कार्य–कारण का सम्बन्ध: नियतत्व, संभाव्यता और आकस्मिकता
कार्य–कारण का सम्बन्ध केवल दर्शन का विषय नहीं, हमारे रोज़मर्रा के अनुभवों का भी हिस्सा है। डॉ मधु कपूर इस लेख में नियतत्व, संभाव्यता और आकस्मिकता के बीच के सूक्ष्म ताने‑बाने को हमारे सामने लाती हैं—जहाँ मिट्टी से घड़ा बनता है, बीज से वृक्ष और विचार से कर्म। यह लेख हमें याद दिलाता है कि हर घटना के पीछे एक क्रम है, और कभी‑कभी वही क्रम अनिश्चितता में नई संभावना भी जन्म देता है.
कार्य–कारण का सम्बन्ध: नियतत्व, संभाव्यता और आकस्मिकता
डॉ मधु कपूर
हम भले ही मुंह से कहते है कि ‘अरे कैसे जल गई? अचानक तवे पर हाथ लग गया’! पर कोई भी कार्य या घटना अकारण या अकस्मात नहीं होती है। प्रश्न है कि क्या कारण-कार्य सम्बन्ध एक वास्तविक सम्बन्ध है? कारण-कार्य संबंध में आकस्मिकता की क्या भूमिका है? क्या बिना कारण के कार्य की उत्पत्ति हो सकती है? क्या कारण-कार्य एक मानसिक संरचना मात्र है। कारण को कार्य की पूर्ववर्ती अवस्था तथा कार्य को परवर्ती घटना कहा जाता है। पहले आहार ग्रहण करते हैं फिर भूख मिटती है। पहले आग में हाथ डालते है, फिर हाथ जलता है। इस तरह घटनाओं में व्यक्ति कारण कार्य सम्बन्ध स्थापित कर लेता है। यह सम्बन्ध नियत और अनिवार्य कहा जाता है। यूँ कार्य उत्पत्ति के पूर्व अनेक घटनाएँ उपस्थित रहती है पर सभी कारण नहीं होती है। जो कार्य उत्पादन में साक्षात् उपयोगी होती है, उन्हें ही कारण कहा जाता है। जैसे कुम्हार का पिता अथवा मिट्टी ढोनेवाला गधा घट रूप कार्य के पूर्व रहने पर भी उन्हें कारण नही कहा जाता है। (परोक्ष रूप से कार्य में मदद करने वाला भी कारण की श्रेणी में गिना जाता है, पर उस पर फिर कभी लिखूंगी।)
इसी से जुड़ा एक प्रश्न है—उत्पत्ति के पूर्व क्या कारण में कार्य विद्यमान् रहता है? जो यह मानते हैं कि कार्य, कारण में संभाव्य रूप से वर्त्तमान रहता है— जैसे बीज में वृक्ष जो कालक्रम से प्रकट होता है। ऐसे विचार रखने वाले दार्शनिकों को सत्कार्यवादी कहा जाता है। इसके विपरीत जो यह मानते है कि कार्य अपनी उत्पत्ति के पूर्व कारण में विद्यमान् नहीं रहता है, उन्हें असत्कार्यवादी कहा जाता है। उनके अनुसार कार्य एक नवीन सृष्टि है, जो कारण से पृथक होता है। यदि घड़ा मिट्टी में, कपड़ा धागों में तथा दही दूध में पहले से ही मौजूद होता तो कुम्हार को मिट्टी से घड़ा बनाने के लिए, तांति को धागों से वस्त्र बनाने में, गृहिणी को दूध से दही बनाने में किसी परिश्रम की आवश्यकता नहीं होती। मिट्टी ही पानी रखने का काम कर पाती या धाग़े ही शरीर को ढकने का कार्य कर लेते या दूध ही दही का स्वाद देने लगता! कहा जा सकता है कि मिट्टी में घड़ा, धागों में वस्त्र तथा दूध में दही अव्यक्त अवस्था में वर्तमान रहता है, लेकिन उसे चेतन सत्ता—यथा कुम्हार, तांति और गृहिणी की चेष्टा द्वारा व्यक्त किया जाता है।
यदि उत्पत्ति के पूर्व कारण में कार्य की सत्ता न मानी जाए तो कार्य आकाश कुसुम की भांति अलीक पदार्थ हो जाएगा। और उसकी उत्पत्ति कभी भी संभव नहीं हो सकती है। भगवद্गीता में भी कहा गया है -‘नासतो विद्यते भावो ना भावो विद्यते सत’ अर्थात असत् वस्तु का कोई अस्तित्व नहीं होता, और सत् का कभी अभाव नहीं होता। । बालू में तेल असत् है अतः कितना भी प्रयत्न किया जाए बालू से तेल प्राप्त नहीं हो सकता है। तिल को पेर कर ही तेल निकाला जा सकता है। कहने का तात्पर्य है कि कार्य–कारण सम्बन्ध आकस्मिक नहीं, बल्कि नियमबद्ध क्रम से घटित होता हैं।
इस सम्बन्ध में अन्वयव्यतिरेक (positive and negative instances) पद्धति का सहारा लिया जाता है अर्थात विष ग्रहण करने से व्यक्ति की मृत्यु हो जाती है और उसको ग्रहण न करने से मृत्यु की सम्भावना नहीं रहती है। इससे साबित होता है कि ‘विष मृत्यु का कारण है’। इसी तरह मिट्टी घड़े का उपादान कारण (समवायी) है, क्योंकि मिट्टी और घड़े का अविच्छिन्न सम्बन्ध है। लेकिन कुम्हार न हो तो मिट्टी से घड़ा स्वतः उत्पन्न नहीं हो सकता है अतः कुम्हार को घड़े का निमित्त कारण कहा जाता है। पर कुम्हार घड़ा निर्माण करने के बाद उससे अलग हो जाता है। वास्तव में देखा जाए तो मिट्टी उपादान कारण होने के बावजूद मिट्टी के अवयवों (कपाल कपालिका) को परस्पर जब तक सम्बंधित नहीं किया जाता है तब तक घड़े की उत्पत्ति नहीं होती है। मिट्टी के अवयवों को परस्पर जोड़ना ही घड़े का असमवायी कारण होता है। अरस्तू इसमें उद्देश्य को भी कार्य उत्पत्ति का प्रयोजक कारण मानते है। निष्प्रयोजन किसी कार्य की उत्पत्ति नहीं होती है— पानी रखने के लिए घड़े का निर्माण होता है।
प्रश्न उठता है क्या कारण कार्य दो पृथक् सत्ताएं हैं? डेविड ह्यूम को स्मरण करके कहा जा सकता है कि हम घटनाओं को पृथक पृथक रूप से घटते हुए देखते है, लेकिन ‘कारण में कार्य उत्पादन की सामर्थ्य है’ —ऐसा अनुभव हमें नहीं होता है। परन्तु अपनी आदत से मजबूर होकर पूर्ववर्ती-परवर्ती घटनाओं को व्यवस्थित करने के लिए हम उन्हें कारण-कार्य के बंधन में बाँध देते हैं। इनमें कोई सम्बन्ध नहीं होता है। परन्तु दही यदि दूध का परिवर्तित रूप है, तो दूध और दही पृथक सत्ता के रूप में अनुभव होना चाहिए। लेकिन एकबार दही हो जाने पर दूध पृथक रूप से कहीं नहीं मिलता है और न ही उसे पूर्वावस्था में लौटाया जा सकता है। इसी तरह तेल तिल का ही परिवर्तित रूप है। कारण में परिवर्तन होने के कारण इस सिद्धांत को परिणामवाद कहा जाता है।
इसके विपरीत अद्वैत वेदांत के अनुसार कारण का कार्य रूप में वास्तविक रूपांतरण नहीं होता है। यह आभासी या भ्रांत परिवर्तन है। कारण तो अपरिवर्तित ही रहता है, कार्य केवल उसका प्रतिभास होता है जैसा रस्सी में सर्प का भ्रम। रस्सी अपरिवर्तित रहती है, परंतु अज्ञान से सर्प का आभास देती है। कार्य कारण का यह विवर्तन मात्र है, यथा जगत ब्रह्म का विवर्तन मात्र है। अतः यह सिद्धांत विवर्तनवाद कहलाता है।
विज्ञान कार्य–कारण संबंध को निरीक्षण और परीक्षण के माध्यम से एक नियम में बाँध कर अनिवार्य सत्य की प्रतिष्ठा करता है। उदाहरणस्वरूप किसी दवा के लेने के यदि मलेरिया रोग में राहत मिलती है तो चिकित्सक ‘मलेरिया’ और उसके ‘निदान’ में एक कारण–कार्य संबंध को स्थापित कर देता है।
कारण –कार्य का सम्बन्ध सिर्फ भौतिक वस्तुओं में ही नहीं इसका विस्तार नैतिक जगत में भी देखा जाता है। इसका प्रयोग कर्म–फल सिद्धांत में मिलता है। कर्म से फलप्राप्ति अनिवार्य है —जैसे बीज से वृक्ष का उत्पन्न होना। हम अपने कर्मों से ही अपने भविष्य का निर्माण करते हैं।
इन सभी सिद्धांतों को नज़र में रखते हुए प्रश्न उठता है— क्वांटम स्तर के सम्बन्ध में हम क्या कह सकते हैं, जहाँ कार्य–कारण सम्बन्ध को केवल एक संभावना के रूप में देखा जाता है। क्वांटम कण एक ही समय में कई अवस्थाओं में रह सकते हैं—यथा तरंग और कण के रूप में। क्वांटम एंटैंगलमेंट (Entanglement) का सिद्धांत हमें और भी अचम्भे में डाल देता है जब दो कण मीलों दूर होने पर भी एक-दूसरे से जुड़े रहते हैं। एक कण की अवस्था बदलने पर दूसरे की अवस्था तुरंत बदल जाती है, चाहे दूरी कितनी भी हो। यहाँ कार्य–कारण पारंपरिक नियमों से हटकर हमें सोचने पर विवश करता है कि ब्रह्मांड के मूलस्वरूप में नियमबद्धता नहीं, बल्कि संभाव्यता है।
शायद इन्हीं अनिश्चित तथ्यों के आधार पर Nassim Nicholas Taleb, एक लेबनानी अमेरिकी विचारक, कार्य–कारण संबंध को पारंपरिक रूप से समझने के बजाय अनिश्चयता और दुर्लभ घटनाओं के संदर्भ में देखते हैं। दुर्लभ और अप्रत्याशित घटनाएँ इतिहास और समाज को निर्णायक रूप से बदल देती हैं। उदाहरणस्वरूप 2008 का वित्तीय संकट, इंटरनेट का आगमन, या अचानक युद्ध की घोषणा के कारण जो परिवर्तन मानव जीवन में आता है उसे हम कारण कार्य सम्बन्ध से जोड़ देते है। वास्तव में कारण-कार्य के संबंध में कोई स्पष्ट धारणा न होने के कारण अक्सर हम उन्हें एक साफ-सुथरी कहानी में बाँध देते है, जिसे वे Narrative Fallacy कहते हैं। यद्यपि अनुभव में ‘सभी हंस सफेद होते है’ पर यदि कही ‘काला हंस’ दिख जाए तो यह एक अनहोनी दुर्लभ घटना हमारे पूर्व वाक्य को चुनौती दे देती है। हमें ऐसे अपवादों को नज़रअंदाज़ नहीं करना चाहिए।
तालेब का तर्क है कि हम अक्सर आकस्मिक घटनाओं को कारण मान लेते हैं। जबकि कई बार यह केवल यादृच्छिक ही होती है। कार्य–कारण को समझने का सबसे अच्छा तरीका है कि अनिश्चियता और अपवादों से हम लाभ उठाएँ, यानी व्यवस्था को ऐसा प्रारूप दें कि दुर्लभ घटनाएँ कारण-कार्य के सम्बन्ध को नष्ट किये बिना उसे एक मजबूत बुनियाद दे सकें। यही उनकी Anti-fragile अवधारणा है—जहाँ व्यवस्था संकट से लाभ उठाती है और हर अप्रत्याशित घटना उसे एक स्थायी आधार देती है।
इसलिए हमें अनिश्चयता से डरना नहीं चाहिए बल्कि उससे लाभ उठाना चाहिए। जैसे बाँस का पौधा तूफ़ान आने पर गहरी जड़ पकड़ लेता है। जब हम वजन उठाते हैं या दौड़ते हैं, तो मांसपेशियों पर हल्का तनाव आता है। यह तनाव उन्हें कभी कभी दर्द भी देता है, लेकिन उसी प्रक्रिया से वे और मज़बूत भी बनती हैं। अगर कोई छात्र एक बार असफल होता है, तो वह अपनी तैयारी का तरीका बदलता है। यह टूटना उसे और गहरी समझ और बेहतर रणनीति देता है। अचानक नौकरी चली जाए तो एक बड़ा झटका लगता है। लेकिन इसी झटके से नया व्यवसाय शुरू करने की प्रेरणा मिल जाती है, और व्यक्ति को एक नई राह दिखाई देने लगती है। हम सबके जीवन में ऐसा अनुभव अक्सर हुआ होगा जब अचानक बिजली गुल हो जाती थी, तो परिवार के लोग मोमबत्ती की रोशनी में बैठकर अन्ताक्षरी खेलते थे या कहानियां सुनते थे। यह झटका उन्हें तकनीक से अलग करके आत्मीयता और समय की उपयोगिता सिखाता था।
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डॉ मधु कपूर कलकत्ता के एक प्रतिष्ठित कॉलेज में दर्शनशास्त्र की प्रोफेसर रही हैं। दर्शनशास्त्र के अलावा साहित्य में उनकी विशेष रुचि रही है। उन्हीं के शब्दों में, "दार्शनिक उलझनों की गुत्थियों को साहित्य के रास्ते में तलाशती हूं।" डॉ कपूर ने हिंदी से बंगला में कुछ पुस्तकों का अनुवाद किया है और कुछ कविता संग्रह भी प्रकाशित हुए हैं। अभी हाल ही में उनकी पुस्तक "द्रष्टा दृश्य और दर्शन दर्शन - एक चौथे आयाम की खोज" प्रकाशित हुई है. इससे पहले भी उनके निबंधों का एक संग्रह Dice Doodle Droll Dance आ चुका है।