आश्रय-भ्रम – अनीता गोयल की नई कहानी
अनीता गोयल की नई कहानी की शुरुआत ऐसे होती है कि जैसे वो कोई कहानी ना होकर कोई निबंध हो – अप्रवासियों में मुद्दों पर या वैसा ही कुछ! धैर्य रखियेगा और आगे बढ़ियेगा। यह कहानी भी उतनी ही मार्मिक है जितनी उनकी पिछली कहानियाँ थीं! नए पाठक उनके नाम पर क्लिक करके सभी पिछली कहानियों को एक साथ देख सकते हैं। आज की कहानी विएतनाम से 1976 और उसके बाद के वर्षों में ऑस्ट्रेलिया पहुँचने वाले "बोट पीपल" (नाव द्वारा आए शरणार्थियों) में से एक छोटे से परिवार की है। यह कहानी सत्तर के दशक के विएतनामी शरणार्थियों से जुडी मानवीय संवेदनाओं को तो कहीं गहरे में पकड़ती ही है, साथ ही ऑस्ट्रेलिया में मूल निवासियों की त्रासदी को भी छूती हुई चलती है। कहानी अंत में कुछ प्रश्न भी उठाती है जिनके उत्तर, अनीता ने हमें बताया, वह अपनी अगली कहानी में खोजने की कोशिश करेंगी।
आश्रय-भ्रम – अनीता गोयल की नई कहानी
धरती, जल, वायु और अम्बर प्रकृति की देन है। इसे कौन बाँट कर कह सकता है कि इस पर रहने वाले प्राणियों को इसके स्वामी से स्वीकृति लेनी होगी। अहो दुर्भाग्य! मनुष्य को ही सबसे अधिक प्रबन्धन की आवश्यकता है। अगर छूट दे दी जाये तो जाने किन विनाश के द्वारों को पार कर जाये। ये भी सच है कि करुणा, दया और चिंतन की मानवीय भावनाएँ अभी विलुप्त नहीं हुई है। सभी के हालात और परिस्थितियाँ एक सी नहीं होती। भय, दुख और गरीबी की मार बेहाल कर देती है और ऐसे में किसी को सहारा या आश्रय देकर क्या कोई आश्रयदाता बन सकता है? सभी तो किसी न किसी का आसरा लिए हुए है।
प्राकृतिक संसाधनों और जीवन-स्तर की दृष्टि से ऑस्ट्रेलिया एक अत्यंत भाग्यशाली देश है। सरकार की अप्रवासियों के लिए और आश्रय मांगने वालो के लिए बहुत ही उदार नीति है। वैसे तो 1770 में जेम्स कुक ने ऑस्ट्रेलिया के पूर्वी तट पर झंडा गाड़कर ब्रिटेन के आधिपत्य का दावा किया था। कुछ वर्षों पश्चात् एक और जहाज़ नाविको, सैनिकों, अधिकारियो और कैदियों को लेकर लौटा और ऑस्ट्रेलिया की भूमि पर आश्रय लेकर इसे ही अपना उपनिवेश घोषित कर दिया। सभी अप्रवासियों को चाहे वो आक्रांता थे या शोषित - इस भूमि ने शरण दी लेकिन विडंबना देखिए कि यहाँ के प्रथम निवासी ही अपनी भूमि से बेदखल हो गए! प्रथम निवासियों की एक पूरी पीढ़ी ज़ब्त करने के करीब दो सौ सालों से ऊपर के बाद सन् 2008 में, यहाँ के तत्कालीन प्रधानमंत्री केविन रड्ड ने अपने एतिहासिक भाषण में ‘स्टोलन जनरेशन’ जुल्म के लिए, खेद व्यक्त करते हुए औपचारिक रूप से क्षमा माँगी। हाल ही में हर महत्वपूर्ण कार्य से पहले सरकार और प्रत्येक संस्थान, मूल निवासियों के पूर्वजों और बुजुर्गों को अपनी भूमि पर आश्रय देने के लिए आभार प्रकट करते हैं। ये और बात है कि मूल निवासी पश्चिमी संस्कृति के दबदबे के चलते अपनी पहचान को आज भी किसी कोने में बचा पाते हैं या नहीं। विडंबना यह है कि अढ़ाई सौ वर्ष पहले जिनके पूर्वज स्वयं इस भूमि पर आकर बसे थे, आज उनकी संतति यह तय कर रही है कि दूसरे देशों से आने वालों के लिए यहाँ जगह होगी या नहीं।
फ़िट्ज़रॉय नदी के मुहाने पर बसा रॉकहैम्प्टन नगर ऑस्ट्रेलिया में स्थित ब्रिस्बेन से लगभग 630 किलोमीटर की दूरी पर है। 40,000 वर्षों से (जी हाँ, चालीस हज़ार वर्षों से – ऐसा ही यहाँ के मूल निवासियों की श्रुति परंपरा बताती है) ये नगर, यहाँ के प्रथम मूल स्थानीय निवासियों के डारूम्बल संपदा क्षेत्र में आता है। 1850 के ‘गोल्ड रश’ के दौरान ही इस शहर ने वर्तमान यूरोपियन निवासियों को शरण दी। बहुत से लोग यहाँ सोने की तलाश में आए और निराश ही लौटे। सोना कुछ ख़ास उबलब्ध नहीं हुआ पर कुछ ने रुक कर इसे ऑस्ट्रेलिया की ‘बीफ कैपिटल’ बनाया। प्रगति की दौड़ से दूर रॉकहैम्पटन नगर आज भी बहुत ही धीमी गति से चलने वाला बेफ़िक्र शहर है। रॉकहैम्पटन और आस पास के क्षेत्रों में पशु-पालन ही मुख्य धंधा है। इस छोटे शहर ने बहुत से उतार चढ़ाव देखे। वर्तमान आँकड़ो के अनुसार अभी भी इसकी जनसंख्या एक लाख के नीचे ही है। सड़के चौड़ी है और घरों के आगे और पीछे की तरफ़ बहुत जगह होती है। इस नगर की शांत सड़कें, अपने खुले वातावरण के साथ, बाँहे फैलाकर हर आने वाले का स्वागत करती है।
रॉकहैम्पटन मुख्य शहर से थोड़ी दूर, अलमा स्ट्रीट पर लकड़ी के सुंदर ‘वेदरबोर्ड घर’ बने है। आमने सामने के घरों के बीच की सड़क बहुत चौड़ी है और दोनों और यूकेलिप्टस वृक्ष पंक्ति से लगे है। इसी गली में वियतनामी स्त्री थाओ का घर था। 86 वर्षीय थाओ की स्मृति धूमिल हो चली थी और वह चलने फिरने में भी असमर्थ थी। अपने छोटे से छोटे कार्य के लिए वो अपनी पोती नुआक़ पर आश्रित थी। रात के दो बजे थे और उसकी आँखे खुली थी। उसका बिस्तर खिड़की के साथ लगा था। खिड़की के ऊपर लगे जालीदार पर्दे कभी धीरे और कभी तेज हिल रहे थे। उसने कमरे पर एक दृष्टि डाली, एक तरफ़ कंप्यूटर मेज़ और कुर्सी रखी थी जिस पर नुआक़ काम करती थी। इस समय वो अपने कमरे में सो रही होगी। यह वास्तव में नुआक़ का अध्ययन कक्ष था, यहाँ उसने बीमार दादी के लिए एक तरफ़ पलंग लगा दिया था ताकि काम के साथ साथ दादी का भी ध्यान रख सके।
रात बीत ही नहीं रही थी, थाओ ने खिड़की से बाहर की तरफ़ देखा। हवा की तीव्र गति के कारण, बाहर लगे यूकेलिप्टस वृक्षों की शाखाएँ बीच बीच में पूरे उन्माद के साथ हिलती थी। इन वृक्षों की झूलती छाया ने थाओ के मस्तिष्क पर एक सम्मोहन का सा कार्य किया और उसे कुछ अड़तालीस वर्ष पूर्व वियतनाम ले गई। वियतनाम में उसकी आख़िरी रात उसके हृदय पर घाव कि तरह अंकित थी। न केवल वियतनाम छूटा, साथ साथ उसका पति, वो खेत खलिहान, समुंदर के तट, रिश्तेदार और मित्र, उसका यौवन, उसके पुत्र की मुस्कान सभी पीछे छूट गए। मन में टीस थी और किसी से कह नहीं सकती थी। समय चक्र भव्य साम्राज्यों का भी विमोचन करा डालता है तो ये तो फिर सामान्य सी दादी थाओ ही थी।
बिस्तर पर पड़े पड़े, वायु के साथ नीलगिरी वृक्षों और लैवेंडर पौधों की खुशबू मन को जैसे मरहम लगा रही थी। थाओ को 1978 के उस दिन का स्मरण हो उठा जब सारे गांव में खलबली सी मची थी। थाओ ने रात का भोजन अभी बनाया ही था कि उसका पंद्रह वर्षीय पुत्र तुआन डर और घबराहट के साथ दौड़ता आया और अपनी माँ से पिता के विषय में पूछा, ”बा, कहाँ है और कब तक आयेंगे? जब उन्हें पता है कि सैनिकों की टोलियाँ निकट ही आ पहुँची है, वो क्यों घर से निकले? जाने कौन कब उनका नाम ले दे? मैंने अपने एक मित्र से बात की है, हमें तड़के ही निकलना होगा। समय अधिक नहीं है, माँ तू सूखा खाना और बचे-कूचे पैसे बाँध ले”। कई महीनों से एक भय गाँव में फैला था। आज थाओ को भी, सुबह से ही, गांव की हलचल और ख़ुसपुस सुनाई दे रही थी। बहुत से परिवार, सुरक्षा और शरण के लिए इधर-उधर भाग रहे थे।
1975 में दक्षिणी वियतनाम की हार के बाद कई गांवों और शहरों में यहाँ के सरकारी और अमेरिकी समर्थकों की धरपकड़ अचानक ही शुरू हो जाती थी और लोग जान बचाने के लिए कुछ भी कर गुजरने के लिए बाध्य हो जाते थे। घोषणाएँ हो रहीं थी कि जो भी आत्मसमर्पण करेगा उसे उत्तरी वियतनाम की सरकार आश्रय देगी। अपने ही देश में आश्रय और उस पर भी लोगो को विश्वास नहीं था! 1978 में हालात और भी ख़राब होने लगे। एक और चीन के साथ युद्ध के बादल मंडराने लगे और दूसरी और ग़रीबी, भुखमरी, बीमारी के साथ साथ, पकड़े और मारे जाने के भय से दक्षिण वियतनाम से जनता का पलायन होने लगा। पहले ये शरणार्थी अमेरिका और कनाडा की तरफ़ गए, फिर मलेशिया, कंबोडिया और हांग-काँग में पनाह ना मिलने पर ऑस्ट्रेलिया और जर्मनी तक अपने जोखिम पर जाने को तैयार थे। उन दिनों संपर्क के माध्यम कम ही होते थे, पर फिर भी दो भाइयों - लाम बिन्ह और लाम टाक की ऑट्रेलिया की सफल यात्रा की कहानियाँ, समाचारों और नाव के लोगो के माध्यम से सभी वियतनामी लोगों ने अचरच से सुनी थी। अविराम यात्रा में संभावित मृत्यु को साथ लेकर अपने ही देश से भागने का निर्णय आसान नहीं था। लगभग दो महीने और लगभग 4000 किलोमीटर की समुंदरी यात्रा, लहरों के हिचकोले, भोजन का अभाव, समुंदर की दिन की गर्मी और रातों की ठंड, थकान और उफनती मतलियों के विवरण भी लोगो को अपना सब कुछ दाव पर लगाने से न रोक सके क्योंकि अंत में एक सुरक्षित और स्वर्ण नगरी की आशा की किरण की ऊष्मता, शक्ति और ऊर्जा प्रदान करने के लिए काफ़ी थी।
ऊपर हमने जिस वृद्ध महिला थाओ की बात की थी, उस पर वापिस आते हैं। 1975 की उथल-पुथल में उसके पति वैन डाओ ने साईगॉन (Saigon) पतन के बाद बहुत से पूर्व प्रबंधकों को सैनिकों के आघात से बचाया था और वह अपने गाँव का अघोषित नेता बन गया था। इसी कारण उसका नाम सरकारी खेमों में आने लगा और सत्ता परिवर्तन होते ही उसका सारा परिवार खतरे की चपेट में आ पड़ा। नाव यात्रा से देशत्याग करना कठिन था और इसमें देहत्याग भी हो सकता था, पर मरना तो न जाकर भी पड़ेगा, यही सोचकर थाओ के पति वैन डाओ ने एक मछुआरे मित्र के साथ नाव के रास्ते वियतनाम से भागने की योजना बनाई थी। कहाँ और कैसे जाएँगे सब भाग्य ने ही तय करना था। सारी जमा पूंजी इसी यात्रा के जुए पर लगा कर वह अपने कुछ मित्रों से मिलने निकला पर इसी बीच उत्तरी सैनिकों के धावे का शोर मच गया। थाओ को पूरा विश्वास था कि घंटे दो घंटे में उसका पति लौट आयेगा। होनी बलवान होती है और नियति तो अपना धारा प्रवाह आप ले लेती है।
डाओ की प्रतीक्षा में, उसकी पत्नी थाओ और पुत्र तुआन की नींद आँखों से उड़ी हुई थी। रात का पहला पहर ही होगा, अचानक शोर मचा और तुआन और थाओ दोनों भाग कर घर के पीछे के खेत की झाड़ियों में छिप गए। थाओ को खुली आँखों से स्पष्ट दिख रहा था कि बहुत सी काली परछाइयाँ उनके घर में घुसी, सामान गिरने की आवाज आई और घर घूँ धूँ करके जलने लगा। तुआन घबराकर रोने लगा, थाओ ने निर्णय लिया कि इस समय आगे बढ़ने में ही समझदारी है। कभी धीरे और कभी तेज कदमों से और कभी भागते हुए वो दोनों तट की और बढ़ने लगे। रास्ते में बर्बादी और विनाश के तरह-तरह दृश्य दिखाई पड़ रहे थे। तट से दो किलोमीटर पहले थाओ को एक अधमरी महिला के पास दो बच्चे दिखे, एक तीन वर्षीय लड़का होगा और एक क़रीब सात महीने की बच्ची थी जो अपनी अधमरी माँ से लिपटी थी। थाओ ने बच्ची को उठा लिया। तुआन अभी किशोर बालक ही था पर बहुत रुष्ट हुआ कि “अपना ही भागना मुश्किल है तो तू एक और मुसीबत क्यों ले रही है?” थाओ ने अपने किशोर को बिल्कुल चुप रहने की आज्ञा दी और आगे ही बढ़ती गई। बच्ची भी भूख और प्यास से अर्धचेतन थी सो कोई शोर न हुआ।
समुंदर किनारे वैन डाओ का मछुआरा मित्र मिल गया। पूछने पर थाओ ने उसे बताया कि छोटी बच्ची उसके रिश्तेदार की है, वो सब मारे गए है और इसका नाम नुआक़ है। वैन के मित्र ने थाओ से कहा, “आप चिंता न करे, मैं, इन मुश्किल क्षणों में, जो बन पड़ेगा, वो पूरा सहारा दूँगा”। थाओ को एक आशा थी कि शायद डाओ इधर आ ही जाये। जल्द ही अधेंरे में ही नाव यात्रा आरम्भ होनी थी। डाओ नहीं पहुँच सका और तीन यात्रियों के शुल्क में नुआक़ को बिना किसी रुकावट के सम्मिलित कर लिया गया। विधि का विधान और नुआक़ की भी यात्रा आरंभ हुई। पचास यात्रियों को पनाह देकर एक छोटी सी नाव अपनी परीक्षा के लिए निकल चली। थाओ ने नुआक़ को गोद लेकर कहा, “लड़की तू बहुत भाग्यशाली है, आज से मैंने तुझे आश्रय दिया”।
बीमार और अधमरी बच्ची आँखे कम ही खोलती थी। जाने कब ही दम तोड़ दे, इसीलिए थाओ का ध्यान उसकी तरफ़ मुड़ने लगा। तुआन युवक नहीं था पर बालक की श्रेणी में भी नहीं था। उसको जो भोजन मिलता था वो बहुत नाकाफी था और उसे नाव खेने में भी मदद करनी पड़ती थी। तुआन पिता खो चुका था, नाव की कठिन यात्रा पर था, दिन भर श्रम करता था और भर पेट भोजन भी नहीं मिलता था। इन परिस्थितियों में वह माँ का आँचल किसी अनजान शिशु के साथ बंट जाने से काफ़ी चिड़चिड़ा था। कठिन घड़ियों में भी थाओ बहुत धैर्य और समझदारी से काम लेती थी। लंबी यात्रा में नुआक़ के साथ होने का बहुत लाभ हुआ। थाओ के पास छोटा बीमार बच्चा होने से नाव के अतिरिक्त कार्य में उसे छूट दी जाती थी। हर दूसरे दिन दया से बच्चे के लिए दूध भी मिल जाता था। अपने ख़ून की खींच ही अलग थी, गोद में नुआक़ थी पर आखों में तुआन ही होता था। थाओ नुआक़ को आधा ही दूध देती थी और आधा तुआन को चुपके से पीने को देती। अब किसी तरह हालात का सामना करके थाओ, तुआन और नुआक़ को यह दुष्कर यात्रा करनी ही थी। इस यात्रा में दानव समुंदर ने समय समय पर कुछ यात्रियों की आहुति भी ली। जैसे-जैसे यात्रा के दिन बीतते थे, आशा और निराशा दोनों, प्रति दिन गहराकर, आँख मिचौनी खेलती थी। यात्रियों की देह, नाव संभालने और खेने का काम करती थी पर सबके भीतर का मानुख, सिंधु की विशालकाय लहरों में डूब रहा था।
आख़िर एक दिन समुंदर का शोर ख़त्म हुआ, भयानक रातों का अंत हुआ और सुबह की भोर के साथ नाव ऑस्ट्रेलिया के डार्विन शहर के किनारे लगी। वैन के वियोग में थाओ ने जाने कितने अश्रु बहाए थे पर तुआन को ही बचाकर नए देश ले आना उसके लिए एक नए जीवन को प्राप्त करने जैसा था। वो देख ही न पाई कि समुंदर का शोर और भय सिमट कर, कमज़ोर किशोर तुआन के भीतर घुसकर उसकी आत्मा को खा चुका था, केवल शरीर भर ही बचा था। भूमि दर्शन के कुछ ही क्षणों बाद, थाओ का दिमाग़ अनिश्चित भविष्य के बारे में सोचने लगा और वैन बिछोह का दुख, महासागर के साथ ही पीछे बह गया। पचास में से चालीस यात्री ही डार्विन भूमि पर कदम रख पाये। नन्ही अर्धजीवित नुआक़ भी इन चालीस भाग्यशाली यात्रियों में शामिल थी।
नाव के किनारे लगते ही कुछ स्थानीय मछुआरे और नागरिक भाग कर करीब आए और उन्होंने नाव से उतरने में लोगो की मदद की। फटे और मैले-कुचैले वस्त्रों में चालीस बेहद भूखे और प्यासे कंकाल, स्थानीय लोगो की सहायता से धरती पर उतरे। कुछ रो रहे थे, कुछ अपने जीवित होने पर हतप्रभ थे और बाक़ी के लड़खड़ाकर बेहोश होने को थे। स्थानीय लोगो के साथ संपर्क करना बहुत ही कठिन था क्योकि चालीस लोगो में से कोई भी अंग्रेजी नहीं बोलता था। थाओ की गोद में अर्धमृत सा शिशु था और उसने अपने एक कंधे से संत्रस्त तुआन को भी लगाया हुआ था। यही बेबसी का दृश्य पत्रकारों और स्थानीय लोगों के लिए काफ़ी था। स्थानीय लोगो ने इन सभी नाव यात्रियों को पास के एक विश्राम स्थल पर बिठाया और भाग-दौड़ करके सर्वप्रथम बच्ची के लिए कुछ दूध और बाज़ारी शिशु आहार उपलब्ध कराया। इतना भोजन तो थाओ और तुआन को किसी भी दिन पूरी यात्रा में न मिला। उनके व सभी अन्य शरणार्थियों के नेत्र आभार और अश्रुओं से भरे थे। स्थानीय सरकारी तंत्र भी इस समय फुर्ती से हरकत में आ गया। इस तरह नाव में लोगो का आश्रय मांगने के लिए आना उनके लिए नई बात नहीं थी पर केंद्र की नीतिया अब ग़ैर क़ानूनी तरीक़े से आए हुए प्रवासियों के लिए कुछ बदल रही थीं।
शाम तक सभी समाचारों में थाओ, कंधे से लगे बेजान तुआन और नुआक़ की तस्वीरे थी। जनता का एकमत आग्रह था कि असहाय दादी को छोटी बच्ची के साथ, पूरे स्नेह व सहानुभूति से स्वीकार करने में सरकारी कार्यवाही की प्रतीक्षा नहीं होनी चाहिए। सरकार ‘किसी को हाँ और किसी को नहीं’ की नीति नहीं अपनाना चाहती थी पर ऐसे तूल पकड़े मानवीय विषय को विवाद और चर्चा का विषय भी नहीं बनाना चाहती थी। मीडिया और जनता इस मुद्दे पर नैतिकता की जीत चाहती थी। बीमार नुआक़ के चित्रों से पूरे ऑस्ट्रेलिया का हृदय पिघल पड़ा। आश्रय-संरक्षण के अंतर्गत थाओ की काग़ज़ी कार्यवाही सबसे पहले हुई। ना केवल थाओ और तुआन को बल्कि पूरे चालीस नाव यात्रियों को ऑस्ट्रेलिया में आश्रय प्रदान किया गया। विश्व भर के समाचार पत्रों ने ऑस्ट्रेलिया सरकार की अत्यधिक प्रशंसा करते हुए कहा, अपने ही देश से निर्वासित स्त्री व नन्हे शिशु के लिए, संवेदनशील ऑस्ट्रेलिया ने अपने शरण के द्वार खोले। थाओ प्रसन्न थी कि उसने नुआक़ को आश्रय देकर, अपना व उस नाव से आने वाले सभी शरणार्थियों का ऑस्ट्रेलिया में आश्रय निश्चित कर दिया था।
सरकार ने थाओ को रॉकहैम्प्टन में एक घर दिया और एक अन्य वियतनामी परिवार के साथ जोड़ दिया। रॉकहैंप्टन का विकास बहुत ही मंद और शिथिल था, यहाँ नए पहुंचे कर्मशील हाथों का स्वागत हुआ। थाओ ने एक पशु पालन केंद्र में उस वियतनामी परिवार के साथ काम करना शुरू किया। इस केंद्र में ग़ैर भाषियों का स्वागत था क्योंकि वे आधे नक़द वेतन पर भी काम करने को तैयार थे। रॉकहैम्प्टन में एक बहुत छोटा सा वियतनामी समुदाय था। एक वियतनामी बुजुर्ग महिला छोटी नुआक़ की देखभाल के लिए राज़ी हो गई। वह एक और वियतनामी परिवार के आगमन से प्रसन्न थी। इस तरह रॉकहैम्पटन में पहली निशुल्क वियतनामी बालवाड़ी शुरू हुई। तुआन को अंग्रेज़ी भाषा बिल्कुल नहीं आती थी। उसका हुलिया रॉकहैम्टन के किशोरों से बिल्कुल अलग था। वहाँ के विद्यालयों में उसका मज़ाक़ उड़ता और उसका बिल्कुल मन न लगा। वो घर पर ही रहने लगा, उसकी एकमात्र मुस्कान नन्ही बढ़ती हुई नुआक़ की बातें थी।
थाओ काम में व्यस्त रहती। उसके लिए पानी की हर बूँद, खाने का हर कण और डॉलर का हर सेंट बहुत ही महत्वपूर्ण था। वह जी भरकर मेहनत करती और सोचती की कुछ पैसा जमा हो जाये तो किसी प्रकार अपने पति की खोज-खबर ले। नुआक अब स्कूल जाने लगी, थाओ और तुआन के लिए अंग्रेज़ी से वियतनामी भाषा का रूपांतरण करने लगी। स्कूल से आकर वो अपने समुदाय की बालवाड़ी जाती। वहाँ की बुजुर्ग महिला दस सेंट प्रति बटन का कार्य उठती और नुआक़ पाँच सेंट प्रति बटन लगाती ताकि अपनी लिए साबुन और शैम्पू जैसे सामान ला सके। नुआक़ को अपनी दादी और चाचा से बहुत स्नेह था। उसे यही पता था कि उसके माता-पिता साईगॉन पतन की अस्थिरता के दौर में मारे गए और दादा लापता है। उसके चाचा बहुत चुप रहते है और घर से बाहर भी नहीं निकलते और उसकी दादी बहुत ही परिश्रमी है। नुआक़ घर में अंग्रेज़ी गीत और कविताएँ गुनगुनाने लगी जो थाओ और तुआन को समझ ही नहीं आते थे।
थाओ को पुनःस्थापित होने के लिए रॉकहैम्प्टन से बेहतर भूमि नहीं मिल सकती थी। नुआक़ अपने अंग्रेज़ी गीतों व कविताओं के साथ साथ दादी व चाचा से प्रसन्न थी, दादी अपने नए सुरक्षित देश से। तुआन, जो पूरी नाव यात्रा में बच्ची के साथ लाए से नाराज था, आज नुआक़ गुड़िया की शाम को अधीरता से प्रतीक्षा करता था। आश्रय देने और लेने वाले दोनों ही प्रसन्न प्रतीत होते थे।
सभी प्राणी आदान-प्रदान पर निर्भर होते है। वास्तव में ऊपर से नीचे तक की श्रृंखला में सभी किसी ना किसी पर आश्रित है। कोई अकेला बसेरा नहीं कर सकता तो फिर किसी को काहे का मान। आज हम किसी को आश्रय दे तो क्या जाने कल हम ही उन पर आश्रित हो। आश्रय लेने और देने के बाद भी बहुत से प्रश्न उठते हैं। क्या ऑस्ट्रेलिया अपनी संरक्षण प्रदान करने की नीति को जारी रख पाएगा? थाओ को एक सुरक्षित और सुदृढ़ देश मिला पर क्या ये देश अपनी गोद में सहारा देकर उसके जीवन के पुराने घावों और संताप को भर सकता है? क्या कोई सुरक्षित आश्रय किशोर तुआंग के सभी भयावह अनुभवों की चोटों के निशानों को मिटा सकता है? क्या नुआक़ के, माँ से छिने जाने की कभी भी भरपाई की जा सकती है? क्या बालवाड़ी में नुआक़ का पाँच सेंट में बटन टाकना न्यायसंगत है? क्या भाषा न आने पर रॉकहैम्प्टन में आधे वेतन पर काम करना उचित है? जाने ये परिवार कभी एक आम जीवन व्यतीत करने में आंतरिक रूप से सबल भी हो पाएगा? और क्या ये विएतनामी परिवार ऑस्ट्रेलिया के कल के भविष्य में अपना योगदान करेगा? थाओ की कहानी और भी बहुत से प्रश्न कुरेदती है।
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अनीता गोयल, दिल्ली विश्वविद्यालय के भारती महाविद्यालय में 12 साल इतिहास पढ़ाने के बाद, मेलबर्न (ऑस्ट्रेलिया) जा कर बस गई। वहाँ उन्होंने विक्टोरियन स्कूल ऑफ़ लैंगुएजिज़ के प्रोग्राम के अंतर्गत कई बरस माध्यमिक स्तर पर हिंदी पढ़ाने का कार्य किया। अपने आस-पास के परिवेश के प्रति सजग उनकी रचनाएं सामाजिक संवेदना से सरोबर होती हैं।