आजकल हर प्रकार के विशिष्ट दिवस मनाने का चलन काफी बढ़ गया है और हम सब जानते हैं कि इन अधिकांश दिवसों के पीछे बाज़ार की ताकतें काम करती हैं. इसलिए 'फादर्स डे' को लेकर भी हम कोई इतना उत्साहित नहीं थे कि इस अवसर पर कोई विशेष लेख प्रकाशित करें लेकिन आज दोपहर जब हमारे वरिष्ठ स्तंभकार अजीत सिंह ने अपने बचपन का यह संस्मरण भेजा तो हमें लगा कि इसे तुरंत प्रकाशित करना चाहिए. आइये देखिए, अपने पिता से जुड़ा एक संस्मरण वह कितने जीवंत अंदाज़ में सुना रहे हैं.












