हमारी जीवन शैली से जुड़ा है पर्यावरण का सवाल
प्रख्यात गाँधीवादी चिन्तक एवं पर्यावरणविद अनुपम मिश्र का यह लेख हमें उनकी जीवनसंगिनी मंजूश्री मिश्र के सौजन्य से प्राप्त हुआ है। अनुपम मिश्र आज हमारे बीच नहीं हैं, लेकिन उनकी आवाज़, उनकी चिंता और उनके सवाल अब भी हमारे बीच मौजूद हैं। किसी समाज के लिए इससे बड़ी विडम्बना क्या होगी कि जिन प्रश्नों को लेकर एक संवेदनशील लेखक ने पच्चीस वर्ष पहले हमें चेताया था, वे आज भी हमारे सामने लगभग उसी रूप में खड़े हों, बल्कि कई मामलों में और अधिक गंभीर होकर। इन वर्षों में पर्यावरण को लेकर शोर बहुत बढ़ा है। सम्मेलनों, अभियानों, घोषणाओं और विशेष दिनों की संख्या भी बढ़ी है। लेकिन यदि हम अपने चारों ओर देखें तो तस्वीर उत्साहवर्धक नहीं दिखाई देती। हवा पहले से अधिक प्रदूषित है, नदियाँ पहले से अधिक संकट में हैं और प्रकृति के साथ हमारा रिश्ता पहले से अधिक कमजोर हुआ है। पर्यावरण हमारे सार्वजनिक विमर्श का विषय तो बना, लेकिन हमारी जीवन शैली का हिस्सा नहीं बन सका। यह चिंता का विषय तो है ही, कहीं न कहीं शर्म का विषय भी है कि चेतावनियाँ स्पष्ट थीं, समस्याएँ सामने थीं, फिर भी हम अपने आचरण और अपनी प्राथमिकताओं में वह बदलाव नहीं ला सके जिसकी आवश्यकता थी। यही कारण है कि यह लेख केवल एक पुराने समय का दस्तावेज़ नहीं है। इसे पढ़ते हुए बार-बार लगता है कि अनुपम मिश्र हमारे समय से ही संवाद कर रहे हैं। उनके उठाए हुए प्रश्न आज भी उतने ही ज़रूरी, उतने ही असुविधाजनक और उतने ही प्रासंगिक हैं, जितने तब थे जब यह लेख लिखा गया था।
हमारी जीवन शैली से जुड़ा है पर्यावरण का सवाल
अनुपम मिश्र
पर्यावरण के महत्व को लेकर समाज की जागरूकता बढ़ी है । इसमें कोई शक नहीं कि पिछले 20-25 वर्षों से शायद सन् 1972 के बाद, जब संयुक्त राष्ट्र संघ के ढाँचे में पहली बार ‘पर्यावरण कार्यक्रम’ नाम से एक अलग विभाग खोला गया, फिर सभी सदस्यों से आग्रह किया गया कि वे भी अपने यहां जल्द से जल्द ‘पर्यावरण विभाग’ बनाएं। पहले तो हमारे देश में विभाग भी नहीं था (एक समिति बनी)। संयोजक और 10-20 विद्वान लोगों को लेकर कुछ काम हुआ। फिर समिति को विभाग का रूप मिला। फिर विभाग में से मंत्रालय निकला। जब मंत्रालय बना तो बहुत सारी संस्थाएं भी बनीं और कुछ इधर-उधर जो भी उससे संबंधित काम हैं, वे इधर खूब बढ़े हैं। दिवस बहुत मनाने लगे हैं अब। हम पर्यावरण दिवस मनाते हैं, धरती दिवस मनाते हैं। सब दिवस मनाते हैं, लेकिन हम वर्ष नहीं मनाते। पर्यावरण को 365 दिन का कारोबार नहीं बनाते। आज पर्यावरण की जागरूकता का बोझ हम ढो रहे हैं, पर वह हमारे दिवस में है, वर्ष में नहीं है, आचरण में नहीं है, व्यवहार में नहीं है।
मेरा मानना है कि पर्यावरण के प्रति संवेदना आज बढ़ने की बजाय कम हुई है। संवेदना दिखती है बढ़ी हुई, लेकिन परिणाम नहीं दिखते उस अनुपात में। अपने सभी पुराने समाजों में इससे ज्यादा संवेदना थी। उन्होंने अपनी पूरी जीवन शैली ही अपने पर्यावरण के इर्द-गिर्द ढाली थी। उन दोनों में कोई फर्क नहीं था। ऐसा नहीं था कि पर्यावरण की शिक्षा देने से पर्यावरण मजबूत होगा या पर्यावरण के कारण शिक्षा मजबूत होगी - उस तरह की दो आंखों में यह विषय उन्होंने नहीं बांटा था।
फिर एक बिल्कुल भिन्न किस्म की शिक्षा प्रणाली अंग्रेजों के कारण आई। वह अपने इलाके के पर्यावरण से कटी हुई है। वह बिल्कुल एक-सा काम सिखाती है लोगों को। अब चाहे नागालेंड में रहता हो उसको पढ़ाने वाला या मरुस्थल में रहता हो उसको अपने इलाके से कोई मतलब नहीं। सिर्फ साधारण शिक्षा ही नहीं, भूगोल की शिक्षा भी वही है। जानकारी सबकी चाहिए लेकिन उसको बचाने के लिए अपनी क्या परम्पराएं रही हैं, इस सबकी तरफ से लोगों का ध्यान बिल्कुल हट गया है। एक दौर पिछले चार-पांच साल में यह भी आया है कि पर्यावरण के अलग से कोर्स बने हैं। सभी स्तर पर प्राथमिक से लेकर महाविद्यालयों तक कोर्स चलते हैं लेकिन इस समय जो कुल मिलाकर के शिक्षा का वातावरण है उसमें पर्यावरण में अच्छे नंबर मैं ले आऊं तो जरूरी नहीं है कि मैं अपने पर्यावरण की अच्छी रखवाली भी करूं। निचले स्तर पर इसकी शिक्षा में भी नकल से काम चलेगा।
जो लोग शिक्षा की धारा से काट दिए गये हैं, उन्होंने उसको शिक्षा का विषय ना मानकर जीवन का विषय बनाया था और जीवन की शिक्षा से बड़ी कोई शिक्षा नहीं होती। उसी में से सब चीजें निकलना चाहिए। इसलिए मुझे लगता है कि पर्यावरण का पाठ बहुत आगे नहीं ले जाएगा। जो पढ़ा-लिखा समाज इस प्रकार की शिक्षा से बनेगा वह विद्वान जरूर होगा लेकिन पर्यावरण के लिए अपने को न्यौछावर करने को तैयार नहीं होगा। उस चतुर में इतनी चतुराई होगी कि समाज के, पर्यावरण के संकट में वह अपने को बचा लेगा।
किसी एक क्षेत्र विशेष के पर्यावरण का आज की शिक्षा में कोई दखल नहीं बचा है। इसलिए वह इस समय अलग-थलग पड़ा विषय बन गया है। लेकिन वह चोट करता है धीरज से। काफी अत्याचार सहने के बाद। जब ऐसा कोई संकट समाज पर आता है तो मजबूरी में उसे अपने को पर्यावरण से जोड़ना पड़ता है। अपनी शिक्षा को नहीं जोड़ पाता है वह लेकिन अपने व्यवहार को जोड़ता है। उसका सबसे अच्छा उदाहरण गुजरात का अकाल है। गुजरात का बहुत बड़ा हिस्सा शिक्षा को पर्यावरण से नहीं जोड़ पाया होगा । लेकिन उसने अपने कामों को इसी पर्यावरण से जोड़ा और यह किया कि हमें अपने सब पुराने तालाबों की मरम्मत करना चाहिए जितना हो सके छोटे-छोटे नदी-नालों को बांधना चाहिए।
एक गांव में एक सज्जन ने बहुत ही अच्छी बात कही। उससे शायद यह शिक्षा वाला मामला निकलता है। उन्होंने कहा कि हमने इस अकाल में तीन आधुनिक व्यवस्थाओं को असफल देखा। एक हमारे घर में पाइप की सप्लाई, दूसरा हमारे खेत का ट्यूबवैल और तीसरा हमारे मोहल्ले में हैंडपम्प। तीनों सूख गए इस अकाल में। हमारे तालाब टूटे पड़े थे। तालाब उन्होंने ठीक किए उसके बाद थोड़ा-सा पानी गिरा। वह तालाब में इकट्ठा हुआ। तालाब ठीक हो गया था। टूट-फूट उसकी उन्होंने ठीक कर दी थी तो पानी नीचे गया और उसने थोड़े ही दिनों में हैंडपंप चालू कर दिया और फिर नलकूप में भी पानी आ गया। तो उन्होंने यह कहा कि हमने तीन आधुनिक चीजों को अपने सामने असफल होते देखा और एक पुरानी व्यवस्था जिसको हम भूल गए थे, जिससे हम कट गए थे, उसको हमने थोड़ी-सी मेहनत करके ठीक किया तो उसने इन चीजों में भी जान डाल दी। इसलिए मुझे लगता है कि शिक्षा में यह बात दूसरे सिरे से जुड़ेगी कि अब हमको अपने स्कूल और कॉलेजों में पानी के प्रबंध के बारे में ऐसी शिक्षा देनी चाहिए या नहीं। बहस तो उठ सकती है। हो सकता है कि क्षेत्र अपनी औपचारिक शिक्षा में, तकनीकी शिक्षा में तालाब की बात करें। तो इस तरह से शिक्षा भी पर्यावरण से जुड़ सकती है।
आज की शिक्षा प्रणाली में स्वदेशी ज्ञान की रत्ती भर गुंजाइश नहीं दिखती। एक तरफ तो हम देखते हैं कि स्वदेशी शब्द पिछले दो-चार साल में बहुत ऊपर आया है। इसके बाद भी वह व्यवस्था में कोई जगह बना पाएगा ऐसा नही लगता। लेकिन गुजरात जैसे दो-तीन छुटपुट किस्से अगर होते हैं तो लोगों का ध्यान इस बारे में जरूर आएगा कि स्वदेशी की बात एक सिद्धांत के नाते नहीं व्यवहार के नाते भी जरूरी है। जिसकी स्मृति में से जो चीज जाती है पहले वही वापस आनी चाहिए। पहले समाज के मुख्य हिस्से से जो चीजें गयीं वह उनके ध्यान में आनी चाहिए। फिर शिक्षा में वापस आएगी ऐसा नहीं होगा कि शिक्षा के माध्यम से समाज में आएगी, कुछ पूरक भूमिका जरूर हो सकती है।
इसलिए अकाल के कारण, कभी बाढ़ के कारण, कभी किसी चीज के कारण ठोकरें लगेंगी। उनको लगेगा कि ये तालाब मामूली गड्ढे नहीं थे। ऊलजलूल ऊटपटांग हरकतें नहीं थीं। सोची-समझी एक तकनीकी व्यवस्था का रूप था। लेकिन यह वैसा रूप नहीं था जो आज हम इंजीनियरिंग के पाठ्यक्रम में पाते हैं। उसके पीछे एक सांस्कृतिक आधार था। उसके पीछे तीज-त्यौहार थे। उसी पर लौटना होगा क्याॽ दो शब्द हैं समयसिद्ध और स्वयंसिद्ध। अगर कोई चीज समयसिद्ध है तो 20-25,100 साल की उपेक्षा की आंधी उस पर कोई असर नहीं डालेगी। अगर कोई समयसिद्ध – स्वयंसिद्ध है तो उसे किसी बाहरी चीज की कोई जरूरत नहीं है। उसने समाज के बहुत बड़े इतिहास की सेवा की है। वर्तमान में वह थोड़ी देर के लिए लुप्त हो गई है। भविष्य में वह वापिस आ सकती हो तो ही वह एक परम्परा या स्वदेशी कहलाएगी। नहीं तो जब उससे छुटकारा मिले मिल जाने दो। उसका मोह क्यों करें ॽ यह हमारी चीज है मोह इसलिए रखना जरूरी है।
हम तो कहते हैं कि कोई आधुनिकतम मशीन या आविष्कार मरुभूमि को पानी दे दे तो हम कुंड, कुएं व तालाबों को एक म्यूजियम बना कर रख दें, हमेशा के लिए। चार आना टिकट लगा देंगे। लेकिन हो यह रहा है कि जिनको हम आधुनिक मानते हैं वो तकनीक, तरीके केवल पानी निकाल सकते हैं। पानी पैदा नहीं कर सकते, पानी का संग्रह नहीं कर सकते। इसलिए लौट कर आपको उसी पर आना पड़ेगा और यह सब यहां का नहीं केवल अपने यहां का नहीं—सभी जगह यह अनुभव ठोकर खाकर वापिस आएगा।
जून 2001

जाने-माने पर्यावरणविद और गांधी-विचार को अपने जीवन में व्यावहारिक रूप से उतारने वाले अनुपम मिश्र (1948-2016) का पूरा जीवन जल-संरक्षण एवं पर्यावरण-संरक्षण को समर्पित था। गांधी शांति प्रतिष्ठान में उन्होंने पर्यावरण कक्ष की स्थापना वर्ष 1977 में थी और उस समय पर्यावरण के बारे में कोई खास चर्चा नहीं होती थी। उनकी लिखी दो पुस्तकें 'आज भी खरे हैं तालाब' और 'राजस्थान की रजत बूंदे' जल-संरक्षण के क्षेत्र में आज भी सर्वश्रेष्ठ पुस्तकों में गिनी जाती हैं।