कथाकार प्रेमचंद की कथाओं - तावान और गुल्ली-डंडा पर प्राध्यापकों और समालोचकों की भाषा-शैली की बजाय साधारण पर संवेदनशील और ‘फोकस्ड’ पाठक के तौर पर हमने चर्चा की और इनसे कुछ नए, शायद ‘एमेच्योर’ निष्कर्ष निकाले (इन चर्चाओं को आप यहाँ और यहाँ पढ़ सकते हैं)।











