लोकगीत “छल्ला” के बहाने एक दर्द को आवाज़
पंजाबी लोकगीतों की लोकप्रियता भाषाई और भौगोलिक सीमाओं से बहुत आगे तक फैली हुई है। पंजाब की मिट्टी से उपजे ये गीत केवल मनोरंजन का माध्यम नहीं, बल्कि पीढ़ी-दर-पीढ़ी हस्तांतरित होती सांस्कृतिक विरासत हैं, जिनमें प्रेम, विरह, बिछोह और मानवीय संवेदनाओं का गहरा संसार समाया हुआ है। यही कारण है कि "टप्पे", "माहिए", "हीर" और "छल्ला" जैसे लोकगीत समय की सीमाओं को पार कर आज भी लोगों के दिलों में उसी आत्मीयता के साथ बसे हुए हैं। हमारे लेखक-परिवार की नई सदस्य प्रो. आशा रानी ने इस लेख में चर्चित पंजाबी लोकगीत "छल्ला" की पृष्ठभूमि, उससे जुड़ी लोककथा और समय के साथ उसमें जुड़ते गए नए अर्थों एवं दर्द की परतों पर अत्यंत संवेदनशील ढंग से विचार किया है।
लोकगीत “छल्ला” के बहाने एक दर्द को आवाज़
प्रो. आशा रानी
पंजाबी लोक साहित्य अविभाजित पंजाब की सामूहिक सांस्कृतिक अभिव्यक्ति, जीवन मूल्यों,संघर्षों और परम्पराओं का एक सच्चा और जीवंत दर्पण है। उसके जन मानस में रची बसी लोककथाएँ संस्कृति की वाहक बनी हैं। पंजाबी लोक-कथाओं और गीतों का संसार बहुत व्यापक है, वे जनश्रुतियाँ हैं, जिसे एक पीढ़ी दूसरी पीढ़ी को प्रदान करती आई है। इनमें जीवन की विभिन्न अवस्थाओं, घटनाओं और स्थितियों को बख़ूबी दर्शाया गया है। यूँ भी लोकसाहित्य बहते हुए पानी की तरह होता है जो निरंतर प्रवाहमान रहता है जिसमें लोगों की रूह और आत्मा की आवाज़ गूंजती है,जीवन का पूरा फ़लसफ़ा होता है,मिट्टी की ख़ुशबू समाई रहती है।
लोकगीत एक तरह हमारे सामाजिक और सांस्कृतिक विधान होते हैं। मैं बचपन से ही अविभाजित पंजाब के प्रचलित लोकप्रिय किस्सों और कथाओं को गीतों और स्वांग के रूप में देखती आयी हूँ और पिता जी के मुख से सुनती भी। थोड़े-बहुत हेरफेर के साथ लोकगीतों में वही झलक भारत के विभिन्न हिस्सों में मिलती है ,फिर भी हर प्रदेश की कुछ कहानियां हटकर होती हैं,भाषायी सीमाओं के कारण लोग उनके मर्म तक नहीं पहुँच पाते। कभी-कभी लगता है उन पर बात हो।
वर्तमान परिस्थितियां दिल-ओ-दिमाग़ पर बहुत गहरा असर कर रही हैं। पंजाब के युवाओं को नशों की चपेट में आकर बेमौत मरते देखा,जिनके अभिभावकों के दर्द का एहसास हर पल सताता है। कारण ख़ुद अपने परिवारों से कई जवान बच्चे बर्बाद हो गए। आज देश की जो परिस्थितियां हैं उसमें भी सबसे ज्यादा प्रभावित युवावर्ग हो रहा है। व्यवस्था आज की हो या पहले की, कठोरता और संवेदनहीनता उसके साम्राज्य को स्थापित करने में हमेशा सहायक होती रही है। आज व्यवस्था की खामियों से लड़ते युवा जिन जोखिमों को उठा रहे हैं वे भी चिंताजनक हैं। अवसाद में घिरे युवा आत्महत्या करके अपनी जीवनलीला समाप्त कर रहे हैं और पीछे छोड़ रहे हैं एक अंतहीन खालीपन जिसकी कोई भरपाई नहीं।
दर्द के इस मंज़र को जब भी महसूस करती हूँ तो जुबां पर पंजाबी लोकगीत “छल्ला” अनायास ही आ जाता है जिसे सुनना हर पंजाबी के लिए बेहद तकलीफदेह रहा है। विरह तो पंजाबियों को विरासत में मिला है इसलिए ऐसे गीतों का असर उन्हें झकझोरे रखता है।
तो बात छल्ले की जिसके पंजाबी में दो रूप प्रचलित हैं। पहला हाथ की उंगली में बिना नग के डाले जाने वाली अँगूठी जिसे प्यार की निशानी माना जाता है और छल्ले का दूसरा रूप पंजाबी गायकी की एक शैली है जिसे गाकर कुछ गायक अमर और मक़बूल हो गये। पंजाबी लोकगीतों में “छल्ला” गीत बहुत प्रसिद्ध है, जिसकी कहानी बड़ी दर्दनाक है। इस लोकगीत में छल्ला घर के चिराग़ बेटे के लौटकर न आने के रूप में वर्णित है। इस लोकगीत को इनायत अली, शौक़त अली, आलम लुहार, आरिफ़ लुहार और गुरदास मान सरीख़े गायकों से लेकर आज के गायकों ने भी बड़ी मार्मिकता से गाया है। जिसने भी इसे गाया उसने अपने हिसाब से इसमें कुछ तबदीलियाँ करके ही गाया।
“छल्ला” कहानी पंजाब के उस हिस्से की है, जो आज पाकिस्तान में है। उस वक़्त के पंजाब में जल्ला उर्फ़ जलालदीन नाम का एक मल्लाह रहता था जो हर रोज अपनी नाव से मुसाफिरों को नदी के इस पार से उस पार ले जाता था। जल्ला का 12 साल का कम उम्र बेटा था, जिसका नाम छल्ला था। पिता के प्यार और अच्छी ख़ुराक के चलते कम उम्र में भी बेटा जवान लगने लगा था। जल्ला जब चनाब दरिया में नाव चलाता तो अपने बेटे छल्ला को भी अपने साथ ले जाता। एक रोज़ जल्ला बहुत बीमार पड़ गया जिससे वे नाव चलाने में असमर्थ हो गया। उसके नाव ना चलाने से लोगों को बहुत परेशानी हुई तो उन्होंने आ कर जल्ला से कहा कि वह खुद नाव नहीं चला सकता तो अपने बेटे को ही भेज दे। कहते हैं जल्ला अपने प्यारे बेटे को भेजना नहीं चाहता था लेकिन उसके बेटे छल्ला ने यह जिद पकड़ ली कि लोगों को पार उतारना तो हमारा कर्त्तव्य है, सो वह नाव लेकर जाएगा व साथ ही उस पार से अपने पिता के लिए दवाई भी लेता आएगा। जल्ला रोकता रह गया लेकिन छल्ला नहीं माना और चल दिया।
छल्ला नाव लेकर चला तो गया मगर छोटा और अभ्यास न होने से नदी में डांवाडोल होती नाव को संभाल न पाया। थोड़ी देर में ही छल्ला पानी में डूबकर मर गया। जब जल्ला को ये पता लगा कि उसका बेटा नहीं रहा तो वे दहाड़ें मार-मारकर रोने लगा, उनके उसी विलाप को लोककथा का रूप मिला। जल्ला महीनों नदी के किनारे बैठकर अपने बेटे को दर्दभरी आवाज़ों में पुकारता रहा। बेटे के वियोग ने उसे एक तरह से पागल कर दिया था। छल्ले की माँ बचपन में ही मर गयी थी। पुत्र बिछोह में उसकी कभी माँ बनकर तो कभी पिता बनकर दिल को चीरने वाली आवाज़ें लोगों को सुनाई देती रहीं। जल्ला को लगता कि छल्ले की मां जिंदा होती तो उसे संभालती। उसके आंचल की छांव में बेटा रहता तो कभी न मरता। छल्ला की मां को याद कर वह गाता ‘वे गल सुन छल्लेया, काँवां वे माँवाँ ठंड़ीयां छाँवाँ ’ यही गाते-गाते बाद में झल्ला पाकिस्तान के गुजरात सूबे में जाकर मर गया। आज भी वहां उनकी समाधि बनी हुई है और लोग उसकी पूजा करते हैं।
पंजाब के लोकगीतों में ये लोकगीत आज भी उसी सोज़ से गाया जाता है। “छल्ला” और “जल्ला” दोनों मर गए लेकिन उनकी यह कहानी लोकगीतों में अमर हो गई। जिन लफ़्ज़ों में पिरो के जल्ले ने अपना दर्द बयाँ किया वह आगे चलकर एक शैली में प्रसिद्ध हो गयी। इस गीत की शुरुआत भी विलाप करती हुई माँ के दर्द से होती है जो बेटे को वापस मोड़ लाने की लोगों से गुहार लगाती है और कहती है कि वो मुझसे रूठकर चला गया है। अल्लाह यदि मेरा लाल मुझको लौटा दे तो मैं अपनी जान भी उसके कदमों में न्यौछावर कर दूँगी.....
‘जावो नी कोई मोड़ ले आवो / मेरे नाल गया अज लड़ के
बेटे के न रहने से जल्ला एकदम अकेला हो गया। महीनों वो नदी के किनारे बैठकर अपने पुत्तर को आवाज़ें लगाता रहा। उसने नाव चलाना तो नहीं छोड़ा, लेकिन जब भी नाव नदी में खेवन जाता अपने बेटे को याद करके बहुत रोता। जीवन के इकलौते सहारे के न रहने से नाव में बैठा जल्ला नदी के पानी में हाथ डालकर हमेशा अपने पुत्तर को खोजता हुआ गाता। यह गीत दरअसल हर उस माँ-बाप की पीड़ा का प्रतीक बन गया जिसने असमय अपनी संतान को किन्हीं भी कारणों से खोया या गँवा दिया। समय के साथ इसमें बहुत से टप्पे जुड़ते चले गए लेकिन आज भी हर टप्पा जीवन में रिश्तों की गहराई के साथ एक गहन सोच और चिंतन के निचोड़ को दर्शाता है।
छल्ला बेरी बुर ए / वतन माही दा दूर ए / जाणा पहले पुर ए / गल सुण छल्लया चोरा / दिल नू लाया ए झोरा !(छल्ला तो अभी बेरी का कच्चा बूर ही था, फल के रूप में पका भी नहीं था। उस दिलबर-रहबर का
वतन तो बाहर दूर था, और वहां बाप होने के नाते पहले मुझे जाना था। ओ छल्ले, मेरी बात सुन,मेरे सुकून को चुराने वाले, तूने मेरे दिल को ये कैसा रोग लगा दिया।तू अभी भी वापस आ जा।)
छल्ला मुड़के नहीं आया / रोना उमरां दा पाया / ओ मल्या देस पराया / ओ गल्ल सुन छल्लया ढोला/
काहनूं पाना ए रौला।(छल्ला मुड़ कभी वतन या घर को लौटकर नहीं आया, जिसके वियोग ने अपनों को उम्रभर के रोने दे दिए हैं। आज के छल्ले रोजगार पाने के लिए पराए देशों में जाकर बस गए हैं जो वापस लौट कर नहीं आते।)
पंजाब से पलायन अभी भी बदस्तूर जारी है ज़्यादातर युवक एक बेहतर ज़िन्दगी की तलाश में अपने वतन को छोड़कर अमरीका, ऑस्ट्रेलिया, यूरोप और कनाडा जैसे मुल्कों में स्थाई रूप से बस गए हैं। पीछे माँ-बाप अकेले जिंदगियां जी रहे हैं।बहुत कम हैं जो हमेशा के लिए लौटते हैं। गाँवों से युवाओं की एक पूरी पीढ़ी गायब हो गयी है।अपनी बड़ी हवेलियों में बुजुर्ग अकेले जिंदा रहने के लिए जद्दोजहद कर रहे हैं। इस उम्मीद में, कि मरने से पहले अपने बच्चों को वो एक बार जरूर देख पाएंगे। तमाम तरह की सुविधाओं के वाबजूद भीतर का खालीपन किसी चीज़ से भर नहीं रहा। अपने गांव में ऐसे अनेक घरों को देखती हूँ जिनकी आँखें अपनों को देखने के लिए हर पल तरसती हैं। कुछ युवाओं को तो बीसियों साल हो गए परदेस में डेरा जमाए जो किन्हीं कारणों से चाहकर भी लौटकर आ नहीं सके। यह लम्बी जुदाई बहुत असहनीय है।
दोनों पक्षों के जिंदा होने के बावजूद लगता है कि जैसे एक रिश्ते की मौत हो गयी है। दोनों जिस दर्द को एक दूसरे से साझा करते थे, अब केवल छुपाते हैं। सो आज के छल्ले जिंदा हैं लेकिन अपनों से बहुत दूर बसे हुए हैं।जिम्मेदारियों के बोझ तले दबे दूर परदेसी हुए एक अलग दुनिया बसर कर रहे हैं।कमोवेश ये स्थिति अब पूरे भारतवर्ष की है जहाँ बच्चे अपने गांवों और शहरों से पलायन करके अपने ही देस में परदेसी बन बैठे हैं। बदलते परिवेश में मूल्यों के विघटन से कुछ माँ-बाप ऐसे अभागे भी हैं जो अपने बच्चों के पास होकर भी दूर रहने को अभिशप्त हैं। दूसरी तरफ नशों ने पंजाब के युवाओं की जिंदगियों को जिस तरह लील लिया, घर-परिवार जिस तरह तबाह हो रहे है,उन हालातों में ये गीत और भी प्रासंगिक हो उठता है।
जब यह गीत लिखा गया तब बेटों का ही वर्चस्व होता था और गीत के टप्पे में बेटियों को पराया धन कहकर संबोधित किया गया था। आज बेटे और बेटियों में कोई अंतर नहीं रह गया है। आज बेटों से ज्यादा बेटियां घर परिवार को संभाल रही हैं तो वक्त की नज़ाकत को देखते हुए गीत के बोलों को भी बदल दिया गया। उसमें जोड़ा गया कि अल्लाह सबको बेटियाँ दे, क्योंकि आज विदेशों में रह रहे बेटों के बाद मां-बाप का सहारा वही बनी हुईं हैं। बेटों के विदेशगमन के बाद पंजाब की बेटियों ने अपने घरों की जिम्मेदारियों को जिस मज़बूती से अपने कंधों पर उठाया, जहां तक कि खेतीबाड़ी भी अपने हाथों में संभाल ली थी, वह काबिलेतारीफ़ था।
इस गीत का मूल कथ्य व्यवस्था की उन जटिलताओं और अंतर्विरोधों की ओर इशारा करता है जिसके चलते आज भी लाखों-करोड़ों छल्ले अपने परिवारों से अपनी छोटी- छोटी ज़रूरतों के चलते बहुत दूर हैं। जीवन और मृत्यु के बीच ‘जल्ला’ और ‘छल्ला’ की यह कथा मन में पीड़ा भर देने वाली है। दरअसल सारी समस्या इस व्यवस्था की ही है जो बालश्रम करने को मजबूर करती आयी है और आगे चलकर भी उसने रूप बदल कर युवाओं को ‘देस होया परदेस’ कहने पर मजबूर किया है। आज का कड़वा सच यही है कि लोग अपनों से दुखों को साझा नहीं करते, बल्कि छिपाते हैं।
घरबार को छोड़कर दूर बसे बच्चे किन-किन कठिनाइयों से गुजरते हैं, कौन -कौन सी मुसीबतें उठाते हैं कभी अपने माँ-बाप को बता नहीं पाते और माँ-बाप लाख परेशानियों से गुजरते हुए भी सारे भेद छुपा जाते हैं। विस्थापन की इस पीड़ा के पीछे के अर्थशास्त्र को समझना भी जरुरी है जो इस आधुनिक ज़माने का क्रूर सच बन गया है। राजनीतिक दावपेंचों ने जिस व्यवस्था का निर्माण किया है, उसमें सबसे ज्यादा ठगा हुआ और बदहवास आज का युवा वर्ग है। बढ़ती हुई महंगाई और बेरोज़गारी ने उसे एक ऐसे मोड़ पर ला कर खड़ा कर दिया है जहाँ उसे हर तरफ़ बिखराव नज़र आता है।
वक्त के साथ हर कहानी अपने नए अर्थों में जिंदा रहती है। आज छल्ला भी युवा वर्ग का प्रतीक बन गया है। समकालीन परिदृश्य में ये कथा अनेक अर्थों में ध्वनित होती है। बदलते परिवेश ने और पूंजीवादी व्यवस्था ने मनुष्य को जितना स्वार्थी और निर्मम बना दिया है,इसकी कल्पना किसी ने नहीं की थी। घरों में बुजुर्गों की बे-अदबी और वृद्धाश्रमों में भेजे जा रहे बूढ़ों के दर्द को भी इस लोकगीत से जोड़कर देखा जा सकता है। जिन पुत्रों को वे अपनी सबसे बड़ी दौलत मानते थे और अल्लाह से सबको देने के लिए दुआएं करते थे,आज उन्हीं ने अपने जीवन से बड़ी बेदर्दी से बेदखल कर दिया है। आज ‘जल्ले’ केवल नदी किनारों पर ही नहीं घर-बाहर हर जगह अपने बच्चों को ढूँढ़ते मिल जायेंगे।
असल में ‘छल्ला’ गीत पारिवारिक रिश्तों,विछोह और दुखांत की दर्दभरी कहानी है जो हमें दुआएं मांगने के लिए प्रेरित करती है। ‘छल्ला’ बाप से जवान हो रहे बेटे के बिछुड़ने के दर्द, माँ बिहूणे बचपन , बेटियों के पराये होने,माता- पिता के चले जाने और अपनी मोहब्बत से दूर हो जाने के दर्द की गहरी टीस है और एक दुआ है कि रब सबको संतान का सुख दे।
इस तरह “छल्ला” 1930 के पहले की कहानी होकर भी आज हर पंजाबी क्या भारतीय के जीवन का हिस्सा बनी हुई है। हालाँकि छल्ले की कई सारी कहानियां सुनने को मिलती हैं लेकिन असली कहानी पुत्र के वियोग से ही जुडी है। कोई भी संवेदनशील मन इस छल्ले के दर्द को अपनों के विछोह से जोड़कर देख सकता है। नैतिक मूल्यों में आये इस विघटन के बाद भी ‘जल्ला’ और ‘छल्ला’ का संबंध नाबाद है और रहेगा।
(इस घटना के कई सालों के बाद नौटंकी थिएटर यानी बाद में पाकिस्तान थिएटर कहे जाने वाले एक थिएटर ग्रुप को चलाने वाले फ़ज़ल शाह ने इस कहानी को गाने की शक्ल दी। इस गाने को धुन में पिरोया उनकी बीवी अम्मान ने और उनके गोद लिए बेटे आशिक़ हुसैन जट्ट ने इस गीत को गाने की नींव रखी। 1934 में इस गाने को म्यूजिक कम्पनी HMV ने एल पी पर रिलीज़ किया। एल पी यानी वो बड़ी वाली गोल सी डिस्क जिसे आम तौर पर रिकॉर्ड भी बोला जाता है)
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दिल्ली विश्वविद्यालय के पी.जी.डी.ए.वी. कॉलेज (सांध्य) में कार्यरत प्रो. आशा रानी नारीवादी चेतना की प्रखर प्रवक्ता हैं। नारी विमर्श पर उनकी ‘स्त्री विमर्श की उलझनें’, ‘हिंदी स्त्री लेखन’ और ‘स्त्री साहित्य का सौंदर्य शास्त्र’ जैसी महत्वपूर्ण पुस्तकें आईं हैं। साथ ही ‘भारत का बदलता परिदृश्य और हिंदी साहित्य की भूमिका’ एवं ‘हिन्दी शोध:स्वरूप और संभावना’ जैसी शोधपरक पुस्तकों ने हिन्दी के शैक्षणिक जगत में विशिष्ट स्थान बनाया है। इन चर्चित पुस्तकों के साथ-साथ हिन्दी की विभिन्न पत्रिकाओं व पुस्तकों में उनके 60 के करीब आलेख प्रकाशित हो चुके हैं। वह दो वर्ष तक दिल्ली विश्वविद्यालय की एकेडमिक काउंसिल की सदस्य रहीं और उन्होंने दिल्ली विश्वविद्यालय की अनेक समितियों में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई। अपने लगभग तीन दशक के शैक्षणिक कैरियर में उन्हें कई सम्मान भी प्राप्त हुए हैं। उनके निर्देशन में दिल्ली विश्वविद्यालय से एक शोधार्थी को पीएचडी की उपाधि प्राप्त हो चुकी है और अनेक शोधार्थी उनके मार्गदर्शन में अपना शोधकार्य कर रहे हैं। ई-मेल asharani@pgdave.du.ac.in