आंदोलनों की नई इबारत लिख रही हैं लड़कियां
हाल के महीनों में देशभर में हुए छात्र और युवा आंदोलनों की तस्वीरों पर एक नज़र डालिए। मंच पर बोलती हुई लड़कियाँ, जुलूसों की अगुवाई करती छात्राएँ, पुलिस और प्रशासन के सामने निर्भीकता से अपनी बात रखती युवा महिलाएँ, हर जगह उनकी उपस्थिति पहले से कहीं अधिक दिखाई देती है। यह दृश्य अचानक नहीं बना है। इसकी जड़ें उन सामाजिक और राजनीतिक आंदोलनों में हैं जिन्होंने पिछले कुछ वर्षों में भारतीय युवतियों को सार्वजनिक जीवन का अधिक आत्मविश्वासी और मुखर सहभागी बनाया है। आप कह सकते हैं कि महिलाओं की आंदोलनों में बढती भागीदारी के बीज 2012 के निर्भया आन्दोलन और बाद में नागरिकता कानून (CAA) के विरोध में हुए आन्दोलन में पड़ गए थे। आज लड़कियां केवल आंदोलनों की समर्थक नहीं, बल्कि उनकी दिशा और भाषा तय करने वाली मुखर शक्ति के रूप में उभर रही हैं। इसी बदलती तस्वीर का विश्लेषण कर रहे हैं वरिष्ठ पत्रकार एवं राजनीतिक विश्लेषक राजकेश्वर सिंह।
आंदोलनों की नई इबारत लिख रही हैं लड़कियां
राजकेश्वर सिंह
चुनावी हार-जीत और उसके लिए राजनीतिक दलों की ओर से की जाने वाली तिकड़म अपनी जगह हैं, लेकिन जरूरी मुद्दों को लेकर देश में हुए हालिया आंदोलनों की एक नई तस्वीर भी उभरी हैं। कुछ बरस पहले तक राजनीतिक दलों और दूसरे संगठनों के धरनों-प्रदर्शनों में महिलाओं की भागीदारी अमूमन कहने-सुनने भर की होती थी, लेकिन बीते कुछ महीनों के भीतर देश की राजधानी दिल्ली में हुए आंदोलनों में देश की लड़कियां जिस हिम्मत, बहादुरी और जज्बे के साथ सड़कों पर उतरी हैं, वह यह साबित करता है कि सरकारों से जरूरी सवालों पर जवाब की बाबत आंदोलनों की नई इबारत लिखी जा रही है।
हाल केइन आंदोलनों से दो बड़ी बातें निकली हैं। एक तो पुराने ढर्रे की राजनीति में बड़ी उम्र के नामी नेताओं के सामने डटकर खड़े होने वाले छात्रों-छात्राओं और नौजवानों में से नई नायिकाएं और नायक उभर रहे हैं। दूसरी बात यह कि जुल्म-ज्यादती के खिलाफ जमीन पर उतरकर व्यवस्था से लड़ने के मामले में अब लड़कियों ने भी बराबर की भागीदारी साथ मोर्चा संभालना शुरू कर दिया है।
अभी यह बात बहुत पुरानी नहीं हुई है, जब जुलाई में दिल्ली के जंतर मंतर पर हुई आंदोलन में देशभर से जुटे छात्रों-छात्राओं इतना बड़ा आंदोलन किया था कि 12 सालों में मोदी सरकार के किसी मंत्री को इस्तीफा देना पड़ गया था। उस आंदोलन ने पहली बार देश को दिखाया कि लड़के ही नहीं, आज के भारत की लड़कियां भी अपनी पीढ़ी के ज़रूरी सवालों पर किसी से भी भिड़ने को तैयार हैं। तब लड़कियों ने लड़कों से भी आगे जाकर सर्वोच्च नेतृत्व तक को निशाने पर लिया था। उनका वह तेवर और जज्बा समय के साथ और बढ़ता ही जा रहा है। सड़कों पर उतरकर लड़ने और जूझने के मामले में लड़कियों, महिलाओं के ऊपर कमजोर होने का जो लेबल शुरू से चस्पा चला आ रहा था, अब वह टूट चुका है। अब वे सारे सवालों का खुलकर जवाब दे रही हैं। पुलिस से संघर्ष कर रही हैं।
इन जुझारू लड़कियों की समझ का दायरा बहुत बड़ा है। वे सिर्फ हालिया आंदोलनों के तात्कालिक मुद्दों पर ही किसी से बहस तक सीमित नहीं हैं, बल्कि वे महिलाओं के खिलाफ शुरू से चले आ रहे दुराग्रह और अत्याचार के खिलाफ भी खुलकर बोलती हैं। यह एक नया ट्रेंड है। नीट पेपर लीक मामले में केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे के बाद मतदाता सूचियों से वोटर्स के नाम हटाने को लेकर मुख्य चुनाव आयुक्त के इस्तीफे की मांग के सवाल पर हुए दोनों आंदोलनों में सड़कों पर उतरकर पुलिस और सादे कपड़ों में आये मारपीट करने वाले अराजक तत्वों से दिल्ली की सड़कों पर लड़कियों ने जो मुक़ाबला किया, देश में आज़ादी के बाद उसकी दूसरी नजीर नहीं मिलती है।
हालिया इन आंदोलनों के सबक इतने भर ही नहीं हैं। ये लड़कियां हर मुद्दे पर, हर किसी से बहस को तैयार हैं। वैचारिक स्तर पर बहुत मजबूत हैं और उसी का नतीजा है कि इन आंदोलनों से कई ऐसे चेहरे सामने आए हैं, जिन्होंने अपने दौर के नेताओं के बीच एक अलग लाइन खींच दी है। उसमें पहला नाम है वामपंथी छात्र संगठन- आइसा की राष्ट्रीय अध्यक्ष नेहा बोरा का। नेहा हाल के आंदोलनों में तेज-तर्रार और जबर्दस्त आंदोलनकारी के रूप में सामने आई हैं। वे तात्कालिक मुद्दों के अलावा जाति व्यवस्था पर भी खुलकर हमला करती हैं। गौर करने वाली बात है कि इस साल मई महीने से पहले इस देश में न तो कॉकरोच जनता पार्टी (सीजेपी) नाम से कोई संगठन था और न ही अभिजीत दीपके, सौरव दास और आशुतोष रांका जैसे युवाओं को पूरा देश जानता था। नेहा बोरा को भी आइसा की राष्ट्रीय अध्यक्ष होने के बावजूद राष्ट्रीय फ़लक पर वह पहचान नहीं हासिल थी, जो अब है। विश्लेषण की बात यह भी है कि नीट पेपर लीक मामले में केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे की मांग के लिए सीजेपी ने जून महीने में दिल्ली के जंतर मंतर पर जब आंदोलन शुरू किया था, तब शुरुआती समय में सीजेपी नेता भी नेहा बोरा को खास तवज्जो नहीं दे रहे थे, लेकिन जब उन्होंने 23 दिनों तक अनशन किया तो उनको पूरे देश में अलग पहचान मिली। तार्किक क्षमता, बात रखने का अंदाज और जुझारूपन की वजह से महज 29 साल की नेहा आज विपक्षी की ओर से होने वाले राजनीतिक विरोध का एक प्रमुख चेहरा बन गई हैं।
इस कड़ी में देखें तो बात सिर्फ नेहा तक की भी नहीं है, बल्कि कई अन्य छात्र और युवा संगठनों ने भी इन आंदोलनों को धार देने में बड़ी भूमिका निभाई है। सीपीएम से जुड़े युवा संगठन डीवाइएफआई और उनके छात्र संगठन एसएफआई के छात्रों ने ही नहीं, बल्कि उनकी छात्राओं ने जुलाई से लेकर अब के आंदोलनों में सड़कों पर जबर्दस्त मोर्चा संभाला है। इनमें एसएफआई के महासचिव सृजन भट्टाचार्य, एसएफआई की आल इंडिया संयुक्त सचिव आईशी घोष एवं दिल्ली कमेटी की अध्यक्ष नादिया साजन समेत कई पदाधिकारियों ने अपने साथियों के साथ कनॉट प्लेस से लेकर जंतर मंतर तक सड़कों पर पुलिस और अराजकतत्वों से जबर्दस्त मुक़ाबला किया।
इसी तरह कांग्रेस के छात्र संगठन एनएसयूआई ने हाल के आंदोलनों में काफी बढ़ चढ़कर हिस्सा लिया है, उसमें भी लड़कियों की भरपूर भागीदारी देखी गई है। इस सबके बीच एक और नाम खास तौर से चर्चा में है। वह हैं इंडियन यूथ कांग्रेस से जुड़ी गुरमेहर कौर। लेखिका और सामाजिक कार्यकर्ता के रूप में अपनी पहचान बना चुकी गुरमेहर अब कई आंदोलनों में सक्रिय हिस्सेदारी करके चर्चा में हैं। रिपोर्ट्स के मुताबिक रामजस कालेज में 2017 में एबीवीपी के खिलाफ सोशल मीडिया कैम्पेन चलाकर वे चर्चा में आई थीं और टाइम मैगजीन ने उन्हें नेक्स्ट जनरेशन लीडर की सूची में शामिल किया था। गुरमेहर के पिता कैप्टन मंदीप सिंह भारतीय सेना में थे और 1999 में जम्मू-कश्मीर में एक आतंकवादी हमले में शहीद हुए थे। गुरमेहर तब तीन वर्ष की थीं।
देश के जरूरी मुद्दों और सवालों पर बहस के साथ जमीनी आंदोलनों में लड़कियों और महिलाओं की बढ़ती भागीदारी से मौजूदा विपक्ष को बड़ी ताकत मिली है। पहले जिन सवालों पर सारी बहस विपक्ष और सरकार के बीच तक सीमित रहती थी, उसमें अब अब छात्र और नौजवान भी कूद पड़े हैं और उसमें भी लड़कियों की भागीदारी बढ़ने से विपक्ष की लड़ाई में और धार आती दिख रही है। यही वजह है कि कांग्रेस नेता राहुल गांधी समेत समूचा विपक्ष ही नहीं, बल्कि देश भी इन युवाओं की तरफ बड़ी उम्मीद से देख रहा है। मतदाता सूचियों से मतदाताओं के नाम गलत तरीके से काटे जाने के जिस सवाल पर विपक्ष, सामाजिक संगठन और सीजेपी मुख्य चुनाव आयुक्त के इस्तीफे की मांग पर अलग-अलग आंदोलन कर रहे थे, वे सभी अब साथ आते दिख रहे हैं। मतलब साफ है कि छात्रों-छात्राओं और युवा-शक्ति की अपने जायज़ अधिकारों के लिए लड़ने की अदम्य इच्छाशक्ति का अहसास राजनीतिक दलों को भी हो चुका है।
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राजकेश्वर सिंह राजनीतिक विश्लेषक व वरिष्ठ पत्रकार हैं। वह नियमित रूप से रागदिल्ली.कॉम के लिए लिखते रहते हैं।
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