प्रेमचंद की प्रासंगिकता स्वत:सिद्ध है लेकिन फिर भी इस विषय पर लिखने की उस समय तत्काल ज़रूरत महसूस हुई जब पिछले दिनों हिन्दी की एक चर्चित कथा-पत्रिका के संपादक ने (संभवतः अपनी तरफ ध्यान खींचने की गरज़ से?) ये बात कही कि प्रेमचंद के लिखे में करीब बीस कहानियों को छोड़ कर बाकी सब कूड़ा है।











