जब चीनी सैनिक ने हमारी फोटो खींच ली !!
संजीव शर्मा बीच-बीच में अपनी यात्राओं के सजीव वर्णन हमारे पाठकों के साथ साझा करते रहते हैं। हाल ही में वह एक मीडिया टीम के साथ भारत-चीन सीमा पर स्थित नाथू ला दर्रे की यात्रा पर गए थे। पूर्वी सिक्किम में हिमालय की ऊँची चोटियों के बीच स्थित नाथू ला कभी प्राचीन रेशम मार्ग (सिल्क रूट) का महत्वपूर्ण पड़ाव रहा है और आज देश के प्रमुख सीमावर्ती पर्यटन स्थलों में गिना जाता है। यहाँ भारतीय और चीनी सीमा चौकियाँ आमने-सामने स्थित हैं तथा दोनों ओर से पर्यटक बड़ी संख्या में पहुँचते हैं।
नाथू ला पास की रोमांचक यात्रा
…जब चीनी सैनिक ने हमारी फोटो खींच ली !!
चौदह हजार फीट से ज्यादा की ऊंचाई पर बर्फीली हवाओं और हिमालय की अद्भुत खूबसूरती के बीच हम दो देशों के बीच मौजूद अंतरराष्ट्रीय सीमा के विभिन्न पहलुओं को समझने का प्रयास कर ही रहे थे कि एकाएक चीन की सरहद से एक सैन्य कैमरामैन प्रकट हुआ और फटाफट हमारी फोटो खींचने लगा। बमुश्किल मिनट भर में वह अपना काम कर वापस चला गया। हम हैरान थे और कुछ कुछ खुश भी..हैरान इस वजह से की चीन को हमारी फोटो की क्या दरकार है?..और खुश इसलिए की हम चीन को कम से कम इतने खास तो लगे कि हमारी फोटो खींच कर रख ली।
खैर, यह तो हुई हल्के फुल्के अंदाज़ में कही गई बात लेकिन वहां तैनात भारतीय सैन्य अफसरों ने बताया कि इस सीमा पर यह सामान्य बात है। जब भी चीन को लगता है कि सरहद देखने सामान्य पर्यटकों के अलावा कुछ ख़ास लोग भी आएं हैं तो वे शायद अपने रिकॉर्ड के लिए तस्वीरें ले लेते हैं।चूंकि, हम लोग मीडिया टीम लेकर गए थे इसलिए सामान्य दर्शकों के लिए निर्धारित स्थान से आगे बढ़कर सरहद को काफी करीब से देख पा रहे थे इसलिए चीन के वहां तैनात सैनिकों को हम शायद खास लगे। वैसे, फोटो तो हमारी भारतीय सैनिकों ने भी खींची लेकिन उन्होंने किसी जासूसी के लिए नहीं बल्कि नाथू ला की तस्वीर जोड़कर बढ़िया सा स्मृति चिन्ह बनाकर देने के लिए खींची थी जिससे इस अद्वितीय सरहद की यात्रा की यादें हमेशा हमारे साथ रहें।
हम बात कर रहे हैं भारत-चीन की नाथू ला पास स्थित सरहद की। देश की दुर्गमतम सीमाओं में से एक नाथू ला पास में बाघा बॉर्डर जैसा कोई समारोहिक आयोजन तो नहीं होता पर बीपीएम (बॉर्डर पर्सनल मीटिंग) जरूर होती रहती हैं जिसमें सैन्य सामंजस्य कायम रखने पर चर्चा होती है। इन बैठकों के लिए यहां भारत की साइड छोटा एवं खूबसूरत सभागार भी बना हुआ है।
नाथू ला सीमा पर हिमालय की बर्फीली चोटियों, बादलों से आँख-मिचौली करते पहाड़ों और हाड़ कंपा देने वाली ठंड के बीच गर्मजोशी से भरे भारतीय सैनिकों एवं शान से लहराते हमारे राष्ट्रीय ध्वज को देखकर हमारे तन बदन में भी गर्माहट आ जाती है। इसलिए कहा जाता है कि कुछ यात्राएँ सिर्फ जगहें दिखाती हैं, कुछ यादें बन जाती हैं और कुछ ऐसी होती हैं, जिनका एक छोटा-सा प्रसंग बरसों तक चेहरे पर मुस्कान ले आता है। नाथू ला पास की यात्रा ऐसी ही है।
नाथू ला पहुंचना किसी चुनौती से कम नहीं है। हालांकि शानदार सड़क ने इस सफर को काफी हद तक आसान बना दिया है लेकिन पहाड़ी रास्तों का रोमांच कम नहीं हुआ है। गंगटोक से नाथू ला की ओर बढ़ने के कुछ समय बाद ही ऐसा लगने लगता है जैसे प्रकृति ने अपने सबसे खूबसूरत रंग इसी रास्ते के लिए बचाकर रखे हैं। सड़क कभी पहाड़ों को चीरती हुई आगे बढ़ती है, कभी गहरी घाटियों के किनारे से गुजरती है और कभी बादलों के इतने करीब पहुँच जाती है कि लगता है, हाथ बढ़ाकर उन्हें छू लें।
पूरे रास्ते में पहाड़ों पर पसरी हरियाली, देवदार के वृक्षों की कतारें और कहीं दूर फैली बर्फीली चोटियों के साथ यहां कतार में लगे हजारों विशाल सफेद ध्वज भी हमारा ध्यान खींचते हैं । हमारे ड्राइवर ने बताया कि बौद्ध संस्कृति में किसी की मृत्यु पर आत्मा की शांति के लिए ये झंडे लगाए जाते हैं। ऊंचे बांस के डंडों पर लगे 108 सफेद झंडे दिवंगत आत्माओं की शांति और उनके मोक्ष के लिए लगाए जाते हैं। तिब्बती बौद्ध धर्म और सिक्किम की स्थानीय भूटिया व अन्य संस्कृतियों में इस परंपरा का बहुत गहरा धार्मिक और आध्यात्मिक महत्व है।
जैसे जैसे हम शहर को छोड़कर आगे बढ़ते हैं, ऊँचाई बढ़ने के साथ हवा का मिजाज भी बदलने लगता है। गंगटोक की अपेक्षाकृत सहज आबोहवा पीछे छूटती जाती है और कड़ाके की ठंड धीरे-धीरे अपने तेवर दिखाने लगती है। यहां आने के लिए दमदार गरम कपड़े जरूरी हैं। वैसे, ठंड से बचाव के लिए रास्ते में अनेक ऐसी दुकानें हैं जहां से आप गरम कपड़े मामूली किराए पर ले सकते हैं ।
गंगटोक से करीब 40 किलोमीटर का फासला तय कर हम 12 हजार फीट की ऊंचाई पर स्थित छांगू लेक पहुंच जाते हैं। छांगू यानी त्सोमगो झील का मनमोहक सौंदर्य हमें ठहरने पर मजबूर कर देता है। पहाड़ों के बीच ठहरा हुआ इसका पानी कभी नीला, कभी धूसर और कभी आसमान के रंगों को अपने भीतर समेटे दिखाई देता है। पल पल बदलते मौसम के साथ झील का रंग भी पल पल बदलता रहता है। यहाँ प्रकृति किसी कलाकार की बनाई स्थिर तस्वीर नहीं, बल्कि हर पल बदलती हुई एक जीवंत पेंटिंग है। छांगू लेक पर रुककर आप गरमागरम चाय के साथ आगे की और दुर्गम यात्रा की तैयारी कर सकते हैं।
नाथू ला की यात्रा केवल प्राकृतिक सुंदरता का आनंद नहीं है क्योंकि जैसे-जैसे हम सीमा के करीब पहुँचते हैं, रोमांच में एक गंभीरता भी शामिल होने लगती है। यह एहसास लगातार गहरा होता जाता है कि हम उस जगह की ओर बढ़ रहे हैं, जहाँ भूगोल, इतिहास, कूटनीति और राष्ट्रीय सुरक्षा एक साथ दिखाई देते हैं।
यहां के मौसम का अंदाजा आप इस बात से लगा सकते हैं कि यहां दोपहर बाद प्रवेश नहीं मिलता । दरअसल, दोपहर 3 बजे के बाद नाथू ला पास पर मौसम बहुत तेजी से बदलता है। उस दौरान तापमान शून्य से नीचे तक चला जाता है और तेज बर्फीली हवाएं चलने लगती हैं इसलिए सेना शाम 4 बजे तक पूरे पास को खाली करवा देती है।
आखिरकार वह जगह आ गई, जहाँ पहुँचने के लिए हम इतने उत्साहित थे। लगभग 4,310 मीटर यानी 14,140 फीट की ऊँचाई पर स्थित नाथू ला पास भारत के सिक्किम और चीन के तिब्बत स्वायत्त क्षेत्र को जोड़ने वाला ऐतिहासिक दर्रा है। कभी यह प्राचीन सिल्क रूट का हिस्सा है, जहाँ से व्यापारी ऊन, रेशम और मसालों के साथ आवाजाही करते थे। आज इसकी पहचान भारत-चीन सीमा पर स्थित एक महत्वपूर्ण सामरिक क्षेत्र के रूप में है।
आमतौर पर मैदानी इलाकों में सर्दियों के दिनों में हम स्वेटर पहनकर ठंड से बच जाते हैं लेकिन यहाँ ऊँचाई, तेज हवा और कम ऑक्सीजन मिलकर मौसम का अलग ही रूप सामने लाते हैं। हवा चेहरे को छूती नहीं बल्कि चुभती हुई महसूस होती है। दस्ताने पहने हाथ भी कुछ समय बाद ठंड महसूस करने लगते हैं। कैमरा निकालने, मोबाइल पकड़ने और तस्वीर के लिए मुस्कुराने के बीच भी ठंड अपनी सतत् मौजूदगी का एहसास कराती रहती है।
नाथू ला पहुँचकर सबसे पहले निगाहें उन सैनिकों को तलाशती हैं, जो इस दुर्गम इलाके में देश की सीमाओं की निगरानी करते हैं। भारतीय सैनिकों की वर्दी, उनका अनुशासन और विपरीत परिस्थितियों में भी चेहरे पर दिखाई देने वाला आत्मविश्वास मन में सम्मान का भाव पैदा करता है। यहां, भारत चीन सीमा अन्य सरहदों से बिल्कुल अलग है। दोनों देशों की सैन्य इमारतें परस्पर सटी हुई हैं। यहां दोनों देशों के सैनिक न केवल एक दूसरे को देख सकते हैं बल्कि हाथ भी मिला सकते हैं। यहां तक की कंटीले तार भी घने एवं ऊंचे नहीं हैं। आप इन्हें लांघकर एक दूसरे देश की सीमा के जा सकते हैं लेकिन ये पूरी तरह से प्रतिबंधित है और सामान्य लोगों को यहां तक जाने की अनुमति नहीं है।
नाथू ला सीमा के इस तरफ हम और हमारे जैसे सैकड़ों लोग अपने कैमरों और मोबाइल फोन के साथ सरहद के साथ एक दूसरे की तस्वीरें लेने में जुट गए। आखिर, ऐसी जगह रोज-रोज जाने का अवसर कहाँ मिलता है! कभी सरहद को पृष्ठभूमि में रखकर तस्वीर, कभी तिरंगे के सामने साथियों के साथ सामूहिक फोटो और कभी ऐसी तस्वीर, जिसमें पीछे सीमा पर चीन की पहचान का दृश्य भी आ जाए।
वहीं, चीनी सैनिक हमारी फोटो अपने कैमरे में कैद कर रहे होते हैं। इस प्रसंग का एक दिलचस्प पहलू यह भी है कि हम अक्सर दूसरे देश को नक्शों, खबरों, राजनीतिक बयानों और अंतरराष्ट्रीय तनाव की भाषा में देखते हैं लेकिन जब उसके प्रतिनिधि को अपनी आँखों के सामने देखते हैं, तो वह देश हमारे लिए एक ठोस वास्तविकता बन जाता है। वैसे, देखा जाए तो सीमा की दूसरी ओर खड़ा व्यक्ति भी अपनी ड्यूटी निभा रहा होता है, वह भी किसी व्यवस्था का हिस्सा होता है और अपने दायित्वों में बँधा होता है।
हिमालय की इस ऊँचाई पर सामान्य काम में भी अधिक मेहनत लगती है। साँस कुछ भारी लग सकती है, चलते समय थकान जल्दी हो सकती है और मौसम पल भर में करवट बदल सकता है। यहाँ रोमांच का अर्थ केवल खूबसूरत दृश्य देखना नहीं, बल्कि प्रकृति की कठोरता को महसूस करना भी है। हालांकि, नाथू ला में तैनात भारतीय सैनिकों के लिए ये परिस्थितियाँ रोजमर्रा की जिम्मेदारी का हिस्सा हैं क्योंकि देश की सीमा की रक्षा करना केवल साहस का नहीं, धैर्य, प्रशिक्षण और लगातार सतर्क रहने का भी काम है।
यहाँ देशभक्ति किसी नारे की मोहताज नहीं होती। यह उन जवानों को देखकर महसूस होती है, जो कठिन मौसम में भी अपनी जिम्मेदारी निभा रहे हैं। यह उन पहाड़ों को देखकर महसूस होती है, जहाँ तक पहुँचने के लिए ही लंबा और चुनौतीपूर्ण सफर करना पड़ता है। यह उस जमीन पर खड़े होकर महसूस होती है, जिसके संरक्षण और सुरक्षा की जिम्मेदारी हमारे बहादुर सैनिकों के कंधों पर है। इसलिए, जब आप सीमा पर खड़े होते हैं, तो मन में सहज ही यह इच्छा उठती है कि भारत की सीमाएँ सुरक्षित रहें, दोनों देशों के बीच शांति बनी रहे और सैनिकों को अपने कर्तव्य का निर्वहन करते हुए भी किसी अनावश्यक तनाव का सामना न करना पड़े ।
नाथू ला से वापसी के समय पहाड़ फिर सामने थे। वही घुमावदार सड़कें, वही बादलों से ढकी चोटियाँ और वही बदलता मौसम लेकिन अब इन दृश्यों के साथ एक नया अनुभव जुड़ गया था। प्रकृति ने हमें अपनी विराटता दिखाई, ऊँचाई ने अपनी कठिनाई का एहसास कराया और भारतीय सैनिकों की मौजूदगी ने सम्मान का भाव जगाया । इसलिए, कभी अवसर मिले तो नाथू ला जरूर जाइए। वहाँ की सुंदरता देखिए, ठंड महसूस कीजिए, इतिहास को याद कीजिए और भारतीय सैनिकों के प्रति मन में सम्मान लेकर लौटिए।

संजीव शर्मा तीन दशक से ज्यादा समय से मीडिया में सक्रिय हैं और फिलहाल पत्र सूचना कार्यालय (PIB) शिमला में सहायक निदेशक का दायित्व संभाल रहे हैं। इससे पहले वह भोपाल में आकाशवाणी के समाचार केंद्र में कार्यरत थे। आपको प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और पूर्व उप राष्ट्रपति हामिद अंसारी के साथ जापान और अफ्रीकी देशों की यात्रा पर जाने का अवसर मिला है और इन यात्राओं पर केन्द्रित कर पुस्तक‘चार देश चालीस कहानियां’ काफी लोकप्रिय हुई है. इन्होने हाल ही में अयोध्या पर केन्द्रित ‘अयोध्या 22 जनवरी’ नामक किताब भी लिखी है. संजीव शर्मा का ‘जुगाली’ jugaali.blogspot.com के नाम से एक ब्लॉग भी है.