सम्बन्ध रुपेण संस्थिता - सम्बन्ध श्रृंखला का अंतिम लेख
डॉ. मधु कपूर की संबंधों पर केंद्रित यह श्रृंखला 'सम्बन्ध की सत्ता: यथार्थ या मानसिक कल्पना' लेख से प्रारंभ हुई थी. श्रृंखला के पहले ही लेख से ऐसा लगा कि हम एक ऐसे बौद्धिक और आध्यात्मिक संवाद में जा रहे हैं जहाँ संबंध केवल सामाजिक या मनोवैज्ञानिक धरातल पर नहीं परखे जाते बल्कि बोध और चेतना का द्वार बनकर उभरते हैं। इस अंतिम कड़ी में वह पाठक को एक और भी गहरे प्रश्न के सम्मुख खड़ा करती हैं: क्या संबंध केवल दो अस्तित्वों के बीच का जुड़ाव है, या वह स्वयं एक ऐसी चेतना है जहाँ द्वैत समाप्त होकर अद्वैत का अनुभव जन्म लेता है?
सम्बन्ध रुपेण संस्थिता - पाणिनि अष्टाध्यायी १.४.९०
डॉ मधु कपूर
सम्बन्ध को समझने के लिए सम्बन्ध की द्विनिष्ठता स्वीकारना आवश्यक है—जैसे चिकित्सक–रोगी, शिक्षक–विद्यार्थी, क्रेता–विक्रेता इत्यादि। इसी प्रकार ज्ञेय और ज्ञाता का सम्बन्ध विषय–विषयी कहलाता है, जहाँ ‘विषय’ और ‘मैं’ की सत्ता अलग-अलग होती है। परन्तु एक सम्बन्ध ऐसा भी है जो सभी सम्बन्धों को जानने वाला होता है। उसे ‘ज्ञाता’ कहा जाता है, और वह ऊपर उल्लिखित युग्मों से पृथक होता है।
सामान्यतः भारतीय दर्शन में त्रिपुटी सत्ता—ज्ञाता (जानने वाला), ज्ञेय (जो जाना जा रहा है), और ज्ञान (जानने की प्रक्रिया) स्वीकार की गई है। जब तक व्यक्ति इन तीनों को अलग-अलग अनुभव करता है, तब तक विषय और विषयी का भेद बना रहता है। यह सत्य है कि व्यक्ति का ध्यान या तो ‘विषय’ पर केंद्रित होता है—जैसे मंत्र, मूर्ति, भोजन, सुन्दर दृश्य इत्यादि—या फिर ‘विषयी’ पर, अर्थात् ‘मैं ध्यान कर रहा हूँ, मैं देख रहा हूँ, मैं खा रहा हूँ’ जैसे एहसासों पर।
विज्ञान भैरव तंत्र भगवान शिव (भैरव) और देवी (भैरवी) के बीच का दिव्य संवाद है, जिसमें संसार को चेतना और शक्ति का एक अद्भुत नृत्य कहा गया है, जहाँ नर्तक नृत्य से पृथक नहीं होता है। दर्शक और नर्तक से पृथक यहाँ ‘सम्बन्ध’ को ही ध्यान की विधि माना गया है। जिस द्विनिष्ठता की चर्चा हम कर चुके हैं, वह सभी तथाकथित सम्बन्धों में विद्यमान रहता है: चाहे घट का भूतल से सम्बन्ध हो, वस्त्र का रंगों से सम्बन्ध हो, अथवा विषय का विषयी से सम्बन्ध हो। तांत्रिक ध्यान का मूल सार यही है कि इन द्वैतभावों के मध्य जो ‘सम्बन्ध’ है, उसी पर ध्यान केंद्रित करना ही स्वस्वरूप की पहचान करवाता है। अर्थात विषय और विषयी के भाव को विसर्जित कर केवल ‘शुद्ध सम्बन्ध’ पर ध्यान केंद्रित करने की प्रक्रिया को एक उपमा से समझा जा सकता है: जैसे रस्सी पर करतब दिखाने वाला व्यक्ति केवल रस्सी पर ही अपना ध्यान स्थिर रखता है, यदि उसके ध्यान में थोड़ा सा भी भटकाव आ जाय तो विपत्ति की आशंका से बचा नहीं जा सकता है। उसी प्रकार जब एक विचार समाप्त होता है और नया विचार प्रारम्भ होने वाला होता है, तो उस बीच का जो रिक्त क्षण है—वह ‘शुद्ध सम्बन्ध’ का भाव है। ध्यान की प्रगाढ़ अवस्था में ज्ञाता और ज्ञेय दोनों ओझल हो जाते हैं, और वहाँ केवल ‘सम्बन्ध’ ही शेष रहता है। उदाहरण के लिए किसी सुंदर दृश्य या विचार के आने पर तुरंत यह अवधारणा नहीं करनी चाहिए कि ‘यह वस्तु अच्छी है’ (विषय) या ‘मुझे यह पसंद है’ (विषयी)। ध्यान केवल उस अनुभव की तरंग पर स्थिर होना चाहिए जो देखने मात्र से महसूस होता है। ऐसी स्थिति में द्रष्टा और दृश्य का अलगाव विलीन हो जाता है।
विज्ञान भैरव तंत्र की एक विधि के अनुसार व्यक्ति जब श्वास लेता है, तो श्वास ‘विषय’ होती है और व्यक्ति ‘विषयी’। श्वास के भीतर प्रवेश करते समय और बाहर निकलते समय उस संक्रमण-काल पर ध्यान केंद्रित होना चाहिए जहाँ श्वास ठहर जाती है। उस स्थिर पल में न तो कोई श्वास लेता है, और न ही कोई छोड़ता। यही ‘शुद्ध सम्बन्ध’ का ध्यान है। जब व्यक्ति अंदर सांस लेता है (पान) और जब सांस बाहर छोड़ता हैं (अपान), तो दोनों के बीच एक सूक्ष्म पल के लिए सांस रुकती है। सांस के अंदर आने और बाहर जाने के उस संधि-स्थल को ठहराव का वह बिंदु कहा जा सकता है, जहाँ 'सम्बन्ध' का असली अर्थ 'एकात्मता' का बोध होता है। जब मन की सीमाएं टूट जाती हैं और साधक स्वयं को ब्रह्मांडीय ऊर्जा या शक्ति के साथ एकत्व महसूस करने लगता है अर्थात व्यक्ति अपनी इंद्रियों के माध्यम से अपनी चेतना को आत्मसात कर पूरे ब्रह्मांड को एक ही चेतना के सूत्र में बाँध देता है।
विज्ञान भैरव तंत्र में एक प्रसिद्ध संस्कृत श्लोक है, जिसमे विषय-विषयी के द्वैत को मिटाने और 'सम्बन्ध' की एकात्मता पर ध्यान केंद्रित करने की प्रक्रिया का वर्णन है —
घटकुड्यादिभावेषु स्थिरबुद्धिं विनिम्य च। तद्देशानां क्षये चित्तं निर्विभागं प्रविलीयते (विज्ञान भैरव तंत्र, श्लोक ४३) ॥ इस सूत्र में आचार्य भैरव कहते हैं कि जब व्यक्ति किसी वस्तु— जैसे दीवार या घड़े को देखता है, तो साधारणतः व्यक्ति खुद को (विषयी) उस वस्तु से (दीवार या घट जो विषय है ) अलग मानता है। लेकिन जब व्यक्ति घड़े, दीवार की सीमाओं का तथा देखने वाले का भी विसर्जनकर अन्तराल के रिक्त स्थान पर ध्यान केंद्रित करता है, तो उस अवस्था में द्वैत भाव विलीन हो जाता है, विषय और विषयी का सारा अंतर समाप्त हो जाता है। केवल एक अद्वैत चेतना का सम्बन्ध शेष रहता है।
जैसा कहा गया है, शिव और शक्ति दो पृथक इकाइयाँ नहीं, बल्कि एक ही परम सत्य के दो पहलू हैं। चेतना स्थिर है, और शक्ति वह गतिशील आधार है जो सृष्टि को संचालित करती है। यहाँ देवी भैरवी जिज्ञासु साधक का और भैरव उत्तरदाता गुरु-चेतना का प्रतिनिधित्व करते हैं, जबकि ग्रंथ की ११२ ध्यान-पद्धतियाँ साधक और साध्य के भेद को मिटाने का कार्य करती हैं।
शिव और शक्ति का सम्बन्ध केवल एक दार्शनिक विचार नहीं, बल्कि अनुभव का प्रत्यक्ष एहसास है —जैसे अग्नि से उसकी उष्णता और सूर्य से उसका प्रकाश अलग नहीं हो सकता, वैसे ही शिव से शक्ति अलग नहीं हो सकती। शिव ‘प्रकाश’ हैं और शक्ति ‘विमर्श’—जो स्पंदन या ऊर्जा से सृष्टि का निर्माण करती हैं।
बाहरी दृष्टि से जगत में पुरुष और प्रकृति, सुख और दुःख जैसे द्वैत दिखाई देते हैं। पर तंत्र के अनुसार यह सब शक्ति का ही खेल है, और अंततः सब कुछ शिव-चेतना में विलीन हो जाता है। शिव के परम पद को जानने के लिए शक्ति की आराधना और उनके स्वरूप का ध्यान आवश्यक होता है। यहाँ सम्बन्ध का अर्थ 'जुड़ाव' नहीं, बल्कि 'अद्वैत का अनुभव' है। जिसे हम ' सम्बन्ध ' कहते हैं, वह असल में शिव (शुद्ध चेतना) और शक्ति (ऊर्जा) का अविभाज्य मिलन है। यह सम्बन्ध बाहर नहीं, बल्कि स्वयं के भीतर ही खोजना है। द्वैत सत्ता से उर्ध्वगमन या अद्वैत की यात्रा अथवा 'मैं' और 'विषय' के बीच के अलगाव को मन की एक भ्रांति समझना ही इस ध्यान प्रक्रिया का उद्देश्य है। यह ध्यान बौद्धिक ज्ञान से परे अनुभव को महसूस करना चाहता है। एक प्रयोग करके देखा जा सकता है —जब क्रोधित अवस्था में व्यक्ति क्रोध पर अपना ध्यान केन्द्रित करने लगता है, तो क्रोध स्वतः विलीन हो जाता है, वहां क्रोध करने वाला व्यक्ति और जिस पर क्रोध किया जाता है वह लुप्त हो जाता है।
आचार्य अभिनवगुप्त, कश्मीर शैव दर्शन के प्रणेता, वस्तुओं या घटनाओं के दो पहलू मानते हैं—प्रकाश (चेतना का स्वरूप) और विमर्श (स्वयं को जानने की शक्ति)। सौंदर्यशास्त्र के प्रसंग में वे स्पष्ट करते है कि जब हम किसी कला या नाटक का आस्वादन करते हैं, तो हमारा व्यक्तिगत अहंकार और सीमाएं समाप्त हो जाती हैं, और हमारी चेतना उस कला के रस में डूब जाती है। जिस तरह कोई अभिनेता जब राम की भूमिका में अवतरित होता है, तो वह कुछ समय के लिए उस पात्र की भूमिका से स्वयं को एकात्म कर लेता है, जहाँ वह स्वयं की सत्ता को पात्र की सत्ता में विलीन कर देता है। यह सम्बन्ध सामयिक होता है, पर वह क्षणिक अनुभूति हमें विराट चेतना का आभास दे जाती है। अभिनवगुप्त हर प्रकार के द्वैत को नकारते हुए संपूर्ण सृष्टि, चेतना, कला और दर्शन के बीच एक अद्वैत और घनिष्ठ सम्बन्ध स्थापित करते हैं।
अतः विज्ञान भैरव तंत्र का मानना है कि संबंध केवल दो अलग-अलग बिंदुओं को जोड़ने वाला सेतु नहीं, बल्कि वह स्वयं अन्तःसंजल्प है, यानि स्वयं से संवाद (एकालाप) की स्थिति है जहाँ दोनों का अस्तित्व मिटकर केवल अद्वैत की गूंज शेष रह जाती है। यह लौकिक अनुभव हमें आध्यात्मिक आनंद के करीब ले जाता है। तैत्तिरीयोपनिषद् में कहते है —अहं अन्नं अहं भोक्ता अर्थात मैं ही अन्न हूँ और मैं ही भोक्ता हूँ अर्थात आहार भी मैं हूँ तथा आहार का उपभोग करने वाला भोक्ता भी मैं हूँ। वास्तव में जो अन्न का उपभोग करता है, वह स्वयं को ही उपभोग करता है। जैसाकि ‘स्वाद’ (स्वा + अद्): शब्द की व्युत्पत्तिगत अर्थ से स्पष्ट है कि ‘स्वा’ (स्वयं) व्यक्ति की मूल सत्ता, जो अपने में स्थित है, उसका स्वत्व है। ‘अद्’ (खाना, ग्रहण करना) अनुभव का आत्मसात करना है। जब “स्वयं” किसी वस्तु या अनुभव को ग्रहण करते हैं, तो वह केवल बाहरी रस नहीं लेता, बल्कि उसे अपने अस्तित्व का हिस्सा बना लेता है। इसीलिए “स्वाद” केवल जीभ का अनुभव नहीं है, बल्कि आत्मा का अनुभव भी है। यह केवल तभी पूर्ण होता है जब भोक्ता स्वयं को अन्न में और अन्न को स्वयं में अनुभव करे। यह अस्तित्व का अद्वैत अनुभव है अर्थात अनुभव और अनुभवकर्ता पृथक नहीं रह जाते।
अपने व्यवहारिक जीवन में हम इस अनुभव को इस प्रकार समझ सकते है —जब दो शब्दों या ध्वनियों में संधि होती है तो उनके स्वर या व्यंजन का स्वरूप परिवर्तित होकर एक नया रूप पाता है। उनकी पूर्वावस्था का लोप हो जाता है। यह ध्वनि-परिवर्तन उच्चारण को सहज और भाषा को प्रवाहपूर्ण बनाने के लिए होता है। जैसे राम + ईश्वर = रामेश्वर । व्यंजनों के मेल से जैसे तत् + जन = तज्जन अथवा तत् + धर्म = तद्धर्म । इसी तरह दृश्य और दृष्टि का एक नया विभ्रम उस गहरे बहुल सम्बन्ध का एकत्व प्रदर्शन कर सरहदें समाप्त कर देता है।
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डॉ मधु कपूर कलकत्ता के एक प्रतिष्ठित कॉलेज में दर्शनशास्त्र की प्रोफेसर रही हैं। दर्शनशास्त्र के अलावा साहित्य में उनकी विशेष रुचि रही है। उन्हीं के शब्दों में, "दार्शनिक उलझनों की गुत्थियों को साहित्य के रास्ते में तलाशती हूं।" डॉ कपूर ने हिंदी से बंगला में कुछ पुस्तकों का अनुवाद किया है और कुछ कविता संग्रह भी प्रकाशित हुए हैं। दर्शन पर उनके निबंधों का एक संग्रह Dice Doodle Droll Dance प्रकाशित हुआ है।