धर्म पर तो सदियों से लिखा जा रहा है और यह स्तंभकार बिना गूगल की मदद के निश्चयपूर्वक ये कह सकता है कि जब से मानवता ने लिखना-पढ्ना सीखा है, या बल्कि उससे पहले यदि श्रुति-परंपरा के युग को भी जोड़ लिया जाये तो धर्म पर जितना कहा-सुना गया है, उतना किसी भी अन्य विषय पर नहीं!









