लेकिन बाद के वर्षों में कई राज्यों से यह संकेत मिलने लगे कि कुछ लोग स्थायी रूप से या अर्ध-स्थायी रूप से गाँवों में ही बसने लगे हैं और स्थानीय स्तर पर रोजगार के नए अवसर तलाश रहे हैं। उदाहरण के लिए, उत्तराखंड में राज्य सरकार और प्रवासन आयोग के अनुसार 2020 से 2025 के बीच 6,282 से अधिक लोग अपने गाँवों में वापस लौटे और उनमें से लगभग 40 प्रतिशत युवा वर्ग 25 से 35 वर्ष आयु समूह का था। इन लौटे हुए लोगों में से 39 प्रतिशत कृषि और बागवानी, 21 प्रतिशत पर्यटन और सेवा क्षेत्र तथा 18 प्रतिशत पशुपालन से जुड़े कार्यों में संलग्न पाए गए। यह संकेत देता है कि यदि ग्रामीण क्षेत्रों में आधारभूत ढाँचा और बाज़ार समर्थन उपलब्ध हो, तो वापसी प्रवास स्थानीय अर्थव्यवस्था को पुनर्जीवित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है।
भारत में ग्रामीण संकट का एक बड़ा कारण दशकों से जारी असंतुलित विकास मॉडल रहा है, जिसमें उद्योग, शिक्षा, स्वास्थ्य और आधुनिक सेवाएँ मुख्यतः शहरों में केंद्रित रही हैं। इसके परिणामस्वरूप गाँवों में रोजगार के अवसर सीमित होते गए और कृषि पर निर्भरता बढ़ती रही, जबकि कृषि आय स्थिर या कम होती गई। सामाजिक-आर्थिक जाति जनगणना 2011 के अनुसार ग्रामीण भारत के 56 प्रतिशत परिवारों के पास कृषि योग्य भूमि नहीं थी और लगभग 29.97 प्रतिशत ग्रामीण परिवार भूमिहीन थे तथा उनका मुख्य आय स्रोत दिहाड़ी मजदूरी था। ऐसे हालात में पलायन एक मजबूरी बन गया। लेकिन जब यही श्रमिक और युवा वर्ग वापस गाँवों की ओर लौटता है, तो वह अपने साथ केवल श्रमशक्ति ही नहीं, बल्कि शहरों में अर्जित अनुभव, कौशल और नए दृष्टिकोण भी लेकर आता है, जो ग्रामीण अर्थव्यवस्था के आधुनिकीकरण में सहायक हो सकता है।
पलट प्रवास ग्रामीण उद्यमिता को भी बढ़ावा दे सकता है। शहरों में कार्यरत रहे अनेक लोग सेवा क्षेत्र, निर्माण, परिवहन, लघु उद्योग और डिजिटल सेवाओं का व्यावहारिक अनुभव लेकर लौटते हैं। यदि उन्हें वित्तीय सहायता, प्रशिक्षण और बाज़ार तक पहुँच उपलब्ध कराई जाए, तो वे गाँवों में छोटे उद्योग, कृषि आधारित प्रसंस्करण इकाइयाँ, डेयरी, मत्स्य पालन, ग्रामीण पर्यटन और ई-कॉमर्स आधारित गतिविधियाँ शुरू कर सकते हैं। इससे ग्रामीण क्षेत्रों में स्थानीय स्तर पर रोजगार सृजन होगा और गाँवों की अर्थव्यवस्था केवल कृषि पर निर्भर रहने के बजाय विविधीकृत हो सकेगी। यह मॉडल आत्मनिर्भर ग्रामीण अर्थव्यवस्था की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम हो सकता है, जिसकी चर्चा लंबे समय से नीति दस्तावेज़ों में होती रही है।
ग्रामीण विकास की दृष्टि से पलट प्रवास का एक और सकारात्मक पहलू यह है कि इससे गाँवों की जनसांख्यिकीय संरचना में सुधार हो सकता है। वर्षों से बड़े पैमाने पर युवा आबादी के शहरों की ओर जाने से अनेक गाँवों में बुजुर्ग और बच्चों की संख्या अधिक हो गई थी, जिससे कृषि, सामुदायिक गतिविधियों और स्थानीय संस्थाओं की कार्यक्षमता प्रभावित हुई। जब युवा और कार्यशील आयु वर्ग के लोग वापस लौटते हैं, तो वे पंचायतों, स्वयं सहायता समूहों, सहकारी समितियों और स्थानीय संगठनों में सक्रिय भूमिका निभा सकते हैं। इससे ग्रामीण शासन व्यवस्था अधिक गतिशील और जवाबदेह बन सकती है।
हालांकि पलट प्रवास अपने आप में कोई जादुई समाधान नहीं है। यदि ग्रामीण क्षेत्रों में आधारभूत सुविधाओं जैसे सड़क, बिजली, इंटरनेट, स्वास्थ्य सेवाएँ, शिक्षा संस्थान और बाज़ार संरचना का अभाव बना रहता है, तो लौटे हुए लोग पुनः शहरों की ओर जाने के लिए मजबूर हो सकते हैं। उत्तराखंड के ही उदाहरण में यह पाया गया कि लौटने वालों की संख्या बढ़ने के बावजूद कुल मिलाकर राज्य से बाहर जाने वाले लोगों की संख्या अभी भी अधिक है और कई गाँव पूरी तरह खाली हो चुके हैं। यह दर्शाता है कि पलट प्रवास को स्थायी और उत्पादक बनाने के लिए केवल भावनात्मक अपील पर्याप्त नहीं है; इसके लिए सुनियोजित और दीर्घकालिक ग्रामीण विकास नीतियों की आवश्यकता है।
पलट प्रवास को अवसर में बदलने के लिए सबसे महत्वपूर्ण क्षेत्र ग्रामीण अवसंरचना का सुदृढ़ीकरण है। डिजिटल इंडिया और भारतनेट जैसी योजनाओं के माध्यम से गाँवों तक इंटरनेट पहुँचाने का प्रयास किया गया है, जिससे दूरस्थ कार्य, ऑनलाइन शिक्षा और डिजिटल सेवाओं की संभावनाएँ बढ़ी हैं। यदि ग्रामीण क्षेत्रों में विश्वसनीय इंटरनेट कनेक्टिविटी और विद्युत आपूर्ति सुनिश्चित की जाए, तो आईटी आधारित सेवाएँ, फ्रीलांसिंग, ऑनलाइन व्यापार और ई-गवर्नेंस जैसी गतिविधियाँ गाँवों से ही संचालित की जा सकती हैं। इससे शहरों पर जनसंख्या का दबाव कम होगा और ग्रामीण युवाओं को अपने घर के पास ही सम्मानजनक रोजगार मिल सकेगा।
कृषि क्षेत्र में भी पलट प्रवास नई ऊर्जा ला सकता है। शहरों में रहकर आधुनिक प्रबंधन, विपणन और तकनीक से परिचित हुए लोग जब खेती में लौटते हैं, तो वे पारंपरिक कृषि पद्धतियों के साथ आधुनिक तकनीकों जैसे ड्रिप सिंचाई, जैविक खेती, कृषि मशीनरी और फसल विविधीकरण को अपनाने में अधिक रुचि दिखाते हैं। इससे कृषि उत्पादकता और आय दोनों में वृद्धि की संभावना होती है। साथ ही, कृषि उत्पादों के प्रसंस्करण और सीधे उपभोक्ता तक पहुँचाने के लिए डिजिटल प्लेटफॉर्म का उपयोग भी बढ़ सकता है, जिससे बिचौलियों पर निर्भरता कम होगी।
ग्रामीण समाज की सामाजिक संरचना पर भी पलट प्रवास का सकारात्मक प्रभाव पड़ सकता है। शहरों में काम करने वाले लोगों का अनुभव उन्हें जाति, लिंग और पेशागत विभाजन के पार एक अधिक व्यावहारिक और आधुनिक दृष्टिकोण प्रदान करता है। जब वे गाँवों में लौटते हैं, तो वे शिक्षा, स्वच्छता, महिला सशक्तिकरण और बच्चों की पढ़ाई के प्रति अधिक जागरूकता लाते हैं। इससे धीरे-धीरे ग्रामीण समाज में सामाजिक सुधार और प्रगतिशील मूल्यों का प्रसार हो सकता है।
इसके बावजूद, नीति निर्माताओं के सामने एक बड़ी चुनौती यह है कि पलट प्रवास को आकस्मिक घटना मानकर नजरअंदाज न किया जाए, बल्कि इसे दीर्घकालिक विकास रणनीति के रूप में देखा जाए। यदि लौटे हुए लोगों का व्यवस्थित पंजीकरण, कौशल मानचित्रण और रोजगार परामर्श किया जाए, तो उन्हें उनकी योग्यता के अनुसार स्थानीय स्तर पर अवसर उपलब्ध कराए जा सकते हैं। कौशल भारत, राष्ट्रीय ग्रामीण आजीविका मिशन और सूक्ष्म, लघु एवं मध्यम उद्यम योजनाओं को पलट प्रवासियों के साथ विशेष रूप से जोड़ा जा सकता है।
शहरी दृष्टिकोण से भी पलट प्रवास महत्वपूर्ण है, क्योंकि अत्यधिक जनसंख्या दबाव से जूझ रहे महानगरों के लिए यह एक राहत का कारक बन सकता है। शहरों में झुग्गी बस्तियों का विस्तार, यातायात दबाव, प्रदूषण और बुनियादी सेवाओं पर बढ़ता बोझ इस बात का संकेत है कि अनियंत्रित शहरीकरण दीर्घकाल में टिकाऊ नहीं है। यदि आर्थिक गतिविधियों का विकेंद्रीकरण होता है और गाँवों तथा छोटे शहरों में भी पर्याप्त अवसर विकसित होते हैं, तो देश का विकास अधिक संतुलित और स्थायी हो सकेगा।
अंततः यह कहा जा सकता है कि पलट प्रवास केवल लोगों का स्थान परिवर्तन नहीं है, बल्कि यह भारत के विकास मॉडल पर पुनर्विचार का अवसर भी है। यह हमें यह सोचने के लिए प्रेरित करता है कि क्या विकास का अर्थ केवल महानगरों का विस्तार और ग्रामीण क्षेत्रों का खाली होना है, या फिर ऐसा संतुलित विकास मॉडल संभव है जिसमें गाँव और शहर दोनों समान रूप से प्रगति करें। यदि सरकार, स्थानीय प्रशासन, निजी क्षेत्र और स्वयं ग्रामीण समाज मिलकर इस दिशा में योजनाबद्ध प्रयास करें, तो पलट प्रवास ग्रामीण भारत के लिए एक नई शुरुआत साबित हो सकता है। यह प्रक्रिया न केवल गाँवों की अर्थव्यवस्था को सशक्त करेगी, बल्कि सामाजिक संतुलन, पर्यावरण संरक्षण और सांस्कृतिक निरंतरता को भी बनाए रखने में सहायक होगी। इस प्रकार, पलट प्रवास को समस्या के बजाय अवसर के रूप में समझना और उसके अनुरूप नीतियाँ बनाना ही वह मार्ग है, जिससे भारत का ग्रामीण परिदृश्य वास्तव में तेज और समावेशी विकास की ओर बढ़ सकता है।
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डॉ. शैलेश शुक्ला करीब ढाई दशक से मीडिया, राजभाषा, अनुवाद और अकादमिक जगत में सक्रिय हैं और एक दशक तक दिल्ली में पत्रकारिता एवं शिक्षण, सिक्किम विश्वविद्यालय के पहले राजभाषा अधिकारी और एक केन्द्रीय उपक्रम के राजभाषा अधिकारी के रूप में कार्य करने का पश्चात वर्तमान में सृजन संसार अंतरराष्ट्रीय पत्रिका समूह के वैश्विक समूह संपादक के रूप में कार्यरत हैं। उन्होंने दिल्ली विश्वविद्यालय और सिक्किम केंद्रीय विश्वविद्यालय में अध्यापन भी किया है। ‘न्यू मीडिया में हिंदी साहित्य’ विषय पर पीएचडी की उपाधि प्राप्त डॉ. शैलेश शुक्ला ने दिल्ली विश्वविद्यालय और इग्नू के पाठ्यक्रमों सहित विभिन्न पुस्तकों में 30 से अधिक अध्यायों का लेखन किया है। उन्होंने 20 से अधिक पुस्तकों का लेखन एवं संपादन किया है तथा देश-विदेश के विभिन्न समाचार पत्रों और पत्रिकाओं में 40 से अधिक शोध-पत्र, लेख, कविताएँ, कहानियाँ और व्यंग्य सहित 1000 से अधिक रचनाएँ प्रकाशित की हैं। डॉ. शुक्ला को भारत सरकार, गृह मंत्रालय द्वारा ‘राजभाषा गौरव पुरस्कार 2019-20’ और राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र, दिल्ली की हिंदी अकादमी द्वारा ‘नवोदित लेखक पुरस्कार 2003-04’ सहित विभिन्न सम्मान प्राप्त हुए हैं।
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