दर्शनशास्त्र की पारंपरिक सीमाओं को लांघती है द्रष्टा दृश्य और दर्शन
डॉ मधु कपूर हमारी वेबपत्रिका के लिए पचास से भी अधिक निबंध लिख चुकी हैं. दर्शनशास्त्र जो अपने आप में एक शुष्क विषय माना जाता है, उसे रागदिल्ली के पाठकों के लिए उन्होंने काफी सरल कर दिया है. हाल ही में इस वेबपत्रिका में प्रकाशित उनके कुछ निबंधों को ब्लूरोज पब्लिशर ने प्रकाशित किया है. केविन मल्लिक ने इस पुस्तक की समीक्षा की है और इसे आधुनिक हिंदी दार्शनिक विमर्श में एक मूल्यवान योगदान बताया है।
दर्शनशास्त्र की पारंपरिक सीमाओं को लांघती है द्रष्टा दृश्य और दर्शन
केविन मल्लिक
समकालीन हिंदी दार्शनिक साहित्य के परिप्रेक्ष्य में डॉ. मधु कपूर की द्रष्टा दृश्य और दर्शन: एक चौथे आयाम की खोज एक गहन बौद्धिक विचार की खोज करती है। दर्शनशास्त्र की समृद्ध परंपरा में गहराई से निहित यह पुस्तक अकादमिक दर्शन की पारंपरिक सीमाओं को तोड़कर उससे कहीं आगे क्षितिज की ओर संकेत करती प्रतीत होती है। पाठकों को ज्ञानमीमांसा, अस्तित्ववाद और मानव अनुभव के उन आयामों पर विचार करने के लिए आह्वान करती है जो अक्सर रोज़मर्रा की जिंदगी में अनदेखे रह जाते हैं। डॉ. कपूर ने इस पुस्तक में ऐसे ही कुछ अदृश्य, अनकहे और उपेक्षित चिंतन के पहलुओं की तरफ इंगित किया है, जो पाठकों का ध्यान आकर्षित करने में सक्षम है।
पुस्तक का मूल केंद्र इसके शीर्षक में निहित है, जो त्रिपुटी सम्बन्ध — द्रष्टा (देखने वाला), दृश्य (देखा जाने वाला विषय), और दर्शन (दार्शनिक उपलब्धि)— से आगे जाने का प्रयास करता है। पुस्तक इन आधारभूत पारंपरिक धारणाओं का उपयोग करके पाठकों को एक अज्ञात "चौथे आयाम" की ओर झाँकने को प्रेरित करती हैं—एक ऐसा उच्चतर दृष्टिकोण जहाँ से पाठक को अपनी बौद्धिक और आध्यात्मिक यात्रा स्वयं तय करनी पड़ती है।
पुस्तक के अंतर्गत लेख अत्यन्त साधारण घटनाओं से शुरू होकर एक विस्तृत पृष्ठभूमि को समेटने में सफल होते हैं। दार्शनिक पृष्ठभूमि से निकल कर विषय केवल अमूर्त शास्त्रीय सिद्धांतों तक सीमित नहीं रहते है, बल्कि सामान्य घटनाओं, सामाजिक कथनों और स्वीकृत मान्यताओं को व्यक्तिगत तर्क की कसौटी पर कस कर उन्हें परखा गया है। अपने विचारों को पुष्ट करने के लिए लेखिका रोज की बातचीत से उपलब्ध सामग्री से लेकर साहित्यिक तथा दार्शनिक संदर्भों का उल्लेख कर एक अद्भुत ताना-बाना बुनती हैं। वे गुरचरण दास और अमर्त्य सेन जैसे आधुनिक सामाजिक-आर्थिक चिंतकों की अंतर्दृष्टियों का सहारा लेती हैं, साथ ही जॉन ऑस्टिन जैसे दार्शनिकों और फ़्योदोर दोस्तोयेव्स्की की साहित्यिक-अस्तित्ववादी कहानियों की गहराइयों से भी संवाद स्थापित करती हैं। इस प्रकार पूर्वी विश्लेषणात्मक परंपरा और पश्चिमी भाषिक व अस्तित्ववादी चिंतन का संगम पुस्तक को न केवल विशिष्टता, बल्कि विश्वव्यापी समृद्ध स्वरूप प्रदान करता है।
विषयों का विस्तार एक विशाल परिसर को स्पर्श करता प्रतीत होता है, क्योंकि लेखिका के पास विषयों का कोई अभाव नहीं है। एक साधारण टेबल और हथौड़े से आरम्भ करके एक सौन्दर्य पिपासु तृष्णार्त व्यक्ति में भी दार्शनिक बिंदु को खोज लाती हैं। डॉ. कपूर सौंदर्यशास्त्र, भाषा-दर्शन और प्राचीन सिद्धांतों के समकालीन पुनर्मूल्यांकन जैसे जटिल क्षेत्रों में प्रवेश करती हैं और उन्हें मानवीय जीवन संघर्षों से जोड़ने का प्रयत्न करती है। वे जीवन और मृत्यु के रहस्यों की गहराई से पड़ताल करती हैं, शरीर, मन और आत्मा के तथा ज्ञान, भक्ति और कर्म के आपसी संबंधों को बारीकियों से मानस-पटल पर पेश करती हैं।
भारतीय दृष्टिकोण के अलावा पाश्चात्य दार्शनिक, विशेष रूप से मार्टिन हाईडेगर के मत का उल्लेख कर पाठकों को किनारे पर ले जाकर आगे की यात्रा करने के लिए विवश करती है। अपनी दृष्टि को एक छोर पर आकाशगंगाओं और दूरस्थ तारों तक फैलाकर तथा दूसरे छोर पर मानवीय संवेदनाओं तथा जमीनी यथार्थ से जोड़ कर वे इस सेतु को कभी टूटने नहीं देती है।
ध्यान देने योग्य बात है कि पुस्तक ‘द्रष्टा दृश्य और दर्शन: एक चौथे आयाम की खोज‘ इतने विशाल विषय-विस्तार को समेटती हुई होने पर भी साधारण पाठकों को ध्यान में रख कर ही लिखी गई है, पर गंभीर और गहन पाठकों को भी सोचने की रसद प्रदान करती है। यह कहने में कोई संकोच नहीं है कि इसके विषय और विचार पाठकों से धैर्य और सक्रिय सहयोगिता की मांग करती है। डॉ. कपूर दर्शन को मृत विचारों का "संग्रहालय" नहीं, बल्कि जीवंत "प्रयोगशाला" के रूप में प्रस्तुत करती हैं, जहाँ परीक्षण और निरीक्षण के आधार पर कठोर से कठोर सत्य की भी अवमानना करने का विधान पाठकों को देती है, क्योंकि सत्य किसी की निजी धरोहर नहीं है, सभी अपने अपने प्रिज्म के माध्यम से उसका दर्शन करते है।
अंततः, डॉ. मधु कपूर का यह कार्य आधुनिक हिंदी दार्शनिक विमर्श में एक मूल्यवान योगदान है। वे ज्ञान को निष्क्रिय न मान कर पाठकों को सत्य की अपनी खोज में सक्रिय भागीदार बनाने के लिए आग्रह करती है। जो पाठक इसके बौद्धिक शिखरों तक पहुँचने का साहस रखते हैं, उनके लिए यह पुस्तक एक रूपांतरणकारी यात्रा सिद्ध होगी—जो दृष्टि को स्वच्छता प्रदान करती है। दर्शन की समझ को एक सहज उड़ान देने में मदद करती है।
शीर्षक : द्रष्टा दृश्य और दर्शन — एक चौथे आयाम की खोज
लेखिका : डॉ. मधु कपूर
मूल्य : ३१४ रुपये
प्राप्ति स्थान : ब्लूरोज पब्लिशर (फ़ोन न. 8882898898 (८८८२८९८८९८), 447342408967 (४४७३४२४०८९६७) Online platform Amazon
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समीक्षक केविन मल्लिक है। वह Kevein Books and Reviews नाम से एक भारतीय ऑनलाइन बुक-रिव्यू और बुक-प्रमोशन प्लेटफ़ॉर्म का संचालन करते हैं। इस प्लेटफ़ॉर्म का फोकस किताबों की समीक्षा, लेखकों का प्रचार और पुस्तक मार्केटिंग इत्यादि है। इसे एक स्वतंत्र ऑनलाइन पुस्तक-समीक्षा और प्रचार मंच के रूप में देखा जा सकता है।