पिछले वर्ष प्रेमचंद जयंती (31 जुलाई 2020) के अवसर पर रागदिल्ली में अपने लेख में मैंने उनकी एक कम चर्चित कहानी तावान की चर्चा की थी और इस बहाने एक गंभीर लेखक के, मात्र समीक्षकों और लेखकों से आगे जाकर, संवेदनशील-सहृदय पाठकों तक पहुँच पाने, उन्हें बेहतर इंसान बनाने में योगदान दे पाने और कहानी में ‘सुनाने’ योग्य ‘कथा-पन’ ला पाने जैसी चुनौतियों का उल्लेख किया था।












