यूपी चुनाव : क्या योगी पर ही है सारा दारोमदार!
उत्तर प्रदेश विधान सभा का चुनाव चाहे अभी करीब पांच माह दूर है लेकिन राजनीतिक गलियारों में पिछले कई माह से चर्चा में है। इस बार के चुनाव में पिछली दो बार से मुख्यमंत्री रहे आदित्यनाथ योगी की विशेष परीक्षा मानी जा रही है कि वह दस वर्षों के दौरान वोटर को होने वाली ऊब पर (जिसे अंग्रेज़ी वाले anti-incumbency कहते हैं) जीत हासिल करके क्या तीसरी बार भी सत्ता में आ सकते हैं? उधर पूर्व मुख्यमंत्री अखिलेश यादव भी प्रदेश की जनता के बीच पिछले दस वर्षों में लगातार सक्रिय रहे हैं और वोटर की निगाह में बने रहे हैं। कांग्रेस की संगठनात्मक कमज़ोरियाँ चाहे सर्वविदित हैं लेकिन उनके नेता राहुल गाँधी ने जनता से जुड़े मुद्दों को जिस तरह पूरी ताकत से उठाया है, उससे कम से कम इतना तो हुआ है कि सपा की मज़बूत सहयोगी के तौर पर कांग्रेस की ज़रूरत को कोई नकार नहीं सकता। चुनाव पूर्व परिदृश्य के विभिन्न पहलुओं पर वरिष्ठ राजनीतिक विश्लेषक राजकेश्वर सिंह प्रस्तुत लेख में विचार कर रहे हैं।
यूपी चुनाव : क्या योगी पर ही है सारा दारोमदार!
राजकेश्वर सिंह
अगले साल होने वाला उत्तर प्रदेश विधानसभा का चुनाव इस बार कुछ ज्यादा ही दिलचस्प होने जा रहा है। यह चुनाव भाजपा के लिए जीने-मरने का प्रश्न भले न हों, लेकिन यही बात समाजवादी पार्टी और कांग्रेस के मामले में नहीं कही जा सकती। इस सच्चाई को जानने के बावजूद कि गठबंधन जरूरी ही नहीं, मजबूरी भी है, फिर भी सपा और कांग्रेस के बीच की तल्खियां आये दिन मीडिया की सुर्खियां बन रही हैं। वजह यह है कि सपा और कांग्रेस के लिए यह चुनाव एक बार फिर से अपनी खोई राजनीतिक जमीन को हासिल करने के बड़े मौके के रूप में दिख रहा है। जहां तक भाजपा का सवाल है तो वहां कई तरह की तैयारियों के बीच ऊपर से सब कुछ ठीक जरूर दिख रहा है, लेकिन अंदरखाने पार्टी एक साथ कई अंतर्विरोधों के मोर्चे पर जूझ रही है, लेकिन उसका मीडिया मैनेजमेंट उसे बाहर नहीं आने दे रहा है।
उत्तर प्रदेश के आगामी चुनाव की बाबत मुख्य विपक्षी समाजवादी पार्टी और कांग्रेस के बीच गठबंधन क्या रुख अख़्तियार करता है? इन दिनों राजनीतिक हल्कों में इस पर ही ज्यादा चर्चा हो रही है। तालमेल के लिए सपा जहां सीट से ज्यादा गठबंधन की जीत की दुहाई दे रही है, वहीं उसके नेता कांग्रेस को बमुश्किल 50 विधानसभा सीटें ही देने की हिमायत कर रहे हैं, जो यह बताता है कि इस बार सपा अपनी जीत को लेकर कुछ ज्यादा ही हौसलामंद है। हालांकि उसे इस बात का भी बखूबी अहसास है कि कांग्रेस के साथ के बिना यह जीत आसान भी नहीं है। सपा भी जानती है कि कांग्रेस के नेता भले ही गठबंधन में 150 सीटों को लेने वाला बयान दे रहे हैं, लेकिन सच्चाई यह है कि पार्टी के कमजोर संगठन के चलते उसके पास अभी मांगी जा रही सभी सीटों पर उतारने के लिए मजबूत प्रत्याशी ही नहीं हैं।
कांग्रेस के लिए भी यह हकीकत दीवार पर लिखी इबारत जैसी ही है, लेकिन बड़ा सवाल यह है कि यदि दोनों दलों के बीच गठबंधन नहीं होता तो भी क्या कांग्रेस के पास प्रत्याशियों का उतना ही संकट रहेगा। उस स्थिति में, क्या सपा जिस विधानसभा सीट पर अपने किसी एक प्रत्याशी को उतारेगी और दूसरे दावेदार को टिकट नहीं देगी तो क्या गारंटी होगी कि वह कांग्रेस समेत दूसरे दलों से उम्मीदवार बनने की जुगत नहीं करेगा और यदि ऐसी कोई नौबत आती है तो विपक्ष के संभावित नतीजों का अनुमान लगाया जा सकता है। सपा ने रणनीति के तहत अभी हर सीट पर अपने दो-दो जिताऊ प्रत्याशियों का आकलन कर रखा है।
कांग्रेस का जहां तक सवाल है तो ऐसा भी नहीं है कि उसे उत्तर प्रदेश में अपनी राजनीतिक जमीन का कायदे से अहसास नहीं है, लेकिन उसे यह भी पता है कि केंद्र कि मोदी सरकार और भाजपा पर उसके नेता राहुल गांधी बीते कई वर्षों से जिस तरह खुलकर आक्रामक रूप से हमलावर रहे हैं, उस लिहाज से देश का बड़ा जनमानस मोदी के सामने दूसरे नेता के रूप में राहुल गांधी की ओर देख रहा है। जिस दौर में केंद्र सरकार और केंद्रीय जांच एजेंसियों के कामकाज के तरीके से एक तरह से सहमे हुए कई विपक्षी दल जब संभलकर राजनीति कर रहे हैं, उस दौर में भी राहुल जिस हद तक मोदी और भाजपा के खिलाफ आक्रामक रहे हैं, उसने भी लोगों को कांग्रेस की तरफ सोचने की जमीन तैयार की है और कांग्रेस इस स्थिति को अपने लिए एक मौके के रूप में देख रही है।
उत्तर प्रदेश में कांग्रेस की स्थिति 1989 के बाद से ही कमजोर है। बाद के वर्षों में वह और भी बदतर ही रही है। फिर भी इन कमजोर स्थितियों के बावजूद उसने 2009 के लोकसभा चुनाव में उत्तर प्रदेश में 21 सीटों पर जीत दर्ज की थी, जबकि 2024 के लोकसभा चुनाव में वह छह सीटों तक पहुंच चुकी है। गौरतलब है कि 2019 के लोकसभा चुनाव में वह एक सीट पर सिमट गई थी, लेकिन अब वह नए सिरे से तैयारी में जुटी है। हालिया कई बदलावों के साथ वह दलितों, ब्राह्मणों और अल्पसंख्यकों पर वह खास फोकस कर रही है। वह दलित समाज से राजेन्द्रपाल गौतम को प्रदेश प्रभारी, ब्राह्मण समाज से आराधना मिश्रा को प्रदेश अध्यक्ष और अल्पसंख्यक समाज से सांसद इमरान मसूद को कार्यकारी प्रदेश अध्यक्ष बनाकर सक्रियता बढ़ा दी है। चूंकि हाल के वर्षों में देश के विभिन्न राज्यों में भाजपा से लड़ाई में क्षेत्रीय दल जिस तरह एक के बाद एक हारते गये, वह स्थिति भी कांग्रेस के लिए एक गुंजाइश ही पैदा करती है।
उधर, इंडिया गठबंधन में विपक्ष के कई ऐसे दल भी शामिल रहे हैं जो साथ होने के बावजूद परोक्षरूप से कांग्रेस के लिए असहज स्थिति पैदा करने की कोई गुंजाइश नहीं छोड़ते थे। यही वजह है कि अब बदली परिस्थितियों में कांग्रेस खुद को फिर से खड़ा करने का कोई मौका नहीं छोड़ना चाहती। वह उत्तर प्रदेश में भी सपा से समझौते में सम्मानजनक सीटें चाहती है। बयानबाजी के लिए उसके नेता यूपी की 403 विधानसभा सीटों में से सपा से गठजोड़ में भले ही 150 सीटों की बात करते हों, लेकिन ऐसा माना जा रहा कि 80 से 90 सीटों तक वह हर हाल में चाहती है, जबकि सपा की ओर से सिर्फ 50 सीटों की बात की जा रही है। इन स्थितियों के बावजूद सपा के शीर्षस्थ नेता मानते हैं कि कांग्रेस से गठबंधन होगा ही। ऐसे में सम्भावना जताई जा रही है कि दोनों दलों के बीच 75 से 80 सीटों के आसपास चुनावी गठबंधन हो सकता है।
दूसरी तरफ, भाजपा तो कई महीने पहले से ही चुनावी तैयारियों में जुटी है। मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ प्रदेश के 75 जिलों की लगभग सवा सौ विधानसभा सीटों को लक्ष्य करके उससे संबंधित जिलों में दौरा करके हजारों करोड़ की विकास परियोजनाओं का शिलान्यास/लोकार्पण कर चुके हैं। इनमें 67 वही सीटें हैं, जिन पर 2024 के लोकसभा चुनाव में सपा-कांग्रेस गठबंधन आगे रहा था। योगी अब उन सीटों पर पार्टी की स्थिति मजबूत करने में लगे हैं। हालांकि यह भी एक सच्चाई है कि योगी जब से मुख्यमंत्री बने हैं, तब से पार्टी के शीर्ष नेतृत्व व उनके बीच सब कुछ ठीक न होने की अफवाहें समय-समय पर जन्म लेती रही हैं। यह सही है कि योगी पूरी तरह चुनावी तैयारियों में जुटे हैं, लेकिन केंद्रीय नेता उस लिहाज से प्रदेश में अभी सक्रिय नहीं दिख रहे हैं। ऐसी चर्चा है कि पार्टी के शीर्ष नेतृत्व का फोकस इस बार पंजाब में अपनी सरकार बनाने का है। साथ ही पश्चिम बंगाल,बिहार, महाराष्ट्र समेत दूसरे कई राज्यों में भाजपा की सरकार बन जाने के बाद भाजपा उत्तर प्रदेश को लेकर बहुत फिक्रमंद नहीं है। ऐसे में राज्य में पार्टी को विधानसभा चुनाव जिताने का ज्यादा दारोमदार फिलहाल योगी पर है। ज़ाहिर है, अपेक्षित परिणाम न आने पर जवाबदेही का सवाल उठता ही है।

राजकेश्वर सिंह राजनीतिक विश्लेषक व वरिष्ठ पत्रकार हैं। वह नियमित रूप से रागदिल्ली.कॉम के लिए लिखते रहते हैं।
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