बाज़ार और करवा चौथ
अभी कुछ दिन पहले देश के अधिकांश हिस्सों में करवा चौथ का त्यौहार खूब धूमधाम से मनाया गया। हमारी वेब-पत्रिका से इसी लेख के माध्यम से पहली बार जुड़ रहीं राकी गर्ग को यह थोड़ा अटपटा लग रहा है कि उन्होंने अपने बड़ों को जिस तरह का करवा चौथ मनाते देखा था, आज मनाया जा रहा करवा चौथ तो बिलकुल अलग स्वरुप का हो गया है। राकी बता रही हैं कि कैसे आज के करवा चौथ के तो सभी तार बाज़ार से जुड़े लगते हैं और यह कोई खरीददारी का उत्सव लगने लगा है जबकि कुछ दशक पहले यह एक गरिमामय उपवास भर होता था। त्यौहार पर होने वाले खर्च को आधुनिक अर्थशास्त्री अर्थव्यवस्था के लिए अच्छा लक्षण अवश्य मानते होंगे किन्तु क्या हमारे समाज को इस बात से कोई चिन्ता नहीं कि त्यौहार के बाज़ार और अनाप-शनाप खर्च से जुड़ जाने के कारण गरीब और अमीर का त्यौहार तो बिलकुल अलग तरह का हो जाता है और बहुत बार गरीब अपने को वंचित महसूस करता होगा। यह कुछ ज़रूरी प्रश्न हैं जिन पर राकी ने अपने लेख में विचार किया है।
बाज़ार और करवा चौथ
राकी गर्ग
व्यापारियों के शीर्ष संगठन ‘कन्फेडरेशन ऑफ ऑल इंडिया ट्रेडर्स’ द्वारा जारी किए गए आंकड़ों के अनुसार वर्ष 2025 के करवाचौथ पर देशभर के बाजारों में लगभग 28,000 करोड़ रुपये का रिकॉर्ड व्यापार हुआ था और यह अनुमान लगाया जा रहा है कि इस वर्ष यह आंकड़ा बढ़कर 33,000 करोड़ हो गया होगा। अब तो हर वर्ष करवा चौथ पर बाज़ारों में बहुत अधिक भीड़-भाड़ और उससे भी ज़्यादा सोशल मीडिया पर रीलें देखने को मिलती हैं। ये रीलें पहनने-सजने से लेकर करवा चौथ मनाने के अलग-अलग ढंगों जैसी बातों को लेकर बनाई जाती हैं। स्वाभाविक है कि जब यूट्यूब पर रीलें चलेंगी तो वहां विज्ञापन भी आयेंगे और महिलाओं और उनके पतियों को लुभाने के लिए तरह-तरह के विज्ञापन भी आते हैं। इस तरह से एक सहज -सरल व्रत को पूरी तरह बाज़ार पर निर्भर कर दिया गया है कि जैसे बिना नए परिधान और गहनों के यह त्योहार मनाया ही नहीं जा सकता।
पिछले तीन दशकों में हिंदी सिनेमा ने करवा चौथ को कुछ अलग ही ढंग से दिखाना शुरू कर दिया। 1995 में “दिलवाले दुल्हनिया ले जाएंगे” जिसमें शाहरुख़ ख़ान और काजोल मुख्य भूमिकाओं में थे, करवा चौथ का चित्रण धार्मिक अनुष्ठान के रूप में नहीं बल्कि प्रेम, प्रतीक्षा, और भावनात्मक समर्पण के रूप में कर दिया। उसके बाद तो करवा चौथ हिंदी फिल्मों में एक फ़ॉर्मूला ही बन गया और हम दिल दे चुके सनम (1999), कभी खुशी कभी ग़म (2001) और बागबान (2003) जैसी जाने कितनी ही हिट फिल्मों का हिस्सा बन गया। साधारणत: यह कहा जाता है कि साहित्य (और कला जिसमें आप सिनेमा को भी शामिल करेंग) समाज का दर्पण होता है लेकिन करवा चौथ के मामले में शायद समाज ने सिनेमा से मिले ‘ज्ञान’ को अपनाने में कंजूसी नहीं की।
वैसे कुछ ही बरस पहले की बात करें तो मैंने अपने घर में अपनी माँ, भाभियों को करवा चौथ पर कभी कुछ भी खरीदते नहीं देखा। शहर की बात तो अभी नहीं करती पर हमारे मोहल्ले में ही एक पंक्ति से करीब पंद्रह घर तो थे ही और इतने ही लगभग सामने की पंक्ति में थे। इतने घरों में शायद ही कोई परिवार ऐसा हो कि जिसके यहाँ धन का ऐसा अभाव रहा हो कि वे कुछ खरीद न सकते हों। कुछेक परिवार तो बहुत अधिक सम्पन्न थे पर कभी यह सुनने में नहीं आया कि किसी परिवार में कोई ख़ास खरीददारी हो रही है। ना ही ऐसा कोई प्रसंग सुनने को मिला कि पति ने भी व्रत रखा है और न ही किसी पत्नी या माँ ने इस बात का अहसान जताया कि उसने कितना बड़ा त्याग किया है और न ही खरीददारी की बात। हां , एक दिन पहले सुहागिनें हाथों में मेंहदी ज़रूर लगाया करती थीं और जिन्हें काम से समय नहीं मिल पाता, वे रात में नुआँ कर करती थीं यानी सिर्फ हाथों के पोरों पर मेहंदी लगाना और उसी से हाथ के पीछे दो लाइन खींचना। इतनी ही बस उनकी व्रत से पहले की तैयारी होती थी।
करवा चौथ का दिन भी हमारे यहाँ एक सामान्य दिन की तरह शुरु होता था। सरगी (तड़के तारों की छांव में खाना) का चलन का हमारे मोहल्ले में नहीं था। सूरज उगने से पहले पानी पीना या चाय जिसको आदत थी, वे पी लेते थे। ऐसा करने वालों की भी संख्या बहुत कम थी। रोज़ की तरह घर के सभी काम होते थे। नाश्ता, खाना, सफाई वगैरह। दोपहर में माँ और भाभी कोई भी साफ साड़ी, बस काली नीली न हो पहनकर , और अपने विवाह का ओढ़ना ओढ़कर करवा चौथ की कथा सुनती थीं। थाली फिराने की रस्म हमारे यहाँ नहीं होती थी।
शाम को रसोई में चूरमा, आलू टमाटर की रसेदार सब्जी, मूली का लच्छा और चूरमा के साथ खाने के लिए अरहर की हींग और जीरे की तड़के की दाल (दाल कोई जरूरी नहीं थी।) बनती थी । चाँद को चूरमा से जिमा और अर्ध्य देकर हमारी माएं और भाभियाँ जीमती थीं। इससे पहले उनके पति और बच्चे अक्सर जीम लिया करते थे, इसलिए कि वे फिर आराम से चाँद देखकर अपना व्रत खोल सकें। कुछ लोग साथ- साथ भी भोजन करते थे।
हम सब बच्चे चाँद देखने के लिए बार -बार छत पर जाते और कई बार वहीं रुककर चाँद का इंतजार करते थे। उस दिन रात में आसपास सब घरों की छतों पर किसी के बच्चे और किसी के पति चाँद का इंतजार करते हुए पाए जाते। फिर वह समय गपशप का भी हो जाता था। चाँद निकलते ही सुनाई देने लगता, “चाँद निकल आया है। चाँद दिख रहा है। “जल्दी आओ।
दरअसल हमारे यहाँ यह त्योहार परदेस कमाने गए पुरुषों, (पति और पुत्र) के स्वास्थ्य और सुरक्षा के लिए रखा जाता था। स्त्रियाँ उस समय अपने पतियों के साथ परदेश नहीं जा पाती थीं। संयुक्त परिवार होते थे। घर के बड़े बूढ़े महिलाओं का शहर में जाकर रहना उचित नहीं समझते थे। बहुत कम परिवार बहू- बेटियों को उनके पति के साथ शहर भेजते थे। और जो भेजते थे, दबी ज़बान से उनके इस कदम की आलोचना होती थी। ऐसे परिवार अक्सर सम्पन्न और समाज के प्रतिष्ठित व्यक्ति होते थे। धीरे-धीरे आवागमन के साधन अच्छे हो गए। लोग पत्नी और बच्चों के साथ कमाने के लिये अपने घर से दूर जाने लगे। लेकिन यह व्रत रखने की परंपरा बनी रही।
वैसे नारी स्वातंत्र्य के नाम पर इस व्रत को न रखने के लिए चर्चाएँ होती रहती हैं लेकिन सच तो यह है कि पहले इस उपवास के पीछे कोई लैंगिक भेदभाव (जेंडर डिस्क्रिमिनेशन) नहीं था। साल में शुक्ल पक्ष में 12 चौथ यानी चतुर्थी आती हैं। उनका व्रत रखने की एक मान्यता रही है। हो सकता है कि ऐसे उपवास स्वस्थ रहने की दृष्टि से भी महत्वपूर्ण होते हों। जैसे हर ग्यारस (एकादशी) का उपवास अभी भी बहुत लोग रखते हैं। यह व्रत मास की दोनों (शुक्ल पक्ष और कृष्ण पक्ष) एकादशी को रखा जाता है। इसी तरह कालान्तर में ऐसा चलन हो गया होगा कि यदि बारह नहीं तो वर्ष में दो चतुर्थी उपवास करना ही चाहिए। इस तरह एक कार्तिक माह की चतुर्थी (जो करवा चौथ है) और एक माघ की चौथ (सकट चौथ) का व्रत करना आवश्यक समझा जाने लगा। सकट चौथ का व्रत भी बिल्कुल करवाचौथ की तरह होता है लेकिन इस व्रत में अक्सर कोहरा ज्यादा होता है, चाँद मुश्किल से दिखता है। वैसे इस बार करवा चौथ पर भी बादल होने के कारण चाँद देश के कई हिस्सों में बहुत मुश्किल दिखा। वैसे चाँद कितना भी मुश्किल से दिखे लेकिन उतनी श्रद्धा से प्रेम से उसकी प्रतीक्षा करती थीं। लेकिन पहले इसमें बाजार कहीं नहीं था।
ऐसे त्योहारों पर फिज़ूलखर्ची की बजाय संपन्न परिवार समाज के लिए प्याऊ बैठाने, सामाजिक संस्थाओं की इमारतों की कुछ टूट-फूट ठीक करवाने, धर्मशाला आदि बनवाने का कार्य प्रसन्नता से करते थे। इसमें समाज प्रसन्नतापूर्वक जो जितना भी योगदान दे सकता, देता था। इसके साथ किसी निर्धन की पुत्री के विवाह में सहायता कर देना, किसी रिश्तेदार की बारात शहर से जा रही है तो समयानुसार जलपान या भोजन का प्रबंध कर देना, किसी के घर में कोई पुरुष कमाने वाला नहीं हो तो कभी -कभी उसकी आर्थिक सहायता कर देना, यह सब काम होते थे।
त्योहारों पर बहुत पैसा खर्च होते नहीं देखा। और इसलिए किसी को पैसे के अभाव में त्योहार ठीक से नहीं मना पाने का भाव भी नहीं आता था। सभी के त्योहार एक जैसे होते थे। अब जिसकी जैसी सामर्थ्य, उसका वैसा त्योहार है। अब बाजार का वर्चस्व है। शायद इसीलिए अब चाँद भी अक्सर नखरे करता है, दिखता नहीं, मानों कह रहा हो जब तुम लोग इतनी तैयारी करते हो तो मुझे भी दिखने की तैयारी करनी होगी।

सम्पादक एवं कवि राकी गर्ग ने सुप्रसिद्ध पर्यावरणविद अनुपम मिश्र के व्याख्यानों का संकलन एवं सम्पादन किया जो 'अच्छे विचारों का अकाल' शीर्षक से भारतीय ज्ञानपीठ से प्रकाशित हुई। बाल साहित्य में रवीन्द्रनाथ टैगोर एवं गोस्वामी तुलसीदास की जीवनी प्रकाशित। सुप्रसिद्ध जर्मन कवि रिल्के के पत्रों के अनुवाद की इनकी एक किताब भी आई है। इनका एक कविता संग्रह ‘दरवाज़े’ भी आ चुका है। एम.ए, और पीएचडी करने के बाद आजकल वह स्वतंत्र लेखन करती हैं।